जन्माष्टमी की शुभ घड़ी यानी 4 सितंबर 2026 की रात जब श्रीहरिकोटा से GSLV-F17 ने उड़ान भरी और EOS-05 को निर्धारित कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया, तब यह केवल एक और रॉकेट लॉन्च नहीं था, बल्कि यह भारत की चार दशक से अधिक पुरानी अंतरिक्ष-यात्रा में तकनीकी परिपक्वता, संस्थागत अनुशासन और असफलताओं से सीखने की वैज्ञानिक संस्कृति का एक महत्वपूर्ण प्रमाण था। इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (ISRO) के आधिकारिक रिकॉर्ड में GSLV-F17/EOS-05 को 4 सितंबर 2026 के सफल मिशन के रूप में दर्ज किया गया है।
हालांकि, इस सफलता का मूल्यांकन केवल राष्ट्रवादी उत्साह से करना वैज्ञानिक दृष्टि से अधूरा होगा। असली सवाल यह है— आखिर ISRO बार-बार कठिन अंतरिक्ष अभियानों को सफल बनाने की क्षमता कैसे विकसित कर पाया? इसका सटीक उत्तर किसी एक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक, किसी एक सरकार या किसी एक तकनीक में नहीं है। वास्तव में इसका शानदार उत्तर है— सतत संस्थागत learning system, जिसको इस प्रकार समझा जा सकता है:-
पहला, ISRO की पहली ताकत— असफलता को अपराध नहीं, Data मानना: अंतरिक्ष विज्ञान में असफलता असामान्य नहीं है। दुनिया की सबसे बड़ी अंतरिक्ष एजेंसियां भी मिशन खोती रही हैं। ISRO भी इससे अछूता नहीं रहा। PSLV-C61/EOS-09 मिशन मई 2025 में पूरा नहीं हो सका। GSLV-F15/NVS-02 मिशन में भी उपग्रह को निर्धारित operational orbit तक पहुंचाने में समस्या आई। बावजूद इसके, ISRO के आधिकारिक launch record में इन घटनाओं को दर्ज किया गया है। महत्वपूर्ण यह है कि ISRO असफलता के बाद उसे छिपाने के बजाय failure analysis करता है। उदाहरण के लिए 2021 के GSLV-F10 मिशन की विफलता के बाद क्रायोजेनिक upper stage की anomaly की जांच के लिए विशेषज्ञों की Failure Analysis Committee गठित की गई थी। यही वैज्ञानिक संस्कृति किसी भी aerospace organisation की असली पूंजी होती है। Failure, फिर Analysis, फिर Modification, फिर Testing, फिर Reflight- यह चक्र जितनी तेजी और ईमानदारी से चलता है, उतनी ही तेजी से reliability बढ़ती है।
दूसरा, GSLV-F17 की सफलता इसलिए महत्वपूर्ण है कि
GSLV साधारण rocket नहीं है: ISRO के अनुसार GSLV तीन-stage vehicle है जिसमें solid, liquid और cryogenic upper stage शामिल हैं और इसे लगभग 2,000 किलोग्राम वर्ग के spacecraft को Geosynchronous Transfer Orbit में पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया है। क्रायोजेनिक तकनीक किसी भी अंतरिक्ष कार्यक्रम की अत्यंत कठिन तकनीकी क्षमताओं में से एक है। Liquid hydrogen और liquid oxygen को अत्यंत निम्न तापमान पर संभालना, turbopumps को नियंत्रित करना, combustion stability बनाए रखना और सही समय पर thrust उपलब्ध कराना—ये सभी अत्यधिक जटिल engineering challenges हैं। इसलिए GSLV की सफलता को केवल “rocket चला और satellite पहुंच गया” के स्तर पर देखना तकनीकी उपलब्धि को छोटा करना होगा।
तीसरा, असली सफलता—Precision: अंतरिक्ष में “पास-पास” भी असफलता हो सकती है। रॉकेट को satellite को केवल अंतरिक्ष में नहीं पहुंचाना होता। उसे निर्धारित velocity, direction और orbital parameters के साथ पहुंचाना होता है। इसमें Guidance, Navigation and Control प्रणाली की भूमिका निर्णायक होती है।
Inertial sensors, gyroscopes, accelerometers, onboard computers, telemetry और ground tracking systems लगातार vehicle की स्थिति और गति का अनुमान लगाते हैं। फिर flight-control system trajectory को नियंत्रित करता है। यानी रॉकेट का हर सेकंड गणित है। एक छोटी velocity error भविष्य में satellite के fuel budget को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि GSLV-F17 जैसी सफलता वास्तव में हजारों calculations और लाखों engineering decisions की अंतिम अभिव्यक्ति होती है।
