क्यों डॉलर के खिलाफ BRICS ने की लामबंदी? आखिर अमेरिका को कैसे पछाड़ेंगी ब्रिक्स कंट्रीज, भारत को फायदा या नुकसान?
Explainer: नई दिल्ली में हुए 18वें BRICS शिखर सम्मेलन ने एक बार फिर दुनिया की वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर की भूमिका पर बहस तेज कर दी है. BRICS देश लंबे समय से व्यापार और भुगतान में डॉलर पर निर्भरता कम करने की बात कर रहे हैं. लेकिन इसे सीधे-सीधे 'डॉलर खत्म करने की योजना' समझना सही नहीं होगा. असल रणनीति धीरे-धीरे ऐसी वित्तीय व्यवस्था खड़ी करने की है, जिसमें BRICS देशों को हर अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए अमेरिकी मुद्रा और पश्चिमी वित्तीय ढांचे पर निर्भर न रहना पड़े.
तो सवाल है कि आखिर डॉलर को चुनौती देने की जरूरत क्यों महसूस हुई? और क्या BRICS वाकई अमेरिका की आर्थिक ताकत को पीछे छोड़ सकता है? डॉलर कमजोर हुआ तो भारत को फायदा होगा या फिर नुकसान भी हो सकता है? आइए जानते हैं इन सब सवालों के विस्तार से जवाब. लेकिन इससे पहले जान लेते हैं कि आखिर डॉलर मजबूत कैसे हुआ?
डॉलर इतना ताकतवर कैसे बना?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी डॉलर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण आधार बन गया. दुनिया के केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर रखते हैं, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में इसका इस्तेमाल होता है और तेल समेत कई प्रमुख कमोडिटी की कीमतें भी डॉलर में तय होती हैं.
इसका फायदा अमेरिका को यह मिलता है कि दुनिया के दूसरे देशों को डॉलर की जरूरत रहती है. अमेरिकी वित्तीय बाजारों और बैंकों की वैश्विक भूमिका भी इसी व्यवस्था से मजबूत होती है.
लेकिन BRICS के कई देशों को लगता है कि इस व्यवस्था में शक्ति का संतुलन पश्चिम, खासकर अमेरिका के पक्ष में बहुत ज्यादा झुका हुआ है.
BRICS की नाराजगी सिर्फ डॉलर से नहीं
BRICS का एजेंडा केवल डॉलर को हटाना नहीं है. समूह IMF, World Bank और वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में विकासशील देशों की हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व बढ़ाने की भी मांग करता रहा है.
BRICS का विस्तार होने के बाद इसका आर्थिक और राजनीतिक वजन और बढ़ा है. वर्तमान समूह में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हैं. समूह वैश्विक आबादी के 40 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है. यानी BRICS के पास बाजार भी है, प्राकृतिक संसाधन भी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं भी.
अमेरिका पर निर्भरता कम करने की पहली सीढ़ी है लोकल करेंसी
BRICS की सबसे व्यावहारिक रणनीति स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाना है. मान लीजिए भारत और रूस के बीच व्यापार हो रहा है. यदि दोनों देशों के कारोबारी सीधे रुपये और रूबल में भुगतान कर सकें तो हर लेनदेन को पहले डॉलर में बदलने की जरूरत कम होगी.
इसी तरह चीन और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल काफी बढ़ चुका है. भारत भी अलग-अलग देशों के साथ रुपये में व्यापार निपटाने की व्यवस्था को आगे बढ़ाने की कोशिश करता रहा है.
इस मॉडल का फायदा यह है कि डॉलर की जरूरत पूरी तरह खत्म नहीं होती, लेकिन हर लेनदेन में डॉलर की अनिवार्यता घटने लगती है.
दूसरी बड़ी तैयारी, अलग पेमेंट सिस्टम
सिर्फ अपनी मुद्रा में व्यापार करना पर्याप्त नहीं है. पैसा एक देश से दूसरे देश तक पहुंचाने के लिए बैंकिंग और भुगतान नेटवर्क भी चाहिए. यहीं BRICS की दूसरी रणनीति सामने आती है क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम को मजबूत करना.
