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मोदी के 25 साल: 2001 से 2026 तक कितना बदला भारत? GDP, सड़क, रेलवे, UPI से लेकर डिफेंस और सोलर तक पूरी कहानी

PM Modi Birthday 2026: नरेंद्र मोदी अपना 76वां जन्मदिन मना रहे हैं. देश और दुनिया में उनके समर्थकों में खासा उत्साह भी है. खास बात यह है कि उनके सार्वजनिक जीवन के 25 साल भी पूरे हो रहे हैं. साल 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनकी राजनीतिक प्रशासनिक यात्रा शुरू हुई थी. इसके बाद 2014 में वह देश के प्रधानमंत्री बने और 2019 तथा 2024 में लगातार दो बार सत्ता में लौटे.

25 साल के इस सफर को सिर्फ चुनावी जीत और राजनीतिक घटनाओं से नहीं समझा जा सकता. इस अवधि में भारत की अर्थव्यवस्था, सड़क और रेलवे नेटवर्क, बैंकिंग, डिजिटल पेमेंट, इंटरनेट, ऊर्जा, रक्षा उत्पादन और स्टार्टअप इकोसिस्टम में भी बड़े बदलाव हुए हैं.

हालांकि, इन बदलावों को केवल किसी एक सरकार की उपलब्धि कहना भी पूरी तस्वीर नहीं होगी. बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था में बदलाव कई सरकारों, नीतियों, निजी निवेश और वैश्विक परिस्थितियों का परिणाम होते हैं. इसलिए आंकड़ों के जरिए यह समझना ज्यादा उपयोगी है कि 2001 से 2026 के बीच भारत की तस्वीर किस तरह बदली.

GDP: करीब 1 ट्रिलियन डॉलर से लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था

भारत की अर्थव्यवस्था ने पिछले ढाई दशक में जबरदस्त विस्तार किया है. विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक 2000 में भारत की GDP करीब 468 अरब डॉलर थी. 2025 तक यह बढ़कर करीब 3.96 ट्रिलियन डॉलर हो गई. यानी डॉलर में मापी जाने वाली अर्थव्यवस्था कई गुना बड़ी हुई.

2025 में भारत की आर्थिक वृद्धि दर 7.6 फीसदी रही. विश्व बैंक ने भारत को दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में रखा है.

लेकिन GDP बढ़ने का मतलब यह नहीं कि हर व्यक्ति की आय उसी अनुपात में बढ़ी है. आबादी बढ़ने के कारण प्रति व्यक्ति आंकड़ा अलग तस्वीर दिखाता है.

प्रति व्यक्ति आय: 2000 से कई गुना बढ़ी

विश्व बैंक के अनुसार भारत की प्रति व्यक्ति GDP 2000 में करीब 443 डॉलर थी, जो 2025 में बढ़कर लगभग 2,703 डॉलर हो गई.

यह वृद्धि बताती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ने के साथ औसत आर्थिक उत्पादन भी बढ़ा है. हालांकि वास्तविक जीवन में आय, रोजगार, महंगाई और क्षेत्रीय असमानता को समझने के लिए केवल प्रति व्यक्ति GDP पर्याप्त नहीं है.

यानी आर्थिक तस्वीर में बड़ी उपलब्धि के साथ-साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण रहेगा कि विकास का लाभ समाज के अलग-अलग वर्गों तक कितना पहुंचा.

सड़कें: नेशनल हाईवे नेटवर्क में बड़ा विस्तार

इंफ्रास्ट्रक्चर के मोर्चे पर सबसे स्पष्ट बदलाव सड़क नेटवर्क में दिखाई देता है.

2000-01 में भारत का राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क करीब 57,737 किलोमीटर था. 2014 में यह 91,287 किलोमीटर था और मार्च 2026 तक बढ़कर 1,46,572 किलोमीटर हो गया.

सिर्फ लंबाई ही नहीं, सड़क की गुणवत्ता और क्षमता में भी बदलाव आया है. 2014 में चार लेन या उससे ज्यादा वाले राष्ट्रीय राजमार्ग करीब 18,371 किलोमीटर थे, जो 2026 में बढ़कर 45,516 किलोमीटर हो गए.

यानी अब फोकस केवल सड़क बनाने पर नहीं, बल्कि एक्सप्रेसवे, आर्थिक कॉरिडोर और तेज माल परिवहन पर भी है.

