कौन हैं अनंत नाग, जिन्हें मिलेगा दादा साहेब फाल्के पुरस्कार, पीएम मोदी ने भी दी बधाई
भारतीय सिनेमा में अपने लंबे और शानदार योगदान के लिए दिग्गज अभिनेता अनंत नाग को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा. सरकार ने उन्हें वर्ष 2024 के लिए इस प्रतिष्ठित सम्मान के लिए चुना है. पुरस्कार की घोषणा ऐसे समय हुई है जब अनंत नाग भारतीय सिनेमा में अपने पांच दशक से ज्यादा लंबे सफर को पूरा कर चुके हैं. उन्हें खास तौर पर कन्नड़ सिनेमा में अपने बहुआयामी अभिनय के लिए जाना जाता है. 22 सितंबर 2026 को गुजरात के एकता नगर (केवड़िया) में होने वाले 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में उन्हें यह सम्मान दिया जाएगा.
दादा साहेब फाल्के पुरस्कार क्या है?
दादा साहेब फाल्के पुरस्कार भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में शामिल है. यह पुरस्कार भारतीय सिनेमा में किसी कलाकार या फिल्म व्यक्तित्व के आजीवन और उल्लेखनीय योगदान को सम्मानित करने के लिए दिया जाता है.
दादा साहेब फाल्के को भारतीय सिनेमा का जनक माना जाता है. उन्होंने 1913 में भारत की पहली स्वदेशी फीचर फिल्म राजा हरिश्चंद्र बनाई थी. उनकी विरासत को सम्मान देने के लिए केंद्र सरकार यह पुरस्कार प्रदान करती है.
????THE DADASAHEB PHALKE AWARD 2024 GOES TO…
— PIB India (@PIB_India) September 16, 2026
Shri ANANT NAG
On the recommendation of the Dadasaheb Phalke Award Selection Committee, the Government of India is pleased to announce that the Actor will be conferred the prestigious Dadasaheb Phalke Award 2024 for his contribution… pic.twitter.com/3WKnWZDGs0
4 सितंबर 1948 को हुआ जन्म
अनंत नाग का जन्म 4 सितंबर 1948 को हुआ था. उनका पूरा नाम अनंत नागरकट्टे है. उनका शुरुआती जीवन कर्नाटक और आसपास के क्षेत्रों में बीता. बचपन के दौरान उन्होंने आनंदाश्रम और चित्रापुर मठ में भी समय बिताया. बाद में उन्होंने उडुपी, चित्रापुर, शिराली और होन्नावर में शिक्षा हासिल की और फिर मुंबई चले गए.
अभिनय की दुनिया में उनका सफर फिल्मों से पहले रंगमंच से शुरू हुआ. 18 वर्ष की उम्र में उन्हें एक नाटक में मुख्य भूमिका निभाने का अवसर मिला. इसके बाद उन्होंने कई नाटकों में अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं. सरकारी जीवनी के मुताबिक, अगले करीब पांच वर्षों में उन्होंने 50 से अधिक नाटकों में विविध किरदार निभाए.
कन्नड़ सिनेमा के प्रमुख अभिनेताओं में बनाई पहचान
रंगमंच के अनुभव ने अनंत नाग को फिल्मों में मजबूत आधार दिया. उन्होंने कन्नड़ सिनेमा में कई तरह के किरदार निभाए और अपनी सहज अभिनय शैली के लिए पहचान बनाई.
उनका फिल्मी करियर सिर्फ कन्नड़ भाषा तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने अलग-अलग भारतीय भाषाओं की फिल्मों में भी काम किया. उनकी अभिनय शैली की खासियत यह रही कि उन्होंने नायक के साथ-साथ चरित्र भूमिकाओं को भी प्रभावी ढंग से निभाया.
सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें पांच दशक से अधिक समय से भारतीय सिनेमा में सक्रिय और बहुमुखी कन्नड़ फिल्म अभिनेता बताया गया है.
