Explainer: क्रिएटर और इन्फ्लुएंसर में होता है जमीन आसमान का अंतर, यहां समझिए दोनों में क्या है फर्क?
Creators and Influencers Difference: आज के डिजिटल दौर में सोशल मीडिया सिर्फ लोगों से जुड़े रहने का जरिया नहीं रह गया है, बल्कि ये एक पूरा करियर प्लेटफॉर्म बन चुका है. इंस्टाग्राम, यूट्यूब, फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे हजारों-लाखों लोग मौजूद हैं, जो अपने कंटेंट के जरिए पहचान और कमाई दोनों हासिल कर रहे हैं. इन्हीं लोगों के लिए आपने अक्सर दो शब्द सुने होंगे- क्रिएटर और इन्फ्लुएंसर. आमतौर पर लोग इन दोनों शब्दों को एक ही मान लेते हैं. कई बार किसी ऐसे व्यक्ति को, जो सोशल मीडिया पर वीडियो बनाता है, सीधे इन्फ्लुएंसर कहा जाता है. वहीं कोई कंटेंट बनाने वाला व्यक्ति खुद को क्रिएटर कहता है. लेकिन क्या दोनों रियल में एक ही होते हैं? जवाब है- नहीं.
क्रिएटर और इन्फ्लुएंसर के काम में कई जगह समानताएं जरूर हैं लेकिन दोनों की प्रायोरिटी , काम करने का तरीका और ऑडियंस से जुड़ने का उद्देश्य अलग हो सकता है. तो आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर क्रिएटर और इन्फ्लुएंसर में क्या अंतर होता है और दोनों पैसे कैसे कमाते हैं?
सबसे पहले समझिए कौन होता है क्रिएटर?
क्रिएटर यानी Content Creator वो व्यक्ति होता है, जो किसी खास टॉपिक या अपनी क्रिएटिविटी के आधार पर कंटेंट तैयार करता है. ये कंटेंट वीडियो, फोटो, शॉर्ट्स, रील्स, ब्लॉग, पॉडकास्ट, कॉमेडी स्किट, एजुकेशनल वीडियो, म्यूजिक, गेमिंग या किसी अन्य फॉर्म में हो सकता है. उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति सिर्फ टेक्नोलॉजी से जुड़ी जानकारी देता है, कोई खाना बनाने की वीडियो बनाता है, कोई ट्रैवल व्लॉग करता है, कोई कॉमेडी कंटेंट बनाता है और कोई फिल्मों या सेलिब्रिटीज से जुड़ी जानकारी शेयर करता है. इन सभी को कंटेंट क्रिएटर कहा जा सकता है.
क्रिएटर का मेन फोकस अक्सर कंटेंट बनाने पर होता है. उसका मकसद अपनी क्रिएटिविटी, जानकारी या किसी खास स्किल के जरिए लोगों तक कुछ पहुंचाना होता है. यानी अगर कोई व्यक्ति कैमरे के सामने बैठकर हर हफ्ते फिल्मों की रिव्यू करता है, किसी टॉपिक पर रिसर्च करके वीडियो बनाता है या फिर एडिटिंग और विजुअल्स के जरिए कहानी सुनाता है तो उसकी पहचान एक क्रिएटर के तौर पर हो सकती है.
फिर इन्फ्लुएंसर किसे कहते हैं?
अब बात करते हैं इन्फ्लुएंसर की. जैसा कि नाम से ही समझ आता है, Influencer वो व्यक्ति होता है जिसका लोगों की पसंद, सोच या खरीदारी के फैसले पर प्रभाव पड़ता है. इन्फ्लुएंसर की ताकत सिर्फ उसके कंटेंट में नहीं बल्कि उसकी ऑडियंस और उस ऑडियंस के साथ बने भरोसे में होती है. मान लीजिए कोई व्यक्ति लगातार इंस्टाग्राम पर फैशन, ब्यूटी या फिटनेस से जुड़े वीडियो डालता है. उसके लाखों फॉलोअर्स हैं और जब वो किसी प्रोडक्ट, कपड़े या कॉस्मेटिक की तारीफ करता है तो उसके फॉलोअर्स उस प्रोडक्ट को खरीदने में दिलचस्पी दिखाते हैं. ऐसे व्यक्ति को इन्फ्लुएंसर कहा जा सकता है. इन्फ्लुएंसर के लिए उसकी पर्सनल ब्रांडिंग और ऑडियंस के साथ कनेक्शन काफी महत्वपूर्ण होता है.
