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वो सिंगर, डेब्यू फिल्म ने जीता नेशनल अवॉर्ड, हीरो बनकर पर्दे पर किया राज, 'दूसरे प्यार' से गहरा लगाव

हम जिस शख्सियत की बात कर रहे हैं, वे एक्टिंग, सिंगिंग और डायरेक्शन में माहिर हैं. वे अपने पिता के मूल्यों को फॉलो करते हैं. उनकी पहली ही फिल्म ने नेशनल अवॉर्ड जीता था. हम जावेद अख्तर और हनी ईरानी के बेटे की बात कर रहे हैं. उन्होंने 'दिल चाहता है', 'रॉक ऑन', 'भाग मिल्खा भाग' जैसी फिल्में की हैं.

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फराह खान@61, पिता के जनाजे के लिए कर्ज लिया:7 साल तक चुकाया, कंगाली में घर का फर्नीचर तक बिका, जानिए कैसे बनीं स्टार

हिंदी सिनेमा के एक स्टंटमैन हुआ करते थे, नाम था कामरान खान। उनकी शादी, जावेद अख्तर की पहली पत्नी हनी ईरानी की बहन मेनका ईरानी से हुई। इस फिल्मी परिवार में 9 जनवरी 1965 को एक बेटी का जन्म हुआ, नाम रखा गया फराह खान। आलीशान 5 कमरों का घर था, कई प्रॉपर्टी थीं, घर में इंपाला कार थी और खूब नाम था, लेकिन फिर एक समय ऐसा आया, जब फराह के पास पिता के जनाजे तक के पैसे नहीं रहे। फराह महज 5 साल की थीं, जब उनके पिता कामरान ने अपनी सारी जमापूंजी लगाकर फिल्म 'ऐसा भी होता है' (1971) बनाई। ये फिल्म बुरी तरह फ्लॉप हुई, जिससे सारे पैसे डूब गए। नुकसान की भरपाई के लिए पिता ने कुछ बी-ग्रेड फिल्में बनाईं, लेकिन एक-एक कर सब फ्लॉप हो गईं। परिवार भारी कर्जे में डूब गया। पहले घर की गाड़ियां बिकीं और फिर प्रॉपर्टी, गहने। कर्जदारों से छुटकारा पाने के लिए घर का ग्रामोफोन और फर्नीचर तक बेचना पड़ा। कभी इंपाला जैसी लग्जरी कार से घूमने वाले कामरान ये नुकसान झेल नहीं सके। उन्होंने शराब पीना शुरू कर दिया। पीने का प्रोग्राम सुबह शुरू हो जाता और शाम तक घर का माहौल, झगड़ों और तमाशों में तब्दील हो जाता था। कई बार मां घर छोड़कर गईं, तो कभी शराब के नशे में पिता ने बच्चों को पीटकर गुस्सा निकाला। इस माहौल में फराह और छोटे भाई साजिद का बचपन गुजरा। फराह को बचपन से ही फिल्मों और डांस से लगाव था। जब उनके घर के हालात ठीक थे, तब महज 3-4 साल की उम्र में फराह को जैसे ही पता चलता कि मेहमान आए हैं, तो वो हेलन की तरह तैयार हो जातीं और सबको डांस कर दिखाती थीं। इसकी एक वजह ये भी थी कि वो मुंबई के जिस नेहरू नगर सोसाइटी के एक छोटे से कमरे में रहती थीं, वहां ज्यादातर स्ट्रगलिंग डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, फ्लॉप सिंगर रहा करते थे। आने-जाने वाले लोगों की चर्चा हमेशा फिल्मों से ही जुड़ी होती थी। एक रोज पॉपुलर एक्टर दारा सिंह उनके घर पहुंचे। वो फराह के पिता कामरान के साथ फिल्म कर चुके थे। जैसे ही फराह ने उनके सामने डांस किया, दारा सिंह ने झट से उनके पिता से कहा, कामरान, तुम्हारी बेटी कितना अच्छा डांस करती है, इसे फिल्मों में लाओगे। पिता