यूपीआई पर एमडीआर टैक्स नहीं है, बल्कि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करने में मदद करेगा: टीवी मोहनदास पई
नई दिल्ली, 16 सितंबर (आईएएनएस)। आरिन कैपिटल के चेयरमैन और इंफोसिस के पूर्व मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) टीवी मोहनदास पई ने यूपीआई पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू करने के फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि 96 प्रतिशत यूपीआई ट्रांजैक्शन इस शुल्क के दायरे में नहीं आएंगे।
बेंगलुरु में पत्रकारों से बातचीत के दौरान पई ने कहा कि लगभग 70 प्रतिशत यूपीआई भुगतान व्यक्ति से व्यक्ति (पी2पी) श्रेणी के हैं और उन पर किसी प्रकार का कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा। इसके अलावा 2,000 रुपए तक के सभी भुगतान भी पूरी तरह शुल्क मुक्त रहेंगे। केवल 2,000 रुपए से अधिक के व्यापारी भुगतान पर नाममात्र का एमडीआर लागू होगा।
उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि एमडीआर कोई टैक्स नहीं है। यह बैंकों और भुगतान सेवा प्रदाताओं को दिया जाने वाला शुल्क है, ठीक उसी तरह जैसे क्रेडिट कार्ड भुगतान पर व्यापारी प्रोसेसिंग शुल्क का भुगतान करते हैं।
पई ने कहा कि जब कोई ग्राहक क्रेडिट कार्ड का उपयोग करता है तो व्यापारी को कार्ड कंपनी और बैंक को शुल्क देना पड़ता है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी व्यक्ति को 2,500 रुपए का भुगतान करना हो तो वह इसे दो हिस्सों में बांट सकता है, जैसे 1,500 रुपए और 1,000 रुपए, जिससे दोनों भुगतान 2,000 रुपए की सीमा से नीचे रहेंगे।
उन्होंने कहा कि यूपीआई प्रणाली को बनाए रखने और लगातार बेहतर बनाने में भारी पूंजी निवेश और परिचालन खर्च लगता है। पहले कई मौकों पर लेनदेन की संख्या अचानक बढ़ने से यूपीआई में 15 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक ट्रांजैक्शन फेल होने की समस्या भी देखने को मिली थी।
पई के अनुसार, अगले दो वर्षों में यूपीआई ट्रांजैक्शन की संख्या 24 अरब से बढ़कर 50 अरब तक पहुंच सकती है। ऐसे में पूरे सूचना प्रौद्योगिकी ढांचे को उन्नत बनाना होगा ताकि रियल-टाइम ट्रांजैक्शन को बिना किसी रुकावट के संभाला जा सके।
उन्होंने सवाल उठाया कि इस अपग्रेड का खर्च कौन वहन करेगा। यदि पूरा खर्च बैंक उठाएंगे तो इसका असर अंततः जमाकर्ताओं पर पड़ेगा। इसलिए अब इस लागत का एक हिस्सा उन व्यापारियों को भी वहन करना होगा, जिन्हें डिजिटल भुगतान स्वीकार करने से सीधे लाभ मिलता है।
इस बीच, 2,000 रुपए से अधिक के व्यापारी यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू किए जाने के फैसले पर राजस्थान वित्त आयोग के अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी ने कहा कि आज दुनिया भारत की डिजिटल भुगतान क्रांति की सराहना कर रही है। यूपीआई के माध्यम से सबसे अधिक ऑनलाइन ट्रांजैक्शन करने वाले देशों में भारत अग्रणी बन चुका है।
उन्होंने कहा कि भारत ने डिजिटल और आर्थिक लेनदेन के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अपनी एक अलग पहचान स्थापित की है और यूपीआई आज देश की सबसे बड़ी तकनीकी उपलब्धियों में से एक माना जाता है।
--आईएएनएस
डीबीपी
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Explainer: भारत-पाकिस्तान के बीच समंदर में टकराव! पाकिस्तानी 'गुस्ताखी' पर मोदी सरकार ने उठाया ये बड़ा कदम
अरब सागर में भारतीय नौसेना के जहाज के बेहद करीब आया एक पाकिस्तानी युद्धपोत अब कूटनीतिक विवाद की शक्ल ले चुका है. दरअसल, भारत सरकार ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए पाकिस्तानी पक्ष के सामने सख्त एतराज दर्ज कराया है. मोदी सरकार ने पाक को ये साफ किया कि यह हरकत दोनों देशों के बीच बरसों पुराने समझौते के खिलाफ है.आइए आपको बताते हैं कि दोनों देशों के बीच ऐसे मामलों से निपटने के लिए 1991 का समझौता क्या है? भारत ने किस आधार पर पाक पर कार्रवाई की है.
