तमिलनाडु के परिवार कल्याण कार्यक्रम में जुड़ा बांझपन का इलाज, जन्म दर में भारी गिरावट के बाद लिया फैसला
चेन्नई, 15 सितंबर (आईएएनएस)। रजिस्टर्ड जन्मों में लगातार कमी और तेजी से बूढ़ी होती आबादी को देखते हुए, तमिलनाडु सरकार ने अपने परिवार कल्याण कार्यक्रम में बांझपन के इलाज को शामिल करने के लिए कदम उठाए हैं। ऐसा करने वाला वह देश का पहला राज्य बन गया है।
परिवार कल्याण कार्यक्रम, जो पारंपरिक रूप से जन्म नियंत्रण, गर्भनिरोधक सेवाओं और बच्चों के जन्म के बीच अंतर रखने पर केंद्रित रहा है, अब उन जोड़ों की मदद करेगा जो अपना परिवार पूरा करना चाहते हैं।
बांझपन का इलाज और गर्भधारण से पहले की काउंसलिंग सरकारी जिला मुख्यालय अस्पतालों में उपलब्ध कराई जाएगी, जिसमें वे जिले भी शामिल हैं जहां सरकारी मेडिकल कॉलेज नहीं हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2020 में तमिलनाडु में 9.39 लाख जन्म दर्ज किए गए थे, जबकि 2025 में यह संख्या 8.02 लाख थी। राज्य की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) गिरकर 1.3 हो गई है, जो जनसंख्या प्रतिस्थापन स्तर के पारंपरिक 2.1 के स्तर से काफी कम है।
साथ ही, राज्य में बुजुर्गों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। वर्तमान में, 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोग तमिलनाडु की आबादी का लगभग 16 प्रतिशत हैं।
अनुमान है कि 2036 तक यह आंकड़ा 20 प्रतिशत के करीब पहुंच जाएगा, जिसका अर्थ है कि हर पांच निवासियों में से लगभग एक वरिष्ठ नागरिक होगा।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के नीतिगत नोट में, जिसे हाल ही में विधानसभा में पेश किया गया था, चेतावनी दी गई है कि प्रजनन दर में लंबे समय तक गिरावट और आबादी के बूढ़े होने के कारण अंततः कार्यबल में कमी आ सकती है और राज्य की आबादी में पूर्ण गिरावट हो सकती है। हालांकि, अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यह नीति जोड़ों को बच्चे पैदा करने के लिए मजबूर नहीं करेगी या बड़े परिवारों को प्रोत्साहित नहीं करेगी। सरकार गर्भनिरोधक विकल्प, बच्चों के जन्म के बीच अंतर रखने की सेवाएं और सुरक्षित गर्भपात की सुविधा देना जारी रखेगी।
हाल ही में विभाग के एक ऑडिट में पाया गया कि लगभग 25 से 30 प्रतिशत मातृ मृत्यु अधिक क्रम वाले जन्मों के दौरान हुईं। इसलिए, सरकार उन जोड़ों को और बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करने का इरादा नहीं रखती है जिनके पहले से ही बच्चे हैं। इसके बजाय, विस्तारित कार्यक्रम उन जोड़ों पर ध्यान केंद्रित करेगा जिन्हें गर्भधारण करने में कठिनाई हो रही है।
प्रस्तावित पहल के तहत, सरकारी अस्पतालों में इंट्रा-यूटेरिन इनसेमिनेशन (आईयूआई) उपचार उपलब्ध कराया जाएगा, जिसमें वे ज़िले भी शामिल हैं जहां सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल नहीं हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों के माध्यम से गर्भधारण से पहले की काउंसलिंग भी प्रदान की जाएगी। नि:संतान जोड़ों की पहचान करने और उन्हें काउंसलिंग देने में गांव की स्वास्थ्य नर्सें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। अपनी नियमित जिम्मेदारियों के साथ-साथ, वे आगे की जांच या उपचार की आवश्यकता वाले दंपतियों को विशेषीकृत बांझपन सेवाएं प्रदान करने वाली निकटतम तृतीयक स्वास्थ्य सेवा सुविधा में मार्गदर्शन करेंगे।
--आईएएनएस
पीआईएम/एएस
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
'सरल एआई’ रिसर्चर्स और संस्थानों को उनके काम को रिसर्च पेपर से आगे ले जाने में करेगा मदद
नई दिल्ली, 15 सितंबर (आईएएनएस)। सीएसआईआर-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस कम्युनिकेशन एंड पॉलिसी रिसर्च (सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर) ने वैज्ञानिक रिसर्च को खोजने, समझने और साझा करने में आसानी लाने के लिए खासकर छात्रों और आम जनता के बीच सरल एआई का इस्तेमाल करके साइंस कम्युनिकेशन को मजबूत करने की दिशा में एक नया कदम उठाया है।
सरल एआई, नई दिल्ली स्थित अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एएनआरएफ) की एक पहल है। इसका मकसद अपनी पत्रिकाओं में छपे रिसर्च को दिलचस्प और आसानी से समझ में आने वाले वीडियो में बदलना है।
एक आधिकारिक बयान के अनुसार, यह पहल विज्ञान और रिसर्च के असरदार संचार के लिए नई तकनीकों को अपनाने पर सरकार के जोर के अनुरूप है।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने हाल ही में संस्थानों को सरल एआई का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया है, जिसमें सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर इसे अपनाने में एक प्रमुख संगठन के तौर पर उभरा है।
यह पहल वैज्ञानिक ज्ञान के व्यापक प्रसार को बढ़ावा देने और रिसर्च को समाज के लिए ज़्यादा सुलभ बनाने पर अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एएनआरएफ) के जोर से प्रेरित है।
बयान में कहा गया है कि एनआईएससीपीआर के दौरे के दौरान, एएनआरएफ के सीईओ डॉ. शिवकुमार कल्याणरमन ने सरल एआई के बारे में बताया, जो पब्लिश हुए रिसर्च पेपर से छोटे वीडियो बनाने का एक टूल है।
उन्होंने संस्थान को सलाह दी कि वे सरल एआई को एक ऐसे टूल के तौर पर इस्तेमाल करके देखें जो मुश्किल वैज्ञानिक रिसर्च को आसान बना सके और उसे आम लोगों तक असरदार ढंग से पहुंचा सके।
कल्याणरमन ने कहा, रिसर्च सिर्फ पब्लिकेशन तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए। सरल एआई जैसे टूल्स रिसर्चर्स और संस्थानों की मदद कर सकते हैं, ताकि वे अपने काम को सिर्फ पेपर्स तक सीमित न रखकर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचा सकें और भारतीय रिसर्च के असर को बढ़ा सकें।
सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर की डायरेक्टर डॉ. गीता वाणी रायसम की अगुवाई में संस्थान साइंस कम्युनिकेशन की पहुंच और असर को बढ़ाने के लिए नए जमाने की टेक्नोलॉजी और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करने पर तेजी से काम कर रहा है।
इसी कोशिश के तहत, एनआईएससीपीआर ने हाल ही में सरल एआई पर एक प्रैक्टिकल वर्कशॉप आयोजित की, जिसमें जर्नल्स के एडिटर्स और रिसर्चर्स समेत 90 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया।
--आईएएनएस
ओपी/एएस
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