40 मिनट योग, सूर्यास्त के बाद कुछ नहीं खाते! जानें 76 की उम्र में भी इतने फिट कैसे हैं PM मोदी
PM Narendra Modi 76th Birthday: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज अपना 76वां जन्मदिन मना रहे हैं. 76 साल की उम्र में भी पीएम मोदी अपनी सेहत और फिटनेस का खास ख्याल रखते हैं. देश के लाखों लोग उनकी असीम ऊर्जा और तंदुरुस्ती से प्रेरणा लेते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस उम्र में भी उनकी इस जबरदस्त फिटनेस का राज क्या है? आखिर कैसे वह खुद को लगातार इतना चुस्त-दुरुस्त रख पाते हैं? पीएम मोदी कई मौकों पर खुद यह बता चुके हैं कि वह नियमित योगाभ्यास और बेहद संतुलित आहार का सेवन करते हैं.
सूर्यास्त के बाद खान-पान से करते हैं परहेज
वज्रासन, सेतुबंधासन, भुजंगासन और उत्तानपादासन जैसे योगाभ्यास उनकी फिटनेस का मुख्य आधार हैं. इसके अलावा वह रोजाना करीब चार घंटे ही सोते हैं और शाम को सूर्यास्त के बाद खान-पान से पूरी तरह परहेज करते हैं. केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन ने भी एक बार कहा था कि वह पीएम मोदी के हेल्दी लाइफस्टाइल और रूटीन से बेहद इंस्पायर हैं. रोजाना करीब साढ़े तीन घंटे सोना, सुबह तड़के उठना और शाम 6 बजे के बाद खाने से दूर रहना उन्हें इस उम्र में भी फिट रखता है. पीएम मोदी बेहद सादा और सुपाच्य भोजन लेना पसंद करते हैं, जिसमें अक्सर दाल, चावल, हरी सब्जियां और सादी खिचड़ी शामिल होती है.
रोज सुबह 40 मिनट योग और घास पर वॉक की आदत
पीएम मोदी के दिन की शुरुआत योग से होती है और वह रोज सुबह करीब 40 मिनट योग करते हैं. इसकी शुरुआत सूर्य नमस्कार और प्राणायाम से होती है, जिसके बाद वह कई प्रमुख आसन करते हैं. अनिद्रा और मानसिक थकान से बचने के लिए वह सप्ताह में दो बार योग निद्रा भी लेते हैं. इसके अलावा उन्हें सुबह एक्सरसाइज के बाद नंगे पैर हरी घास पर टहलना पसंद है. डॉक्टरों का भी मानना है कि डेली वॉक करने से एक्स्ट्रा कैलोरी बर्न होती है, जिससे शरीर बड़ी बीमारियों से दूर रहता है और एंग्जायटी या डिप्रेशन जैसी समस्याओं से भी राहत मिलती है.
ब्रेकफास्ट और डिनर का खास मेन्यू
पीएम मोदी पूरी तरह शाकाहारी हैं और अक्सर नवरात्रि या अन्य मौकों पर व्रत भी रखते हैं. वह सुबह 9 बजे के आसपास हल्का नाश्ता करते हैं. 'फिट इंडिया' कार्यक्रम में उन्होंने बताया था कि उन्हें सहजन यानी मोरिंगा के पराठे बेहद पसंद हैं और वह सप्ताह में दो बार इसे जरूर खाते हैं क्योंकि यह पोषक तत्वों से भरपूर होता है. रात के खाने में वह ज्यादातर हल्की गुजराती खिचड़ी ही लेते हैं और सूर्यास्त के बाद कुछ भी खाने से बचते हैं.
आहार नियम: क्या खाएं और क्या नहीं
'परीक्षा पे चर्चा' कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी ने बच्चों को सीजनल फ्रूट्स और मिलेट्स यानी बाजरा, मक्का और रागी जैसे पौष्टिक मोटे अनाज खाने की सलाह दी थी. उन्होंने कहा था कि हमारे देश में मौसमी फलों को प्रसाद रूप में ग्रहण करने की सुंदर परंपरा है. पीएम मोदी खुद भी जंक फूड, ऑयली खाने और मैदे से बनी चीजों से सख्त परहेज करते हैं. उन्होंने यह भी बताया था कि हमारे 32 दांत हैं, इसलिए भोजन को कम से कम 32 बार चबाकर ही खाना चाहिए.
