कैम्पस प्लेसमेंट के मौसम में इस बार कुछ अलग नज़ारा दिख रहा है। बता दें कि देश के शीर्ष प्रबंधन संस्थानों, खासकर भारतीय प्रबंधन संस्थानों में कंसल्टिंग और फाइनेंस कंपनियों की मौजूदगी फिर से तेज़ हो गई है। यह उछाल ऐसे समय में देखने को मिल रहा है, जब वैश्विक स्तर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के चलते कई बड़ी कंपनियों में कर्मचारियों की संख्या घटाने की खबरें सामने आई हैं।
मौजूद जानकारी के अनुसार, आईआईएम कोझिकोड के निदेशक देबाशीष चटर्जी ने बताया कि अंतिम प्लेसमेंट प्रक्रिया में अब तक 594 में से 492 छात्रों को ऑफर मिल चुके हैं। उन्होंने कहा कि प्रतिस्पर्धी माहौल के बावजूद प्लेसमेंट की रफ्तार स्थिर बनी हुई है। गौरतलब है कि इस वर्ष कंसल्टिंग भूमिकाओं में लगभग 60 प्रतिशत और फाइनेंस से जुड़े ऑफर्स में करीब 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
चटर्जी के अनुसार, इस उछाल की बड़ी वजह भारत में जटिल और एआई-संचालित वैश्विक कार्यों की बढ़ती भूमिका है। बड़ी संख्या में ऑफर्स अब रणनीतिक और उच्च प्रभाव वाली टीमों से जुड़े हैं, क्योंकि भारत से संचालित होने वाला वैश्विक कार्यभार लगातार बढ़ रहा है।
गौरतलब है कि कंसल्टिंग, बैंकिंग और एडवाइजरी फर्में हमेशा से बी-स्कूल छात्रों की पहली पसंद रही हैं। हालांकि, 2024 बैच के दौरान वैश्विक सुस्ती का असर भर्ती पर पड़ा था, लेकिन अगले बैच में इन क्षेत्रों की मांग फिर से तेज़ होती दिख रही है। बैन एंड कंपनी, बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप, मैकिन्से, एक्सेंचर के साथ-साथ जनरल अटलांटिक और टेमासेक होल्डिंग्स जैसी निवेश कंपनियां आक्रामक रूप से भर्तियां करने की तैयारी में हैं।
बैन के पार्टनर प्रभव कश्यप ने कहा कि भारत उनकी प्राथमिकता बना हुआ है और भविष्य की रणनीति के लिए सही प्रतिभा में निवेश किया जा रहा है। उन्होंने भरोसा जताया कि आईआईएम जैसे संस्थानों से निकलने वाले छात्र भविष्य के लिए मजबूत टीम तैयार करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
एक्सेंचर की भर्ती रणनीति भी ग्राहकों की एआई आधारित रणनीति और बड़े पैमाने पर बदलाव की मांग को दर्शाती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अगस्त 2025 तक के 12 महीनों में एक्सेंचर ने 4.78 अरब डॉलर का नया कारोबार जोड़ा, जो भारत की शीर्ष आईटी कंपनियों की संयुक्त वृद्धि से भी अधिक है। वहीं, सिंगापुर की टेमासेक के लिए भी भारत एक प्रमुख बाजार है और जुलाई 2025 में भारत पोर्टफोलियो के साथ उसके एसेट्स अंडर मैनेजमेंट 50 अरब डॉलर तक पहुंच गए हैं।
प्लेसमेंट से जुड़े एक अधिकारी के मुताबिक, कंसल्टिंग और फाइनेंस फर्मों द्वारा दी जा रही मीडियन सैलरी में 10 से 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई है। पुराने आईआईएम में यह आंकड़ा 30 से 35 लाख रुपये के आसपास बना हुआ है।
आईआईएम इंदौर ने भी 2026 बैच के लिए कंसल्टिंग और फाइनेंस कंपनियों की बढ़ी दिलचस्पी की पुष्टि की है। निदेशक हिमांशु राय ने बताया कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत में भर्ती बनी हुई है, क्योंकि यहां ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स का विस्तार हो रहा है और भारत कार्यालय एंड-टू-एंड डिलीवरी तथा एनालिटिक्स आधारित प्रोजेक्ट्स में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
हालांकि, यह भी उल्लेखनीय है कि नवंबर में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक मैकिन्से ने एआई आधारित ऑटोमेशन के चलते करीब 200 पदों में कटौती की थी। इसके बावजूद, भारत में कैंपस हायरिंग पर इसका खास असर नहीं दिख रहा है।
आईआईएम अहमदाबाद, बेंगलुरु और कलकत्ता जैसे पुराने संस्थानों में अंतिम प्लेसमेंट आमतौर पर जनवरी के अंत या फरवरी की शुरुआत में होते हैं। आईआईएम अहमदाबाद के प्लेसमेंट चेयर विस्वनाथ पिंगली के अनुसार, इस साल का माहौल पिछले कुछ वर्षों की तुलना में बेहतर नजर आ रहा है और कंसल्टिंग व फाइनेंस कंपनियों की भागीदारी मजबूत बनी हुई है।
समर इंटर्नशिप के दौरान भी कंसल्टिंग कंपनियों की मांग साफ दिखी है। आईआईएम बेंगलुरु में 2027 बैच की समर इंटर्नशिप में मैनेजमेंट कंसल्टिंग का हिस्सा 46 प्रतिशत रहा है। कोझिकोड ने भी 2026 बैच में प्री-प्लेसमेंट ऑफर्स में लगभग 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की है।
