बैंकों में बढ़ी नकदी तो RBI ने उठाया बड़ा कदम, बेचे जाएंगे ₹1 लाख करोड़ के सरकारी बॉन्ड
RBI: भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बैंकिंग प्रणाली में मौजूद अतिरिक्त नकदी को अवशोषित करने के लिए 1 लाख करोड़ रुपए के सरकारी बॉन्डों की ओपन मार्केट सेल (ओएमओ) की घोषणा की है. केंद्रीय बैंक वित्त वर्ष 2028-29 से 2031-32 के बीच परिपक्व होने वाले बॉन्डों की बिक्री करेगा. यह कदम वित्तीय प्रणाली में बढ़ी हुई तरलता को नियंत्रित करने और अल्पकालिक ब्याज दरों को नीतिगत स्तर के करीब बनाए रखने के उद्देश्य से उठाया गया है.
आरबीआई के अनुसार, बॉन्ड बिक्री तीन चरणों में की जाएगी. पहले चरण में 17 सितंबर 2026 को 50,000 करोड़ रुपए, दूसरे चरण में 21 सितंबर 2026 को 25,000 करोड़ रुपए और तीसरे चरण में 28 सितंबर 2026 को 25,000 करोड़ रुपए के बॉन्ड बेचे जाएंगे. यह नीलामी बहु-प्रतिभूति (मल्टी-सिक्योरिटी) और बहु-मूल्य (मल्टीपल प्राइस) पद्धति के तहत आयोजित की जाएगी. यह पिछले दो वर्षों में आरबीआई द्वारा की जा रही पहली शुद्ध ओपन मार्केट बॉन्ड बिक्री होगी. इससे पहले केंद्रीय बैंक ने सितंबर 2024 में द्वितीयक बाजार में सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री की थी. वहीं वित्त वर्ष 2020-21 और 2021-22 के दौरान आरबीआई ने एक साथ बॉन्ड खरीद और बिक्री की रणनीति अपनाई थी. केंद्रीय बैंक ने कहा कि पात्र प्रतिभागियों को 17 सितंबर को सुबह 9:30 बजे से 10:30 बजे के बीच ई-कुबेर सिस्टम के माध्यम से अपनी बोलियां जमा करनी होंगी. नीलामी के नतीजों की घोषणा उसी दिन की जाएगी.
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आरबीआई की घोषणा के बाद सरकारी बॉन्ड बाजार में दबाव देखने को मिला. बॉन्ड बिकवाली की खबर के बाद प्रतिफल (यील्ड) में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई और वे तीन महीने से अधिक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए. देश के मानक 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड 6 आधार अंक बढ़कर 7.035 प्रतिशत हो गई, जबकि 5 वर्षीय बॉन्ड की यील्ड लगभग 10 आधार अंक बढ़कर 6.6222 प्रतिशत तक पहुंच गई. भारतीय बैंकिंग प्रणाली इस समय अतिरिक्त नकदी की स्थिति का सामना कर रही है. हाल ही में बैंकों ने आरबीआई की विशेष विदेशी मुद्रा जुटाव योजना के तहत अपेक्षा से कहीं अधिक धन जुटाया, जिसके चलते देश का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. इसके परिणामस्वरूप बैंकिंग प्रणाली में रुपए की तरलता बढ़ गई है.
अतिरिक्त नकदी के कारण रातोंरात (ओवरनाइट) ब्याज दरें आरबीआई की रेपो रेट से नीचे आ गई हैं. ऐसे में केंद्रीय बैंक के लिए तरलता को नियंत्रित करने वाले कदम उठाना आवश्यक हो गया है. यह स्थिति ऐसे समय बनी है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है, जिससे महंगाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका बनी हुई है. हाल ही में आई एक रिपोर्ट में कहा गया था कि आरबीआई अतिरिक्त तरलता को नियंत्रित करने के लिए अस्थायी और स्थायी दोनों प्रकार के उपायों का उपयोग कर सकता है, जिनमें विदेशी मुद्रा स्वैप, मार्केट स्टेबिलाइजेशन स्कीम (एमएसएस) बॉन्ड, ओपन मार्केट ऑपरेशन (ओएमओ) और नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) में संभावित बढ़ोतरी जैसे कदम शामिल माने जा रहे थे.
Input: IANS
महंगाई का बढ़ता खतरा! RBI अक्टूबर और दिसंबर में बढ़ा सकता है रेपो रेट: SBI रिसर्च
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को अक्टूबर में 25 आधार अंक और फिर दिसंबर में एक अतिरिक्त 25 आधार अंक की बढ़ोतरी रेपो रेट में करनी चाहिए. इसकी वजह वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और कमोडिटी की कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई में इजाफा होने की उम्मीद है. यह जानकारी एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट में दी गई. रिपोर्ट में बताया गया कि अगस्त में महंगाई दर करीब 4.8-4.9 प्रतिशत के बीच रहने की उम्मीद है. अगर कच्चा तेल उच्च स्तर पर बना रहता है तो अक्टूबर और नवंबर में महंगाई दर 6.5 प्रतिशत और उससे उच्च स्तर पर बनी रह सकती है.
एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट में कहा गया कि भू-राजनीतिक अस्थिरता के चलते कच्चे तेल का बेंचमार्क 100 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को पार कर गया है और अगले 15 दिनों में इसके 123 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की उम्मीद है. खुदरा महंगाई बढ़ने के शुरुआती संकेत साफ पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, बेवरेज, फार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स पर दिख रहे हैं और लागत का बढ़ता बोझ अब ग्राहकों पर डाला जा रहा है. ये सभी कारक मिलकर ब्याज दरों को 50 आधार अंक तक बढ़ाने के लिए अनुकूल माहौल तैयार कर रहे हैं. लिक्विडिटी के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल ही में जुटाए गए फंड काफी हद तक बैंकिंग सिस्टम की फंडिंग की कमी को पूरा करते हैं.
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रिपोर्ट में कहा गया, "इसका मतलब है कि क्रेडिट की मजबूत मांग और उसके साथ ही वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ के मजबूत आंकड़ों को देखते हुए, अभी जो तेजी आई है, उसमें स्वाभाविक रूप से कमी आएगी." इसमें आगे कहा गया कि अगर क्रेडिट की उम्मीद के मुताबिक मांग पूरी हो जाती है, तो वित्त वर्ष 27 के आखिर तक सिस्टम में लिक्विडिटी का स्तर सामान्य हो जाएगा. रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि कई संकेतों को देखते हुए, 10-साल के बेंचमार्क भारतीय यील्ड 7.15 प्रतिशत या उससे भी ऊपर जा सकते हैं. रिपोर्ट में कहा गया, "हमारा अनुमान है कि वित्त वर्ष 27 के बाकी समय में लिक्विडिटी धीरे-धीरे कम होगी और मार्च 2027 तक यह आदर्श रूप से 6 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर होनी चाहिए." इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर यील्ड पिछले दस सालों के उच्चतम स्तर से ऊपर जा रहे हैं. इसका एक खास असर यूएस यील्ड में तेजी के रूप में दिख रहा है और 10-साल का यील्ड अब 5 प्रतिशत के करीब पहुंच गया है, जबकि 30-साल का यील्ड घटकर 5.40 प्रतिशत के स्तर पर आ गया है.
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