फिर सीएम बनने वाले हैं नीतीश कुमार? जानें क्यों हो रही है ये चर्चा
बिहार की राजनीति में एक बार फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लेकर गठबंधन बदलने की अटकलें तेज हो गई हैं. इसकी वजह राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के विधायक भाई वीरेंद्र का वह बयान है, जिसमें उन्होंने नीतीश कुमार से भारतीय जनता पार्टी (BJP) का साथ छोड़कर आरजेडी के साथ सरकार बनाने की अपील की है. 15 सितंबर 2026 को दिए गए इस बयान के बाद बिहार के राजनीतिक गलियारों में पुराने गठबंधन समीकरण और नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा फिर चर्चा में आ गई है.
हालांकि, किसी राजनीतिक नेता के बयान और वास्तव में गठबंधन बदलने के फैसले के बीच बड़ा अंतर होता है. फिलहाल उपलब्ध जानकारी में नीतीश कुमार या जेडीयू की ओर से एनडीए छोड़ने की कोई घोषणा नहीं हुई है.
भाई वीरेंद्र ने नीतीश को क्या ऑफर दिया?
आरजेडी विधायक भाई वीरेंद्र ने सार्वजनिक तौर पर नीतीश कुमार को बीजेपी से अलग होने और आरजेडी के साथ सरकार बनाने का न्योता दिया. उन्होंने समाजवादी विचारधारा वाले दलों को एक साथ आने की बात कही. यह बयान ऐसे समय आया है जब बिहार में समान नागरिक संहिता यानी UCC को लेकर राजनीतिक बहस तेज है.
भाई वीरेंद्र ने बीजेपी पर भी निशाना साधा और दावा किया कि नीतीश कुमार के राजनीतिक हितों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश हो रही है. उनके बयान का राजनीतिक संदेश साफ है आरजेडी एक बार फिर जेडीयू के साथ संभावित गठबंधन की संभावना पर सार्वजनिक रूप से बात कर रही है.
UCC बना नई सियासी बहस का केंद्र
नीतीश कुमार को आरजेडी की ओर से मिले इस ऑफर की पृष्ठभूमि में UCC का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है. बीजेपी की ओर से देशभर में UCC को लेकर जोर दिया जा रहा है, जबकि जेडीयू ने बिहार में इसके लागू होने को लेकर अलग रुख जाहिर किया है. जेडीयू नेता श्याम रजक ने भी नीतीश कुमार के पुराने रुख का हवाला देते हुए पार्टी की स्थिति स्पष्ट की है.
यही मतभेद विपक्ष को एनडीए के भीतर संभावित असहमति का मुद्दा उठाने का मौका दे रहे हैं. हालांकि, किसी मुद्दे पर सहयोगी दलों की अलग राय होना अपने आप में गठबंधन टूटने का संकेत नहीं माना जा सकता.
नीतीश कुमार का गठबंधन इतिहास क्यों चर्चा में?
नीतीश कुमार की राजनीति में गठबंधन बदलने का इतिहास रहा है. 2013 में उन्होंने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश किए जाने के बाद बीजेपी से अपना पुराना गठबंधन तोड़ दिया था. इसके बाद 2017 में वह आरजेडी के साथ बने महागठबंधन से अलग होकर फिर एनडीए में लौटे.
2022 में नीतीश कुमार ने बीजेपी से संबंध खत्म कर आरजेडी और अन्य सहयोगी दलों के साथ सरकार बनाई. इसके करीब डेढ़ साल बाद जनवरी 2024 में उन्होंने महागठबंधन छोड़कर एक बार फिर एनडीए का रुख किया.
यही राजनीतिक पृष्ठभूमि मौजूदा आरजेडी ऑफर को ज्यादा चर्चा में ला रही है. हालांकि, इतिहास को मौजूदा राजनीतिक फैसले का संकेत मानना अपने आप में पर्याप्त नहीं है.
