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Kharif 2026 फसल क्षति पर मिलेगी आर्थिक सहायता, Bihar में 31 अक्टूबर तक करें आवेदन

माननीय मंत्री, सहकारिता विभाग, राम कृपाल यादव द्वारा आज अपने कार्यालय कक्ष से बिहार राज्य फसल सहायता योजना के अंतर्गत खरीफ 2024 मौसम के 1,17,708 लाभुक किसानों के बैंक खातों में 104 करोड़ 46 लाख 46 हजार 405 रुपये की सहायता राशि का डीबीटी के माध्यम से भुगतान किया।
 

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इस अवसर पर माननीय मंत्री राम कृपाल यादव ने कहा कि खरीफ 2024 मौसम के प्राप्त आवेदनों के सत्यापन के उपरान्त आज लाभ हेतु योग्य पाए गए 714 पंचायतों के कुल 1,17,708 लाभुक किसानों को सहायता राशि का भुगतान किया जा रहा है। साथ ही, 9 चयनित किसानों को सांकेतिक रूप से चेक प्रदान किए गए।   

माननीय मंत्री ने कहा कि बिहार राज्य फसल सहायता योजना राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी एवं किसान हितैषी योजनाओं में से एक है। इसका उद्देश्य प्राकृतिक आपदा अथवा अन्य कारणों से फसल की उपज में कमी होने की स्थिति में किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान कर उन्हें संकट की घड़ी में संबल देना है। यह योजना पूर्णतः निःशुल्क है तथा इसके लिए किसानों को किसी प्रकार के प्रीमियम का भुगतान नहीं करना पड़ता है। फसल क्षति की स्थिति में मिलने वाली सहायता किसानों को आर्थिक कठिनाइयों से उबरने तथा आगामी फसल के लिए कृषि कार्य जारी रखने में महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करती है।

माननीय मंत्री ने कहा कि वर्तमान में बाढ़ प्रभावित किसानों के लिए फसल क्षति की स्थिति में आर्थिक सहायता पहुंचाने के उद्देश्य से बिहार राज्य फसल सहायता योजना की भूमिका महत्वपूर्ण है। खरीफ 2026 में फसल क्षति से प्रभावित किसानों को इस योजना का लाभ दिया जाएगा। सभी पात्र किसानों से अपील है कि अंतिम तिथि का इंतजार किए बिना 31 अक्टूबर तक अपना आवेदन अवश्य करें।

उन्होंने बताया कि योजना के अंतर्गत थ्रेसहोल्ड उपज की तुलना में वास्तविक उपज में 20 प्रतिशत तक की क्षति होने पर 7,500 रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से अधिकतम 2 हेक्टेयर के लिए 15,000 रुपये तथा 20 प्रतिशत से अधिक क्षति होने की स्थिति में 10,000 रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से अधिकतम 2 हेक्टेयर के लिए 20,000 रुपये तक की सहायता राशि प्रदान की जाती है। सहायता राशि लाभुक किसानों के आधार-संबद्ध बैंक खातों में डीबीटी के माध्यम से सीधे अंतरित की जाती है। बिहार राज्य फसल सहायता योजना का संचालन पूर्णतः राज्य सरकार की निधि से किया जा रहा है। खरीफ 2024 मौसम के लिए धान एवं मकई को पंचायतस्तरीय फसल तथा सोयाबीन, आलू, बैंगन, टमाटर एवं गोभी को जिलास्तरीय फसल के रूप में अधिसूचित किया गया है।
 

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रबी 2024-25 मौसम में उपज दर के आंकड़ों के आधार पर योग्य ग्राम पंचायतों के आवेदक किसानों द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों का सत्यापन जिला स्तरीय समन्वय समिति (DLCC) द्वारा कराया जा रहा है। सत्यापन के उपरांत पात्र पाए गए एवं भुगतान के लिए अनुशंसित किसानों को भी शीघ्र सहायता राशि का भुगतान किया जाएगा। इस अवसर पर सहकारिता विभाग के सचिव श्री धर्मेन्द्र सिंह, निबंधक, सहयोग समितियाँ श्री रजनीश कुमार सिंह सहित विभाग के अन्य पदाधिकारीगण उपस्थित रहे।

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Neeb Karori Baba पर बनी फिल्म Hanuman Ansh ने 10 लाख से शुरू होकर कमाए ₹200 Crore