रूस के पास SPFS और चीन के पास CIPS जैसे वैकल्पिक वित्तीय ढांचे हैं. BRICS देशों के बीच ऐसे सिस्टम को जोड़ने और भुगतान को तेज, सस्ता और सुरक्षित बनाने पर चर्चा हो रही है. हालांकि इनकी पहुंच अभी SWIFT के स्तर की नहीं है. SWIFT दुनिया भर के 11 हजार से अधिक वित्तीय संस्थानों को जोड़ता है.
तीसरा हथियार है न्यू डेवलपमेंट बैंक
BRICS ने 2015 में New Development Bank यानी NDB की स्थापना की थी. इसका उद्देश्य विकासशील देशों को बुनियादी ढांचे और विकास परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध कराना है.
NDB की खासियत यह है कि वह सदस्य देशों की स्थानीय मुद्राओं में भी वित्त उपलब्ध कराने की दिशा में काम करता है. इससे उन देशों को डॉलर में कर्ज लेने से पैदा होने वाले मुद्रा जोखिम से राहत मिल सकती है.
क्या BRICS अपनी नई करेंसी लॉन्च करेगा?
यही सबसे ज्यादा चर्चा वाला सवाल है. BRICS की अपनी साझा मुद्रा को लेकर वर्षों से अटकलें लगती रही हैं. लेकिन 2026 तक कोई आधिकारिक BRICS मुद्रा चलन में नहीं है. न कोई साझा केंद्रीय बैंक है और न यूरो जैसी एकीकृत मुद्रा व्यवस्था.
असल फोकस फिलहाल स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वैकल्पिक भुगतान नेटवर्क और वित्तीय संस्थाओं को मजबूत करने पर है.
इसका मतलब है कि निकट भविष्य में BRICS का लक्ष्य शायद डॉलर को एक झटके में हटाना नहीं, बल्कि डॉलर पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करना है.
भारत का रुख चीन और रूस से अलग क्यों है?
यहां भारत की भूमिका बेहद दिलचस्प है. चीन और रूस BRICS को अक्सर पश्चिमी प्रभुत्व के विकल्प के रूप में देखते हैं. भारत भी वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार चाहता है, लेकिन वह BRICS को केवल 'एंटी-अमेरिका' प्लेटफॉर्म के रूप में नहीं देखता.
भारत की अमेरिका के साथ मजबूत व्यापारिक, तकनीकी और रणनीतिक साझेदारी है. दूसरी ओर भारत BRICS, Quad, G20 और SCO जैसे अलग-अलग मंचों पर एक साथ सक्रिय है.
इसलिए नई दिल्ली का जोर डॉलर को खत्म करने के बजाय विकल्प बढ़ाने और रणनीतिक स्वायत्तता पर ज्यादा है.
फिर अमेरिका को कैसे चुनौती मिलेगी?
BRICS अमेरिका को सैन्य तरीके से नहीं, बल्कि आर्थिक ढांचे में धीरे-धीरे चुनौती दे सकता है.
इसके लिए चार चीजें महत्वपूर्ण होंगी...
- आपसी व्यापार बढ़ाना
- स्थानीय मुद्राओं में भुगतान बढ़ाना
- वैकल्पिक क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम बनाना
- NDB जैसी संस्थाओं की ताकत बढ़ाना
अगर BRICS देश इन चार क्षेत्रों में सफल होते हैं तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर की जरूरत कम हो सकती है. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होगा कि अमेरिकी डॉलर अचानक कमजोर होकर दुनिया की प्रमुख मुद्रा नहीं रहेगा.
डॉलर को हटाना इतना आसान नहीं
यहीं BRICS की सबसे बड़ी चुनौती है. अमेरिकी डॉलर अभी भी दुनिया की वित्तीय व्यवस्था में बेहद गहराई से जुड़ा हुआ है. सितंबर 2025 तक वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी करीब 57 प्रतिशत थी. वहीं SWIFT जैसे नेटवर्क का विशाल वैश्विक आधार है.