ने सख्त आवाज में कहा, कभी नहीं, अभी तो छोटी है, तो डांस करने दे रहा हूं। बाद में नहीं करेगी। हुआ भी कुछ यही। तंगी के हालात में घर का ग्रामोफोन बिक चुका था, गाना बजाने की कोई सुविधा नहीं थी, तो फराह ने भी डांस करना छोड़ दिया। अब मनोरंजन के लिए वो उस समय शुक्रवार को सिनेमाघरों में लगने वाली फिल्मों का इंतजार किया करती थीं। कहीं से चंद रुपए मिलते तो वो छोटे भाई साजिद के साथ फिल्में देखा करती थीं। माइकल जैक्सन की नकल उतारते हुए मिली डांसर बनने की प्रेरणा फराह टीनएज में थीं, जब उनके पड़ोस में रहने वाले एक्टर तेज सप्रू के घर वीडियो कैसेट आए। उनमें एक कैसेट माइकल जैक्सन के गाने थ्रिलर का था। फराह रोज पड़ोस के घर जातीं और वीडियो देखकर माइकल जैक्सन की नकल उतारती थीं। उन्होंने जल्द ही पूरा डांस कॉपी कर लिया और यहीं से उन्हें डांस में करियर बनाने की प्रेरणा मिली। वो घर में पिता से छिपकर डांस किया करती थीं। वहीं दूसरी तरफ शराबी पिता और मां के झगड़े बढ़ने लगे। एक समय ऐसा आया, जब मां ने आए दिन के झगड़ों से तंग आकर घर छोड़ दिया और बहन डेजी ईरानी के साथ रहने लगीं। फराह, उनका छोटा भाई साजिद और मां वहां एक छोटे से कमरे में रहा करते थे। कुछ दिन उन्होंने दूसरी आंटी हनी ईरानी के घर में बिताए, जहां वो कजिन फरहान अख्तर और जोया अख्तर के साथ खूब खेला करती थीं। इसी तरह फराह का बचपन कभी आंटी के घर तो कभी अपने घर में बंटकर गुजरा। फराह ने सानिया मिर्जा के पॉडकास्ट में बताया था कि उनके घर में एक हॉल, एक कमरा और किचन था। शाम होते ही पिता के 6-7 दोस्त ताश खेलने हॉल में जमा होते थे। खेलते हुए कोई 5 रुपए छोड़ जाता था, कोई 10, ऐसे में उनके परिवार को रोजाना करीब 30 रुपए तक मिल जाया करते थे, जिससे अगले दिन का राशन, दूध और जरूरत का सामान आता। किसी दिन ज्यादा लोग आते, तो मटन आ जाता और जिस दिन कम आते, उस दिन खर्चे में कटौती करनी होती थी। पिता के निधन के समय घर में थे महज 30 रुपए फराह महज 17 साल की थीं, जब उनके पिता का निधन हो गया। तंगहाली का वो आलम था कि परिवार शोक मनाने की बजाय से ये सोचकर चिंतित था कि जनाजे की तैयारी कैसे होगी। पिता की जेब टटोली तो सिर्फ 30 रुपए ही निकले। ऐसे में फराह ने भाई के साथ रिक्शा किया और हर रिश्तेदार के घर जाकर जनाजे के लिए पैसे उधार मांगे। फराह खान ने खुद बताया था कि इस मुश्किल समय में सलमान खान के पिता सलीम खान ने उन्हें जनाजे के लिए पैसे दिए और साथ ही इतनी रकम दी, जिससे उनके घर का कई दिनों का राशन आ सका। अब घर की पूरी जिम्मेदारी फराह खान के कंधों पर थी। बिग बॉस 13 में आए फराह खान के भाई साजिद ने बताया था कि वो अक्सर जुहू बीच जाकर डांस किया करते थे, जिससे कुछ कमाई हो जाया करती थी। समय के साथ फराह खान एक डांस ग्रुप से जुड़ गईं और हिंदी फिल्मों में बतौर बैकग्राउंड डांसर काम करने लगीं। साल 1987 में फराह खान को फिल्म