AISA अध्यक्ष Neha Bora का आरोप: धर्म और राम मंदिर के नाम पर अयोध्या के निवासियों को हुआ भारी नुकसान
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने मंगलवार को आरोप लगाया कि धर्म और राम मंदिर के नाम पर फैलाए गए “डर, हिंसा और नफरत” का सबसे अधिक नुकसान अयोध्या-फैजाबाद के आम लोगों को हुआ है। फैजाबाद प्रेस क्लब में संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए बोरा ने कहा कि 1990 के दशक में शुरू हुआ ‘‘नफरत का अभियान’’ अयोध्या को डर का केंद्र बना गया। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन लोगों ने बच्चों और युवाओं को इस अभियान का हिस्सा बनाया, वे आज उत्तर प्रदेश में सत्ता में हैं।
उन्होंने कहा कि इस अभियान का नेतृत्व करने वाले लोग आज सत्ता में हैं और युवा पीढ़ी का भविष्य खराब कर रहे हैं। उन्होंने किसी संगठन या व्यक्ति का नाम लिए बिना कहा, ‘‘जिन लोगों ने आपके बच्चों को डर के अभियान का हिस्सा बनाया, वे आज आपके राज्य में सत्ता में बैठे हैं और उन्हीं बच्चों का भविष्य बर्बाद कर रहे हैं।’’ बोरा ने आरोप लगाया कि जब भी अयोध्या और धर्म के नाम पर हिंसा व नफरत को बढ़ावा दिया गया, तो सबसे ज्यादा नुकसान फैजाबाद-अयोध्या के आम निवासियों को उठाना पड़ा। उन्होंने दावा किया कि मंदिर निर्माण और राजनीतिक सत्ता हासिल करने की प्रक्रिया में जिन लोगों के घर ढहाए गए और दुकानें तोड़ी गईं, वे भी इसी शहर के आम निवासी थे।
बोरा ने राम मंदिर के चंदे में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए कहा कि धर्म का इस्तेमाल राजनीतिक और आर्थिक लाभ के लिए किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि मंदिरों में श्रद्धालुओं की ओर से चढ़ाया जाने वाला चढ़ावा धर्म या मंदिरों के बजाय सत्ता में बैठे लोगों तक पहुंच रहा है। उन्होंने उत्तर प्रदेश की “बुलडोजर न्याय” व्यवस्था की भी आलोचना की और आरोप लगाया कि जिन लोगों के घर गिराए गए, उनमें गरीब, दलित और मुस्लिम परिवारों समेत आम लोग शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि “सत्ता का प्रतीक” बना बुलडोजर प्रदेश के लोगों की बेबसी का भी प्रतीक है। बोरा ने कहा कि अयोध्या के लोग “हिंसा, नफरत और लूट” से छुटकारा चाहते हैं। आइसा अध्यक्ष अयोध्या में संगठन के उत्तर प्रदेश में चल रहे ‘जेन-जी महाजुटान’ अभियान के तहत पहुंची थीं।
अभियान के तहत बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक न्याय और सरकारी भर्ती परीक्षाओं तथा नियुक्तियों में कथित अनियमितताओं जैसे मुद्दों को उठाया जा रहा है। आइसा के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष मनीष ने बताया कि अभियान बुधवार को लखनऊ पहुंचेगा, जहां संवाददाता सम्मेलन के बाद रायबरेली और अलीगढ़ का दौरा किया जाएगा।
नवजात की मौत पर Allahabad High Court सख्त, यूपी सरकार से मांगी स्वास्थ्य कार्ययोजना
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने सुलतानपुर से इलाज के लिए लखनऊ लाए गए नवजात की मौत के मामले में प्रदेश सरकार को चिकित्सा व्यवस्था मजबूत करने के लिए समयबद्ध और ठोस कार्ययोजना पेश करने का मंगलवार को निर्देश दिया। न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजिव शुक्ल की खंडपीठ ने चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव को तत्काल और दीर्घकालिक उपायों की कार्ययोजना शपथपत्र के साथ पेश करने तथा प्रदेश के बजट में चिकित्सा सुविधाओं और सेवाओं के लिए आवंटित राशि का अनुपात बताने को कहा। अदालत ने कहा कि धन की कमी बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने में बाधा नहीं बननी चाहिए।
अदालत ने ये निर्देश अशुतोष कुमार सिंह की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिए। याचिका नवजात की मौत से जुड़ी है, जिसे सुलतानपुर से लखनऊ लाकर केजीएमयू, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (आरएमएलआईएमएस) और एसजीपीजीआई में इलाज के लिए ले जाया गया था। पीठ ने कहा कि मामला केवल नवजात को पर्याप्त इलाज नहीं मिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था से जुड़े व्यापक सवाल भी उठते हैं।
अदालत ने नए मेडिकल कॉलेजों में पर्याप्त ढांचागत सुविधाएं, विशेषज्ञ सेवाएं और वेंटिलेटर जैसी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर दिया, ताकि गंभीर मरीजों को लखनऊ न भेजना पड़े। पीठ ने कहा कि यदि नवजात को उच्च चिकित्सा केंद्र भेजना जरूरी था तो एंबुलेंस में भी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं होनी चाहिए थीं, जबकि उसे सामान्य एंबुलेंस से लाया गया। वहीं, केजीएमयू के चिकित्सकों और परिजनों ने बच्चे को अस्पताल में दिखाए जाने तथा बिस्तर उपलब्ध होने या नहीं होने को लेकर अलग-अलग दावे किए।
अदालत ने कहा कि इन विरोधाभासी दावों से सरकारी अस्पतालों में मरीजों और तीमारदारों के लिए प्रभावी मार्गदर्शन एवं परामर्श व्यवस्था की जरूरत स्पष्ट होती है। पीठ ने राज्य सरकार को पूरे घटनाक्रम की जांच कराकर 15 दिन में रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने अभी किसी चिकित्सक या अस्पताल की लापरवाही पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला है।
जांच में कमी या लापरवाही सामने आने पर जिम्मेदारी तय करने और परिवार को मुआवजा देने पर विचार किया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई एक अक्टूबर को होगी। पीठ ने चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव तथा केजीएमयू, एसजीपीजीआई और आरएमएलआईएमएस से संबंधित चिकित्सकों को वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई में शामिल होने का निर्देश दिया है।
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