चौथा, ISRO की सबसे बड़ी ताकत—System Engineering: ISRO की उपलब्धि को केवल rocket technology के रूप में देखना गलत होगा। एक अंतरिक्ष मिशन वास्तव में कई प्रणालियों का एक साथ काम करना है— Propulsion और Avionics और Software और Navigation और Telemetry और Communication और Satellite और Ground Station और Mission Control. इनमें से कोई एक critical subsystem विफल हुआ तो पूरा मिशन खतरे में पड़ सकता है। ISRO ने दशकों में इन प्रणालियों को अलग-अलग विकसित करने के बजाय एक integrated engineering ecosystem में विकसित किया है। यही उसकी institutional strength है।
पांचवां, NASA से तुलना- संसाधन बनाम engineering culture: NASA के पास ISRO की तुलना में कहीं अधिक वित्तीय संसाधन, विशाल industrial ecosystem और private-sector partnerships हैं। NASA का मॉडल high-end science, deep-space exploration और अत्यंत जटिल वैज्ञानिक missions पर केंद्रित है। लेकिन ISRO की ताकत अलग है। भारत ने सीमित संसाधनों के भीतर high reliability और mission utility को प्राथमिकता दी। NASA जहां अत्यंत महंगे और technologically ambitious missions कर सकता है, ISRO ने comparatively frugal architecture के माध्यम से ऐसे missions विकसित किए जिनका प्रत्यक्ष उपयोग मौसम, संचार, navigation, agriculture, disaster management और Earth observation में होता है। यह तुलना “कौन बेहतर है?” की नहीं होनी चाहिए। यह दो अलग engineering philosophies की तुलना है।
छठा, SpaceX से तुलना: यहां ISRO को सीखना भी होगा: SpaceX ने launch economics को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। Reusable rockets, rapid launch cadence, vertically integrated manufacturing और aggressive testing ने space-launch industry की पारंपरिक सोच को चुनौती दी है। ISRO की ताकत reliability और cost efficiency में रही है, लेकिन आने वाले दशक में उसके सामने बड़ा प्रश्न होगा— क्या वह केवल सफल launches करेगा या launches को mass-scale commercial service में बदल पाएगा? SpaceX की असली चुनौती यही है। भविष्य में भारत को केवल “कम लागत में satellite launch करने वाला देश” नहीं रहना चाहिए। उसे— Reusable Launch Vehicle और Rapid Turnaround और Private Space Industry और High Launch Frequency की दिशा में तेजी से बढ़ना होगा।
सातवां, चीन से तुलना- भारत की अगली चुनौती: China ने अंतरिक्ष कार्यक्रम को राष्ट्रीय शक्ति के एक व्यापक instrument में बदल दिया है। उसका space programme launch vehicles, navigation, lunar exploration, space station, Earth observation और military space capabilities तक फैला हुआ है।
भारत के लिए चीन की चुनौती केवल rocket technology नहीं है। चुनौती है—Scale। भारत को अब यह सोचना होगा कि क्या उसका space ecosystem अगले 10–20 वर्षों में चीन जैसी industrial scale हासिल कर सकता है? ISRO अकेले इसका उत्तर नहीं दे सकता। इसके लिए private companies, universities, semiconductor industry, materials science, propulsion companies और venture capital ecosystem को साथ आना होगा।
आठवां, EOS-05 का महत्व—Space से Earth तक: EOS-05 की सफलता का एक बड़ा संदेश यह है कि space technology का अंतिम लक्ष्य केवल अंतरिक्ष में पहुंचना नहीं है। Earth observation का मतलब है- कृषि निगरानी, आपदा प्रबंधन, शहरी नियोजन, infrastructure monitoring, मौसम और पर्यावरण अध्ययन तथा रणनीतिक applications, यानी satellite की सफलता तभी पूर्ण मानी जाएगी जब उसका data जमीन पर decision-making को बेहतर बनाए। इसीलिए अंतरिक्ष कार्यक्रम को केवल launch statistics से मापना गलत होगा। असली सवाल है— एक सफल launch से भारत की जमीन पर कितनी नई क्षमता पैदा हुई?