'मालगुडी डेज' ने घर-घर पहुंचाया
अनंत नाग को फिल्मों के अलावा टेलीविजन ने भी देशभर में लोकप्रिय बनाया. दूरदर्शन के चर्चित धारावाहिक 'मालगुडी डेज' से उन्हें हिंदी भाषी दर्शकों के बीच भी बड़ी पहचान मिली.
आर.के. नारायण की कहानियों पर आधारित इस सीरियल ने भारतीय टेलीविजन के इतिहास में खास जगह बनाई. अनंत नाग की मौजूदगी ने उन्हें उन दर्शकों तक भी पहुंचाया, जो कन्नड़ सिनेमा से परिचित नहीं थे.
'KGF' से नई पीढ़ी के बीच भी लोकप्रिय
अनंत नाग का करियर कई दशकों तक फैला हुआ है, लेकिन नई पीढ़ी के दर्शकों ने भी उन्हें बड़े पर्दे पर देखा है. उन्होंने कन्नड़ स्टार यश की चर्चित फिल्म 'KGF' और उसके दूसरे भाग 'KGF: Chapter 2' में भी अभिनय किया.
इससे उनकी लोकप्रियता का दायरा एक बार फिर युवा दर्शकों तक पहुंचा. यह भी उनकी लंबी फिल्मी यात्रा की खासियत है कि अलग-अलग दौर में उन्होंने अलग पीढ़ियों के दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाए रखी.
2025 में मिला पद्म भूषण
दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से पहले भी अनंत नाग को देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों में शामिल पद्म भूषण से सम्मानित किया जा चुका है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मई 2025 में उन्हें कला के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्म भूषण प्रदान किया था.
पद्म सम्मान के आधिकारिक विवरण में उनके पांच दशक से अधिक लंबे फिल्मी योगदान और बहुमुखी अभिनय का उल्लेख किया गया है.
राजनीति में भी सक्रिय रहे
अनंत नाग की पहचान सिर्फ अभिनेता के तौर पर नहीं है. उन्होंने सार्वजनिक जीवन और राजनीति में भी भूमिका निभाई है. यही वजह है कि उनकी सार्वजनिक पहचान सिनेमा के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र से भी जुड़ी रही है.
हालांकि, उनकी सबसे बड़ी पहचान भारतीय सिनेमा और खास तौर पर कन्नड़ फिल्म जगत में उनके अभिनय योगदान की रही है.
Congratulations to the legendary Anant Nag Ji on being conferred the Dadasaheb Phalke Award.
— Narendra Modi (@narendramodi) September 16, 2026
For several decades, his effortless performances, remarkable versatility and brilliance have left a very strong mark on Indian cinema, particularly Kannada cinema. In whichever role he…
पीएम मोदी ने दी बधाई
अनंत नाग को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार दिए जाने की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उन्हें बधाई दी. पीएम मोदी ने उनके दशकों लंबे फिल्मी सफर और खास तौर पर कन्नड़ सिनेमा में योगदान की सराहना की.
प्रधानमंत्री ने उनके अभिनय में विविधता और किरदारों में गहराई का उल्लेख करते हुए इस सम्मान को उनके लंबे योगदान की पहचान बताया.
क्यों खास है अनंत नाग का यह सम्मान?
अनंत नाग को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिलना कन्नड़ सिनेमा के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. उन्होंने क्षेत्रीय सिनेमा में काम करते हुए भारतीय फिल्म जगत में अपनी अलग पहचान बनाई और कई पीढ़ियों के दर्शकों तक पहुंचे.
रंगमंच से शुरुआत, कन्नड़ फिल्मों में लंबी पारी, टेलीविजन के जरिए देशभर में पहचान और बाद के दौर में KGF जैसी फिल्मों में काम अनंत नाग का करियर भारतीय सिनेमा के बदलते दौर की कहानी भी कहता है.
अब 22 सितंबर 2026 को जब उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार प्रदान किया जाएगा, तो यह उनके पांच दशक से ज्यादा लंबे अभिनय सफर में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ जाएगा.
