AI के आर्थिक और सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए साथ आएंगी OpenAI और Google DeepMind
एआई को लेकर दुनिया भर में बहस लगातार तेज हो रही है और अब इसकी झलक बड़ी तकनीकी कंपनियों के बीच भी दिखाई दे रही है। ओपनएआई ने बताया है कि वह एंथ्रोपिक और गूगल डीपमाइंड के साथ मिलकर एआई की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर काम करने की दिशा में बातचीत कर रही है। कंपनियों के बीच यह कोशिश ऐसे समय हो रही है, जब बेहद ताकतवर एआई प्रणालियों से जुड़े आर्थिक और सुरक्षा खतरों को लेकर चिंता बढ़ रही है।
एआई को लेकर बढ़ती चिंता अब तकनीक की दुनिया से निकलकर सरकारों और नीति बनाने वालों तक पहुंच गई है। इसी बीच ओपनएआई ने संकेत दिया है कि वह एआई सुरक्षा से जुड़े मामलों में अपनी दो बड़ी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों एंथ्रोपिक और गूगल डीपमाइंड के साथ मिलकर काम करने की तैयारी कर रही है। मकसद बेहद ताकतवर एआई प्रणालियों से पैदा होने वाले संभावित खतरों को बेहतर तरीके से समझना और उनसे निपटने के लिए सुरक्षा उपायों पर सहयोग करना है।
मौजूद जानकारी के अनुसार ओपनएआई के वैश्विक नीति प्रमुख क्रिस लेहेन ने मंगलवार को वॉशिंगटन में एक बातचीत के दौरान बताया कि एंथ्रोपिक और गूगल के साथ इस मुद्दे पर चर्चा पिछले कई हफ्तों से चल रही है। उन्होंने कहा कि सुरक्षा के मामले में कंपनियों का एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करना जरूरी है। लेहेन के मुताबिक, इस तरह के सहयोग के लिए तीनों कंपनियों को अलग से किसी प्रतिस्पर्धा कानून संबंधी छूट की जरूरत नहीं दिखती है।
क्रिस लेहेन ने कहा कि सुरक्षा को प्राथमिकता देने के लिए साथ काम करने की कोशिश करना बेहतर है। उन्होंने इसके लिए विमानन उद्योग का उदाहरण भी दिया, जहां अलग-अलग कंपनियां यात्रियों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में एक-दूसरे के अनुभव और तरीकों से सीखती रही हैं।
गौरतलब है कि एआई के भविष्य को लेकर गंभीर चिंता हाल में उस समय फिर चर्चा में आई, जब एंथ्रोपिक के प्रमुख दारियो अमोडेई ने करीब 3,800 शब्दों का एक लेख लिखा। उन्होंने बेहद उन्नत एआई प्रणालियों के विकास की रफ्तार को कुछ समय के लिए धीमा करने की जरूरत बताई, ताकि शोधकर्ता इनके संभावित खतरों को ज्यादा अच्छी तरह समझ सकें। इस लेख के बाद ओपनएआई के प्रमुख सैम ऑल्टमैन और स्पेसएक्सएआई के प्रमुख एलन मस्क ने भी इसके कुछ विचारों का समर्थन किया।
ओपनएआई अब केवल कंपनियों के स्तर पर बातचीत तक सीमित नहीं रहना चाहती। लेहेन ने बताया कि वह अमेरिकी सांसदों से मिलने के लिए वॉशिंगटन पहुंचे हैं और एआई से होने वाले बेहद गंभीर खतरों से निपटने वाली ऐसी योजनाओं का समर्थन करेंगे, जिन्हें दोनों राजनीतिक दलों का समर्थन हासिल हो।
कंपनी जिन प्रस्तावों को समर्थन दे रही है, उनमें रिपब्लिकन सांसद जे ओबरनोल्टे और डेमोक्रेट सांसद लॉरी ट्राहन की ओर से तैयार किया जा रहा संघीय एआई व्यवस्था का ढांचा भी शामिल है। इसके अलावा सीनेट में बहुमत नेता जॉन थ्यून, रिपब्लिकन टेड क्रूज और डेमोक्रेट एमी क्लोबुचर से जुड़े एक दूसरे प्रस्ताव पर भी चर्चा चल रही है। इसका मकसद एआई से पैदा होने वाले बेहद गंभीर खतरों से निपटना है।
एआई कंपनियों के बीच सुरक्षा सहयोग को लेकर प्रतिस्पर्धा कानून का सवाल भी सामने आया है। सीनेटर जिम बैंक्स और सीनेटर एडम शिफ ने ऐसा प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत एआई कंपनियों को कुछ खास सुरक्षा मामलों में आपस में जानकारी साझा करने की सीमित छूट मिल सकती है। इसमें एआई पर नियंत्रण खोने का खतरा, साइबर और जैविक हमले तथा चीनी कंपनियों की ओर से आंकड़े हासिल करने की कोशिश जैसे मामले शामिल हैं। यह प्रस्ताव वार्षिक रक्षा कानून में शामिल किए जाने की बात भी सामने आई है।
