EPF Scheme 2026: तीन महीने घटा PF योगदान तो रिटायरमेंट फंड पर कितना पड़ेगा असर?
नए इम्पलॉय प्रोविडेंट फंड स्कीम 2026 में सरकार को खास हालात में पीएफ योगदान घटाने या कुछ समय के लिए टालने का अधिकार दिया गया। महामारी या राष्ट्रीय आपदा की स्थिति में कर्मचारी, नियोक्ता या दोनों के योगदान में अधिकतम तीन महीने तक बदलाव किया जा सकता है। इससे नौकरीपेशा लोगों की टेक-होम सैलरी कुछ समय के लिए बढ़ सकती है, लेकिन इसका असर उनके रिटायरमेंट फंड पर भी पड़ेगा।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि कर्मचारियों का PF योगदान अभी अपने आप कम हो जाएगा। यह प्रावधान तभी लागू होगा, जब महामारी या राष्ट्रीय आपदा की स्थिति में सरकार इसके लिए अलग से आदेश जारी करेगी। ऐसा कोई आदेश नहीं होने पर PF योगदान सामान्य तरीके से चलता रहेगा।
अभी कितना जमा होता है PF?
मौजूदा व्यवस्था में लागू नियमों के तहत कर्मचारी और नियोक्ता आमतौर पर बेसिक सैलरी और DA का 12-12% योगदान करते हैं। नए प्रावधान के तहत आपात स्थिति में सरकार कर्मचारी, नियोक्ता या दोनों का योगदान अस्थायी तौर पर कम या स्थगित कर सकती है।
अगर कर्मचारी का योगदान घटाया जाता है तो हर महीने सैलरी से PF की कटौती कम होगी। इससे हाथ में आने वाली रकम बढ़ेगी और मुश्किल आर्थिक हालात में परिवार को कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। PF में कम पैसा जाने से रिटायरमेंट के लिए जमा होने वाली रकम घट सकती है।
6 हजार की जगह 5 हजार रुपए जमा हुए तो?
इसे एक उदाहरण से समझिए। मान लीजिए हर महीने कर्मचारी के हिस्से से 6,000 रुपए PF में जाते हैं। इसे तीन महीने के लिए घटाकर 5,000 रुपए कर दिया जाता है। ऐसे में हर महीने 1,000 रुपए कम जमा होंगे और तीन महीने में कुल 3,000 रुपए का अंतर आएगा।
नुकसान सिर्फ इन 3,000 रुपए तक सीमित नहीं होगा। इस रकम पर भविष्य में मिलने वाला ब्याज और कंपाउंडिंग का फायदा भी नहीं मिलेगा। खासतौर पर करियर के शुरुआती वर्षों में योगदान कम होने का असर ज्यादा हो सकता है, क्योंकि उस रकम को कई वर्षों तक ब्याज कमाने का मौका मिलता।
नियोक्ता का हिस्सा घटा तो भी असर
अगर सरकार कर्मचारी के बजाय नियोक्ता का PF योगदान कम करती है, तब भी रिटायरमेंट कॉर्पस प्रभावित हो सकता है। कितना असर होगा, यह योगदान में कटौती की रकम, उसकी अवधि और रिटायरमेंट में बचे समय पर निर्भर करेगा।
वहीं, योगदान घटाने और उसे टालने में अंतर है। अगर योगदान केवल स्थगित किया जाता है तो उसका भुगतान बाद की तारीख से दोबारा शुरू या जमा कराया जा सकता है। ऐसे मामले में क्या व्यवस्था होगी, यह सरकार के संबंधित आदेश की शर्तों से तय होगा।
ज्यादा PF जमा करने का भी विकल्प
नई व्यवस्था में कर्मचारी वैधानिक वेतन सीमा से ज्यादा वेतन पर अपनी इच्छा से अतिरिक्त PF योगदान कर सकता है। हालांकि, कर्मचारी जितनी अतिरिक्त रकम जमा करेगा, उतनी रकम नियोक्ता के लिए भी जमा करना जरूरी नहीं होगा। महामारी या दूसरी आपात स्थिति में इस तरह के स्वैच्छिक योगदान का क्या होगा, यह उस समय सरकार की ओर से जारी आदेश पर निर्भर करेगा।
(प्रियंका कुमारी)
Dollar vs Rupee: डॉलर के मुकाबले 96 के पार पहुंचा रुपया, 3 साल बाद Fed ने बढ़ाईं ब्याज दरें
भारतीय रुपये पर एक बार फिर दबाव बढ़ गया। गुरुवार, 17 सितंबर को डॉलर के मुकाबले रुपया 96 का अहम स्तर पार कर गया। शुरुआती कारोबार में रुपया करीब 96.03 प्रति डॉलर तक पहुंच गया। पिछले कारोबारी दिन यह 95.95 के आसपास बंद हुआ था। जुलाई के बाद यह पहला मौका है, जब रुपया 96 के पार गया।
भारतीय रुपए में आई इस कमजोरी के पीछे सबसे बड़ी वजह अमेरिकी फेडरल रिजर्व का ब्याज दरें बढ़ाने का फैसला है। फेड ने तीन साल से ज्यादा समय बाद पहली बार ब्याज दर में बढ़ोतरी की। ब्याज दर 0.25% बढ़ाकर 3.75% से 4% के दायरे में कर दी गई। फेड ने कहा है कि अमेरिका में महंगाई अब भी ऊंची बनी हुई और इसे 2% के लक्ष्य की तरफ लाने के लिए यह कदम उठाया गया।
आगे भी बढ़ सकती हैं अमेरिकी ब्याज दरें
बाजार की चिंता सिर्फ इस बढ़ोतरी तक सीमित नहीं है। फेड के अनुमानों ने आगे भी सख्त मॉनेटरी पॉलिसी जारी रहने के संकेत दिए हैं। इससे अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ है और दूसरी एशियाई करेंसी पर दबाव बढ़ा है। डॉलर इंडेक्स भी सात हफ्ते के ऊंचे स्तर के आसपास पहुंच गया।
सीआर फॉरेक्स एडवाइजर्स के एमडी अमित पाबारी के मुताबिक, रुपया पिछले दो सेशन से 96 के आसपास बना हुआ था और अब ग्लोबल हालात इसके लिए ज्यादा मुश्किल हो गए हैं। अगर रुपया लगातार 96 के पार बना रहता है तो डॉलर के मुकाबले 96.30 से 96.50 तक का स्तर देखने को मिल सकता है।
महंगा कच्चा तेल भी बढ़ा रहा मुश्किल
रुपये के लिए दूसरी बड़ी परेशानी कच्चे तेल की कीमत है। ब्रेंट क्रूड में कुछ नरमी जरूर आई है, लेकिन भाव अब भी 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है। पश्चिम एशिया में तनाव के कारण सप्लाई को लेकर चिंता बनी हुई है।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में महंगा क्रूड डॉलर की मांग बढ़ा सकता है और रुपये पर दबाव डाल सकता है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की निकासी भी रुपये की मुश्किल बढ़ा रही है।
अब RBI पर भी रहेंगी नजरें
Fed के रेट बढ़ाने के बाद अब नजरें भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) पर हैं। RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की बैठक अक्टूबर की शुरुआत में होनी है। महंगा कच्चा तेल और महंगाई का दबाव बना रहा तो ब्याज दरों को लेकर RBI के अगले कदम पर बाजार की खास नजर रहेगी।
(प्रियंका कुमारी)
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