नौवां, ISRO का सबसे बड़ा competitive advantage—Frugal Engineering: ISRO की “कम लागत” वाली छवि अक्सर गलत तरीके से प्रस्तुत होती है। Frugal engineering का अर्थ घटिया engineering नहीं है। इसका अर्थ है—कम संसाधनों में अधिकतम engineering value। Proven technology का इस्तेमाल, indigenous components, modular architecture, extensive testing और mission objectives की स्पष्ट प्राथमिकता—इन सबने भारतीय space programme को टिकाऊ बनाया। लेकिन अब भारत को frugal engineering के अगले चरण में जाना होगा: Frugal Engineering से Scalable Engineering की ओर, यानी कम लागत के साथ बड़ी संख्या में उत्पादन और launches की क्षमता की ओर।
दसवां,. सबसे महत्वपूर्ण पूंजी—Institutional Memory: ISRO की सफलता का शायद सबसे कम चर्चित कारण है institutional memory। एक वैज्ञानिक retire हो जाता है। लेकिन उसका अनुभव organisation में बना रहता है। एक mission समाप्त होता है। लेकिन उसका telemetry data अगली generation के engineers के काम आता है। एक failure होता है। लेकिन उसकी failure report अगली design review का हिस्सा बनती है। यही कारण है कि चार दशक पुरानी engineering knowledge आज के missions में दिखाई देती है। यह किसी भी देश के वैज्ञानिक संस्थान की सबसे मूल्यवान संपत्ति है।
ग्यारहवां, ISRO को अब अपनी अगली परीक्षा के लिए तैयार होना होगा: GSLV-F17 की सफलता पर गर्व स्वाभाविक है। लेकिन अंतरिक्ष दौड़ अब बदल चुकी है। अगले दशक में केवल successful launches पर्याप्त नहीं होंगे। भारत को पांच मोर्चों पर आगे बढ़ना होगा—
पहला—Reusable Launch Vehicles: Launch cost घटाने के लिए reusability निर्णायक होगी।
दूसरा—Private Space Industry: ISRO को हर काम खुद करने वाली संस्था के बजाय technology enabler और national space architect बनना होगा।
तीसरा—Semiconductor और advanced materials: Space technology की आत्मनिर्भरता केवल rocket engine से नहीं होगी। चौथा—Human Spaceflight: Gaganyaan भारत की engineering ecosystem की अगली बड़ी परीक्षा है। पांचवां—Deep Space Exploration: चंद्रमा, मंगल और आगे के missions भारत की scientific ambition का वास्तविक पैमाना तय करेंगे।
वस्तुतः, ISRO की असली उपलब्धि rocket नहीं, scientific culture है। GSLV-F17/EOS-05 की सफलता को देखकर भारत को केवल यह नहीं कहना चाहिए कि— “हमने एक और rocket सफलतापूर्वक launch कर दिया।” सही निष्कर्ष इससे बड़ा है। भारत ने एक ऐसा scientific institution बनाया है जो—असफल होता है, असफलता का विश्लेषण करता है, अपनी तकनीक सुधारता है, फिर उड़ान भरता है और अगली बार अधिक परिपक्व होकर लौटता है। यही वैज्ञानिक सभ्यता की पहचान है।
गौर कीजिए, जहां NASA की ताकत उसका विशाल scientific ecosystem है। वहीं SpaceX की ताकत उसकी disruptive commercial engineering है। जहां चीन की ताकत उसका scale और state-backed industrial mobilisation है। और ISRO की ऐतिहासिक ताकत रही है—सीमित संसाधनों में विश्वसनीय, स्वदेशी और उपयोगी अंतरिक्ष तकनीक विकसित करने की क्षमता। लेकिन 21वीं सदी के दूसरे चरण में भारत के सामने सवाल बदल चुका है।
अब सवाल यह नहीं है कि— “क्या भारत अंतरिक्ष में पहुंच सकता है?” वह साबित हो चुका है। अब सवाल है— क्या भारत अंतरिक्ष में ऐसी स्थायी वैज्ञानिक-औद्योगिक शक्ति बन सकता है जो NASA जैसी research depth, SpaceX जैसी commercial speed और चीन जैसा scale—तीनों से सीखकर अपनी स्वतंत्र भारतीय space architecture तैयार कर सके? सच कहूं तो GSLV-F17/EOS-05 की सफलता उस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, मंजिल नहीं। और शायद यही इस उपलब्धि का सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक मूल्यांकन है।