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वर्कलोड मैनेजमेंट और बिना ब्रेक का क्रिकेट
आधुनिक क्रिकेट का कैलेंडर बेहद बिजी हो चुका है. भारतीय खिलाड़ी साल के 12 महीने तीनों फॉर्मेट (टेस्ट, वनडे, टी20) के साथ-साथ 2 महीने आईपीएल की अत्यधिक दबाव वाली क्रिकेट खेलते हैं. पूर्व भारतीय दिग्गज सुनील गावस्कर ने हाल ही में चेतावनी दी थी कि खिलाड़ी मशीन या गन्ना नहीं हैं जिनसे लगातार रस निकाला जा सके. एक सीरीज खत्म होते ही दूसरी सीरीज शुरू हो जाती है, जिससे शरीर को आराम देने का समय ही नहीं मिलता.
रिकवरी मैनेजमेंट की अनदेखी
चोट लगने से ज्यादा खतरनाक है खिलाड़ी का पूरी तरह ठीक न होना. स्पोर्ट्स साइंस विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय क्रिकेट में असली समस्या खिलाड़ियों के फिटनेस स्तर की नहीं, बल्कि 'रिकवरी मैनेजमेंट' (चोट से उबरने की प्रक्रिया) की है. जब कोई खिलाड़ी हाई-इंटेंसिटी वाले मैच खेलता है, तो उसकी मांसपेशियों और जोड़ों पर भारी दबाव पड़ता है. अगर मैचों के बीच में मांसपेशियों को आराम और सही थेरेपी नहीं मिलती, तो वे कमजोर हो जाती हैं और मैदान पर उतरते ही दोबारा टूट जाती हैं.
खिलाड़ियों को जल्दबाजी में मैदान पर उतारना
कई बार बड़े टूर्नामेंट्स या सीरीज के समीकरणों को देखते हुए खिलाड़ियों को उनकी तय रिकवरी टाइमलाइन से पहले ही मैदान पर उतार दिया जाता है. उदाहरण के लिए, तेज गेंदबाज हर्षित राणा को पूरी तरह फिट होने से पहले ही मैदान पर उतार दिया गया, जिससे वे दोबारा चोटिल हो गए. वरुण चक्रवर्ती के मामले में भी आईपीएल के दौरान पैर में हेयरलाइन फ्रैक्चर के बावजूद खेलने की खबरें आई थीं. यह 'जल्दबाजी' खिलाड़ियों के लंबे करियर के लिए घातक साबित हो रही है.
BCCI के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (CoE) पर उठते सवाल
खिलाड़ियों के बार-बार चोटिल होने के कारण बीसीसीआई का CoE (सेंटर ऑफ एक्सीलेंस) भी गंभीर सवालों के घेरे में है. खिलाड़ियों की रिकवरी प्रोसेस को लेकर यहां की व्यवस्था पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं. जब वरुण चक्रवर्ती और जसप्रीत बुमराह जैसे स्टार खिलाड़ी यहां हफ्तों बिताने के बाद मैदान पर उतरते ही दोबारा चोटिल हो जाते हैं, तो पूरी व्यवस्था पर उंगली उठना लाजमी है. विशेषज्ञों और पूर्व क्रिकेटरों के अनुसार, इस सिस्टम में मुख्य रूप से निम्नलिखित कमियां सामने आ रही हैं:
स्पोर्ट्स साइंस हेड का पद खाली होना: मार्च 2025 में नितिन पटेल के जाने के बाद से करीब डेढ़ साल बीत चुके हैं, लेकिन बोर्ड अभी तक 'हेड ऑफ स्पोर्ट्स साइंस एंड मेडिसिन' के मुख्य पद पर किसी की स्थायी नियुक्ति नहीं कर सका है. नेतृत्व की इस कमी का सीधा असर खिलाड़ियों की मॉनिटरिंग पर पड़ रहा है.
