कम बारिश से Rice Output 6.5 Percent घटने का अनुमान, 5.96 करोड़ टन स्टॉक देगा राहत
भारत में इस साल धान की पैदावार को लेकर चिंता बढ़ रही है। बारिश की कमी और फसल पकने के समय लंबे समय तक सूखा रहने से उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है। हालांकि, पिछले कुछ साल में जमा किए गए बड़े सरकारी भंडार के कारण घरेलू बाजार पर दबाव बढ़ने के बावजूद देश के चावल निर्यात पर तुरंत बड़ा असर पड़ने की संभावना कम बताई जा रही है।
भारत में इस साल चावल का उत्पादन घट सकता है। फसल पकने के अहम दौर में सामान्य से कम बारिश होने के कारण धान की पैदावार पर असर पड़ा है। उद्योग से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, दुनिया के सबसे बड़े चावल उत्पादक और निर्यातक भारत में इस साल उत्पादन करीब एक करोड़ मीट्रिक टन तक कम हो सकता है। इससे घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, इस साल भारत में चावल का उत्पादन करीब 14.4 करोड़ मीट्रिक टन रह सकता है। पिछले साल देश में रिकॉर्ड 15.4 करोड़ मीट्रिक टन चावल पैदा हुआ था। यानी इस बार उत्पादन में करीब 6.5 प्रतिशत की कमी आ सकती है। अगर ऐसा होता है तो यह 2009-10 के बाद उत्पादन में सबसे बड़ी गिरावट होगी। उस समय अल नीनो के कारण पड़े सूखे ने धान की फसल को काफी नुकसान पहुंचाया था।
चावल निर्यातक संघ के अध्यक्ष बीवी कृष्णा राव के अनुसार, पिछले कुछ हफ्तों से जारी लंबे सूखे ने दक्षिण और पूर्वी भारत के कई राज्यों में धान की पैदावार की क्षमता को प्रभावित किया है। फसल के अंतिम दौर में पर्याप्त पानी नहीं मिलने से दानों के विकास पर असर पड़ सकता है।
बारिश की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली है। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, एक जून से शुरू हुए चार महीने के मानसून के दौरान देश में सामान्य से करीब 15 प्रतिशत कम बारिश हुई है। कुछ प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में कमी इससे भी ज्यादा है और कई जगह यह 42 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 11 सितंबर तक गर्मी के मौसम में बोए गए धान का क्षेत्रफल करीब 4.268 करोड़ हेक्टेयर रहा है। यह पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले लगभग चार प्रतिशत कम है। देश के कुल चावल उत्पादन में गर्मी के मौसम की फसल की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से ज्यादा है, जबकि बाकी उत्पादन सर्दी के मौसम में बोई जाने वाली फसल से आता है।
गौरतलब है कि सर्दी के मौसम में बोई जाने वाली धान की फसल को लेकर भी चिंता बनी हुई है। ओलम एग्री इंडिया के उप प्रमुख नितिन गुप्ता ने बताया कि जलाशयों में पानी का स्तर सामान्य से नीचे रहने के कारण सर्दी के मौसम में धान की बुवाई का क्षेत्र भी घट सकता है। इसका असर आने वाले महीनों में कुल उत्पादन पर पड़ने की आशंका है।
उत्पादन घटने की खबरों के बीच घरेलू बाजार में चावल की कीमतें पहले ही बढ़ने लगी हैं। इसका असर निर्यात कीमतों पर भी पड़ा है और भारतीय चावल की कीमत एक साल से ज्यादा समय के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है। प्रीमियम किस्म के धान उगाने वाले किसानों को खुले बाजार में बेहतर दाम मिलने की उम्मीद है। ऐसे में वे सरकार को कम मात्रा में धान बेच सकते हैं।
हालांकि, उत्पादन घटने के बावजूद भारत के पास फिलहाल इतना बड़ा भंडार है कि तत्काल चावल की कमी होने की संभावना नहीं है। एक सितंबर तक देश में बिना कुटे धान समेत चावल का सरकारी भंडार करीब 5.96 करोड़ मीट्रिक टन था। यह एक अक्टूबर तक सरकार के तय 1.03 करोड़ मीट्रिक टन के लक्ष्य से कई गुना ज्यादा है।