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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हिंद महासागर में भारत की सामरिक क्षमता को नई धार देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल शुरू हुई है। हम आपको बता दें कि भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के वैज्ञानिक अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) स्थापित करने की संभावनाओं का आकलन कर रहे हैं। यह कवायद द्वीपों की बढ़ती बिजली जरूरतों को पूरा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे भारत की एक व्यापक रणनीतिक सोच भी दिखाई देती है, जिसके केंद्र में ग्रेट निकोबार, पूर्वी हिंद महासागर और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शामिल मलक्का जलडमरूमध्य है।
हम आपको बता दें कि परमाणु ऊर्जा विभाग की एक टीम 4 से 8 सितंबर तक अंडमान-निकोबार के दौरे पर है और द्वीपसमूह के तीनों जिलों में संभावित स्थानों का अध्ययन कर रही है। यह सर्वे ऐसे समय हो रहा है, जब यहां बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाएं आकार ले रही हैं और आने वाले वर्षों में बिजली की मांग तेजी से बढ़ने की संभावना है। BARC की टीम ने अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के उपराज्यपाल एडमिरल डीके जोशी को प्रस्तावित SMR योजना, संभावित स्थलों और इसकी प्रमुख विशेषताओं की जानकारी भी दी है। इससे संकेत मिलता है कि यह योजना केवल तकनीकी विचार-विमर्श तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे द्वीपसमूह के भविष्य के विकास और भारत के सामरिक ढांचे के साथ जोड़कर देखा जा रहा है।
बढ़ती बिजली जरूरतों के बीच SMR का विकल्प
दरअसल, अंडमान-निकोबार में प्रस्तावित विशाल परियोजनाओं के कारण ऊर्जा की जरूरत आने वाले समय में कई गुना बढ़ सकती है। विशेष रूप से ग्रेट निकोबार में अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, गहरे पानी वाला बहुउद्देशीय बंदरगाह, टाउनशिप और अन्य बिजली एवं बुनियादी ढांचा परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। इसी पृष्ठभूमि में स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टरों का विकल्प महत्वपूर्ण बनकर उभरा है। हम आपको बता दें कि SMR अपेक्षाकृत छोटे आकार के परमाणु रिएक्टर होते हैं, जिन्हें स्थानीय और क्षेत्रीय ऊर्जा जरूरतों के अनुरूप विकसित किया जा सकता है। अंडमान-निकोबार जैसे दूरस्थ द्वीपीय क्षेत्रों में स्थिर और दीर्घकालिक बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिहाज से इनकी उपयोगिता महत्वपूर्ण मानी जा रही है। लेकिन इस पूरी कहानी का एक दूसरा और अधिक व्यापक पहलू भी है। परमाणु ऊर्जा के विस्तार के साथ-साथ भविष्य में परमाणु ईंधन की उपलब्धता भी एक महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रश्न बनती जा रही है।
चीन की समुद्र से यूरेनियम निकालने की नई तकनीक
इसी बीच चीन से आई एक नई वैज्ञानिक उपलब्धि ने वैश्विक परमाणु ऊर्जा की बहस को एक नया आयाम दिया है। चीनी शोधकर्ताओं ने एक ऐसी नई सामग्री विकसित करने का दावा किया है, जो समुद्री जल से यूरेनियम निकालने में अमेरिकी ऊर्जा विभाग द्वारा पहले निर्धारित लक्ष्य से आठ गुना अधिक क्षमता दिखाती है। चीन के क़िंगदाओ स्थित चीनी विज्ञान अकादमी से जुड़े शोधकर्ताओं ने प्राकृतिक समुद्री जल के नमूनों से इस सामग्री के प्रति ग्राम से 50.4 मिलीग्राम तक यूरेनियम प्राप्त करने का दावा किया है। इसकी तुलना में अमेरिकी मानक लगभग 6 मिलीग्राम प्रति ग्राम था।