(कोमल पंचमटिया) मुंबई, 11 सितंबर नीब करौरी बाबा के जीवन पर आधारित फिल्म ‘हनुमान अंश’ सात अगस्त को जब सिनेमाघरों में आई तो न उसके साथ किसी बड़े सितारे का नाम जुड़ा था और न ही उसे लेकर कोई चर्चा थी। यहां तक की टिकट खिड़की पर कोई खास हलचल नहीं हुई, लेकिन कुछ ही हफ्तों में तस्वीर ऐसी बदली कि 10 लाख रुपये से शुरुआत करने वाली यह फिल्म 200 करोड़ रुपये की कमाई तक पहुंच गई। टिकट खिड़की पर फिल्म के धमाकेदार प्रदर्शन ने 51 साल पहले आई फिल्म ‘जय संतोषी मां’ को मिली अप्रत्याशित सफलता की याद दिला दी।

डॉक्टर से फिल्मकार बने विशाल चतुर्वेदी के निर्देशन में बनी ‘हनुमान अंश’ में अभिनेता शोभिनव सत्या मुख्य भूमिका में हैं जिन्हें इस फिल्म के रिलीज होने से पहले अभिनय जगत में शायद ही कोई जानता था। सात अगस्त को महज 250 स्क्रीन पर रिलीज हुई यह फिल्म अब 2,000 स्क्रीन तक पहुंच चुकी है। यह फिल्म उत्तराखंड के संत बाबा नीब करौरी के जीवन को परदे पर उतारती है।

उनके भक्तों में हॉलीवुड अभिनेत्री जूलिया रॉबर्ट्स, क्रिकेटर विराट कोहली और उनकी पत्नी एवं अभिनेत्री अनुष्का शर्मा जैसे चर्चित नाम शामिल हैं। ऐसा भी बताया जाता है कि स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग जैसे कारोबारी दिग्गज भी उत्तराखंड के कैंची धाम में उनके आश्रम आए थे। नीब करौरी बाबा का असली नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा था।

उनका जन्म करीब 1900 में उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के एक गांव में हुआ था और 1973 में उनका निधन हुआ था। कम उम्र में उनका विवाह हो गया था लेकिन बाद में उन्होंने घर-परिवार छोड़कर संन्यासी जीवन अपना लिया। उनके भक्त उन्हें भगवान हनुमान का अवतार मानते हैं और उनका मानना है कि बाबा नीब करौरी के पास चमत्कार करने की शक्ति थी।

‘हनुमान अंश’ की सफलता ने फिल्म जगत को भी हैरान कर दिया है और अब यह चर्चा का विषय है कि आखिर एक ऐसी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर अचानक कैसे छा गई जिसके बारे में पहले कोई चर्चा नहीं थी। फिल्म कारोबार के आंकड़ों पर नजर रखने वाली वेबसाइट ‘सैकनिल्क’ के अनुसार, पहले सप्ताह की मामूली कमाई के बाद दूसरे सप्ताह में फिल्म का कारोबार और गिर गया था, लेकिन तीसरे सप्ताह से तस्वीर पूरी तरह बदल गई। पीवीआर आईनॉक्स लिमिटेड के मुख्य व्यवसाय नियोजन एवं रणनीति अधिकारी कमल ज्ञानचंदानी ने पीटीआई-से कहा, ‘‘किसी ने ऐसी उम्मीद नहीं की थी।

‘हनुमान अंश’ अपने आप में एक ‘केस स्टडी’ है। तीसरे सप्ताह में इसे सिनेमाघरों से हटाए जाने की नौबत आ गई थी लेकिन उसी सप्ताह फिल्म ने रफ्तार पकड़ ली और चौथे एवं पांचवें सप्ताह में ‘ब्लॉकबस्टर’ बन गई। ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है।’’ फिल्म उद्योग से जुड़े कई व्यक्तियों और फिल्म इतिहासकारों का मानना है कि आस्था पर आधारित सिनेमा के प्रति दर्शकों का आकर्षण नया नहीं है।

इससे पहले 1975 में रिलीज हुई ‘जय संतोषी मां’ और 1977 में आई ‘शिरडी के साईं बाबा’ से लेकर 2024 में भगवान विष्णु के वराह और नरसिंह अवतारों पर बनी ‘महावतार नरसिंह’ तक ऐसी फिल्मों ने दर्शकों से लगातार जुड़ाव बनाया है। ‘महावतार नरसिंह’ ने दुनियाभर में 300 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की थी। फिल्म इतिहासकार एवं अभिलेख विशेषज्ञ एस. एम. एम. औसाजा के अनुसार, धार्मिक और पौराणिक फिल्मों की लोकप्रियता नयी बात नहीं है।

उन्होंने कहा कि दादासाहेब फाल्के की फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ (1913) से ही ऐसी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने ‘राम राज्य’ (1943), वी. शांताराम की ‘शकुंतला’ (1943) और ‘जय संतोषी मां’ का उदाहरण दिया। ‘जय संतोषी मां’ उस समय सिनेमाघरों में आई थी जब ‘शोले’ भी सिनेमाघरों में लगी थी।

