मानवाधिकार उल्लंघनों पर यूरोपीय संघ ने पाकिस्तान को दी चेतावनी
नई दिल्ली, 12 सितंबर (आईएएनएस)। जबरन लापता किए जाने, राजनीतिक दमन और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के दमन जैसे मामलों में खराब रिकॉर्ड को लेकर यूरोपीय संघ ने पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी दी है।
यूरोपियन कंजर्वेटिव में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, यूरोपीय संसद और यूरोपीय संघ के प्रतिनिधिमंडल ने इस्लामाबाद को स्पष्ट कर दिया है कि केवल अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर हस्ताक्षर करने और कानून बनाने से अब यूरोपीय बाजार में पाकिस्तानी निर्यात को मिलने वाली विशेष व्यापारिक सुविधाएं सुरक्षित नहीं रह सकेंगी।
सितंबर की शुरुआत में स्पेन की यूरोपीय सांसद सैंड्रा गोमेज लोपेज ने यूरोपीय संसद की मानवाधिकार उपसमिति में सवाल उठाया कि यदि पाकिस्तान की प्रतिबद्धताओं के साथ समय सीमा, मापने योग्य लक्ष्य और जवाबदेही तय नहीं है तो उनकी क्या उपयोगिता है।
इसके दो दिन बाद पाकिस्तान में यूरोपीय संघ के राजदूत रायमुंडास कारोब्लिस ने कहा कि देश एक बेहद महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। उन्होंने चेतावनी दी कि ठोस और सत्यापित सुधारों के बिना जीएसपी प्लस (जनरलाइज्ड स्कीम ऑफ प्रेफरेंसेज प्लस) का भविष्य बिल्कुल भी सुनिश्चित नहीं है।
लेख में कहा गया है कि यूरोपीय संघ की यह सख्त भाषा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तान इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभार्थी देश है।
पाकिस्तान को वर्ष 2014 से जीएसपी प्लस का लाभ मिल रहा है। वर्ष 2024 में उसके लगभग 7.5 अरब यूरो मूल्य के निर्यात इस योजना के तहत पात्र थे, जबकि 7.1 अरब यूरो से अधिक के निर्यात ने वास्तव में इस सुविधा का उपयोग किया। यह करीब 95 प्रतिशत उपयोग दर को दर्शाता है। यूरोपीय आयोग के अनुसार, इससे पाकिस्तान ने उस वर्ष लगभग 73.2 करोड़ यूरो के शुल्क (टैरिफ) की बचत की।
पाकिस्तान के यूरोपीय संघ को होने वाले निर्यात में कपड़ा और परिधान क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 70 से 76 प्रतिशत है। यदि यह व्यापारिक सुविधा समाप्त हो जाती है तो कुछ कपड़ा उत्पादों पर 9 से 12 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लग सकता है।
यूरोपीय आयोग की 2023-2025 अवधि को कवर करने वाली ताजा रिपोर्ट बताती है कि ब्रुसेल्स ने अपना रुख सख्त क्यों किया है।
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पीछे गया है। इनमें जबरन गुमशुदगी, न्यायेतर हत्याएं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पत्रकारों पर दबाव, अल्पसंख्यकों के अधिकार, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जबरन मजदूरी जैसी समस्याएं शामिल हैं।
यूरोपीय आयोग ने कहा कि जबरन गुमशुदगी के मामलों में अब तक किसी भी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया गया है। वहीं, ऐसे मामलों की जांच करने वाले पाकिस्तानी आयोग ने वर्ष 2025 में 273 नए मामले दर्ज किए हैं। मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है।
लेख के अनुसार, यूरोपीय संघ की नई जीएसपी प्लस व्यवस्था 1 जनवरी 2027 से लागू होगी। इसके तहत लाभ प्राप्त करने वाले देशों को जिन अंतरराष्ट्रीय समझौतों का पालन करना होगा, उनकी संख्या 27 से बढ़ाकर 32 कर दी जाएगी।
पाकिस्तान को फिलहाल 2028 के अंत तक अपनी वर्तमान स्थिति बनाए रखने की अनुमति मिलेगी, लेकिन इसके बाद उसे नए और अधिक कड़े नियमों के तहत दोबारा आवेदन करना होगा।
--आईएएनएस
एएमटी/डीकेपी
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इस्राइली प्रधानमंत्री के मेकअप पर 7 साल में खर्च हुए 4 करोड़ रुपये, हेयर स्टाइलिंग पर भी हुआ भारी खर्चा
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनकी पत्नी सारा नेतन्याहू से जुड़े हेयरस्टाइल और मेकअप खर्च को लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है. सरकारी रिकॉर्ड से सामने आई जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2019 से अगस्त 2026 के बीच इजरायल के प्रधानमंत्रियों से जुड़े हेयरस्टाइल, मेकअप और आधिकारिक प्रतिनिधित्व के खर्च पर करीब 14.3 लाख इजरायली शेकेल, यानी लगभग 4 करोड़ रुपये से ज्यादा या 4.7 लाख डॉलर खर्च हुए. इस खर्च को लेकर इजरायल में सरकारी पैसे के इस्तेमाल और पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं.