इस नई सामग्री को PhosCage नाम दिया गया है। यह स्पंज जैसी आणविक संरचना है, जिसमें फॉस्फेट समूह मौजूद हैं। ये रासायनिक रूप से यूरेनियम को बांधने की क्षमता रखते हैं। शोधकर्ताओं ने बाद में इस सामग्री को मिलीमीटर आकार के छोटे मोतियों या बीड्स में बदल दिया, ताकि इसे प्रयोगशाला के बाहर भी अधिक आसानी से इस्तेमाल और वापस प्राप्त किया जा सके। इन बीड्स ने प्रति ग्राम सामग्री से 22.55 मिलीग्राम तक यूरेनियम निकाला और सात बार दोबारा इस्तेमाल किए जाने के बाद भी प्रभावी बने रहे। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह तकनीक समुद्री जल से यूरेनियम निकालने के लिए एक नया रास्ता खोल सकती है और भविष्य में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले अधिक प्रभावी अवशोषक पदार्थों के विकास की नींव रख सकती है।
समुद्र का यूरेनियम क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
परमाणु ऊर्जा का विस्तार करने वाले देशों के लिए यूरेनियम की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती है। चीन के मामले में यह चुनौती विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसका परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम घरेलू यूरेनियम उत्पादन की तुलना में कहीं तेजी से बढ़ रहा है। विश्व परमाणु संघ के आंकड़ों के अनुसार, चीन ने 2024 में घरेलू खदानों से लगभग 1,600 टन यूरेनियम का उत्पादन किया, जबकि उसके परमाणु रिएक्टरों की जरूरत लगभग 13,000 टन थी। इस बड़े अंतर के कारण चीन को यूरेनियम के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।
यहीं समुद्र एक संभावित वैकल्पिक संसाधन के रूप में सामने आता है।
हम आपको बता दें कि दुनिया में जमीन पर ज्ञात यूरेनियम संसाधन लगभग 7.9 मिलियन टन माने जाते हैं, जबकि महासागरों में अनुमानित रूप से करीब 4.5 अरब टन यूरेनियम मौजूद है। भूवैज्ञानिक समय के दौरान चट्टानों से बारिश के पानी द्वारा यूरेनियम बहकर नदियों के माध्यम से समुद्रों तक पहुंचता रहा है, जिसके कारण समुद्री जल में इसकी विशाल मात्रा जमा हो गई। समस्या यह है कि समुद्र में यूरेनियम की सांद्रता बेहद कम है। एक टन समुद्री जल में केवल लगभग 3.3 मिलीग्राम यूरेनियम पाया जाता है। इसका अर्थ है कि व्यावसायिक स्तर पर बड़ी मात्रा में यूरेनियम निकालने के लिए अत्यधिक मात्रा में समुद्री जल को संसाधित करना होगा। इसके अलावा समुद्री जल में यूरेनियम के साथ कई अन्य घुले हुए तत्व भी मौजूद रहते हैं, जिससे इसे अलग करना तकनीकी रूप से मुश्किल हो जाता है।
वैनाडियम की चुनौती और चीन की नई सफलता
इसके अलावा, समुद्री जल से यूरेनियम निकालने में वैनाडियम एक बड़ी चुनौती माना जाता रहा है। इसका कारण यह है कि वैनाडियम भी उन्हीं रासायनिक स्थानों से जुड़ सकता है, जिनका उपयोग यूरेनियम को पकड़ने के लिए किया जाता है। अमेरिका में इस चुनौती से निपटने के लिए वर्षों तक शोध किया गया। ओक रिज नेशनल लेबोरेटरी ने विशेष प्रकार के फाइबर विकसित किए, जबकि पैसिफिक नॉर्थवेस्ट नेशनल लेबोरेटरी ने प्राकृतिक रूप से बहने वाले समुद्री जल में इन तकनीकों का परीक्षण किया।
2016 तक अमेरिका की सबसे प्रभावी अवशोषक सामग्री समुद्री जल के लंबे संपर्क के बाद प्रति ग्राम लगभग 6 मिलीग्राम यूरेनियम निकालने में सक्षम थी। हालांकि यह तकनीक पारंपरिक यूरेनियम खनन की तुलना में काफी महंगी बनी रही और अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने 2018 में कार्यक्रम समाप्त होने के बाद इस दिशा में अपनी सक्रियता काफी हद तक कम कर दी। उधर, चीन के क़िंगदाओ स्थित शोधकर्ताओं का दावा है कि उनकी नई सामग्री ने इस चुनौती के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। दो अलग-अलग वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया कि बीड्स आधारित यह सामग्री कई धातुओं की मौजूदगी के बावजूद यूरेनियम को प्राथमिकता के साथ पकड़ने में सक्षम रही। विशेष रूप से यह वैनाडियम की तुलना में यूरेनियम को अधिक प्रभावी ढंग से अलग करने में सक्षम बताई गई है।