क्रिएटर और इन्फ्लुएंसर में सबसे बड़ा फर्क क्या है?
सबसे आसान तरीके से समझें तो हर इन्फ्लुएंसर क्रिएटर हो सकता है, लेकिन हर क्रिएटर जरूरी नहीं कि इन्फ्लुएंसर हो. एक क्रिएटर का मुख्य काम कंटेंट तैयार करना है, जबकि इन्फ्लुएंसर की सबसे बड़ी ताकत लोगों पर उसका प्रभाव है. उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति यूट्यूब पर साइंस से जुड़े शानदार वीडियो बनाता है. उसके वीडियो की क्वालिटी बहुत अच्छी है और वो लोगों को जानकारी देता है, लेकिन उसके फॉलोअर्स किसी प्रोडक्ट या ब्रांड के बारे में उसके कहने पर जरूरी नहीं कि खरीदारी करें. वो एक सफल क्रिएटर हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि उसे इन्फ्लुएंसर भी कहा जाए. दूसरी तरफ कोई फैशन क्रिएटर अपने कपड़े, लाइफस्टाइल और ब्रांड्स के बारे में लगातार पोस्ट करता है और उसकी ऑडियंस उसके सुझावों को गंभीरता से लेती है. यहां वह क्रिएटर होने के साथ-साथ इन्फ्लुएंसर की भूमिका भी निभा रहा है.
दोनों की ऑडियंस भी अलग तरह से करती है काम
क्रिएटर और इन्फ्लुएंसर के बीच एक बड़ा अंतर उनकी ऑडियंस के साथ रिश्ते में भी देखने को मिलता है. क्रिएटर की ऑडियंस अक्सर उसके कंटेंट के लिए आती है. मसलन किसी को किसी खास क्रिएटर के टेक्निकल वीडियो पसंद हैं, किसी को उसकी कॉमेडी पसंद है या किसी को उसके ट्रैवल व्लॉग अच्छे लगते हैं. वहीं इन्फ्लुएंसर की ऑडियंस अक्सर उस व्यक्ति से जुड़ जाती है. लोग उसकी जिंदगी, उसकी पसंद, उसकी राय और उसकी सिफारिशों में दिलचस्पी लेने लगते हैं. यही वजह है कि इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग आज ब्रांड्स के लिए काफी महत्वपूर्ण हो चुकी है.
क्रिएटर और इन्फ्लुएंसर पैसे कैसे कमाते हैं?
क्रिएटर के पास कमाई के कई रास्ते होते हैं. यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म से विज्ञापन की कमाई, ब्रांड डील, स्पॉन्सर्ड कंटेंट, एफिलिएट मार्केटिंग, मेंबरशिप, कोर्स, मर्चेंडाइज और डिजिटल प्रोडक्ट्स इसके प्रमुख माध्यम हो सकते हैं. उदाहरण के लिए कोई यूट्यूब क्रिएटर अपने चैनल पर लगातार वीडियो डालता है. उसके वीडियो पर व्यूज आते हैं और उसे विज्ञापन से कमाई हो सकती है. इसके अलावा कोई कंपनी उसके वीडियो को स्पॉन्सर कर सकती है. इन्फ्लुएंसर की कमाई में भी ये रास्ते मौजूद हैं, लेकिन यहां ब्रांड प्रमोशन और स्पॉन्सरशिप की भूमिका अक्सर ज्यादा बड़ी होती है. किसी इन्फ्लुएंसर को कंपनी अपने प्रोडक्ट की फोटो पोस्ट करने, रील बनाने, स्टोरी लगाने या किसी कैंपेन का हिस्सा बनने के लिए भुगतान कर सकती है. हालांकि ये जरूरी नहीं है कि ज्यादा फॉलोअर्स वाले व्यक्ति की कमाई हमेशा ज्यादा हो. कई बार छोटी लेकिन बेहद एक्टिव और भरोसेमंद ऑडियंस वाला इन्फ्लुएंसर भी बड़े फॉलोअर्स वाले अकाउंट से ज्यादा प्रभावी साबित हो सकता है.
