Explainer: क्यों अहम है बाब अल-मंदेब? हूतियों के कब्जे के बाद वैश्विक ऊर्जा पर क्या पड़ेगा असर
Explainer: मध्य पूर्व पिछले करीब साढ़े छह महीने से जंग की आग में झुलस रहा है. इस जंग ने दुनिया भर में ऊर्जा संकट पैदा कर दिया है. होर्मुज के बंद होने की वजह से वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान पर पहुंच गईं. हालांकि जून में हुए समझौते के बाद इनमें तेजी से गिरावट देखने को मिली थी. लेकिन जुलाई में अमेरिका और ईरान के बीच फिर से शुरू हुए हमलों ने तेल की कीमतों को आसमान में पहुंचा दिया.
अब एक बार फिर से कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर के पास चली गई हैं. इस बीच दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण जलमार्गों में से एक बाब अल-मंदेब पर हूतियों ने कब्जा कर लिया है. बता दें कि ईरान के समर्थन वाले हूथी विद्रोही यमन के पूरे लाल सागर तट पर कब्जा करने के बाद बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य को भी अपने नियंत्रण में ले लिया. ये दुनिया के सबसे व्यस्त और सबसे ज्यादा विवादित समुद्री रास्तों में से एक है.
बता दें कि यह चरमपंथी गुट पहले ही दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी का एलान कर दिया था. ऐसे में बाब-अल-मंदेब जलमार्ग पर हूथी विद्रोहियों का कब्जा कर लेना दुनिया के लिए चिंता की बात है. क्योंकि इससे खाड़ी क्षेत्र के तेल उत्पादक देश अपने मुख्य समुद्री व्यापारिक मार्गों से और भी अलग-थलग पड़ने वाले हैं.
कहां है बाब अल-मंदेब?
बता दें कि खतरनाक नेविगेशन स्थितियों के कारण इसे 'आंसुओं का दरवाजा' (Gate of Tears) कहा जाता है. यह जलडमरूमध्य (strait) लाल सागर के दक्षिणी छोर पर, अरब प्रायद्वीप में यमन और अफ्रीकी तट पर जिबूती और इरिट्रिया के बीच स्थित है. यह प्रायद्वीप के उस तरफ है जो होर्मुज जलडमरूमध्य के ठीक विपरीत है, जो अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान चर्चा का मुख्य केंद्र रहा है.
- यह जलमार्ग अपने सबसे संकरे बिंदु पर 18 मील (29 किमी) चौड़ा है. यहां आने-जाने वाले जहाजों के लिए ट्रैफिक दो चैनलों तक सीमित है, जो यमन के पेरिम द्वीप (अरबी में मय्युन) द्वारा विभाजित हैं.
- इसके उत्तर में हनिश द्वीप समूह स्थित हैं, जो होदेदाह और मोचा बंदरगाह शहरों के बीच हैं. इन पर नियंत्रण रखने वाले को आने वाले जहाजों पर नजर रखने की बेहतर स्थिति मिलती है.
- होदेदाह पर भी हूतियों का नियंत्रण है और उन्होंने लाल सागर में जहाजों पर हमले के अपने व्यापक अभियान के लिए इसे एक बेस के तौर पर इस्तेमाल किया है.
बंदरगाह शहर मोचा पर भी हूती विद्रोहियों का कब्जा
इसके साथ ही विद्रोही गुट दक्षिण की ओर बढ़ रहा है और उसने मोचा पर कब्जा कर लिया है. मोचा एक ऐतिहासिक बंदरगाह शहर है जिसे दुनिया भर में कॉफी व्यापार का जन्मस्थान माना जाता है. और दक्षिण में धुबाब शहर है, जो सीधे जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) के किनारे बसा है. इस वजह से हूतियों के दक्षिण की ओर बढ़ने के अभियान में यह एक बहुत अहम जगह है.
- इससे पहले हूतियों ने धुबाब और पेरिम द्वीप पर कब्जा कर लिया उसके बाद बाब-अल-मंदेब को भी हूतियों ने अपने कब्जे में ले लिया. यही नहीं हूती विद्रोहियों ने बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आस-पास के अहम द्वीपों पर भी कब्जा कर लिया है.
- यहां पूरी क्षेत्र पर अब हूतियों का कब्जा हो चुका है. ईरान के समर्थक हूती विद्रोही पेरिम और हनिश जैसे अहम द्वीपों के साथ-साथ मोचा और धुबाब जैसे तटीय कस्बों तक पहुंच गए हैं. इससे लाल सागर से होकर गुजरने वाले दुनिया के अहम शिपिंग रूट पर उनकी पकड़ और मजबूत हो सकती है.
बाब-अल-मंदेब पर हूतियों के नियंत्रण का क्या है मतलब?
बाब अल-मंदेब में रुकावट से भारत पर क्या पड़ेगा असर?