जलवा में बतौर डांसर काम मिला था। वो फिल्म के गाने फीलिंग हॉट हॉट हॉट में लीड एक्ट्रेस अर्चना पूरन सिंह के पीछे डांस करती नजर भी आई थीं। बैकग्राउंड डांसर बनने का ऑफर मिला, तो रखी असिस्टेंट डायरेक्टर बनने की शर्त छोटी-मोटी फिल्मों में बतौर डांसर काम करने के बाद फराह खान बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर भी काम किया करती थीं। सेट पर वो दूसरे डांसर्स की रिहर्सल करवाया करती थीं। एक रोज कयामत से कयामत तक बनाने वाले डायरेक्टर मंसूर अली खान एक फिल्म के सेट पर पहुंचे। वो उन दिनों अगली फिल्म जो जीता वही सिकंदर की तैयारी कर रहे थे। सेट पर उन्होंने देखा कि एक लड़की बड़ी शिद्दत से सभी डांसर्स को डांस रिहर्सल करवा रही थी। वो फराह खान थीं। मंसूर अली खान को अपनी फिल्म के लिए बैकग्राउंड डांसर की जरूरत पड़ती थी, तो उन्होंने फराह के पास जाकर कहा, मेरी फिल्म में डांसर का काम करोगी। जवाब में फराह ने कहा, एक शर्त पर कि आपको मुझे असिस्टेंट डायरेक्टर भी रखना होगा। मंसूर अली मान गए और फराह खान जो जीता वही सिकंदर से जुड़ गईं। फिल्म में आमिर खान लीड रोल में थे, जिसे उन्हीं के कजिन मंसूर अली खान डायरेक्ट कर रहे थे। फिल्म की कोरियोग्राफी सरोज खान कर रही थीं। सरोज खान डांस के स्टेप बताती थीं और फराह सभी डासंर्स की रिहर्सल करवाती थीं। फराह ने एक इंटरव्यू में बताया था कि वो सरोज खान की कोरियोग्राफी देख बार-बार सोचती थीं कि इससे बेहतर स्टेप्स मैं बता सकती हूं। फराह की सोची हुई ये बात जल्द ही सच हो गई। शुरुआत में इस फिल्म की लीड एक्ट्रेस गिरिजा शेट्टर थीं। सरोज खान को उनके साथ 17 दिनों में 3 गाने शूट करने के लिए रखा गया था। उस समय सरोज खान बड़ी कोरियोग्राफर थीं, जिनके पास एक साथ कई फिल्में हुआ करती थीं। सरोज खान ने लीड एक्ट्रेस गिरिजा के साथ 17 दिनों में तीन की जगह महज 1 गाना ही शूट किया। उन्हें ये काम खत्म करते ही जैकी श्रॉफ की फिल्म किंग अंकल के लिए गाना शूट करना था, जिसकी शूटिंग शिमला में होनी थी। इसी समय फिल्म का अगला गाना ‘पहला नशा’ शूट करना था, लेकिन सरोज खान के पास समय नहीं था। ऐसे में डायरेक्टर मंसूर अली खान ने उन्हें सलाह दी कि वो स्टेप्स तैयार कर लें और अपने असिस्टेंट को यहां छोड़कर खुद शिमला निकल जाएं। सरोज खान अपने दो असिस्टेंट उपेंद्र और शीला को छोड़कर शिमला चली गईं। जब वो मुंबई लौटीं तो उन्हें पता चला कि फिल्म की लीड एक्ट्रेस गिरिजा ने फिल्म छोड़ दी है, अब उनकी जगह आएशा जुल्का को कास्ट किया जाना है, जिससे फिल्म की शूटिंग रुक गई है। जो जीता वही सिकंदर की शूटिंग रुकने से सरोज खान अपनी दूसरी फिल्मों में व्यस्त हो गईं, लेकिन फिर उन्हें एक दिन कॉल आया कि लीड एक्टर-एक्ट्रेस के बजाय सरोज खान को अब फिल्म की दूसरी हीरोइन पूजा बेदी के साथ एक गाना पहले शूट करना होगा, लेकिन तब तक सरोज दूसरी फिल्मों का काम शुरू कर चुकी