रेलवे: ट्रैक से लेकर ट्रेन तक बदला अनुभव

भारतीय रेलवे में भी पिछले दशक में आधुनिकीकरण पर जोर बढ़ा है. रेलवे का बजट 2014-15 के करीब 32 हजार करोड़ रुपये से बढ़कर 2026-27 में 2.78 लाख करोड़ रुपये हो गया.

रेलवे विद्युतीकरण में भी बड़ा बदलाव आया. 2014 से पहले लगभग 20 फीसदी रेल नेटवर्क विद्युतीकृत था, जबकि जुलाई 2026 तक यह आंकड़ा 99.6 फीसदी तक पहुंच गया.

इसी दौर में वंदे भारत जैसी सेमी-हाई-स्पीड ट्रेनें भारतीय रेलवे की नई पहचान बनीं. जुलाई 2026 तक 162 वंदे भारत सेवाएं संचालित हो रही थीं. साथ ही अमृत भारत ट्रेन और स्टेशन पुनर्विकास जैसी योजनाएं भी रेलवे के स्वरूप को बदल रही हैं.

डिजिटल पेमेंट: जेब में बैंक और मोबाइल बना भुगतान का जरिया

अगर पिछले 10 वर्षों में किसी बदलाव ने आम भारतीय की रोजमर्रा की जिंदगी को सबसे ज्यादा बदला है तो वह डिजिटल पेमेंट है.

UPI को 2016 में लॉन्च किया गया था. शुरुआत में इसके लेनदेन बेहद कम थे, लेकिन FY 2025-26 में UPI के जरिए 24,161.69 करोड़ ट्रांजेक्शन हुए, जिनकी कुल वैल्यू करीब 314.23 लाख करोड़ रुपये थी. जून 2026 तक इससे करीब 55.49 करोड़ यूजर जुड़े थे.

जुलाई 2026 तक UPI से 741 बैंक जुड़े थे और यह 11 देशों में उपलब्ध था. यानी भारत में भुगतान व्यवस्था कैश से मोबाइल आधारित इकोसिस्टम की ओर तेजी से बढ़ी है.

बैंक खाते: जनधन ने बदली वित्तीय पहुंच

2014 में प्रधानमंत्री जनधन योजना शुरू होने के बाद बैंकिंग व्यवस्था को उन लोगों तक पहुंचाने का अभियान तेज हुआ, जो औपचारिक बैंकिंग सिस्टम से बाहर थे.

अगस्त 2026 तक 59.09 करोड़ जनधन खाते खोले जा चुके थे. इनमें 56 फीसदी खाते महिलाओं के हैं और करीब 78 फीसदी खाते ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में हैं.

इसका महत्व केवल बैंक खाता खुलने तक सीमित नहीं है. जनधन, आधार और मोबाइल के जरिए सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाने का मॉडल भी मजबूत हुआ है.

LPG: रसोई में लकड़ी से गैस तक

2014 में भारत में कुल LPG कनेक्शन करीब 14.52 करोड़ थे. 2026 तक यह संख्या बढ़कर 33.39 करोड़ हो गई.

उज्ज्वला योजना के तहत ही 10.57 करोड़ से अधिक मुफ्त LPG कनेक्शन दिए जा चुके हैं.

इसका सबसे बड़ा सामाजिक प्रभाव महिलाओं के लिए देखा गया, क्योंकि पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करने का उद्देश्य सीधे महिलाओं के स्वास्थ्य और घरेलू श्रम से जुड़ा था.

बिजली: गांवों से घरों तक पहुंच

बिजली के क्षेत्र में भी भारत ने लंबी दूरी तय की है. सरकार के मुताबिक 28 अप्रैल 2018 तक सभी आबाद गैर-विद्युतीकृत गांवों को बिजली से जोड़ दिया गया था. सौभाग्य योजना के दौरान 2.86 करोड़ घरों को बिजली कनेक्शन दिया गया. अब चुनौती केवल कनेक्शन देने की नहीं, बल्कि 24 घंटे भरोसेमंद और सस्ती बिजली उपलब्ध कराने की है.

इंटरनेट: डिजिटल भारत का आधार

2014 में भारत में करीब 25.16 करोड़ इंटरनेट सब्सक्राइबर थे. दूरसंचार विभाग के आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2023 तक यह संख्या बढ़कर करीब 88.13 करोड़ हो चुकी थी.