बता दें कि यही बड़ा भंडार भारत के लिए सबसे बड़ी राहत है। दिल्ली स्थित एक वैश्विक व्यापार कंपनी के एक कारोबारी के अनुसार, मौजूदा भंडार के कारण भारत बिना किसी तत्काल निर्यात रोक के विदेशों में चावल की आपूर्ति जारी रख सकता है।
थाईलैंड और वियतनाम जैसे दूसरे बड़े निर्यातक देशों में भी चावल की कीमतें बढ़ रही हैं। ऐसे में अगर भारत अपने निर्यात को जारी रखता है तो वैश्विक बाजार में उसकी भूमिका बनी रह सकती है। दूसरी तरफ, घरेलू स्तर पर कम उत्पादन और बढ़ती कीमतों के बीच सरकार के सामने किसानों के हित और उपभोक्ताओं के लिए उचित कीमत बनाए रखने के बीच संतुलन की चुनौती रहेगी।
इस तरह इस साल कम बारिश ने चावल की फसल पर दबाव जरूर बढ़ाया है, लेकिन रिकॉर्ड भंडार भारत को तत्काल संकट से बचाने में मदद कर सकता है। आने वाले महीनों में सर्दी के मौसम की बुवाई, जलाशयों में पानी और घरेलू कीमतों की स्थिति यह तय करने में अहम भूमिका निभाने वाली हैं।
उत्तराखंड में Adani Power को क्यों मिली 1320 मेगावाट की परियोजना, सरकार ने दी सफाई
उत्तराखंड सरकार ने 1,320 मेगावाट की तापीय बिजली परियोजना को लेकर उठे सवालों पर बृहस्पतिवार को स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि टीएचडीसी इंडिया के एनटीपीसी की सहायक कंपनी होने के कारण इस परियोजना को राज्य सरकार के उपक्रम यूजेवीएनएल और टीएचडीसी इंडिया के संयुक्त उपक्रम के बजाय शुल्क आधारित प्रतिस्पर्धी निविदा के जरिए अदाणी पावर को दिया गया। उत्तराखंड के प्रमुख सचिव (ऊर्जा) डॉ. आर. मीनाक्षी सुंदरम ने यहां जारी बयान में कहा कि एनटीपीसी की ओर से टीएचडीसी को तापीय बिजली उत्पादन की अनुमति नहीं होने के कारण संयुक्त उपक्रम के प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ाया जा सका। इसके बाद प्रतिस्पर्धी निविदा के जरिए निजी कंपनी को परियोजना देने की प्रक्रिया अपनाई गई।
सुंदरम का यह स्पष्टीकरण कांग्रेस के उस आरोप के बाद आया है जिसमें कहा गया था कि अदाणी समूह को फायदा पहुंचाने के लिए राज्य सरकार ने परियोजना की निविदा की 86 में से 84 शर्तों को संशोधित कर दिया। सुंदरम ने इस आरोप को गलत बताते हुए कहा, ‘‘इसमें मुश्किल से पांच-छह बदलाव हुए होंगे। वे बदलाव भी भारत सरकार के नियमों के अनुरूप नियामक एजेंसी, उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग, से मंजूरी के बाद किए गए।’’ परियोजना को उत्तराखंड के बजाय देश के किसी अन्य राज्य में लगाने के विकल्प के बारे में उन्होंने कहा कि निविदा में उत्तराखंड में परियोजना लगाने पर कोई रोक नहीं थी।
यह विकल्प इसलिए रखा गया था ताकि कंपनियां ईंधन की उपलब्धता, परिवहन लागत और अन्य व्यावहारिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए प्रतिस्पर्धी दर की पेशकश कर सकें। उन्होंने कहा कि प्रतिस्पर्धी निविदा में पांच बड़ी कंपनियों ने हिस्सा लिया था और बाद में मूल्य बोली में तीन कंपनियां शामिल हुईं। सुंदरम ने कहा, ‘‘इनमें जो न्यूनतम निविदा थी, उसी को हमने (परियोजना) आवंटित की है।
इसे लेकर बाकी किसी फर्म ने कोई आपत्ति भी नहीं की थी।’’ प्रमुख सचिव ने कहा कि निविदा प्रक्रिया में सभी नियमों, प्रतिस्पर्धा और नियामकीय मंजूरियों का पालन किया गया तथा इसमें किसी एक कंपनी को फायदा पहुंचाने का कोई सवाल नहीं उठता है।
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