वहीं, इंजीनियरिंग संस्थानों की बात करें तो आईआईटी में एआई आधारित भूमिकाओं के लिए अलग तरह की कंपनियां पहुंचीं हैं। हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडर्स, स्टार्टअप्स, एजेंटिक एआई फर्मों के साथ टेस्ला, एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट, एनवीडिया, एयरबस और बोइंग जैसी दिग्गज कंपनियां भी भर्ती के लिए मैदान में उतरी हैं। कुल मिलाकर, एआई के दौर में भारत के शीर्ष शैक्षणिक संस्थान वैश्विक प्रतिभा आपूर्ति के केंद्र के रूप में और मजबूत होते दिख रहे हैं।
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हेल्थकेयर सेक्टर में निवेश को लेकर जो हलचल दिख रही है। मोहाली स्थित ऑर्थोटिक्स और फ्रैक्चर सपोर्ट उत्पाद बनाने वाली कंपनी टाइनर ऑर्थोटिक्स में बहुमत हिस्सेदारी खरीदने की रेस में केदारा कैपिटल सबसे आगे बताई जा रही है। इस मामले से परिचित लोगों के अनुसार, इस संभावित सौदे में कंपनी का कुल मूल्यांकन करीब 3,500 से 4,000 करोड़ रुपये के बीच आंका जा रहा है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, इस सौदे में मौजूदा निवेशक लाइटहाउस फंड्स और कंपनी के प्रमोटर्स मिलकर लगभग 60 प्रतिशत हिस्सेदारी बेच सकते हैं। बताया जा रहा है कि यह लेनदेन मुख्य रूप से सेकेंडरी डील होगी, यानी इसमें नई पूंजी डालने के बजाय मौजूदा शेयरों की बिक्री ज्यादा होगी।
गौरतलब है कि उपभोक्ता-उन्मुख और तेजी से बढ़ती हेल्थकेयर कंपनियां इस समय निवेशकों के रडार पर हैं। इसके पीछे स्वास्थ्य बीमा कवरेज में बढ़ोतरी, इलाज की बेहतर पहुंच और भारत में मेडिकल डिवाइस सेक्टर का तेजी से फैलता मरीज आधार बड़ी वजह मानी जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, अगस्त में केदारा कैपिटल ने एक बार फिर इस डील को लेकर बातचीत शुरू की थी और ओ3 कैपिटल को इस प्रक्रिया में सलाहकार नियुक्त किया गया था। इससे पहले 2024 में सिंगापुर की टेमासेक के साथ अल्पांश हिस्सेदारी को लेकर बातचीत हुई थी, लेकिन वह आगे नहीं बढ़ सकी थी। हालांकि, टाइनर के संस्थापक पुषविंदर जीत सिंह, लाइटहाउस फंड्स, केदारा कैपिटल और ओ3 कैपिटल की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
बता दें कि 2024 में एक रिपोर्ट में यह सामने आया था कि टेमासेक इस कंपनी में निवेश के लिए सबसे आगे थी और उसने वारबर्ग पिंकस और नॉरवेस्ट वेंचर पार्टनर्स जैसी वैश्विक प्राइवेट इक्विटी फर्मों को पीछे छोड़ दिया था। मौजूदा घटनाक्रम करीब आठ साल बाद सामने आया है, जब मई 2018 में टाइनर ने लाइटहाउस, थुआन और विहोम बीवी समेत निवेशकों से 21 मिलियन डॉलर जुटाए थे, उस समय कंपनी का पोस्ट-मनी वैल्यूएशन करीब 103.3 मिलियन डॉलर था।
कंपनी की पृष्ठभूमि की बात करें तो टाइनर की स्थापना 1993 में हुई थी और फिलहाल इसे सिंह परिवार की दूसरी पीढ़ी संचालित कर रही है। कंपनी के पास 150 से ज्यादा उत्पादों का पोर्टफोलियो है, जिसमें बॉडी ब्रेसेस, फ्रैक्चर और वॉकिंग एड्स, ट्रैक्शन किट, एडवांस्ड नी-ब्रेसेस, फिंगर स्प्लिंट्स, सिलिकॉन और फुट केयर उत्पाद तथा सर्वाइकल सपोर्ट शामिल हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024 में टाइनर का राजस्व बढ़कर 495.5 करोड़ रुपये पहुंच गया है, जो इससे एक साल पहले 394.1 करोड़ रुपये था। वहीं, कंपनी का मुनाफा भी वित्त वर्ष 2023 के 50.9 करोड़ रुपये से बढ़कर 73.4 करोड़ रुपये हो गया है, यह जानकारी बाजार अनुसंधान संस्था ट्रैक्जन के आंकड़ों से सामने आई है।
गौरतलब है कि भारत का मेडिकल डिवाइस सेक्टर पिछले कुछ वर्षों में प्राइवेट इक्विटी निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। बीमा कवरेज में बढ़ोतरी, आय स्तर में सुधार और टियर-2 व टियर-3 शहरों में स्वास्थ्य ढांचे के विस्तार ने इस सेक्टर को नई रफ्तार दी है।
उद्योग से जुड़े अनुमानों के अनुसार, भारत का मेडिकल डिवाइस बाजार अगले पांच वर्षों में करीब 16.4 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ते हुए 50 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024 में 12 अरब डॉलर के स्तर पर रहा मेड-टेक उद्योग मेडिकल टूरिज्म और बढ़ती स्वास्थ्य जागरूकता से भी लाभान्वित हो रहा है। ऐसे में टाइनर जैसी घरेलू कंपनियों में निवेश को लेकर दिलचस्पी और बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।
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