काम की बात: बिल्डर ने घर में कमी छोड़ी तो मरम्मत का खर्च आप क्यों दें? जानें RERA का अधिकार
नया घर खरीदने के बाद चाबी हाथ में आते ही ज्यादातर लोगों को लगता है कि अब सारी जिम्मेदारी उनकी है। लेकिन अगर कुछ समय बाद दीवारों में दरारें आने लगें, फर्श टूटने लगे या प्लंबिंग और दूसरी सुविधाओं में खराबी निकल आए तो जरूरी नहीं कि मरम्मत का खर्च भी खरीदार ही उठाए। RERA के तहत कुछ मामलों में बिल्डर की जिम्मेदारी घर का कब्जा मिलने के बाद भी बनी रहती है।
रियल एस्टेट रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट एक्ट, 2016 की धारा 14 के तहत RERA के दायरे में आने वाले प्रोजेक्ट में स्ट्रक्चरल डिफेक्ट और काम की गुणवत्ता, निर्माण, सेवाओं या एग्रीमेंट से जुड़ी तय खामियों के लिए प्रमोटर जिम्मेदार हो सकता है। यह जिम्मेदारी कब्जा मिलने की तारीख से पांच साल तक रहती है।
पांच साल के अंदर घर में आई खामी की शिकायत जरूरी
अगर घर में ऐसी कोई खामी सामने आती है तो खरीदार को उसे कब्जा मिलने के पांच साल के भीतर बिल्डर के संज्ञान में लाना होगा। शिकायत मिलने के बाद प्रमोटर को बिना अतिरिक्त पैसा लिए संबंधित कमी दूर करनी होती है। कानून के मुताबिक इसके लिए सामान्य तौर पर 30 दिन की अवधि है।
इसलिए सिर्फ साइट मैनेजर को फोन करके शिकायत करना पर्याप्त नहीं है। शिकायत लिखित में करें और समस्या कब सामने आई, यह साफ-साफ बताएं। साथ में फोटो, वीडियो, ईमेल और निरीक्षण रिपोर्ट जैसे सबूत संभालकर रखें। गंभीर स्ट्रक्चरल समस्या होने पर स्वतंत्र इंजीनियर या योग्य विशेषज्ञ की रिपोर्ट भी काम आ सकती है।
बिल्डर ने मरम्मत नहीं की तो क्या करें?
अगर बिल्डर तय समय में खामी दूर नहीं करता है तो खरीदार RERA के तहत उचित मुआवजे की मांग कर सकता है। मुआवजे की कोई एक तय रकम कानून में नहीं है। यह मामले की परिस्थितियों और नुकसान के आधार पर अलग-अलग हो सकती है।
खरीदार पहले प्रमोटर को औपचारिक पत्र भेजे। इसमें खामी मिलने की तारीख, समस्या का पूरा विवरण और उसे ठीक करने की मांग दर्ज करें। कब्जा पत्र, सेल एग्रीमेंट, फोटो, निरीक्षण रिपोर्ट, ईमेल और बिल्डर से हुई बातचीत का रिकॉर्ड भी सुरक्षित रखें।
RERA में कहां शिकायत करें?
RERA की धारा 31 के तहत पीड़ित होमबायर संबंधित रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी या मामले के अनुसार Adjudicating Officer के पास शिकायत कर सकता है। किस मंच पर जाना है, यह दावे की प्रकृति और संबंधित राज्य की RERA प्रक्रिया पर निर्भर करता है।
ध्यान रखें, पांच साल की अवधि कब्जा मिलने की तारीख से गिनी जाती है। इसलिए घर में खराबी दिखे तो इंतजार न करें। जल्दी शिकायत करें, सबूत संभालें और जरूरत पड़ने पर RERA का रास्ता अपनाएं।
सोना हाई से 15% तक गिरा: क्या आगे भी आएगी बड़ी गिरावट? ये कहता है इतिहास
सोने की कीमतों में सितंबर की शुरुआत में तेज गिरावट ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। 24 अगस्त को सोना 1,63,229 रुपए प्रति 10 ग्राम के हालिया हाई पर पहुंचा था। इसके बाद 1 से 3 सितंबर के बीच कीमत करीब 1.52 लाख से 1.59 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम के दायरे में आ गई। हालांकि, बाद में कीमतों में कुछ रिकवरी देखने को मिली। ऐसे में सवाल है कि सोने में 10-15% की गिरावट आखिर कितनी असामान्य है?
अगर पिछले करीब साढ़े चार दशक का इतिहास देखें तो ऐसी गिरावट सोने के लिए कोई नई बात नहीं है। फंड्सइंडिया रिसर्च के आंकड़ों के मुताबिक, 1980 से अब तक सोने में एक साल के दौरान औसतन करीब 13% का अधिकतम गिराव यानी इन्ट्रा-ईयर ड्रॉडाउन रहा। यानी साल के दौरान सोना अपने ऊपरी स्तर से औसतन 13% तक नीचे आया है।
गोल्ड में 10-15% की गिरावट कई बार हुई
ड्रॉडाउन का मतलब है किसी एसेट की कीमत का उसके पिछले उच्च स्तर से नीचे आना। उदाहरण के लिए, सोना 1 लाख रुपए तक पहुंचने के बाद 87 हजार रुपए पर आ जाए तो यह 13% का ड्रॉडाउन होगा।
इतिहास में 10-15% की गिरावट कई बार देखने को मिली है। 1984 में सोना 13%, 1985 में 12%, 1993 में 15%, 2004 में 13%, 2007 में 14% और 2009 में 12% तक गिरा। हाल के वर्षों में भी यही ट्रेंड दिखा। 2020 में 15%, 2021 में 13%, 2022 में 15% और 2023 में करीब 10% का ड्रॉडाउन रहा।
सोने में कई बार गिरावट 20% से भी ज्यादा रही
सोने में इससे कहीं बड़ी गिरावट भी देखी गई है। 1980 में सबसे बड़ा 40% का ड्रॉडाउन दर्ज हुआ। 1981 में 25%, 1982 और 1983 में 23-23% और 2006 में 22% की गिरावट आई। 2008 के ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के दौरान सोना 20% तक गिरा, जबकि 2013 में गिरावट 24% रही।
गिरावट के बाद भी साल पॉजिटिव रहा
दिलचस्प बात यह है कि साल के दौरान बड़ी गिरावट के बावजूद सोना अक्सर साल के अंत में फायदे में रहा। FundsIndia के विश्लेषण के मुताबिक, ऐसे वर्षों में 78% बार सोने ने कैलेंडर ईयर पॉजिटिव रिटर्न के साथ खत्म किया।
2008 में सोना 20% गिरा, फिर भी साल का रिटर्न 29% रहा। 2020 में 15% गिरावट के बावजूद सालाना रिटर्न 28% रहा। 2023 में 10% तक गिरने के बाद भी सोने ने साल में 15% का रिटर्न दिया।
इतिहास यह जरूर बताता है कि सोने में करेक्शन सामान्य है। लेकिन इससे यह तय नहीं होता कि मौजूदा गिरावट खत्म हो गई है या 2026 में कीमतें कहां जाएंगी। तेज रैली के बाद कुछ दिनों की बड़ी गिरावट डरावनी लग सकती है, लेकिन लंबी अवधि में सोने का सफर कभी सीधी रेखा में नहीं रहा।
(प्रियंका कुमारी)
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