क्या जेडीयू और आरजेडी फिर साथ आ सकते हैं?
राजनीतिक तौर पर यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि जेडीयू और आरजेडी पहले भी सरकार में साथ रह चुके हैं. लेकिन किसी नए गठबंधन के लिए सिर्फ राजनीतिक बयान काफी नहीं होते. इसके लिए नेतृत्व, सीटों का समीकरण, नीतिगत मुद्दों और सत्ता के बंटवारे जैसे कई सवालों पर सहमति जरूरी होगी.
फिलहाल आरजेडी की ओर से ऑफर सामने आया है, लेकिन जेडीयू की तरफ से एनडीए छोड़ने का कोई आधिकारिक संकेत नहीं मिला है. हालिया रिपोर्टों में जेडीयू की ओर से इन अटकलों के बीच पार्टी की स्थिति स्पष्ट करने की कोशिशों का भी उल्लेख है.
जेडीयू में उत्तराधिकार की चर्चा भी अहम
नीतीश कुमार को लेकर चल रही राजनीतिक चर्चा सिर्फ बीजेपी और आरजेडी के रिश्तों तक सीमित नहीं है. जेडीयू में नेतृत्व और उत्तराधिकार को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं.
निशांत कुमार का नाम भी पार्टी के भविष्य के संदर्भ में चर्चा में आया है. हालांकि, हालिया रिपोर्ट के मुताबिक जेडीयू की ओर से उन्हें फिलहाल पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने की बात खारिज की गई है.
इससे यह स्पष्ट होता है कि नीतीश कुमार की भूमिका के साथ-साथ जेडीयू के अगले नेतृत्व को लेकर भी राजनीतिक नजरें बनी हुई हैं.
विधान परिषद सभापति पद पर भी नजर
बिहार की सत्ता की राजनीति में विधान परिषद सभापति का पद भी चर्चा में है. फिलहाल इस पद पर बीजेपी के अवधेश नारायण सिंह हैं.
ऐसे में जेडीयू की ओर से इस पद को लेकर दावेदारी की चर्चाएं गठबंधन के भीतर शक्ति-संतुलन के सवालों को सामने लाती हैं. हालांकि, किसी पद को लेकर राजनीतिक दावेदारी को गठबंधन टूटने का सीधा संकेत मानना जल्दबाजी होगी.
अभी सबसे बड़ा सवाल क्या है?
फिलहाल बिहार की राजनीति में तीन सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में हैं—क्या नीतीश कुमार एनडीए के साथ बने रहेंगे, क्या आरजेडी का ऑफर भविष्य में किसी राजनीतिक बातचीत का आधार बनेगा और जेडीयू अपने नेतृत्व को आगे कैसे आकार देगी?
इन सवालों के जवाब अभी स्पष्ट नहीं हैं. भाई वीरेंद्र का बयान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसे नीतीश कुमार के गठबंधन बदलने के फैसले के रूप में नहीं देखा जा सकता.
UCC जैसे मुद्दों ने दी अटकलों को हवा
आरजेडी विधायक भाई वीरेंद्र के ताजा बयान ने बिहार की राजनीति में पुराने गठबंधन अध्याय को फिर चर्चा में ला दिया है. UCC जैसे मुद्दों पर जेडीयू और बीजेपी के अलग-अलग रुख ने भी राजनीतिक बहस को जगह दी है. दूसरी ओर, आरजेडी खुले तौर पर नीतीश कुमार को अपने साथ आने का न्योता दे रही है.
लेकिन फिलहाल तस्वीर इतनी ही है कि आरजेडी की ओर से ऑफर आया है, जबकि जेडीयू के एनडीए से अलग होने का कोई आधिकारिक ऐलान सामने नहीं आया है. इसलिए बिहार की सियासत में 'पलटी' की चर्चा अभी राजनीतिक अटकल के स्तर पर है; आगे की दिशा नीतीश कुमार और जेडीयू के आधिकारिक फैसलों से ही साफ होगी.
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