Election Commission ने TMC नाम और 'जोड़ा फूल' चुनाव चिह्न के उपयोग पर लगाई अंतरिम रोक
निर्वाचन आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों को पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा क्षेत्रों में छह अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव में पार्टी के नाम और ‘जोड़ा फूल’ चुनाव चिह्न का इस्तेमाल न करने का बृहस्पतिवार को निर्देश दिया। आयोग ने इन उपचुनावों के लिए ईवीएम से तृणमूल कांग्रेस का नाम और ‘जोड़ा फूल’ चुनाव चिह्न भी अस्थाई रूप से हटाने का फैसला किया। उसने दोनों गुटों को शुक्रवार को पूर्वाह्न 11 बजे तक अपनी पसंद का पार्टी नाम और चुनाव चिह्न सौंपने का भी निर्देश दिया।
निर्वाचन आयोग ने ममता बनर्जी और अरूप रॉय के नेतृत्व वाले दोनों गुटों के नेताओं का पक्ष सुनने के बाद बृहस्पतिवार रात जारी अपने अंतरिम आदेश में कहा कि इस मामले में ‘चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश 1968’ के प्रावधानों के तहत आयोग की ओर से ठोस निर्णय लिए जाने की आवश्यकता है। आयोग ने कहा कि फैसला होने तक कोई भी गुट तृणमूल कांग्रेस के नाम या पार्टी को आरक्षित ‘जोड़ा फूल’ चुनाव चिह्न का इस्तेमाल नहीं कर सकता। उसने कहा कि दोनों गुटों को 18 सितंबर को पूर्वाह्न 11 बजे तक अपनी पसंद के तीन नाम और तीन उपलब्ध चुनाव चिह्न जमा करने होंगे।
इस घटनाक्रम को ममता के लिए झटके के रूप में देखा जा रहा है, जिनका हाथ से बनाया गया ‘जोड़ा फूल’ चुनाव चिह्न 1998 में पार्टी की स्थापना के बाद से ही उसकी पहचान रहा है। अंतरिम आदेश में कहा गया है, “रिकॉर्ड पर मौजूद सभी जानकारियों पर ठीक से विचार करने के बाद... आयोग का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस में दो विरोधी गुट हैं, जिनमें से एक का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं और दूसरे की कमान अरूप रॉय संभाल रहे हैं।” इसमें कहा गया है, “अब हर गुट खुद के असली तृणमूल कांग्रेस होने का दावा कर रहा है, इसलिए चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैराग्राम 15 के तहत आयोग को इस मामले पर ठोस फैसला लेना होगा।” आयोग ने कहा कि दोनों विरोधी गुटों को समान अवसर देने और उनके अधिकारों व हितों की रक्षा करने के लिए, तथा पिछली मिसालों को ध्यान में रखते हुए उसने अंतरिम आदेश जारी किया है, ताकि मौजूदा उपचुनावों के उद्देश्य को पूरा किया जा सके। उसने कहा कि यह आदेश मामले में विवाद के अंतिम निपटारे तक जारी रहेगा।
आयोग ने कहा, “अरूप रॉय (याचिकाकर्ता) और ममता बनर्जी (प्रतिवादी) के नेतृत्व वाले दोनों में से किसी भी गुट को तृणमूल कांग्रेस पार्टी का नाम इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं होगी।” उसने कहा, “दोनों में से किसी भी गुट को तृणमूल कांग्रेस के लिए आरक्षित ‘जोड़ा फूल’ चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करने की अनुमति भी नहीं होगी।” आयोग ने कहा कि दोनों गुट अपने-अपने लिए चुने गए नामों से जाने जाएंगे और अगर वे चाहें तो अपनी मूल पार्टी तृणमूल कांग्रेस से जुड़ाव भी रख सकते हैं।
Allahabad High Court ने गवाहों के बयानों की Audio-Video रिकॉर्डिंग अनिवार्य करने का दिया आदेश
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को जांच अधिकारियों के लिए गवाह के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य करने का निर्देश दिया और कहा कि इस कदम से आपराधिक मामलों की जांच अधिक निष्पक्ष एवं पारदर्शी होगी। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने दहेज से जुड़े मामले में एक जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। इस मामले में अदालत में मौजूद जांच अधिकारी ने स्वीकार किया कि उसने भारतीय न्याय सुरक्षा संहिता की धारा 180 के तहत प्रथम सूचना देने वाले का बयान दर्ज करते समय उसकी ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की।
अदालत ने पाया कि बीएनएसएस की धारा 180(3) एक जांच अधिकारी को ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक संचार के जरिए गवाह के बयान दर्ज करने की अनुमति देती है। हालांकि, जब अदालत ने बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के संबंध में डीजीपी के 21 जुलाई, 2025 और चार अगस्त, 2026 को जारी परिपत्र के बारे में सवाल पूछा तो जांच अधिकारी ने अदालत से माफी मांगी। अदालत ने कहा कि उसके सामने ऐसे अनेक मामले आए हैं जिसमें जांच अधिकारियों ने डीजीपी के परिपत्र में विकल्प उपलब्ध कराए जाने के बावजूद ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग तैयार नहीं की।
अदालत के मुताबिक, कई मामलों में जांच अधिकारी स्वयं को इस आरोप से बचाने के लिए ऐसी रिकॉर्डिंग नहीं करते कि धारा 180 के तहत गवाहों के बयान खुद जांच अधिकारी द्वारा प्राथमिकी की नकल कर लिखे गए हैं। अदालत ने पाया कि डीजीपी के परिपत्र संख्या 24/2025 में एक दुष्कर्म पीड़िता के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य की गई है, जबकि अन्य बयानों की रिकॉर्डिंग वैकल्पिक छोड़ दी गई है। अदालत ने कहा कि इस विकल्प का कई जांच अधिकारियों द्वारा व्यापक ढंग से दुरुपयोग किया गया है।
इसलिए अदालत ने डीजीपी को बीएनएसएस की धारा 180 के तहत सभी बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य करने पर विचार करने का निर्देश दिया। अदालत ने डीजीपी को इस दिशानिर्देश से सभी जांच अधिकारियों को अवगत कराने का भी निर्देश दिया ताकि असली दोषी को सजा मिल सके और किसी बेगुनाह व्यक्ति को गलत जांच के कारण परेशान न होना पड़े। अदालत ने आगरा जिले के दहेज से जुड़े एक मामले में चंद्रकांत नाम के व्यक्ति द्वारा दायर जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए ये निर्देश पारित किए।
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