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संजू सैमसन के फ्लॉप शो के बाद भी वैभव सूर्यवंशी को पिलाना पड़ेगा पानी, नहीं मिलेगा प्लेइंग-11 में मौका? ये है वजह

Vaibhav Sooryavanshi: भारत और अफगानिस्तान के बीच खेली जा रही टी-20 सीरीज का दूसरा मुकाबला 15 सितंबर को खेला जाएगा. अरुण जेटली स्टेडियम में खेले जाने वाले दूसरे टी-20 मैच में भारत की प्लेइंग-11 में बदलाव देखने को मिल सकता है. जी हां, पहले टी-20 मैच में वैभव सूर्यवंशी को अंतिम ग्यारह में शामिल नहीं किया गया था, लेकिन उनकी जगह खेलने वाले संजू सैमसन कुछ खास नहीं कर सके. तो ऐसे में सवाल उठता है कि क्या संजू की जगह अब प्लेइंग-11 में वैभव सूर्यवंशी को अंतिम ग्यारह में शामिल किया जाएगा? या फिर भारत सेम प्लेइंग-11 के साथ ही मैदान पर उतरेगा.

वैभव सूर्यवंशी को पहले मैच की प्लेइंग-11 से किया ड्रॉप

अफगानिस्तान के साथ खेले गए पहले टी-20 मैच में भारत के स्टार युवा ओपनर वैभव सूर्यवंशी को प्लेइंग-11 से बाहर किया गया था. टीम मैनेजमेंट के इस फैसले ने सभी को हैरान कर दिया था, क्योंकि जिम्बाब्वे के साथ खेली पिछली टी-20 सीरीज में वैभव ने कमाल की बल्लेबाजी की थी और उन्हें प्लेयर ऑफ द सीरीज भी चुना गया था. हालांकि, कप्तान श्रेयस अय्यर ने भी टॉस के दौरान वैभव को ड्रॉप करने को लेकर कोई बयान नहीं दिया और सिर्फ ये कहा कि वह प्लेइंग-11 में नहीं हैं.

पानी पिलाते नजर आए वैभव सूर्यवंशी

अरुण जेटली स्टेडियम में खेले गए जब पहले टी-20 मैच में वैभव सूर्यवंशी को प्लेइंग-11 में शामिल नहीं किया गया, तो वाकई क्राउड काफी निराश हुआ. इतना ही नहीं मैच के दौरान वैभव को पानी पिलाते देखा गया और उन्हें मैदान पर देखकर स्टेडियम में हलचल मच गई और सभी वैभव को चियर करने लगे. अब सवाल उठता है कि क्या वैभव सूर्यवंशी को दूसरे टी-20 मैच में खेलने का मौका मिलेगा या फिर उन्हें दूसरे मैच में भी पानी पिलाना पड़ेगा.

क्या दूसरे मैच की प्लेइंग-11 में मिलेगा वैभव को मौका?

अफगानिस्तान के साथ खेले गए पहले टी-20 मैच में वैभव सूर्यवंशी की जगह संजू सैमसन को अंतिम ग्यारह में शामिल किया गया. मगर, संजू कुछ खास नहीं कर सके. वह अभिषेक शर्मा के साथ ओपनिंग करने आए और 8 गेंद पर 2 चौकों की मदद से सिर्फ 10 रन बनाकर ही चलते बने.

मगर, दूसरे टी-20 मैच में भी संजू सैमसन के खेलने की उम्मीद है और एक बार फिर वैभव सूर्यवंशी को बेंच पर बैठना पड़ सकता है. दरअसल, संजू एक अनुभवी खिलाड़ी हैं. इस बात में कोई शक नहीं है कि गौतम गंभीर ने संजू को कई बार बैक किया है और फिर अनुभवी खिलाड़ी ने प्रदर्शन भी करके दिखाया है. ऐसे में टीम मैनेजमेंट संजू को प्लेइंग-11 में बरकरार रखकर मौके देना चाहेगा, ताकि वह अपना फॉर्म हासिल करके टीम को मजबूत शुरुआत देने में मददगार साबित हो सकें.

कितनी तारीख को खेला जाएगा दूसरा T20I?