मोबाइल इंटरनेट और सस्ते डेटा ने इंटरनेट को शहरी वर्ग तक सीमित रखने के बजाय छोटे शहरों और गांवों तक पहुंचाया. इसी डिजिटल विस्तार ने UPI, ऑनलाइन शिक्षा, ई-कॉमर्स और डिजिटल सरकारी सेवाओं के लिए आधार तैयार किया.

स्टार्टअप: नौकरी खोजने वाले से नौकरी देने वाले तक?

Startup India की शुरुआत 2016 में हुई थी. मार्च 2026 तक सरकार ने 2.23 लाख से अधिक स्टार्टअप को मान्यता दी थी. इन स्टार्टअप्स से 23.36 लाख से ज्यादा प्रत्यक्ष नौकरियां पैदा होने की जानकारी सरकार ने दी है.

इससे भारत के उद्यमिता इकोसिस्टम में बड़ा बदलाव आया है. हालांकि स्टार्टअप की संख्या और रोजगार के आंकड़े सरकारी मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स पर आधारित हैं; इन्हें पूरे निजी क्षेत्र के रोजगार का पर्याय नहीं माना जा सकता.

रक्षा उत्पादन: आयातक से निर्माता बनने की कोशिश

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पिछले दशक की प्रमुख नीतिगत प्राथमिकताओं में रही है.

2014-15 में भारत का रक्षा उत्पादन करीब 46,429 करोड़ रुपये था. 2025-26 में यह बढ़कर 1.78 लाख करोड़ रुपये हो गया. रक्षा निर्यात भी 2013-14 के 686 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 38,424 करोड़ रुपये पहुंच गया.

इस बदलाव के पीछे सरकारी कंपनियों के साथ निजी उद्योग, MSME और स्टार्टअप की बढ़ती भागीदारी भी महत्वपूर्ण है.

नवीकरणीय ऊर्जा: सौर क्रांति की सबसे बड़ी छलांग

ऊर्जा क्षेत्र में शायद सबसे तेज बदलाव सौर ऊर्जा में हुआ है. मार्च 2014 तक भारत की सौर क्षमता सिर्फ 2.82 GW थी. अगस्त 2026 तक यह बढ़कर करीब 168 GW हो गई. इसी अवधि में पवन ऊर्जा क्षमता 21 GW से बढ़कर करीब 58.5 GW हुई. कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता, बड़े हाइड्रो को छोड़कर, अगस्त 2026 में करीब 243.49 GW थी. यानी भारत की ऊर्जा नीति में पारंपरिक ईंधन के साथ-साथ सौर और पवन ऊर्जा का महत्व तेजी से बढ़ा है.

25 साल सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं

2001 से 2026 तक भारत की कहानी केवल GDP बढ़ने की कहानी नहीं है. यह सड़क से एक्सप्रेसवे, बैंक खाते से UPI, LPG से स्वच्छ ईंधन, इंटरनेट से डिजिटल अर्थव्यवस्था, पारंपरिक रक्षा आयात से घरेलू उत्पादन और कुछ गीगावाट सौर क्षमता से सैकड़ों गीगावाट अक्षय ऊर्जा तक पहुंचने की कहानी भी है.

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है. रोजगार की गुणवत्ता, आय असमानता, कृषि संकट, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और क्षेत्रीय असमानता जैसे सवाल अब भी विकास की अगली परीक्षा हैं.

इसलिए मोदी के 25 साल का सबसे संतुलित मूल्यांकन यही होगा कि भारत का आर्थिक और भौतिक ढांचा निश्चित रूप से पहले से कहीं बड़ा और अधिक डिजिटल हुआ है, लेकिन अगले 25 साल की चुनौती इस विकास को ज्यादा समावेशी, रोजगारपरक और टिकाऊ बनाना होगी.

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नोट- आंकड़े मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक. 

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उत्तराखंड में खनन से रिकॉर्ड कमाई, अब 1500 करोड़ रुपये जुटाने का नया लक्ष्य

Uttarakhand Mining: उत्तराखंड सरकार को खनन से लगातार अच्छी कमाई हो रही है. वित्तीय वर्ष 2025-26 में खनन विभाग ने 1,217 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाया, जो अब तक का सबसे ज्यादा है. अब सरकार ने अगले चरण में खनन से 1,500 करोड़ रुपये का राजस्व हासिल करने का लक्ष्य रखा है. 

