सूरत न्यू सिविल अस्पताल को भूपेंद्र सरकार ने दी सुविधाओं की सौगात, 30 बेड का डायलिसिस सेंटर शुरू
गुजरात के सूरत स्थित न्यू सिविल अस्पताल और सरकारी मेडिकल कॉलेज में मरीजों को बेहतर और आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है. गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने रविवार को अस्पताल में विभिन्न नई स्वास्थ्य सुविधाओं का उद्घाटन किया. इनमें 30 बेड का डायलिसिस सेंटर और ICU की बढ़ाई गई क्षमता प्रमुख है.
नई व्यवस्था के तहत अस्पताल में मेडिकल ICU की क्षमता 10 बेड से बढ़ाकर 20 बेड कर दी गई है. इसी तरह सर्जिकल ICU में भी 10 से बढ़ाकर 20 बेड किए गए हैं. इससे गंभीर मरीजों के इलाज के लिए अस्पताल में अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध होगी और जरूरत के समय अधिक मरीजों को ICU सुविधा मिल सकेगी.
डायलिसिस के मरीजों को मिलेगी राहत
30 बेड का नया डायलिसिस सेंटर शुरू होने से किडनी से जुड़ी बीमारी से जूझ रहे मरीजों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है. सरकारी अस्पताल में डायलिसिस की क्षमता बढ़ने से जरूरतमंद मरीजों को उपचार के लिए बेहतर सुविधा मिल सकेगी. सूरत न्यू सिविल अस्पताल दक्षिण गुजरात के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में शामिल है. यहां बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं. ऐसे में डायलिसिस और ICU जैसी महत्वपूर्ण सुविधाओं का विस्तार अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत करेगा.
गंभीर मरीजों के इलाज की क्षमता बढ़ी
ICU बेड की संख्या बढ़ने से गंभीर मरीजों के इलाज के लिए अस्पताल की क्षमता में इजाफा हुआ है. मेडिकल ICU में गंभीर मेडिकल मामलों और सर्जिकल ICU में ऑपरेशन के बाद या गंभीर सर्जिकल मरीजों को बेहतर निगरानी और उपचार उपलब्ध कराया जा सकेगा. राज्य सरकार की ओर से सरकारी अस्पतालों में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार करने पर जोर दिया जा रहा है. सूरत न्यू सिविल अस्पताल में शुरू की गई ये नई सुविधाएं इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं.
उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने इस अवसर पर स्वास्थ्य सेवाओं को और बेहतर बनाने तथा मरीजों को समय पर गुणवत्तापूर्ण उपचार उपलब्ध कराने पर जोर दिया. नई सुविधाओं के शुरू होने से सूरत और आसपास के क्षेत्रों के मरीजों को सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में बेहतर इलाज मिलने की उम्मीद है.
UP Election 2027: रायबरेली में विधानसभा सीटों का गणित, क्या कांग्रेस का पलड़ा है भारी?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में रायबरेली को लंबे वक्त से कांग्रेस का मजबूत किला माना जाता रहा है. नेहरू-गांधी परिवार की राजनीतिक विरासत से जुड़ी इस सीट ने 2024 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर कांग्रेस के पक्ष में बड़ा संदेश दिया, जब राहुल गांधी ने यहां से करीब 3.90 लाख वोटों के अंतर से जीत दर्ज की. मगर विधानसभा चुनाव की बात करें तो तस्वीर कांग्रेस के लिए उतनी आसान नहीं है. जिले की छह विधानसभा सीटों में फिलहाल कांग्रेस का एक भी विधायक मौजूद नहीं है.
रायबरेली जिले में कितनी विधानसभा सीटें?
रायबरेली जिले में कुल छह विधानसभा सीटें हैं-बछरावां (एससी), हरचंदपुर, रायबरेली, सलोन (एससी), सरेनी और ऊंचाहार. इनमें से पांच सीटें रायबरेली लोकसभा क्षेत्र में आती हैं, जबकि सलोन विधानसभा अमेठी लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है. जिला प्रशासन की मौजूदा सूची भी इन छह विधानसभा क्षेत्रों की पुष्टि करती है.
2022 में क्या था विधानसभा परिणाम?