भारत और अफगानिस्तान के बीच खेली जा रही 3 मैचों की टी-20 सीरीज का दूसरा मुकाबला 15 सितंबर मंगलवार को खेला जाएगा. ये मैच भी अरुण जेटली स्टेडियम में ही खेला जाएगा. इस सीरीज में 1-0 की बढ़त हासिल कर चुकी टीम इंडिया बेस्ट प्रद्रशन के साथ मैदान पर उतरकर दूसरा टी-20 मैच जीतकर सीरीज में 2-0 की अजेय बढ़त बनाना चाहेगी.

ये भी पढ़ें: 'हमारे पास कोई ऑप्शन नहीं था...', पहला T20I जीतने के बाद श्रेयस अय्यर ने आखिर क्यों दिया ऐसा बयान, जो हो गया वायरल

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क्यों डॉलर के खिलाफ BRICS ने की लामबंदी? आखिर अमेरिका को कैसे पछाड़ेंगी ब्रिक्स कंट्रीज, भारत को फायदा या नुकसान?

Explainer: नई दिल्ली में हुए 18वें BRICS शिखर सम्मेलन ने एक बार फिर दुनिया की वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर की भूमिका पर बहस तेज कर दी है. BRICS देश लंबे समय से व्यापार और भुगतान में डॉलर पर निर्भरता कम करने की बात कर रहे हैं.  लेकिन इसे सीधे-सीधे 'डॉलर खत्म करने की योजना' समझना सही नहीं होगा. असल रणनीति धीरे-धीरे ऐसी वित्तीय व्यवस्था खड़ी करने की है, जिसमें BRICS देशों को हर अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए अमेरिकी मुद्रा और पश्चिमी वित्तीय ढांचे पर निर्भर न रहना पड़े. 

तो सवाल है कि आखिर डॉलर को चुनौती देने की जरूरत क्यों महसूस हुई? और क्या BRICS वाकई अमेरिका की आर्थिक ताकत को पीछे छोड़ सकता है? डॉलर कमजोर हुआ तो भारत को फायदा होगा या फिर नुकसान भी हो सकता है? आइए जानते हैं इन सब सवालों के विस्तार से जवाब. लेकिन इससे पहले जान लेते हैं कि आखिर डॉलर मजबूत कैसे हुआ?

डॉलर इतना ताकतवर कैसे बना?

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी डॉलर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण आधार बन गया. दुनिया के केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर रखते हैं, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में इसका इस्तेमाल होता है और तेल समेत कई प्रमुख कमोडिटी की कीमतें भी डॉलर में तय होती हैं.

इसका फायदा अमेरिका को यह मिलता है कि दुनिया के दूसरे देशों को डॉलर की जरूरत रहती है. अमेरिकी वित्तीय बाजारों और बैंकों की वैश्विक भूमिका भी इसी व्यवस्था से मजबूत होती है.

लेकिन BRICS के कई देशों को लगता है कि इस व्यवस्था में शक्ति का संतुलन पश्चिम, खासकर अमेरिका के पक्ष में बहुत ज्यादा झुका हुआ है.

BRICS की नाराजगी सिर्फ डॉलर से नहीं

BRICS का एजेंडा केवल डॉलर को हटाना नहीं है. समूह IMF, World Bank और वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में विकासशील देशों की हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व बढ़ाने की भी मांग करता रहा है.

BRICS का विस्तार होने के बाद इसका आर्थिक और राजनीतिक वजन और बढ़ा है. वर्तमान समूह में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हैं. समूह वैश्विक आबादी के 40 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है. यानी BRICS के पास बाजार भी है, प्राकृतिक संसाधन भी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं भी. 

अमेरिका पर निर्भरता कम करने की पहली सीढ़ी है लोकल करेंसी

BRICS की सबसे व्यावहारिक रणनीति स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाना है. मान लीजिए भारत और रूस के बीच व्यापार हो रहा है. यदि दोनों देशों के कारोबारी सीधे रुपये और रूबल में भुगतान कर सकें तो हर लेनदेन को पहले डॉलर में बदलने की जरूरत कम होगी.

इसी तरह चीन और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल काफी बढ़ चुका है. भारत भी अलग-अलग देशों के साथ रुपये में व्यापार निपटाने की व्यवस्था को आगे बढ़ाने की कोशिश करता रहा है.

इस मॉडल का फायदा यह है कि डॉलर की जरूरत पूरी तरह खत्म नहीं होती, लेकिन हर लेनदेन में डॉलर की अनिवार्यता घटने लगती है.