थीं। उन्होंने डायरेक्टर से कहा कि वो ये गाना किसी दूसरे कोरियोग्राफर के साथ कर लें, वो लौटकर बाकी बचे हुए गाने कर देंगी। उस समय फराह खान फिल्म में क्लैप देने का काम करती थीं। मंसूर अली खान जानते थे कि सेट पर सिर्फ फराह ही हैं, जो डांस करना जानती हैं, तो मंसूर अली खान ने उन्हें ही डांस सिखाने का काम दे दिया। फराह ने बेहतरीन स्टेप्स दिए, जिसके बाद फिल्म के दूसरे गाने भी फराह खान से ही कोरियोग्राफ करवाए गए। इस फिल्म में फराह का काम फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों को इतना पसंद आया कि उन्हें लगातार कोरियोग्राफी के ऑफर मिलने लगे। चंद सालों में ही फराह ने अपने हुनर से फिल्म इंडस्ट्री में पकड़ बना ली और फिर उनकी गिनती सबसे बेहतरीन कोरियोग्राफर्स में होने लगी। कोरियोग्राफी में कामयाब होने के बावजूद फराह ने अपना वो सपना पूरा किया, जो उन्होंने महज 20 साल की उम्र में देखा था। फराह ने 1985 में रिलीज हुई फिल्म अर्जुन देखी, जिसमें सनी देओल लीड रोल में थे। वो महज 20 साल की थीं, लेकिन उन्होंने फिल्म देखते ही मन बना लिया कि एक दिन वो भी डायरेक्टर बनेंगी। समय के साथ फराह ने बतौर कोरियोग्राफर पहचान बना ली, लेकिन इस सपने को अधूरा नहीं छोड़ा। साल 2004 में उन्होंने फिल्म मैं हूं ना से बतौर डायरेक्टर करियर की दूसरी पारी शुरू की। इस फिल्म को बनाने का आइडिया फराह खान को फिल्म कुछ कुछ होता है की शूटिंग के दौरान मिला। दरअसल, साल 1994 में फिल्म कभी हां कभी ना की शूटिंग करते हुए फराह और शाहरुख अच्छे दोस्त बन गए। फिर दोनों ने फिल्म कुछ कुछ होता है में साथ काम किया। ये फिल्म करते हुए फराह को कॉलेज लाइफ पर फिल्म बनाने का आइडिया आया, लेकिन शाहरुख को कुछ कुछ होता है करते हुए ही इस बात की चिंता थी कि इस उम्र में उन्हें कोई कॉलेज स्टूडेंट के रोल में नहीं अपनाएगा। फराह ने वहीं आइडिया ड्रॉप कर दिया। सालों बाद उन्होंने फिल्म मोहब्बतें के सेट पर शाहरुख खान को फिल्म मैं हूं ना की कहानी सुनाई। शाहरुख को स्टोरी इतनी पसंद आई कि उन्होंने कहा कि वो न सिर्फ फिल्म के हीरो रहेंगे, बल्कि इसे प्रोड्यूस भी करेंगे। फराह के डायरेक्शन में बनी पहली फिल्म सुपरहिट रही और उन्हें कई अवॉर्ड मिले। आगे उन्होंने ओम शांति ओम, तीस मार खान, हैप्पी न्यू ईयर जैसी फिल्में भी बनाईं। फराह के निर्देशन की फिल्म तीस मार खान भले ही उस दौर में फ्लॉप रही, लेकिन अब इसे कल्ट फिल्मों में शामिल किया जाता है। आज फराह हिंदी सिनेमा की सबसे कामयाब महिलाओं में शामिल हैं, जो डायरेक्शन, कोरियोग्राफी, राइटिंग हर फील्ड में माहिर हैं। इसके बावजूद फराह ने कुछ महीने पहले ही अपना यूट्यूब चैनल शुरू किया है, जो बेहद पॉपुलर है। फराह ने एक इंटरव्यू में बताया है कि वो फिल्मों से की गई कमाई से कहीं ज्यादा कमाई यूट्यूब से कर रही हैं।

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