भारतीय आयुर्वेद में कई जड़ी-बूटियों का उल्लेख मिलता है। इन जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल सदियों से सेहत को बेहतर बनाने के लिए किया जाता रहा है। इन्हीं में से एक अर्जुन की छाल है। आयुर्वेदाचार्यों के मुताबिक अर्जुन की छाल को खासतौर पर हृदय की सेहत के लिए लाभकारी मानी जाती है। वहीं आधुनिक विज्ञान भी इसके औषधीय गुणों पर लगातार शोध कर रहा है। अर्जुन छाल में एंटीऑक्सीडेंट, फ्लेवोनॉयड्स और ट्राइटरपेनॉयड्स पाया जाता है। जोकि शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस कम करने और हृदय को सुरक्षा प्रदान करने में मदद कर सकता है।
जानें क्या है अर्जुन की छाल
अर्जुन एक बड़ा औषधीय पेड़ है, जिसकी छाल का इस्तेमाल आयुर्वेद में तमाम रोगों के इलाज में किया जाता है। अर्जुन की छाल में सैपोनिन, टैनिन, ट्राइटरपेनॉयड्स, कैल्शियम, फ्लेवोनॉयड्स, मैग्नीशियम और कई तरह के फाइटोकेमिकल्स पाए जाते हैं। जोकि इसको आयुर्वेदिक गुण प्रदान करते हैं।
आयुर्वेद में अर्जुन को 'हृदय' माना गया है और इसका जिक्र चरक संहिता और अन्य आयुर्वेदिक ग्रंथों में भी मिलता है।
आयुर्वेद में हृदय के लिए क्यों महत्वपूर्ण है अर्जुल की छाल
आयुर्वेद के मुताबिक अर्जुन की छाल हृदय बल्य, ब्लड सर्कुलेशन को संतुलित रखने और शरीर में सूजन कम करने वाली औषधि मानी जाती है। माना जाता है कि यह हृदय की मांसपेशियों को पोषण देने के साथ-साथ उसकी कार्यक्षमता बनाए रखने में भी मदद करती है।
अर्जुन की छाल में एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं। जोकि हृदय कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव क्षति से बचाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
अर्जुन की छाल से सेहत को मिल सकते हैं ये लाभ
हृदय की सेहत को समर्थन
अर्जुन की छाल का सेवन करने से हृदय की कार्यक्षमता में सुधार होने के साथ एंजाइना के लक्षण भी कम हो सकते हैं। लेकिन इसको हृदय रोगों की दवाओं का ऑप्शन नहीं माना जा सकता है। इससे कोरोनरी आर्टरी डिजीज में सहायता मिल सकती है।
एंटीऑक्सीडेंट गुण
अर्जुन की छाल में पॉलीफेनॉल और फ्लेवोनॉयड्स पाए जाते हैं। जोकि शरीर में फ्री रेडिकल्स को कम करने में सहायता कर सकते हैं। इससे कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से सुरक्षा भी मिल सकती है।
सूजन कम करने में सहायक
अर्जुन की छाल के एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण देखे गए हैं। इसके यह गुण शरीर में सूजन संबंधी प्रक्रियाओं को कम करने में मदद कर सकते हैं।
रिकवरी में सहायता
ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस कम होने से हृदय और ब्लड वेसेल्स पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है। लेकिन इस संबंध में अभी भी बड़े मानव अध्ययन सीमित हैं।
ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल पर असर
अर्जुन की छाल रक्तचाप और लिपिड प्रोफाइल पर पॉजिटिव असर डाल सकती है। वहीं कुछ अध्ययनों में कुल कोलेस्ट्रॉल और LDL में हल्की कमी देखी गई है। वहीं कुछ मामलों में यह रक्तचाप कंट्रोल रखने में सहायक प्रभाव मिला है।
लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट की मानें, तो अभी मौजूद वैज्ञानिक प्रमाण इतने मजबूत नहीं हैं कि इसको हाई ब्लड प्रेशर या हाई कोलेस्ट्रॉल का शुरूआती इलाज माना जाए। अगर कोई व्यक्ति इन समस्याओं की दवा ले रहा है, तो बिना डॉक्टर की सलाह के अर्जुन की छाल का सेवन नहीं करना चाहिए।
काढ़ा बनाने और पीने का तरीका
सबसे पहले आयुर्वेदाचार्य की निर्धारित मात्रा के हिसाब से पानी में अर्जुन की छाल का पाउडर डालें।
फिर इसको धीमी आंच पर उबालें।
अब जब पानी आधा रह जाए, तो गैस बंद कर दें।