दूसरी बड़ी तैयारी, अलग पेमेंट सिस्टम

सिर्फ अपनी मुद्रा में व्यापार करना पर्याप्त नहीं है. पैसा एक देश से दूसरे देश तक पहुंचाने के लिए बैंकिंग और भुगतान नेटवर्क भी चाहिए. यहीं BRICS की दूसरी रणनीति सामने आती है क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम को मजबूत करना.

रूस के पास SPFS और चीन के पास CIPS जैसे वैकल्पिक वित्तीय ढांचे हैं. BRICS देशों के बीच ऐसे सिस्टम को जोड़ने और भुगतान को तेज, सस्ता और सुरक्षित बनाने पर चर्चा हो रही है. हालांकि इनकी पहुंच अभी SWIFT के स्तर की नहीं है. SWIFT दुनिया भर के 11 हजार से अधिक वित्तीय संस्थानों को जोड़ता है.

तीसरा हथियार है न्यू डेवलपमेंट बैंक 

BRICS ने 2015 में New Development Bank यानी NDB की स्थापना की थी. इसका उद्देश्य विकासशील देशों को बुनियादी ढांचे और विकास परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध कराना है.

NDB की खासियत यह है कि वह सदस्य देशों की स्थानीय मुद्राओं में भी वित्त उपलब्ध कराने की दिशा में काम करता है. इससे उन देशों को डॉलर में कर्ज लेने से पैदा होने वाले मुद्रा जोखिम से राहत मिल सकती है.

क्या BRICS अपनी नई करेंसी लॉन्च करेगा?

यही सबसे ज्यादा चर्चा वाला सवाल है. BRICS की अपनी साझा मुद्रा को लेकर वर्षों से अटकलें लगती रही हैं. लेकिन 2026 तक कोई आधिकारिक BRICS मुद्रा चलन में नहीं है. न कोई साझा केंद्रीय बैंक है और न यूरो जैसी एकीकृत मुद्रा व्यवस्था.

असल फोकस फिलहाल स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वैकल्पिक भुगतान नेटवर्क और वित्तीय संस्थाओं को मजबूत करने पर है.

इसका मतलब है कि निकट भविष्य में BRICS का लक्ष्य शायद डॉलर को एक झटके में हटाना नहीं, बल्कि डॉलर पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करना है.

भारत का रुख चीन और रूस से अलग क्यों है?

यहां भारत की भूमिका बेहद दिलचस्प है. चीन और रूस BRICS को अक्सर पश्चिमी प्रभुत्व के विकल्प के रूप में देखते हैं. भारत भी वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार चाहता है, लेकिन वह BRICS को केवल 'एंटी-अमेरिका' प्लेटफॉर्म के रूप में नहीं देखता.

भारत की अमेरिका के साथ मजबूत व्यापारिक, तकनीकी और रणनीतिक साझेदारी है. दूसरी ओर भारत BRICS, Quad, G20 और SCO जैसे अलग-अलग मंचों पर एक साथ सक्रिय है.

इसलिए नई दिल्ली का जोर डॉलर को खत्म करने के बजाय विकल्प बढ़ाने और रणनीतिक स्वायत्तता पर ज्यादा है. 

फिर अमेरिका को कैसे चुनौती मिलेगी?

BRICS अमेरिका को सैन्य तरीके से नहीं, बल्कि आर्थिक ढांचे में धीरे-धीरे चुनौती दे सकता है.

इसके लिए चार चीजें महत्वपूर्ण होंगी...

- आपसी व्यापार बढ़ाना
- स्थानीय मुद्राओं में भुगतान बढ़ाना
- वैकल्पिक क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम बनाना
- NDB जैसी संस्थाओं की ताकत बढ़ाना

अगर BRICS देश इन चार क्षेत्रों में सफल होते हैं तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर की जरूरत कम हो सकती है. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होगा कि अमेरिकी डॉलर अचानक कमजोर होकर दुनिया की प्रमुख मुद्रा नहीं रहेगा.

डॉलर को हटाना इतना आसान नहीं

यहीं BRICS की सबसे बड़ी चुनौती है. अमेरिकी डॉलर अभी भी दुनिया की वित्तीय व्यवस्था में बेहद गहराई से जुड़ा हुआ है. सितंबर 2025 तक वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी करीब 57 प्रतिशत थी. वहीं SWIFT जैसे नेटवर्क का विशाल वैश्विक आधार है.

