Bipasha Basu: बिपाशा बसु के न्यूट्रिशन प्रोडक्ट में मिले 'कीड़े'! वीडियो शेयर कर FDA अधिकारी से की शिकायत
Bipasha Basu: अभिनेत्री बिपाशा बसु ने एक न्यूट्रिशन प्रोडक्ट को लेकर गंभीर चिंता जताई है। बिपाशा ने दावा किया कि उन्होंने हाल ही में खोले गए आइसोप्योर (Isopure) के एक कंटेनर में छोटे-छोटे कीड़ों जैसी चीजें देखीं। इसके बाद उन्होंने इसका वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) से मामले की जांच करने की अपील की।
बिपाशा ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर यह वीडियो 10 सितंबर को शेयर किया। उन्होंने महाराष्ट्र FDA के कमिश्नर तुकाराम मुंढे को भी टैग किया और उनसे इस मामले को देखने का अनुरोध किया।
वीडियो में बिपाशा ने दिखा सबूत
वीडियो में बिपाशा ने डिब्बे के अंदर की चीज़ों को पास से दिखाया और बताया कि उसमें कीड़े हैं। वीडियो में बिपाशा कहती सुनाई देती हैं, "इस 'आइसोप्योर' (Isopure) में कीड़े भरे हुए हैं... बहुत छोटे-छोटे कीड़े। हमने जो नया डिब्बा खोला है, वह कीड़ों से भरा हुआ है।"
तुकाराम मुंढे को टैग कर मांगी मदद
वीडियो के साथ बिपाशा ने महाराष्ट्र FDA कमिश्नर तुकाराम मुंढे को टैग करते हुए उनसे मामले को देखने की अपील की।
उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा कि उन्हें उम्मीद है कि FDA इस तरह की शिकायतों पर कार्रवाई करेगा, ताकि लोगों को खराब या मिलावटी सामान न खरीदना पड़े। अभिनेत्री ने पोस्ट के साथ हाथ जोड़ने वाली इमोजी भी लगाई।
कौन हैं तुकाराम मुंढे?
तुकाराम मुंढे भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी हैं और महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन विभाग में कमिश्नर के पद पर कार्यरत हैं। खाद्य सुरक्षा और नियमों के पालन से जुड़े मामलों को लेकर वह अक्सर चर्चा में रहते हैं।
महाराष्ट्र FDA की ओर से समय-समय पर रेस्टोरेंट्स, खाद्य प्रतिष्ठानों और क्विक-कॉमर्स से जुड़े स्टोरेज एवं वेयरहाउस की जांच की जाती रही है। खाद्य गुणवत्ता और स्वच्छता से जुड़े कथित उल्लंघनों पर विभाग कार्रवाई भी करता है।
बिपाशा बसु लंबे समय से फिल्मों से दूर
बिपाशा बसु ने पिछले कुछ वर्षों में फिल्मों से दूरी बनाए रखी है। अभिनेत्री को आखिरी बार 2020 की वेब सीरीज 'डेंजरस' में देखा गया था।
फिलहाल उनके किसी नए फिल्म प्रोजेक्ट की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। सोशल मीडिया पर वह समय-समय पर अपनी निजी जिंदगी और परिवार से जुड़ी झलकियां शेयर करती रहती हैं।
Nepal Flood: पहले ही मिल गए थे ग्लेशियर टूटने के संकेत; रिपोर्ट ने बताया कैसे बच सकती थीं 1050+ जानें
Nepal Flood: नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ के बाद तबाही का मंजर अब भी जारी है। सुरक्षा बलों ने आठ जिलों से और शव बरामद किए हैं, जिसके बाद मृतकों की संख्या 1,050 के पार पहुंच गई है। करीब 4,000 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं, जबकि लगभग 12,000 लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है।
इसी बीच HiRISK की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आपदा से पहले ही ग्लेशियर में होने वाले बदलावों के संकेत मिल गए थे। सैटेलाइट तस्वीरों में हिमस्खलन के संकेत और ग्लेशियर की सतह तक पहुंचती दरार दिखाई दी थी। रिपोर्ट के मुताबिक बेहतर आपदा तैयारी और प्रभावी अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम से कई लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
आपदा से पहले दिखे थे ग्लेशियर में बदलाव के संकेत
HiRISK रिपोर्ट के अनुसार, ग्लेशियर के ढहने से पहले सैटेलाइट तस्वीरों में कई अहम संकेत मौजूद थे। इनमें हिमस्खलन के शुरुआती संकेत और ग्लेशियर की सतह की ओर बढ़ती दरार शामिल थी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों पर अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम हाल में स्थापित किए गए थे, लेकिन ग्लेशियर से जुड़े खतरों के लिए मौके पर कोई ऑपरेशनल अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम मौजूद नहीं था।
रासुवागढ़ी बॉर्डर पर नहीं मिल पाता पर्याप्त समय
