अमेरिका की धमकी के बाद BRICS देशों ने उतारे युद्धपोत, ट्रंप की उड़ी नींद!
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की गुंडागर्दी, दादागिरी और खुली सैन्य धमकियों ने दुनिया के कई देशों को अलर्ट मोड पर ला दिया है। अब हालात ऐसे बन चुके हैं कि ट्रंप अगर किसी पर भी हमला करें उससे पहले ही देश अपनी जवाबी तैयारियों में जुट गए हैं और इसी कड़ी में अब जो तस्वीर सामने आई है उसने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है। रूस, चीन और ईरान ने अपने युद्धपथ समंदर में उतार दिए हैं और यह सच भी है। पिछले कुछ समय से डोनाल्ड ट्रंप ने जो कदम उठाए हैं, उन्होंने दुनिया को झकझोर कर रख दिया। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अगवा कर लिया। रूसी तेल टैंकर पर कब्जा कर लिया। कई देशों में तख्तापलट की तैयारी कर ली। दक्षिण चीन सागर में लड़ाकू विमान उतार दिए। परमाणु युद्धपोतों की तैनाती शुरू कर दी।
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इन सब ने मिलकर एक साफ संदेश दिया कि अमेरिका अब कूटनीति से ज्यादा ताकत और धमकी की भाषा बोल रहा है। अमेरिकी हरकतों के जवाब में रूस ने खुली चेतावनी दी कि अगर जरूरत पड़ी तो अमेरिका पर परमाणु हमला भी किया जा सकता है। चीन भी साफ शब्दों में कह चुका है कि आग से मत खेलो। नॉर्थ कोरिया ने भी अमेरिका को ललकारते हुए कह दिया है कि अगर उकसाया गया तो तबाही तय है। मतलब साफ है दुनिया एक बार फिर शीत युद्ध से सीधे गर्म युद्ध की ओर आगे बढ़ रही है। अब इसी बीच एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया जिसने अमेरिका की टेंशन को और बढ़ा दिया। रूस, चीन और ईरान ने हिंद महासागर के पास दक्षिण अफ्रीका के समुद्री तटों पर बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया।
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हालांकि इसे आधिकारिक तौर पर ब्रिक्स अभ्यास नहीं कहा जा रहा लेकिन इसमें शामिल देशों की सूची इसका साफ संदेश दे रही हैं। चीन, रूस, ईरान और दक्षिण अफ्रीका यानी ब्रिक्स की सैन्य झलक। अब कहां हो रहा है यह अभ्यास? जान लीजिए। दरअसल यह युद्धाभ्यास दक्षिण अफ्रीका के समुद्री तटों के पास हिंद महासागर क्षेत्र में किया जा रहा। इस क्षेत्र की अहमियत बहुत बड़ी है। अंतरराष्ट्रीय शिपिंग रूट्स, तेल और गैस की सप्लाई लाइन एशिया, अफ्रीका और यूरोप को जोड़ने वाला रास्ता। यानी अगर यहां नियंत्रण हुआ तो वैश्विक व्यापार हिल जाएगा।
Greenland पर मेलोनी का साफ संदेश, युद्ध के लिए तैयार हो जाए यूरोप
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने बयान से दुनिया की राजनीति में हलचल पैदा कर रहे हैं। इस बार मामला ग्रीनलैंड का है। दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप जो राजनीतिक रूप से डेनमार्क का हिस्सा है। लेकिन अब अमेरिका इसे किसी भी कीमत पर अपने नियंत्रण में लेने की बात कर रहा है। ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा है कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण नहीं किया तो रूस या चीन वहां अपनी पकड़ मजबूत कर सकते हैं। अमेरिका किसी भी हाल में रूस या चीन को अपना पड़ोसी नहीं बनने देगा। ट्रंप के इस बयान के बाद यूरोप में चिंता बढ़ गई है। वाइट हाउस की ओर से यह संकेत भी दिए गए हैं कि ग्रीनलैंड को लेकर सैन्य विकल्पों को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है।
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यही बात यूरोपीय देशों के लिए सबसे बड़ी चिंता बन गई है क्योंकि ग्रीनलैंड का मुद्दा सीधे नाटो और यूरोप की सामूहिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। इसी बीच इस मामले पर इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी का बड़ा बयान सामने आया है। मेलोनी ने ग्रीनलैंड पर किसी भी तरह की सैन्य कारवाई का विरोध किया है। उन्होंने कहा है कि अमेरिका की सुरक्षा चिंताओं को समझा जा सकता है लेकिन उसका समाधान सैन्य कारवाई नहीं हो सकता। मिलोनी ने इस पूरे मामले में आर्कटिक क्षेत्र में नाटो की भूमिका को और मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया है।
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मेलोनी का साफ कहना है कि ग्रीनलैंड में मिलिट्री एक्शन किसी के भी हित में नहीं होगा और इसका असर सीधे नाटो पर पड़ेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इटली किसी भी सैन्य कारवाही का समर्थन नहीं करेगा। उनका मानना है कि सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को सहयोग और कूटनीति के जरिए सुलझाया जाना चाहिए। ग्रीनलैंड भले ही बर्फ से ढका हुआ एक विशाल द्वीप हो और यहां की आबादी सिर्फ 57,000 के आसपास हो, लेकिन इसकी रणनीतिक और आर्थिक अहमियत बहुत बड़ी है। भौगोलिक रूप से यह उत्तरी अमेरिका के बेहद करीब है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह डेनमार्क का हिस्सा है और इसकी संप्रभुता को अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है। ग्रीनलैंड सिर्फ बर्फ का इलाका नहीं है।
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