दूसरी समस्या खुद BRICS के भीतर है. भारत और चीन के बीच सीमा और व्यापार संबंधी मतभेद हैं. सदस्य देशों की आर्थिक नीतियां अलग हैं. राजनीतिक हित भी हमेशा एक जैसे नहीं होते. 

अगर भारत-रूस रुपये-रूबल में व्यापार करते हैं, चीन दूसरे देशों के साथ युआन में भुगतान बढ़ाता है, NDB स्थानीय मुद्राओं में कर्ज देता है और BRICS देशों के पेमेंट सिस्टम आपस में जुड़ते हैं, तो डॉलर की वैश्विक भूमिका धीरे-धीरे कुछ क्षेत्रों में कम हो सकती है.

डॉलर के कमजोर होने से भारत पर क्या होगा असर? 

अगर अमेरिकी डॉलर कमजोर होता है, तो भारत को कुछ फायदे मिल सकते हैं, लेकिन इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि डॉलर के मुकाबले रुपया कितना मजबूत होता है और कमजोरी किस वजह से आई है.

भारत को ये बड़े फायदे हो सकते हैं

1. कच्चा तेल सस्ता पड़ सकता है

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है और अंतरराष्ट्रीय तेल कारोबार मुख्यतः डॉलर में होता है. अगर डॉलर कमजोर होता है और तेल की डॉलर कीमत स्थिर रहती है, तो रुपये में तेल खरीदने की लागत घट सकती है. इससे पेट्रोल-डीजल, परिवहन और महंगाई पर राहत मिल सकती है.

2. विदेश से सामान खरीदना सस्ता हो सकता है

भारत को कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट, मशीनरी, सोना और कई औद्योगिक उत्पाद आयात करने पड़ते हैं. रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत होने पर इन आयातों की रुपये में लागत कम हो सकती है.

3. महंगाई पर दबाव घट सकता है

आयातित वस्तुओं की लागत कम होने से कंपनियों का इनपुट कॉस्ट घट सकता है. इसका फायदा आगे चलकर उपभोक्ताओं को भी मिल सकता है. खासकर ऊर्जा और औद्योगिक कच्चे माल के मामले में इसका असर महत्वपूर्ण हो सकता है.

4. भारत का विदेशी कर्ज सस्ता हो सकता है

जिन भारतीय कंपनियों या संस्थाओं ने डॉलर में कर्ज लिया है, उनके लिए रुपया मजबूत होने पर उस कर्ज को चुकाने की रुपये में लागत घट सकती है. हालांकि यह फायदा उन्हीं पर लागू होगा जिनकी डॉलर में देनदारी है.

5. सोने की कीमत पर असर पड़ सकता है

भारत में सोने की घरेलू कीमत पर अंतरराष्ट्रीय सोने की डॉलर कीमत और डॉलर-रुपया विनिमय दर दोनों का प्रभाव पड़ता है. डॉलर कमजोर होने से अगर वैश्विक सोने की कीमत में पर्याप्त गिरावट आती है, तो भारत में सोना अपेक्षाकृत सस्ता हो सकता है. लेकिन सुरक्षित निवेश की मांग बढ़ने पर उल्टा असर भी संभव है.

लेकिन एक बड़ा नुकसान भी है

भारतीय एक्सपोर्टर्स को नुकसान हो सकता है. मान लीजिए किसी भारतीय कंपनी को अमेरिका से अपने सामान के बदले 1 लाख डॉलर मिलते हैं. अगर डॉलर कमजोर होने के कारण रुपया मजबूत हो जाता है, तो उन 1 लाख डॉलर को रुपये में बदलने पर कंपनी को पहले की तुलना में कम रुपये मिलेंगे. इसलिए IT, फार्मा, टेक्सटाइल और दूसरे निर्यात क्षेत्रों पर दबाव आ सकता है.

BRICS और डॉलर वाली बहस में भारत के लिए क्या मायने?

यही वजह है कि भारत के लिए 'डॉलर कमजोर हो' अपने आप में कोई लक्ष्य नहीं है. भारत का असली फायदा ऐसी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में है जिसमें अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए केवल एक मुद्रा पर अत्यधिक निर्भरता न हो.

अगर BRICS देशों के बीच रुपये, रूबल, युआन जैसी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ता है, तो भारत को कुछ लेनदेन में डॉलर की जरूरत कम हो सकती है. इससे विदेशी मुद्रा जोखिम और भुगतान लागत को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है.

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