नेपाल-चीन सीमा पर रासुवागढ़ी चेकपॉइंट के आसपास शुरुआती हिमस्खलन बेहद तेजी से हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक सामान्य नदी-आधारित चेतावनी प्रणाली से यहां मिलने वाला समय बहुत कम होता और इतने कम समय में लोगों को सुरक्षित निकालना मुश्किल हो सकता था।
हालांकि, नीचे की ओर जाने पर जहां चेतावनी के लिए 10 मिनट या उससे ज्यादा समय मिल सकता था, वहां बेहतर क्षमता वाले व्यापक अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम काफी लोगों की जान बचाने में मदद कर सकते थे।
भूकंपीय संकेत से भी मिल सकती है शुरुआती चेतावनी
रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण बिंदु सामने आया है। ग्लेशियर से हुए बड़े पैमाने के मलबे के खिसकने से 4 से अधिक तीव्रता का भूकंपीय संकेत दर्ज हुआ था।
रिपोर्ट के मुताबिक भविष्य में बड़े इलाकों में भूकंपीय संकेतों पर आधारित अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम विकसित करने में ऐसे संकेतों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे ग्लेशियर और दूसरे अचानक होने वाले भू-खतरों के बारे में समय रहते चेतावनी देने की क्षमता बढ़ सकती है।
नेपाल में 1,050 से ज्यादा मौतें, 4 हजार लोग लापता
अधिकारियों के मुताबिक सुरक्षा बलों ने आठ जिलों में अतिरिक्त शव बरामद किए हैं। इसके बाद बाढ़ और उससे जुड़ी आपदा में मृतकों की संख्या 1,050 से ज्यादा हो गई है।
नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDRRMA) के अनुसार करीब 4,000 लोग अभी भी लापता हैं, जबकि लगभग 12,000 लोगों को रेस्क्यू किया जा चुका है। आपदा प्रभावित इलाकों में राहत और बचाव अभियान अभी भी जारी है।
भारत ने 163 नागरिकों को निकाला
नेपाल में राहत और बचाव अभियान के बीच भारत भी अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने में जुटा है। विदेश मंत्रालय के अनुसार अब तक 163 भारतीय नागरिकों को बाढ़ प्रभावित इलाकों से सुरक्षित निकाला गया है। पिछले अपडेट के बाद पांच और भारतीयों को बाहर निकाला गया है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि भारत नेपाल के अधिकारियों के साथ समन्वय बनाकर राहत और बचाव कार्य जारी रखे हुए है। इसके अलावा मंगलवार को 151 भारतीय नागरिक चीन से बाहर निकले, जिन्हें प्रभावित इलाकों से सुरक्षित निकालने की प्रक्रिया के तहत सहायता दी गई।
काठमांडू पहुंची 19 सदस्यीय भारतीय फोरेंसिक टीम
भारत की 19 सदस्यीय विशेष फोरेंसिक टीम रविवार से काठमांडू में काम कर रही है। टीम आपदा के बाद जरूरी फोरेंसिक कार्यों में स्थानीय अधिकारियों की मदद कर रही है। वहीं, भारत की एक विशेष टनल रेस्क्यू टीम को चिलिमे में हाइड्रोपावर टनलों में तलाश और बचाव अभियान के लिए तैनात किया गया है।
सुरंगों में रेस्क्यू टीम के सामने बड़ी चुनौती
चिलिमे की हाइड्रोपावर टनलों में बचाव अभियान आसान नहीं है। टीम को बेहद संकरे रास्तों, दुर्गम इलाके और विशेष उपकरणों के इस्तेमाल में आ रही सीमाओं जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
टनल के भीतर जमीन दलदली होने के कारण भी अभियान चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। भारतीय टीम ने स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए कुछ नए तरीके अपनाए और अस्थायी फ्लोट की मदद से सुरंग के अंदर आगे बढ़ने में सफलता हासिल की। रेस्क्यू टीम अब भी सुरंगों में फंसे लोगों की तलाश जारी रखे हुए है।
अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम पर उठे सवाल
नेपाल की इस आपदा ने एक बार फिर पहाड़ी और ग्लेशियर प्रभावित क्षेत्रों में अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम की जरूरत को सामने ला दिया है। HiRISK रिपोर्ट के मुताबिक अगर खतरे के संकेतों को समय रहते प्रभावी चेतावनी में बदला जाता और निचले इलाकों में मजबूत आपदा प्रबंधन व्यवस्था होती, तो नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता था।
इस हादसे के बाद भविष्य में ग्लेशियर, हिमस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ की निगरानी के लिए सैटेलाइट और भूकंपीय संकेतों को अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम से जोड़ने पर जोर बढ़ सकता है।
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