नेतन्याहू और सारा पर खर्च का बड़ा हिस्सा
जारी किए गए रिकॉर्ड के अनुसार, इस अवधि के कुल हेयर और मेकअप खर्च का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा बेंजामिन नेतन्याहू और उनकी पत्नी सारा नेतन्याहू से जुड़ा बताया गया है. नेतन्याहू इस अवधि के अधिकांश समय इजरायल के प्रधानमंत्री रहे हैं. यह जानकारी एक फ्रीडम ऑफ इंफॉर्मेशन आवेदन के बाद सामने आई. रिपोर्ट के मुताबिक, वकील यारा विंकलर-शालित ने दिसंबर 2025 में सूचना के अधिकार से जुड़ी याचिका दायर की थी, जिसके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय से खर्च का विवरण जारी किया गया.
युद्ध के दौरान भी हुआ खर्च
रिकॉर्ड में 2023 में इजरायल-हमास युद्ध शुरू होने के आसपास के महीनों का खर्च भी शामिल है. सितंबर से नवंबर 2023 के बीच प्रधानमंत्री के हेयरस्टाइल पर करीब 2,600 डॉलर और मेकअप सेवाओं पर करीब 1,580 डॉलर खर्च किए गए. अक्टूबर 2023 के लिए अकेले प्रधानमंत्री के हेयरस्टाइल पर करीब 810 डॉलर का खर्च दर्ज बताया गया है. यानी युद्ध के शुरुआती दौर में भी प्रधानमंत्री की आधिकारिक उपस्थिति से जुड़े ग्रूमिंग खर्च जारी रहे.
2023 में खर्च अचानक बढ़ा
रिपोर्ट के अनुसार, अलग-अलग वर्षों में इस तरह के खर्च में काफी अंतर रहा. 2022 में करीब 27,600 डॉलर खर्च हुए थे, जबकि 2023 में यह बढ़कर लगभग 1.03 लाख डॉलर हो गया. इसके बाद 2025 में यह खर्च और बढ़ा और करीब 1.11 लाख डॉलर तक पहुंच गया. उपलब्ध आंकड़ों में 2025 को इस अवधि का सबसे ज्यादा खर्च वाला साल बताया गया है.
विदेश यात्राओं में भी लाखों का खर्च
प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं के दौरान हेयर और मेकअप सेवाओं पर होने वाला खर्च भी रिकॉर्ड में सामने आया है. रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी 2025 में वॉशिंगटन डीसी की यात्रा के दौरान हेयरस्टाइल और मेकअप पर करीब 13,500 डॉलर खर्च किए गए थे. इससे पहले जुलाई 2024 में वॉशिंगटन की एक अन्य यात्रा के दौरान भी इन सेवाओं पर करीब 11,500 डॉलर खर्च होने की जानकारी सामने आई थी. स्टाइलिस्ट और मेकअप आर्टिस्ट के नाम नहीं बताए
सरकारी रिकॉर्ड जारी होने के बावजूद कुछ जानकारियां सार्वजनिक नहीं की गई हैं. प्रधानमंत्री कार्यालय ने हेयरस्टाइलिस्ट और मेकअप आर्टिस्ट के नामों को राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए सार्वजनिक नहीं किया. इससे पारदर्शिता को लेकर भी चर्चा तेज हुई है.
सरकार की ओर से इस तरह के खर्चों को प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक और प्रतिनिधित्व संबंधी जिम्मेदारियों से जोड़कर देखा जाता है. समर्थकों का तर्क है कि प्रधानमंत्री को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में औपचारिक रूप से प्रस्तुत होना पड़ता है. वहीं आलोचकों का सवाल है कि सार्वजनिक धन से व्यक्तिगत ग्रूमिंग पर इतनी बड़ी रकम खर्च करना कितना उचित है.
नेतन्याहू परिवार पहले भी रहा है खर्चों को लेकर चर्चा में
बेंजामिन और सारा नेतन्याहू का परिवार सरकारी खर्च को लेकर पहले भी विवादों में रहा है. 2016 में न्यूयॉर्क यात्रा के खर्च के विवरण में भी प्रधानमंत्री के हेयरस्टाइल और मेकअप पर हजारों डॉलर खर्च होने की जानकारी सामने आई थी. उस यात्रा के कुल खर्च को लेकर भी इजरायल में काफी बहस हुई थी. अब 2019 से अगस्त 2026 तक के नए आंकड़े सामने आने के बाद यह मामला फिर चर्चा में है. करीब 4.7 लाख डॉलर के कुल हेयर, मेकअप और प्रतिनिधित्व खर्च ने सरकारी पैसे के इस्तेमाल, पारदर्शिता और प्रधानमंत्री कार्यालय के खर्चों की निगरानी को लेकर नई बहस छेड़ दी है.
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