हालांकि, इस साल के अंत तक एआई से जुड़ा कोई बड़ा कानून बनने की संभावना फिलहाल कम मानी जा रही है। अमेरिकी संसद का निचला सदन गुरुवार के बाद नवंबर में होने वाले चुनाव तक अवकाश पर जाने वाला है। चुनाव के बाद का छोटा सत्र भी मुख्य रूप से रक्षा बजट बढ़ाने पर केंद्रित रहने की उम्मीद है।
बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एआई पर कड़े सुरक्षा नियम लगाने की कोशिशों का खुलकर विरोध कर चुके हैं। उन्होंने सोमवार को सोशल मीडिया पर एंथ्रोपिक और ओपनएआई की ओर से अत्याधुनिक एआई के विकास को धीमा करने की कोशिशों की आलोचना की और एआई के अस्तित्व से जुड़े खतरों की चिंताओं को खारिज किया है।
ऐसे में एआई सुरक्षा पर कंपनियों के बीच बढ़ता सहयोग और अमेरिकी सरकार में चल रही राजनीतिक बहस आने वाले समय में इस तकनीक के विकास की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।
Kishau Dam Project पर 6 राज्यों ने किए दस्तखत, Amit Shah बोले- 10वां जल विवाद सुलझा
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लंबे समय से अटके किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना से जुड़े समझौते को “ऐतिहासिक करार” बताते हुए कहा कि मंगलवार को इस पर हस्ताक्षर किए गए। शाह ने बताया कि यह नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पानी से जुड़े 10वें विवाद का समाधान है। एक आधिकारिक बयान में कहा गया, “उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों-योगी आदित्यनाथ, पुष्कर सिंह धामी, सुखविंदर सिंह सुक्खू, भजनलाल शर्मा, रेखा गुप्ता और नायब सिंह सैनी-ने शाह और जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की उपस्थिति में समझौते पर हस्ताक्षर किए।” शाह ने कहा कि इस समझौते से सभी छह राज्यों को किसी न किसी तरह फायदा होगा और उन्होंने इस परियोजना को इस चरण तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाने के लिए उनके मुख्यमंत्रियों और पाटिल को बधाई दी।
शाह ने कहा कि भारत सरकार और यमुना घाटी वाले छह राज्यों के मुख्यमंत्री इस परियोजना को जल्द से जल्द पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना समझौते के तहत उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहने वाली टोंस नदी पर 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी बांध बनेगा, जहां 1,56.2 करोड़ घन मीटर जल संग्रहण होगा। शाह ने कहा कि परियोजना के तहत 97 हजार हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी, 1,47.6 करोड़ यूनिट स्वच्छ जलविद्युत भी प्राप्त होगी तथा दिल्ली को इसका सबसे ज्यादा लाभ होगा।
यह समझौता ऐसे समय हुआ है, जब छह राज्यों ने जून में 422 मेगावाट की इस परियोजना के लिए एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर करने पर सहमति जताई थी, जिससे इसे केंद्रीय मंत्रिमंडल के विचार के लिए भेजे जाने का रास्ता साफ हुआ। इस परियोजना की अनुमानित लागत पहले करीब 15,000 करोड़ रुपये थी और यह आठ साल से अधिक समय से लंबित थी। शाह ने कहा कि किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया है और 1994 के समझौते के तहत इसका लगभग 90 प्रतिशत वित्तीय भार भारत सरकार और शेष 10 प्रतिशत राशि भागीदार राज्यों द्वारा वहन की जाएगी।
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि आगामी किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना से दिल्ली को करीब 11 करोड़ घन मीटर (एमसीएम) पानी मिलेगा, जिससे शहर में जल आपूर्ति बढ़ेगी और यमुना में पर्यावरणीय प्रवाह में सुधार होगा। गुप्ता ने कहा कि यह परियोजना दिल्ली की जल जरूरतों के लिए दीर्घकालिक सहायता उपलब्ध कराएगी। उन्होंने कहा कि किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना ऊपरी यमुना घाटी की महत्वपूर्ण जल भंडारण परियोजनाओं में से एक है।
टोंस नदी पर बनने वाले इस परियोजना के बांध की उपयोगी जल भंडारण क्षमता करीब 1,32.4 करोड़ घन मीटर (एमसीएम) होगी।
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