बाब अल-मंदेब के बंद होने का सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ने वाला है. ऐसे में माना जा रहा है कि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ने वाली हैं. क्योंकि बाब अल-मंदेब से गुजरने वाले कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की मात्रा पहले ही काफी कम हो गई है. 2023 में 9.3 मिलियन बैरल प्रति दिन से घटकर 2025 की पहली छमाही में लगभग 4.2 मिलियन बैरल प्रति दिन हो गई है.
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हूती विद्रोहियों के आगे बढ़ने की खबर के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई थी, और बाद में यह लगभग 99 डॉलर परर स्थिर हो गई. बाब अल-मंदेब में लगातार रुकावट से एनर्जी की कीमतों पर और दबाव पड़ सकता है. भारत रूस सहित अन्य जगहों से सप्लाई का विकल्प तलाश सकता है, लेकिन इससे ग्लोबल क्रूड की कीमतों में होने वाली व्यापक बढ़ोतरी से उसे राहत नहीं मिलेगी.
भारत की बढ़ी व्यापार चिंता
इसके अलावा दूसरी चिंता व्यापार की है. भारतीय रिफाइनरियां रेड सी (लाल सागर) के रास्ते यूरोप को डीजल, एविएशन टर्बाइन फ्यूल और अन्य पेट्रोलियम उत्पाद एक्सपोर्ट करती हैं. फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल्स, मशीनरी और इंजीनियरिंग उत्पादों सहित भारत के अन्य एक्सपोर्ट भी स्वेज रूट पर निर्भर हैं.
अगर शिपिंग कंपनियां बाब अल-मंदेब से नहीं गुजरती हैं, तो जहाजों को अफ्रीकी महाद्वीप का चक्कर लगाकर जाना होगा. मुंबई और रॉटरडैम के बीच की दूरी छोटे रास्ते से लगभग 15,700 किमी है, जो केप ऑफ गुड होप के रास्ते लगभग 23,000 किमी हो सकती है. इस लंबे सफर से यूरोप तक भारतीय सामान पहुंचाने की लॉजिस्टिकल लागत बढ़ जाएगी और उन बाजारों में ये सामान कम प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं. उल्टी दिशा में आने वाले इंपोर्ट भी महंगे हो जाएंगे.
Gujarat Govt: गुजरात में इलेक्ट्रिक बसों की शुरुआत, CM भूपेंद्र पटेल ने यात्री बनकर किया सफर
गुजरात में सार्वजनिक परिवहन को पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में एक और कदम उठाया गया है. मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने नई AC इलेक्ट्रिक बसों के संचालन की शुरुआत की और खुद एक यात्री के रूप में बस में सफर किया. इस पहल का उद्देश्य सार्वजनिक परिवहन में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना और प्रदूषण कम करना है.
मुख्यमंत्री ने वडोदरा में आयोजित कार्यक्रम के दौरान 30 नई AC इलेक्ट्रिक बसों को हरी झंडी दिखाई. ये बसें सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ शहरों में स्वच्छ और टिकाऊ यातायात को बढ़ावा देने में मदद करेंगी. गुजरात सरकार इलेक्ट्रिक बसों के जरिए पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करने और ग्रीन मोबिलिटी को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है.
यात्री बनकर बस में बैठे मुख्यमंत्री
इलेक्ट्रिक बसों के उद्घाटन के बाद मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल खुद बस में यात्री के तौर पर सवार हुए. उन्होंने बस की सुविधाओं और संचालन का जायजा लिया. मुख्यमंत्री का यह सफर सार्वजनिक परिवहन में इलेक्ट्रिक बसों के इस्तेमाल को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है. नई बसों में यात्रियों की सुविधा के साथ पर्यावरण संरक्षण पर भी ध्यान दिया गया है. इलेक्ट्रिक बसें पारंपरिक डीजल बसों की तुलना में स्थानीय स्तर पर प्रदूषण कम करने में मदद करती हैं. इससे शहरों में हवा की गुणवत्ता सुधारने और ग्रीन ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देने में योगदान मिल सकता है.
गुजरात में बढ़ रहा इलेक्ट्रिक पब्लिक ट्रांसपोर्ट
गुजरात में सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र में इलेक्ट्रिक बसों का विस्तार किया जा रहा है. इससे पहले भी राज्य में इलेक्ट्रिक बसों के संचालन को बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए गए हैं. राज्य सरकार का फोकस आधुनिक, सुविधाजनक और पर्यावरण-अनुकूल सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था तैयार करने पर है. मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार, इलेक्ट्रिक बसों को सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था में शामिल करना गुजरात के स्वच्छ और टिकाऊ विकास के लक्ष्य का हिस्सा है. नई बसों के संचालन से यात्रियों को बेहतर परिवहन सुविधा मिलने के साथ राज्य में ग्रीन मोबिलिटी को भी बढ़ावा मिलेगा.
सरकार का मानना है कि आने वाले समय में इलेक्ट्रिक वाहनों और सार्वजनिक परिवहन के विस्तार से ईंधन की खपत और शहरी प्रदूषण को कम करने में मदद मिलेगी. गुजरात में इलेक्ट्रिक बसों की यह पहल इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है.
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