दूसरी समस्या खुद BRICS के भीतर है. भारत और चीन के बीच सीमा और व्यापार संबंधी मतभेद हैं. सदस्य देशों की आर्थिक नीतियां अलग हैं. राजनीतिक हित भी हमेशा एक जैसे नहीं होते.
अगर भारत-रूस रुपये-रूबल में व्यापार करते हैं, चीन दूसरे देशों के साथ युआन में भुगतान बढ़ाता है, NDB स्थानीय मुद्राओं में कर्ज देता है और BRICS देशों के पेमेंट सिस्टम आपस में जुड़ते हैं, तो डॉलर की वैश्विक भूमिका धीरे-धीरे कुछ क्षेत्रों में कम हो सकती है.
डॉलर के कमजोर होने से भारत पर क्या होगा असर?
अगर अमेरिकी डॉलर कमजोर होता है, तो भारत को कुछ फायदे मिल सकते हैं, लेकिन इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि डॉलर के मुकाबले रुपया कितना मजबूत होता है और कमजोरी किस वजह से आई है.
भारत को ये बड़े फायदे हो सकते हैं
1. कच्चा तेल सस्ता पड़ सकता है
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है और अंतरराष्ट्रीय तेल कारोबार मुख्यतः डॉलर में होता है. अगर डॉलर कमजोर होता है और तेल की डॉलर कीमत स्थिर रहती है, तो रुपये में तेल खरीदने की लागत घट सकती है. इससे पेट्रोल-डीजल, परिवहन और महंगाई पर राहत मिल सकती है.
2. विदेश से सामान खरीदना सस्ता हो सकता है
भारत को कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट, मशीनरी, सोना और कई औद्योगिक उत्पाद आयात करने पड़ते हैं. रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत होने पर इन आयातों की रुपये में लागत कम हो सकती है.
3. महंगाई पर दबाव घट सकता है
आयातित वस्तुओं की लागत कम होने से कंपनियों का इनपुट कॉस्ट घट सकता है. इसका फायदा आगे चलकर उपभोक्ताओं को भी मिल सकता है. खासकर ऊर्जा और औद्योगिक कच्चे माल के मामले में इसका असर महत्वपूर्ण हो सकता है.
4. भारत का विदेशी कर्ज सस्ता हो सकता है
जिन भारतीय कंपनियों या संस्थाओं ने डॉलर में कर्ज लिया है, उनके लिए रुपया मजबूत होने पर उस कर्ज को चुकाने की रुपये में लागत घट सकती है. हालांकि यह फायदा उन्हीं पर लागू होगा जिनकी डॉलर में देनदारी है.
5. सोने की कीमत पर असर पड़ सकता है
भारत में सोने की घरेलू कीमत पर अंतरराष्ट्रीय सोने की डॉलर कीमत और डॉलर-रुपया विनिमय दर दोनों का प्रभाव पड़ता है. डॉलर कमजोर होने से अगर वैश्विक सोने की कीमत में पर्याप्त गिरावट आती है, तो भारत में सोना अपेक्षाकृत सस्ता हो सकता है. लेकिन सुरक्षित निवेश की मांग बढ़ने पर उल्टा असर भी संभव है.
लेकिन एक बड़ा नुकसान भी है
भारतीय एक्सपोर्टर्स को नुकसान हो सकता है. मान लीजिए किसी भारतीय कंपनी को अमेरिका से अपने सामान के बदले 1 लाख डॉलर मिलते हैं. अगर डॉलर कमजोर होने के कारण रुपया मजबूत हो जाता है, तो उन 1 लाख डॉलर को रुपये में बदलने पर कंपनी को पहले की तुलना में कम रुपये मिलेंगे. इसलिए IT, फार्मा, टेक्सटाइल और दूसरे निर्यात क्षेत्रों पर दबाव आ सकता है.
BRICS और डॉलर वाली बहस में भारत के लिए क्या मायने?