WPI Index: अगस्त में 9.78 फीसदी से बढ़कर 9.92% हुई थोक महंगाई दर, ईंधन से लेकर खाने-पीने की चीजें हुई महंगी
Wholesale Price Index: सरकार द्वारा सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, देश में थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) आधारित महंगाई अगस्त 2026 के लिए 9.92 प्रतिशत रही, जो जुलाई में 9.78 प्रतिशत थी. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने बताया कि अगस्त 2026 में सभी वस्तुओं का थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) 110.8 रहा, जबकि जुलाई में यह 110.0 था. आंकड़ों से पता चलता है कि प्राथमिक वस्तुओं, ईंधन एवं ऊर्जा तथा विनिर्मित उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी का समग्र महंगाई पर असर पड़ा.
अगस्त में कच्चे तेल की कीमतों में आया उछाल
अगस्त में ईंधन एवं ऊर्जा श्रेणी की महंगाई बढ़कर 22.93 प्रतिशत हो गई, जो जुलाई में 20.05 प्रतिशत थी. हाल के सप्ताहों में अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी का असर इस श्रेणी पर साफ दिखाई दिया. वहीं, प्राथमिक वस्तुओं की महंगाई अगस्त में 7.76 प्रतिशत रही, जबकि जुलाई में यह 8.52 प्रतिशत थी. दूसरी ओर, विनिर्मित उत्पादों की महंगाई मामूली बढ़कर 8.37 प्रतिशत हो गई, जो पिछले महीने 8.29 प्रतिशत थी.
अगस्त में कितना रहा प्राथमिक वस्तुओं का सूचकांक
अगस्त में प्राथमिक वस्तुओं का सूचकांक 118.1, ईंधन एवं ऊर्जा का 108.3 और विनिर्मित उत्पादों का 108.8 रहा. जुलाई में ये क्रमशः 117.2, 105.4 और 108.4 थे. डब्ल्यूपीआई खाद्य सूचकांक-आधारित महंगाई अगस्त में बढ़कर 7.05 प्रतिशत हो गई, जबकि जुलाई में यह 6.65 प्रतिशत थी. इससे संकेत मिलता है कि खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भी दबाव बना हुआ है.
जानें क्यों बढ़ी थोक महंगाई दर?
मंत्रालय के अनुसार, पिछले महीने अगस्त में थोक महंगाई बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में खनिज तेल (पेट्रोलियम उत्पाद सहित), खाद्य वस्तुएं, खाद्य उत्पादों का विनिर्माण, मूल धातुएं, गैर-खाद्य पदार्थ और रसायन एवं रासायनिक उत्पादों का निर्माण शामिल रहे. सरकार ने जून 2026 के अंतिम आंकड़ों में भी संशोधन किया है. जून का डब्ल्यूपीआई सूचकांक 110.2 के अस्थायी अनुमान से बढ़ाकर 110.3 कर दिया गया है.
जून में भी बढ़ी थी थोक महंगाई दर
इसके साथ ही जून 2026 की थोक महंगाई का अंतिम आंकड़ा 9.87 प्रतिशत से संशोधित होकर 9.97 प्रतिशत कर दिया गया है. आंकड़ों के अनुसार, विनिर्माण क्षेत्र के लिए इनपुट उत्पादक मूल्य सूचकांक (इनपुट पीपीआई) अगस्त 2026 में 104.2 रहा. वहीं जून माह का ट्रायल इनपुट पीपीआई 107.1 के अनंतिम अनुमान से संशोधित होकर 105.9 किया गया है.
स्रोत- आईएएनएस
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