वित्तीय वर्ष 2025-26 में सरकार ने खनन विभाग के लिए 950 करोड़ रुपये का लक्ष्य तय किया था. इसके मुकाबले विभाग ने 1,217 करोड़ रुपये की कमाई की. यानी तय लक्ष्य से करीब 267 करोड़ रुपये ज्यादा राजस्व प्राप्त हुआ. इससे पहले वित्तीय वर्ष 2024-25 में भी खनन विभाग ने लक्ष्य से अधिक कमाई की थी. उस साल सरकार ने 875 करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा था, जबकि विभाग को 1,041 करोड़ रुपये का राजस्व मिला था. मानसून के बाद 1 अक्टूबर से खनन गतिविधियां दोबारा शुरू होने वाली हैं. ऐसे में विभाग के सामने राजस्व बढ़ाने के साथ-साथ अवैध खनन पर रोक लगाने की भी चुनौती होगी.

अब विभाग को मिला नया लक्ष्य

अब विभाग के सामने 1,500 करोड़ रुपये का नया लक्ष्य है. इसके लिए मानसून के बाद नदियों और दूसरे क्षेत्रों में खनिज निकासी शुरू होने के बाद गतिविधियों को व्यवस्थित तरीके से चलाना महत्वपूर्ण होगा. 

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खनन से होने वाली कमाई में लगातार बढ़ोतरी

सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले कई वर्षों में उत्तराखंड में खनन से मिलने वाले राजस्व में काफी वृद्धि हुई है. वित्तीय वर्ष 2012-13 में खनन से करीब 110 करोड़ रुपये की कमाई हुई थी. इसके बाद यह आंकड़ा धीरे-धीरे बढ़ता गया और 2025-26 में 1,217 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. 2025-26 में मिले कुल राजस्व में अलग-अलग मदों में भी राशि जमा की गई. इसमें 1,130 करोड़ रुपये राज्य के कोषागार, 80 करोड़ रुपये जिला खनिज फाउंडेशन न्यास और 7 करोड़ रुपये राज्य खनिज अन्वेषण ट्रस्ट के तहत शामिल हैं. इस बढ़ती कमाई की वजह से खनन विभाग राज्य के अधिक राजस्व देने वाले विभागों में शामिल हो गया है. अब 1,500 करोड़ रुपये का लक्ष्य हासिल करना विभाग के लिए अगली बड़ी चुनौती है.

1 अक्टूबर से फिर शुरू होंगी खनन गतिविधियां

उत्तराखंड में मानसून के दौरान कई जगहों पर खनन गतिविधियों पर रोक रहती है. मानसून खत्म होने के बाद 1 अक्टूबर से खनन का काम फिर से शुरू होने की तैयारी है. नदियों में खनिजों की निकासी शुरू होने के साथ सरकार को उम्मीद है कि राजस्व संग्रह भी तेजी से आगे बढ़ेगा.

हालांकि, खनन गतिविधियां बढ़ने के साथ अवैध खनन और बिना अनुमति खनिजों की ढुलाई जैसी समस्याओं पर निगरानी रखना भी जरूरी होगा. इसी वजह से सरकार ने खनन व्यवस्था में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाया है.

तकनीक से होगी खनन और वाहनों की निगरानी

सरकार ने अवैध खनन रोकने और व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए डिजिटल निगरानी प्रणाली को मजबूत किया है. माइनिंग डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन एंड सर्विलांस सिस्टम के तहत देहरादून, हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर और नैनीताल में 45 ई-चेक गेट लगाए गए हैं.

इन ई-चेक गेट पर वाहनों की निगरानी के लिए ऑटोमेटिक नंबर प्लेट पहचान कैमरों का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसके साथ ही रेडियो फ्रीक्वेंसी पहचान तकनीक के जरिए भी वाहनों की जानकारी पर नजर रखी जा रही है.

अन्य डिजिटल व्यवस्थाओं का हो रहा इस्तेमाल 

इसके अलावा खनिज प्रबंधन प्रणाली, ई-रवन्ना, माइनिंग ई-सर्विस, निगरानी एवं प्रवर्तन प्रणाली और निर्णय सहायता प्रणाली जैसी डिजिटल व्यवस्थाओं का इस्तेमाल किया जा रहा है. इनके जरिए खनन और खनिजों की ढुलाई से जुड़ा रिकॉर्ड डिजिटल तरीके से रखा जा रहा है. ई-रवन्ना प्रणाली में सुरक्षा से जुड़ी सुविधाएं भी जोड़ी गई हैं, ताकि खनिजों की ढुलाई और उससे जुड़े दस्तावेजों की निगरानी बेहतर तरीके से की जा सके.

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