इस पानी को छानकर गुनगुना होने पर पिएं।
अर्जुन की छाल आयुर्वेद की एक महत्वपूर्ण औषधीय जड़ी-बूटी है। इसको खासरूप से हृदय की सेहत के लिए उपयोग किया जाता है। आधुनिक शोध की मानें, तो इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी तत्व हृदय को सुरक्षा देने, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस घटाने में और सूजन कम करने सहायक हो सकते हैं। लेकिन हाई बीपी, हाई कोलेस्ट्रॉल या हृदय रोगों के इलाज के लिए इसको दवाओं का ऑप्शन नहीं माना जा सकता है। वहीं अगर आप किसी बीमारी की दवा ले रहे हैं, तो डॉक्टर या योग्य आयुर्वेदाचार्य की सलाह पर ही अर्जुन की छाल का काढ़ा लें।
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आज के समय में ज्यादातर घरों में खुद से दवाई लेने का चलन बढ़ गया है। बिना डॉक्टर के सलाह लोग खुद से दवाई का सेवन कर रहे हैं। हालांकि, डॉक्टर का कहना है कि इस तरह के दवाईयों का सेवन करने से आपको काफी नुकसान पहुंच सकता है। डॉक्टर कहते हैं कि इन दवाईयों के बार-बार खाने से आपकी इम्यूनिटी कमजोर हो सकती है। यदि आपको एंटीबायोटिक दवाई लेने की आदत हैं, तो इस लेख का आज ही पढ़ें।
पेट का कनेक्शन- यहीं रहती है आपकी इम्यूनिटी
डॉक्टर कहते हैं कि हमारे शरीर का करीब 70 प्रतिशत इम्यून सिस्टम पेट (गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट) में होता है। इस पेट में मौजूद करोड़ों 'गुड बैक्टीरिया' चलाते हैं, जिन्हें गट माइक्रोबायोम कहते हैं।
असल में जब कोई ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक लेते हैं, तो वह एक मिसाइल की तरह कार्य करती है। वह बीमारी फैलाने वाले बैड बैक्टीरिया को तो मारती ही है, लेकिन साथ ही हमारे पेट के गुड और मददगार बैक्टीरिया को भी पूरी तरह खत्म कर देती है।
बार-बार बीमारियों की चपेट में आते हैं आप
अगर आप बार-बार एंटीबायोटिक्स दवाई लेते हैं, तो पेट के गुड बैक्टीरिया को वापस ठीक होने का मौका नहीं मिलता है। डॉक्टरों की भाषा में इस असुंतलन को 'डिस्बायोसिस' कहा जाता है। इसी कारण से प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ जाती है। फिर बदलते मौसम के कारण बार-बार बीमारियों के चपेट में आप आ सकते हैं। बरसात के समय या फिर सर्दी के दौरान जुकाम-वायरल ( जैसे इन्फ्लूएंजा या डेंगू) हो सकता है। एंटीबायोटिक्स केवल बैक्टीरिया को मारती हैं, वायरस पर इनका कोई असर नहीं होता है। इसलिए, वायरल बीमारी में इन्हे बेवजह खाने से शरीर सिर्फ एसिडिटी, पेट फूलना और दस्त जैसी समस्याएं परेशान करती है।
इतना ही नहीं, इंटरनल मेडिसिन के क्षेत्र में आज सबसे बड़ी चिंता एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस की है। अगर आप गलत तरीके से एंटीबायोटिक लेते हैं, तो थोड़ा ठीक महसूस होने पर दवा का कोर्स बीच में ही छोड़ देते हैं, तो इससे मजबूत बैक्टीरिया बच जाते हैं और खुद को म्यूटेट करते हैं। फिर यह सुपरबग्स बन जाते हैं। जिसका मतलब है कि भविष्य में किसी को टाइफाइड या यूरिन इंफेक्शन (यूटीआई) जैसी बीमारियां होंगी, तो ये आम और सस्ती दवाइयां असर करना बंद कर देती है।
परिवार की इम्यूनिटी को बचाने के तरीके
- बिना डॉक्टर के सलाह और चेकअप के कभी भी कोई मेडिसन खुद से न लें और एंटीबायोटिक का सेवन न करें।
- यदि आपके डॉक्टर ने दवा लिखी है, तो ठीक होने के बाद भी इसका कोर्स पूरा करें।
- असल में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल के दौरान या बाद में हमारे पारंपरिक भारतीय प्रोबायोटिक्स जैसे घर का बना दही, छाछ या फर्मेंटेड फूड जरुर खाएं, जिससे पेट के गुड बैक्टीरिया वापिस आ सकें।
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