कम्युनिकेशन गैप: रिपोर्टों के अनुसार मौजूदा समय में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के मेडिकल स्टाफ, राष्ट्रीय चयनकर्ताओं और टीम मैनेजमेंट के बीच आपसी तालमेल और संवाद में एक बड़ी खाई देखने को मिल रही है. खिलाड़ियों की फिटनेस रिपोर्ट और उनकी वापसी की टाइमलाइन को लेकर अलग-अलग विभागों के बीच 'कम्युनिकेशन ब्रेकडाउन' हो चुका है, जिसके कारण अनफिट खिलाड़ियों को भी जल्दबाजी में ग्रीन सिग्नल मिल जाता है.
कमजोर एसओपी (SOP): फिटनेस जांच के लिए साल 2023 में जो मानक (SOP) बनाए गए थे, उन्हें अपडेट नहीं किया गया है. अब फिटनेस टेस्ट सिर्फ 'मैच खेलने की बुनियादी क्षमता' जांचने तक सीमित रह गए हैं, न कि खिलाड़ी की लंबे समय तक फिटनेस देखने के लिए.
हर फॉर्मेट के लिए अलग ट्रेनिंग की कमी
टी20 में जहां विस्फोटक पावर की जरूरत होती है, वहीं टेस्ट क्रिकेट में लंबे समय तक टिके रहने की क्षमता चाहिए होती है. खिलाड़ियों को एक फॉर्मेट से दूसरे फॉर्मेट में बिना किसी खास तैयारी या कस्टमाइज्ड कैंप के भेज दिया जाता है. अचानक बदले इस वर्कलोड को खिलाड़ियों का शरीर झेल नहीं पाता.
???? BIG BLOW FOR INDIA ❌
— Johns. (@CricCrazyJohns) September 16, 2026
- Varun Chakaravarthy ruled out of the Asian Games 2026. [Sports Today] pic.twitter.com/4qU9D82CLg
विदेशी टीमें हमसे कैसे अलग हैं?
अगर दुनिया के बाकी देशों को देखें, तो ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसे बड़े क्रिकेट बोर्ड अपने स्टार खिलाड़ियों के आराम और फिटनेस को लेकर बेहद कड़क रुख अपनाते हैं. वे खिलाड़ियों को थकाकर बीमार करने में नहीं, बल्कि संभाल कर रखने में भरोसा करते हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण ऑस्ट्रेलियाई कप्तान पैट कमिंस हैं. जब उन्हें पीठ में चोट (स्ट्रेस फ्रैक्चर) की शिकायत हुई, तो एशेज जैसी दुनिया की सबसे बड़ी और अहम टेस्ट सीरीज होने के बावजूद उनके बोर्ड ने कोई रिस्क नहीं लिया. उन्हें जल्दबाजी में मैदान पर उतारने के बजाय जबरन आराम दिया गया, ताकि उनकी चोट पूरी तरह ठीक हो सके. इतना ही नहीं, विदेशी बोर्ड बड़े टूर्नामेंट्स के लिए अपने खिलाड़ियों को फ्रेश रखने के लिए उन्हें आईपीएल जैसी महंगी लीग्स तक को छोड़ने की सलाह देने से भी पीछे नहीं हटते.
BCCI को बाहर के बोर्ड से सीखने की है जरूरत
अगर टीम इंडिया को दुनिया में नंबर वन बने रहना है, तो सिर्फ कागजों पर मजबूत दिखने से काम नहीं चलेगा. मैदान पर मैच जिताने वाले खिलाड़ियों का पूरी तरह फिट होना जरूरी है. इसके लिए बीसीसीआई को अपने फिटनेस और रिहैब सिस्टम को पूरी तरह दुरुस्त करना होगा. बोर्ड को जरूरत पड़ने पर बड़े खिलाड़ियों को जबरन आराम देने जैसे कड़े फैसले भी लेने होंगे, फिर चाहे कोई बड़ा टूर्नामेंट ही क्यों न हो. चोटों को संभालने और खिलाड़ियों को लंबे समय तक फिट रखने के मामले में भारतीय सिस्टम को विदेशी क्रिकेट बोर्ड्स से सबक लेने की सख्त जरूरत है.
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