इसके बावजूद ‘जय संतोषी मां’ ने जबरदस्त सफलता हासिल की। अब सभी की निगाहें नितेश तिवारी की महत्वाकांक्षी फिल्म ‘रामायण’ पर हैं, जिसमें रणबीर कपूर और साई पल्लवी मुख्य भूमिकाओं में हैं। यह फिल्म दिवाली पर रिलीज होगी।

उन्होंने कहा, ‘‘भारतीय सिनेमा में पौराणिक फिल्मों की एक विधा हमेशा से रही है और ये फिल्में लगातार सफल भी रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब ऐसी फिल्मों का पैमाना कहीं बड़ा हो गया है और बड़े कलाकार भी इनसे जुड़ रहे हैं।’’ औसाजा के मुताबिक, बाबा नीब करौरी जैसी आध्यात्मिक हस्तियों के प्रति आस्था किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं रहती और यही वजह है कि उनकी कहानियां व्यापक दर्शक वर्ग से जुड़ पाती हैं। ज्ञानचंदानी का मानना है कि कोविड-19 महामारी के बाद सिनेमाघरों में आस्था पर आधारित फिल्मों की लोकप्रियता अधिक साफ तौर पर दिखाई देने लगी है।

उन्होंने कहा, ‘‘लोग बड़ी संख्या में सिनेमाघरों में आ रहे हैं और आस्था पर आधारित फिल्मों को पसंद कर रहे है। इससे सिनेमाघरों को एक नया दर्शक वर्ग और एक ऐसी फिल्म विधा मिली है, जिस पर वे भरोसा कर सकते हैं। यह फिल्म उद्योग के लिए अच्छी खबर है।’’ सिनेपोलिस इंडिया के प्रबंध निदेशक देवांग संपत ने कहा कि ‘हनुमान अंश’ की सफलता से साफ है कि दर्शकों में धार्मिक फिल्मों के लिए विशेष जगह है, लेकिन सिर्फ धार्मिक विषय होना ही सफलता की गारंटी नहीं है।

संपत ने ‘कांतारा’, ‘महावतार नरसिंह’ और ‘लालो’ जैसी फिल्मों का जिक्र करते हुए कहा कि इनकी सफलता के पीछे कोई ऐसा फार्मूला नहीं है जिसे आसानी से दोहराया जा सके और इनमें साझा बात अपनी सांस्कृतिक जड़ों से गहरा जुड़ाव है। मिराज एंटरटेनमेंट लिमिटेड के कार्यकारी निदेशक दीपक अदवानी ने कहा कि वह अभी इसे किसी नये ‘ट्रेंड’ का नाम देने में जल्दबाजी नहीं करेंगे, लेकिन दर्शकों की पसंद में एक स्पष्ट बदलाव जरूर दिखाई दे रहा है। अदवानी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘इन फिल्मों को जोड़ने वाली कड़ी केवल पौराणिक कथाएं नहीं हैं।

असली बात है उनकी प्रामाणिकता, सांस्कृतिक जुड़ाव और ऐसी कहानी जो दर्शकों को भावनात्मक रूप से थाम सके।’’ उन्होंने कहा कि ‘हनुमान अंश’ की खासियत यह भी है कि इसने युवाओं के साथ-साथ बुजुर्ग दर्शकों को भी सिनेमाघरों तक खींचा है। अदवानी ने कहा, ‘‘सबसे दिलचस्प बात यही है कि इसकी लोकप्रियता किसी एक उम्र के दर्शकों तक सीमित नहीं है।’’ सिनेमाघर संचालकों के मुताबिक, ‘हनुमान अंश’ की उपलब्धि इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि ‘टॉक्सिक’ और ‘आवारापन 2’ जैसी बड़े बजट की फिल्मों की मौजूदगी के बावजूद यह सफल हुई। कुछ सिनेमाघरों में ‘हनुमान अंश’ का प्रदर्शन किसी सामान्य फिल्म की ‘स्क्रीनिंग’ जैसा नहीं है।

मिराज सिनेमाज समेत कुछ सिनेमाघरों में धार्मिक वातावरण बनाने के लिए फिल्म शुरू होने से पहले या उसकी पृष्ठभूमि में हनुमान चालीसा बजाया जा रहा है। संपत ने बताया कि कुछ दर्शक सिनेमाघर में प्रवेश करने से पहले अपनी इच्छा से जूते-चप्पल उतार देते हैं, जबकि कुछ लोग फिल्म खत्म होने के बाद पर्दे पर अंतिम ‘क्रेडिट’ (फिल्म निर्माण से जुड़े लोगों की जानकारी देना) चलने तक खामोशी से अपनी सीट पर बैठे रहते हैं।

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