यही वजह है कि भारत के लिए 'डॉलर कमजोर हो' अपने आप में कोई लक्ष्य नहीं है. भारत का असली फायदा ऐसी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में है जिसमें अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए केवल एक मुद्रा पर अत्यधिक निर्भरता न हो.
अगर BRICS देशों के बीच रुपये, रूबल, युआन जैसी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ता है, तो भारत को कुछ लेनदेन में डॉलर की जरूरत कम हो सकती है. इससे विदेशी मुद्रा जोखिम और भुगतान लागत को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है.
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कच्चे तेल की कीमतों में उछाल फिलहाल भारत के लिए कोई व्यापक संकट नहीं; मजबूत फॉरेक्स रिजर्व और कम महंगाई बने सहारा
नई दिल्ली, 14 सितंबर (आईएएनएस)। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है और ब्रेंट क्रूड 107-108 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा स्थिति भारत के लिए चिंता का विषय जरूर है, लेकिन इसे फिलहाल व्यापक आर्थिक संकट नहीं कहा जा सकता।
बाजार विशेषज्ञों ने सोमवार को कहा कि भारत की स्थिति इस समय अपेक्षाकृत मजबूत है। देश में महंगाई नियंत्रित स्तर पर है, चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में चालू खाता घाटा (सीएडी) जीडीपी का लगभग 0.8 प्रतिशत रहा है और विदेशी मुद्रा भंडार (फॉरेक्स रिजर्व) रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है।
हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 785.7 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया है, जो बाहरी झटकों से निपटने के लिए मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान करता है।
हालांकि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं या पश्चिम एशिया से तेल आपूर्ति और समुद्री परिवहन में गंभीर व्यवधान आता है, तो भारत के सामने विकास और महंगाई के बीच संतुलन बनाना कठिन हो सकता है। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 88.6 प्रतिशत आयात करता है, इसलिए ऊंची कीमतों का सीधा असर आयात बिल और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
विश्लेषकों का कहना है कि आरबीआई के एक अध्ययन के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि होने पर खुदरा महंगाई लगभग 49 आधार अंक तक बढ़ सकती है। दूसरी ओर यदि सरकार उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए उत्पाद शुल्क घटाती है या सब्सिडी बढ़ाती है, तो राजकोषीय घाटे पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
तेल कीमतों में वृद्धि का प्रभाव परिवहन, खाद्य पदार्थों और विनिर्मित उत्पादों की लागत पर भी पड़ता है। पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में संभावित बढ़ोतरी से घरेलू उपभोग प्रभावित हो सकता है और परिवारों की वास्तविक आय पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं यदि सरकार कीमतों का बोझ अपने ऊपर लेती है, तो सार्वजनिक वित्त और तेल विपणन कंपनियों की स्थिति प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है कि यदि औसत क्रूड ऑयल मूल्य 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना रहता है, तो वित्त वर्ष 2026-27 में भारत का चालू खाता घाटा बढ़कर जीडीपी के 1.9 से 2.2 प्रतिशत तक पहुंच सकता है, जबकि पहले इसका अनुमान 0.7 से 0.8 प्रतिशत के बीच था।
ऊंचे कच्चे तेल का असर विभिन्न उद्योगों पर भी अलग-अलग होगा। एयरलाइंस, पेंट, रसायन, लॉजिस्टिक्स, सीमेंट, उपभोक्ता सामान और तेल विपणन कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर ओएनजीसी और ऑयल इंडिया जैसी तेल एवं गैस उत्पादक कंपनियों को ऊंची कीमतों से लाभ मिल सकता है। वहीं नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और घरेलू गैस आधारित क्षेत्रों में निवेशकों की रुचि और बढ़ सकती है।
गौरतलब है कि सोमवार को ब्रेंट क्रूड नवंबर डिलीवरी के लिए 107.82 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) भी 103 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कारोबार करता देखा गया। बाजार की नजर पश्चिम एशिया और लाल सागर के समुद्री मार्गों की स्थिति पर बनी हुई है, जहां बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
--आईएएनएस
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