हालांकि इस तकनीक की सीमाएं भी हैं। अभी यह प्रयोगशाला स्तर पर ही है। शोधकर्ताओं ने क़िंगदाओ के तट से समुद्री जल लेकर लगभग 25 लीटर पानी को प्रयोगशाला आधारित फ्लो सिस्टम से गुजारा था। इसका परीक्षण खुले समुद्र में नहीं किया गया है, जहां लहरें, समुद्री धाराएं, जैविक गतिविधियां और बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियां पूरी प्रक्रिया को अधिक जटिल बना सकती हैं। इसके अलावा, अभी तक यह भी स्पष्ट नहीं है कि समुद्र से प्राप्त यूरेनियम की उत्पादन लागत कितनी होगी। शोधकर्ताओं का अगला लक्ष्य इस तकनीक को बड़े स्तर पर विकसित करना और समुद्री जल से यूरेनियम निकालने की कुल लागत कम करना है।
ग्रेट निकोबार: विकास परियोजना से कहीं अधिक
उधर, भारत के संदर्भ में अंडमान-निकोबार में SMR की संभावनाओं का अध्ययन ऐसे समय हो रहा है, जब ग्रेट निकोबार एक विशाल विकास और रणनीतिक परियोजना के केंद्र के रूप में उभर रहा है। ग्रेट निकोबार परियोजना के तहत गलाथिया बे में एक इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, टाउनशिप और उससे जुड़ा ऊर्जा एवं अन्य बुनियादी ढांचा विकसित करने की योजना है। सरकार इस परियोजना को रणनीतिक, रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण बता चुकी है। इसका उद्देश्य केवल व्यापार और कनेक्टिविटी बढ़ाना नहीं है। इसके जरिए भारत अंडमान सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी उपस्थिति मजबूत करना चाहता है और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों के निकट एक बड़े समुद्री केंद्र का विकास करना चाहता है।
देखा जाये तो ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति इसे एक सामान्य विकास परियोजना से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना देती है। भारत यहां अपनी आर्थिक पहुंच बढ़ाने के साथ-साथ समुद्री गतिविधियों की निगरानी और पूर्वी हिंद महासागर में अपनी सामरिक क्षमता को भी मजबूत करना चाहता है। यहीं से यह कहानी हिंद महासागर में बदलते शक्ति-संतुलन तक पहुंचती है। दरअसल, पूर्वी हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सक्रियता के बीच ग्रेट निकोबार भारत की रणनीतिक तैयारियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है। एक मजबूत और स्थायी रक्षा उपस्थिति भारत को समुद्री मार्गों की निगरानी और सुरक्षा में मदद कर सकती है तथा हिंद महासागर में विदेशी शक्तियों की बढ़ती मौजूदगी का मुकाबला करने की क्षमता भी बढ़ा सकती है।
इस पूरी रणनीति के केंद्र में है मलक्का जलडमरूमध्य। हम आपको बता दें कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट्स में शामिल मलक्का जलडमरूमध्य हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है। भारी मात्रा में अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाज और ऊर्जा संसाधन इसी रास्ते से गुजरते हैं। ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति भारत को मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी प्रवेश क्षेत्र के करीब एक महत्वपूर्ण रणनीतिक लाभ प्रदान करती है। ऐसे में यहां विकसित होने वाला बंदरगाह, हवाई अड्डा, ऊर्जा ढांचा और रक्षा उपस्थिति मिलकर भारत की समुद्री क्षमता को नई ताकत दे सकते हैं।
INS Baaz और त्रि-सेवा कमान की अहमियत
कैंपबेल बे स्थित INS Baaz की सामरिक भूमिका भी इसी संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। यह नौसैनिक एयर स्टेशन मलक्का जलडमरूमध्य और सिक्स डिग्री चैनल के महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों पर नजर रखने की दृष्टि से अहम माना जाता है। पूरे अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह की सामरिक अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां भारत की एकमात्र एकीकृत त्रि-सेवा कमान यानि अंडमान और निकोबार कमान स्थापित है।