2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए रायबरेली का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा था. जिले की छह सीटों में से चार पर समाजवादी पार्टी और दो पर बीजेपी ने जीत दर्ज की थी. सपा ने बछरावां, हरचंदपुर, सरेनी और ऊंचाहार सीट जीती, जबकि भाजपा के खाते में रायबरेली सदर और सलोन गईं. कांग्रेस किसी भी सीट पर जीत हासिल नहीं कर सकी.
2022 के आंकड़े बताते हैं कि कांग्रेस का पारंपरिक प्रभाव विधानसभा स्तर पर काफी कमजोर हो चुका था. रायबरेली सदर जैसी पारंपरिक कांग्रेस सीट भी बीजेपी के खाते में चली गई थी. यहां अदिति सिंह ने सपा के राम प्रताप यादव को करीब 7,175 वोटों से हराया था.
फिर 2024 में बदली तस्वीर
लोकसभा चुनाव 2024 ने रायबरेली की राजनीतिक तस्वीर में बड़ा बदलाव जरूर दिखाया. राहुल गांधी ने रायबरेली लोकसभा सीट से भाजपा के दिनेश प्रताप सिंह को करीब 3.90 लाख वोटों के अंतर मात दी. खास बात यह रही कि रायबरेली लोकसभा क्षेत्र में आने वाली सभी पांच विधानसभा सीटों में कांग्रेस को बढ़त मिली. विधानसभा-वार आंकड़े कांग्रेस के लिए खासतौर पर रायबरेली सदर में मजबूत संदेश देते हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली विधानसभा खंड में राहुल गांधी को करीब 1.56 लाख वोट मिले, वहीं भाजपा को करीब 53.5 हजार वोट मिले. यानी कांग्रेस की बढ़त करीब एक लाख से ज्यादा रही.
कांग्रेस के सामने क्या है चुनौती?
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि लोकसभा की जीत को विधानसभा सीटों में बदलना आसान नहीं होगा. 2022 में कांग्रेस का संगठन और वोट आधार विधानसभा स्तर पर काफी कमजोर नजर आया था. इसके अलावा सपा का यहां पर मजबूत जमीनी आधार रहा है. 2022 में चार सीटें सपा के खाते में जाना इसका प्रमाण है.
ऊंचाहार का समीकरण भी काफी अहम है. यहां से 2022 में सपा के मनोज कुमार पांडेय ने जीत दर्ज की थी. मगर बाद में उन्होंने भाजपा का समर्थन किया. इसके कारण विधानसभा स्तर पर सपा का प्रभाव एक सीट पर कमजोर हो गया.
क्या कांग्रेस का पलड़ा भारी है?
लोकसभा के लिहाज से कांग्रेस निश्चित तौर पर मजबूत स्थिति में है. मगर विधानसभा के लिहाज से अभी उसे भारी कहना जल्दबाजी होगा. 2024 में राहुल गांधी की में राहुल गांधी की बड़ी जीत ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह जरूर पैदा किया है और पार्टी को अपना पुराना जनाधार वापस पाने का मौका दिया है. मगर 2022 के विधानसभा नतीजे बताते हैं कि कांग्रेस को संगठन, स्थानीय नेतृत्व और बूथ स्तर पर काफी मेहनत करनी होगी.
अगर कांग्रेस सपा के साथ गठबंधन और वोट ट्रांसफर को प्रभावी ढंग से कायम रख पाती है, तो रायबरेली की कई सीटों पर मुकाबला उसके पक्ष हो सकता है. वहीं भाजपा के लिए चुनौती होगी कि वह 2022 में जीती रायबरेली और सलोन जैसी सीटों को बचाए. इस तरह से लोकसभा में कांग्रेस की बढ़त को विधानसभा के चुनाव में रोका जा सकता है.
कांग्रेस के लिए बेहतर माहौल
लबोलबाब है कि कुल मिलाकर रायबरेली में कांग्रेस का राजनीतिक माहौल जरूर बेहतर हुआ है. लेकिन विधानसभा का मौजूदा गणित अभी कांग्रेस के पक्ष में नहीं है. 2027 के चुनाव में असली मुकाबला इस बात पर होगा कि राहुल गांधी की लोकसभा वाली लोकप्रियता कितनी प्रभावी तरीके से विधानसभा सीटों तक पहुंचती है और सपा-कांग्रेस के बीच वोटों का कितना ट्रांसफर होता है.
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