National Celiac Awareness Day: ऐसी बीमारी जिसमें रोटी भी बन सकती है दुश्मन, जानें क्या है सीलिएक डिजीज, लक्षण और बचाव
What Is Celiac Disease: अगर आपको लंबे समय से पेट से जुड़ी समस्याएं, एनीमिया या लगातार थकान की शिकायत रहती है, तो इसे नॉर्मल समस्या समझकर नजरअंदाज न करें. हो सकता है आप ग्लूटेन सेंसिटिव हो और ये दिक्कतें रोटी, ब्रेड जैसी चीजों के खाने से हो रही हो. मेडिकल भाषा में इसे सीलिएक डिजीज भी कहा जाता है.
Rishi Panchami 2026: कब है ऋषि पंचमी? जानें व्रत, पूजा मुहूर्त और सप्तऋषियों का महत्व
Rishi Panchami 2026: सनातन धर्म में ऋषि-मुनियों को ज्ञान, संस्कृति और धार्मिक परंपराओं का वाहक माना गया है। इन्हीं महान ऋषियों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने वाला प्रमुख पर्व है ऋषि पंचमी। यह दिन सप्तऋषियों के पूजन और उनके योगदान को स्मरण करने के लिए समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धा के साथ सप्तऋषियों की पूजा करने से जीवन में सकारात्मकता आती है और व्यक्ति को अपने पूर्वजों तथा ऋषि परंपरा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर मिलता है।
ऋषि पंचमी 2026 कब मनाई जाएगी?
पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में ऋषि पंचमी का व्रत 15 सितंबर, मंगलवार को रखा जाएगा। पंचमी तिथि की शुरुआत 15 सितंबर को सुबह 7 बजकर 44 मिनट पर होगी और इसका समापन 16 सितंबर को सुबह 8 बजकर 59 मिनट पर होगा। ऋषि पंचमी की पूजा के लिए मध्याह्न काल को विशेष महत्व दिया जाता है। 15 सितंबर को पंचमी तिथि दोपहर के समय विद्यमान रहेगी, इसलिए व्रत और सप्तऋषि पूजन इसी दिन करना उचित माना जाएगा।
ऋषि पंचमी 2026 पूजा का शुभ मुहूर्त
15 सितंबर को सप्तऋषियों की पूजा के लिए शुभ समय सुबह 11 बजकर 07 मिनट से दोपहर 1 बजकर 33 मिनट तक रहेगा। इस अवधि में स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल पर सप्तऋषियों का स्मरण करते हुए विधि-विधान से पूजा करें। अपनी परंपरा के अनुसार सप्तऋषियों को जल, अक्षत, पुष्प और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जा सकती है।
कौन हैं सप्तऋषि?
सनातन धर्म की परंपरा में सप्तऋषियों को अत्यंत सम्मानित स्थान प्राप्त है। सात प्रमुख ऋषियों के नाम कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ बताए जाते हैं। भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में इन ऋषियों को ज्ञान एवं आध्यात्मिक परंपरा के महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में देखा जाता है। ऋषियों ने तप, साधना और ज्ञान के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों तक धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गोत्र परंपरा का संबंध भी प्राचीन ऋषि-कुलों से जोड़ा जाता है। हिंदू धार्मिक संस्कारों में विवाह, श्राद्ध और विभिन्न संकल्पों के समय गोत्र का उल्लेख इसी वंश-परंपरा की पहचान के रूप में किया जाता है।
ऋषि पंचमी पर क्यों की जाती है सप्तऋषियों की पूजा?
ऋषि पंचमी का मूल भाव केवल व्रत रखने तक सीमित नहीं है। यह दिन उस ज्ञान परंपरा को याद करने का अवसर देता है, जिसने भारतीय संस्कृति और धार्मिक जीवन को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया। इस दिन सप्तऋषियों का पूजन करके उनके प्रति श्रद्धा प्रकट की जाती है। कई घरों में इस अवसर पर सात्विक भोजन बनाने, दान करने और जरूरतमंदों की सहायता करने की परंपरा भी है। पूजा के दौरान व्यक्ति अपने जीवन में सत्य, संयम और सदाचार अपनाने का संकल्प ले सकता है।
महिलाओं से जुड़ी मान्यताओं का क्या है संबंध?
ऋषि पंचमी के साथ कुछ प्राचीन धार्मिक परंपराओं में महिलाओं के मासिक धर्म से संबंधित शुद्धि-अशुद्धि की मान्यताओं का उल्लेख मिलता है। हालांकि, आधुनिक संदर्भ में इस पर्व को केवल इसी दृष्टिकोण तक सीमित करके देखना इसकी व्यापक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भावना को संकुचित कर देता है। ऋषि पंचमी का एक महत्वपूर्ण संदेश ऋषि परंपरा, ज्ञान और संस्कारों के प्रति सम्मान है। यह पर्व व्यक्ति को उन महान परंपराओं को याद करने का अवसर देता है, जिनके माध्यम से धार्मिक ज्ञान और सांस्कृतिक मूल्य आगे बढ़े।
ऋषि पंचमी का धार्मिक महत्व
ऋषि पंचमी श्रद्धा, ज्ञान और कृतज्ञता से जुड़ा पर्व है। इस दिन सप्तऋषियों का ध्यान और पूजन करते हुए उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास किया जाता है। ऋषियों की परंपरा हमें संयम, तप, सत्य, ज्ञान और लोककल्याण की भावना का संदेश देती है। इसी कारण ऋषि पंचमी को केवल एक धार्मिक व्रत के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान की उस परंपरा को नमन करने के दिन के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसने भारतीय संस्कृति को लंबे समय तक दिशा प्रदान की है।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। हरिभूमि.कॉम इसकी पुष्टि नहीं करता है।
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