थलसेना, नौसेना और वायुसेना की संयुक्त कमान का गठन इस द्वीपसमूह की उस विशेष भौगोलिक स्थिति को देखते हुए किया गया था, जो अंतरराष्ट्रीय समुद्री संपर्क मार्गों के बेहद करीब स्थित है। द्वीपों की भौगोलिक स्थिति भारत को अपने समुद्री हितों की रक्षा करने और संभावित खतरों पर नजर रखने की क्षमता प्रदान करती है। यही कारण है कि अंडमान-निकोबार कमान भारत की व्यापक ‘एक्ट ईस्ट’ रणनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
ऊर्जा, यूरेनियम और समुद्री शक्ति का नया समीकरण
BARC का SMR सर्वे इस पूरी रणनीतिक तस्वीर में एक नया आयाम जोड़ता है। यदि अंडमान-निकोबार में छोटे मॉड्यूलर परमाणु रिएक्टर स्थापित होते हैं, तो वे तेजी से विकसित हो रहे नागरिक और रणनीतिक ढांचे को एक विश्वसनीय ऊर्जा आधार प्रदान कर सकते हैं। बंदरगाह, हवाई अड्डे, टाउनशिप और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए स्थिर बिजली उपलब्ध कराने के साथ SMR द्वीपों की ऊर्जा आत्मनिर्भरता और लचीलापन भी बढ़ा सकते हैं।
वहीं चीन का समुद्री जल से यूरेनियम निकालने का नया प्रयोग यह संकेत देता है कि भविष्य में महासागर केवल व्यापार और सामरिक प्रतिस्पर्धा के केंद्र नहीं रहेंगे, बल्कि परमाणु ऊर्जा के लिए ईंधन संसाधनों की नई होड़ का भी मैदान बन सकते हैं। समुद्रों में अनुमानित 4.5 अरब टन यूरेनियम मौजूद होने का अनुमान परमाणु ऊर्जा के भविष्य के लिए एक बेहद आकर्षक संभावना प्रस्तुत करता है। हालांकि इसे व्यावसायिक रूप से निकालना अभी भी एक कठिन और महंगी तकनीकी चुनौती है। यदि भविष्य में ऐसी तकनीकें आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनती हैं, तो परमाणु ऊर्जा के लिए ईंधन आपूर्ति का वैश्विक समीकरण बदल सकता है। चीन जैसे देशों के लिए इससे आयातित यूरेनियम पर निर्भरता कम करने का रास्ता खुल सकता है।
भारत के लिए क्या मायने?
भारत के लिए अंडमान-निकोबार में परमाणु ऊर्जा की संभावनाएं और हिंद महासागर की सामरिक स्थिति एक-दूसरे से अलग मुद्दे नहीं हैं। एक तरफ SMR जैसी तकनीकें दूरस्थ द्वीपों को विश्वसनीय ऊर्जा उपलब्ध करा सकती हैं। दूसरी तरफ यही ऊर्जा तेजी से विकसित हो रहे बंदरगाहों, हवाई अड्डों और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को मजबूत आधार दे सकती है। ग्रेट निकोबार में बनने वाला समुद्री और हवाई ढांचा भारत की आर्थिक और सामरिक उपस्थिति को मजबूत कर सकता है। मलक्का जलडमरूमध्य के निकट भारत की भौगोलिक स्थिति उसे वैश्विक समुद्री गतिविधियों पर बेहतर निगरानी का अवसर देती है।
बहरहाल, अंडमान-निकोबार में SMR की संभावनाओं का यह सर्वे केवल एक परमाणु ऊर्जा परियोजना की शुरुआती कवायद नहीं दिखाई देता। यह उस बड़े भारतीय रणनीतिक नक्शे का हिस्सा है, जिसमें विकास, ऊर्जा, समुद्री व्यापार, राष्ट्रीय सुरक्षा और हिंद महासागर में बदलता शक्ति-संतुलन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। साथ ही चीन का समुद्री जल से यूरेनियम निकालने का नया शोध यह भी दिखाता है कि परमाणु ऊर्जा की भविष्य की प्रतिस्पर्धा केवल जमीन पर मौजूद खदानों तक सीमित नहीं रह सकती। महासागर भी भविष्य में परमाणु ईंधन के एक संभावित विशाल स्रोत के रूप में उभर सकते हैं। और इस पूरे भू-रणनीतिक नक्शे पर भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बिंदुओं में से एक है ग्रेट निकोबार। यह एक ऐसा द्वीप है, जहां भारत की नजर केवल विकास परियोजनाओं पर नहीं है, बल्कि समुद्र के उस विशाल रास्ते पर भी है, जिससे होकर दुनिया के व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है।
-नीरज कुमार दुबे
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