भारत-पाकिस्तान के बीच आखिर विवाद की जड़ क्या है?
भारत ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि पाकिस्तानी युद्धपोत का व्यवहार अप्रैल 1991 में हुए भारत-पाकिस्तान समझौते के अनुच्छेद 10 के मुताबिक नहीं था. इसी आधार पर नई दिल्ली ने पाकिस्तान उच्चायोग के जरिए कड़ा विरोध दर्ज कराया है. बता दें मामला तब और गंभीर हो गया जब समुद्र में तय सुरक्षित दूरी बनाए रखने के बजाय पाकिस्तानी पोत भारतीय नौसैनिक इकाई के बेहद नजदीक आ गया जिसे नौवहन सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक माना जाता है.
The Pakistani Naval warship involved in the incident is PNS Hunain. The ship is an Offshore Patrol Vessel of the Yarmook class of the Pakistan Navy: Sources https://t.co/l0Jylf7xKj pic.twitter.com/XLiHA1phM1
— ANI (@ANI) September 16, 2026
भारत-पाकिस्तान के बीच 1991 का समझौता क्या है?
6 अप्रैल 1991 को भारत और पाकिस्तान के बीच एक अहम रक्षा-भरोसा समझौता हुआ था, जिसका मकसद दोनों देशों की सेनाओं के बीच अनजाने में होने वाले टकराव या गलतफहमी को रोकना था. इस व्यवस्था के तहत दोनों पक्षों को सैन्य अभ्यास, बड़ी सैन्य गतिविधियों और सैनिकों की आवाजाही की पहले से जानकारी एक-दूसरे को देनी होती है. एक रिपोर्ट के मुताबिक इसका एक अहम प्रावधान यह भी है कि समुद्र में तैनात दोनों देशों के नौसैनिक जहाज अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में एक-दूसरे के बहुत नजदीक आने से बचें, ताकि किसी भी तरह की भिड़ंत या गलत संकेत जाने का खतरा न रहे.
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समुद्र में इतनी सतर्कता क्यों जरूरी है?
थल सेना और वायुसेना के उलट, दोनों देशों की नौसेनाएं शांति के दौर में भी समुद्र में एक-दूसरे के आसपास मौजूद रह सकती हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र किसी एक देश की सीमा में नहीं आता. इसके अलावा बता दें बीते कुछ समय में भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई सख्त राजनयिक कदम उठाए हैं. पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तानी उच्चायोग में तैनात अधिकारियों की संख्या घटाई थी और रक्षा सलाहकारों को देश छोड़ने का आदेश दिया था. सिंधु जल संधि को स्थगित रखा गया है, और सीमा व्यापार से लेकर वीजा छूट तक कई कदम पहले ही उठाए जा चुके हैं.
क्या पहले भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं?
इस पहले भी ऐसी घटनएं हो चुकी हैं, मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 2011 में पाकिस्तानी नौसेना का जहाज पीएनएस बाबर भारतीय नौसेना के जहाज आईएनएस गोदावरी के बेहद करीब आ गया था. उस समय भारत ने पाकिस्तान उच्चायोग के नौसैनिक सलाहकार को रक्षा मंत्रालय तलब कर औपचारिक विरोध पत्र सौंपा था. भारत का कहना था कि उस घटना में पाकिस्तानी युद्धपोत ने समुद्र में टक्कर रोकने से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नियमों के साथ-साथ इसी 1991 के समझौते के अनुच्छेद 10 का भी उल्लंघन किया था. उस वाकये में भारतीय जहाज से उड़ान भर रहे हेलीकॉप्टर के सुरक्षा जाल को भी नुकसान पहुंचा था, जो बताता है कि दूरी कितनी कम रह गई थी.
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भारत ने अब तक क्या ठोस कदम उठाए हैं?
ताजा घटनाक्रम में भारत सरकार ने पाकिस्तानी पक्ष को औपचारिक तौर पर तलब कर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है. साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि इस तरह के आचरण को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और भविष्य में दोनों देशों की नौसेनाओं को तय सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन करना होगा. भारत की तरफ से यह रुख इसलिए भी अहम है क्योंकि मौजूदा दौर में दोनों देशों के बीच पहले से ही तनावपूर्ण रिश्ते चल रहे हैं.
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