12 सितंबर को खंडवा में नेशनल लोक अदालत, बिजली बिल और बैंक मामलों समेत इन विवादों का होगा समाधान
12 सितंबर 2026 को खंडवा में नेशनल लोक अदालत लगेगी, जिसमें लंबे समय से चल रहे कई विवादों को आपसी सहमति से खत्म करने का मौका मिलेगा। बैंक रिकवरी, बिजली बिल, मोटर दुर्घटना मुआवजा, वैवाहिक विवाद और चेक बाउंस जैसे मामलों में पक्षकार समझौते के जरिए समाधान पा सकेंगे।
जिला एवं सत्र न्यायालय खंडवा के साथ पुनासा और हरसूद के सिविल न्यायालयों में भी 12 सितंबर को लोक अदालत आयोजित की जाएगी। मध्यप्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के निर्देश पर होने वाली इस लोक अदालत का उद्देश्य लोगों को लंबे समय तक चलने वाली अदालती प्रक्रिया से राहत देना और आपसी सहमति से विवादों का जल्दी समाधान कराना है।
किन मामलों का होगा निपटारा
खंडवा की नेशनल लोक अदालत में कई तरह के राजीनामा योग्य मामलों को रखा जा सकेगा। इनमें सिविल और आपराधिक शमनीय प्रकरण, चेक बाउंस से जुड़े धारा 138 के मामले, बैंक रिकवरी और मोटर दुर्घटना क्षतिपूर्ति के दावे शामिल हैं। इसके अलावा पति-पत्नी के बीच विवाद, श्रम विवाद और ऐसे दूसरे मामले भी समझौते के आधार पर निपटाए जा सकेंगे, जिनमें कानून इसकी अनुमति देता है।
बिजली बिल, जलकर और संपत्तिकर से जुड़े विवाद भी लोक अदालत में रखे जा सकते हैं। भूमि अधिग्रहण और राजस्व से जुड़े राजीनामा योग्य मामलों को भी यहां आपसी सहमति से सुलझाने का अवसर मिलेगा। इससे ऐसे लोगों को राहत मिल सकती है जो किसी विवाद के कारण लंबे समय से कोर्ट की प्रक्रिया में फंसे हुए हैं।
आपसी सहमति से होगा लोक अदालत का फैसला
लोक अदालत की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां दोनों पक्षों की सहमति से विवाद का समाधान किया जाता है। इसमें किसी एक पक्ष पर फैसला थोपने के बजाय दोनों पक्षों को बातचीत के जरिए समझौते तक पहुंचने का मौका मिलता है। जब दोनों पक्ष समझौते पर सहमत हो जाते हैं, तो उसी आधार पर लोक अदालत में फैसला पारित किया जाता है।
लोक अदालत में पारित समझौता सामान्य अदालत के फैसले की तरह प्रभावी माना जाता है और दोनों पक्षों के लिए बाध्यकारी होता है। ऐसे मामलों में सामान्य तौर पर अपील का प्रावधान नहीं होता। इसलिए लोक अदालत में जाने वाले लोगों के लिए यह जरूरी है कि वे समझौते की सभी शर्तों को अच्छी तरह समझकर ही अपनी सहमति दें।
कोर्ट फीस भी वापस मिलने का प्रावधान
नेशनल लोक अदालत में मामला निपटने पर लोगों को आर्थिक राहत भी मिल सकती है। नियमों के अनुसार, जिन मामलों में न्यायालय शुल्क जमा किया गया है और उनका लोक अदालत के जरिए निराकरण हो जाता है, वहां नियमानुसार न्यायालय शुल्क वापस किया जा सकता है। इससे पक्षकारों पर मुकदमे का आर्थिक बोझ भी कम होता है।
प्री-लिटिगेशन मामलों का भी होगा समाधान
खंडवा नेशनल लोक अदालत की एक खास बात यह भी है कि इसमें केवल अदालत में चल रहे मामलों का ही निपटारा नहीं होगा। ऐसे विवाद जिनका मामला अभी कोर्ट में दर्ज नहीं हुआ है, उन्हें भी प्री-लिटिगेशन स्तर पर समझौते के लिए रखा जा सकता है। यानी विवाद कोर्ट तक पहुंचने से पहले ही दोनों पक्ष आपसी सहमति से उसका समाधान कर सकते हैं।
12 सितंबर की लोक अदालत से लोगों को क्या फायदा
खंडवा में 12 सितंबर को होने वाली नेशनल लोक अदालत उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण अवसर है जिनके मामले समझौते के जरिए सुलझ सकते हैं। बैंक का कर्ज, बिजली बिल, चेक बाउंस, सड़क हादसे का मुआवजा या वैवाहिक विवाद जैसे मामलों में पक्षकार बातचीत के जरिए समाधान की कोशिश कर सकते हैं।
खड़े हनुमान मंदिर मामले में पंडित शंकर जोशी ने प्रशासन से पूछे सवाल, बोले – ‘चिमनी के लिए रास्ता है तो मंदिर के लिए क्यों नहीं?’
उज्जैन के सती गेट स्थित खड़े हनुमान मंदिर को लेकर चल रहे विवाद में अब संत समाज की ओर से भी सवाल उठने लगे हैं। दरअसल महामुक्तेश्वरी धाम के पीठाधीश्वर पंडित शंकर लक्ष्मीनारायण जोशी ने कहा है कि विकास कार्य जरूरी हैं लेकिन आस्था से जुड़े मंदिर को बचाने का विकल्प भी तलाशा जा सकता है। उन्होंने नीलगंगा क्षेत्र का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां बीच में आ रही चिमनी और एक मंदिर को बचाकर सड़क बनाई गई है तो यहां भी ऐसा किया जा सकता है।
इसके साथ ही उन्होंने प्रशासन से हाथ जोड़कर अपील की है कि सिंहस्थ-2028 की तैयारियां जारी रहें लेकिन खड़े हनुमान की प्रतिमा को हटाने के बजाय ऐसा समाधान निकाला जाए जिससे मंदिर अपनी जगह सुरक्षित रह सके।
पंडित जोशी बोले – मंदिर को नुकसान नहीं पहुंचा तो ढांचा टूटा कैसे?
वहीं पंडित शंकर जोशी ने प्रशासन के उस पक्ष पर भी सवाल उठाया, जिसमें कहा गया कि प्रतिमा को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया गया। उन्होंने पूछा कि अगर मंदिर को क्षति नहीं पहुंची तो उसका ढांचा टूटा कैसे। उन्होंने कहा कि मौके की स्थिति देखकर लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं और प्रशासन को इस पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि उनका विरोध सड़क चौड़ीकरण का नहीं है। उनका कहना है कि विकास के साथ धार्मिक स्थलों का सम्मान भी बना रहना चाहिए। उन्होंने संत समाज और हिंदू समाज से भी इस मुद्दे पर आवाज उठाने की अपील की है।
नई जगह के लिए जमीन भी मिली
वहीं मंदिर के पुजारी महेश बैरागी ने बताया कि करीब 14 दिन पहले प्रशासन प्रतिमा हटाने की बात लेकर पहुंचा था। उनका कहना है कि उन्होंने शुरुआत से ही यह मांग रखी थी कि पूरी कागजी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही प्रतिमा को सुरक्षित तरीके से विस्थापित किया जाए। दरअसल पुजारी के मुताबिक बाद में मंदिर के आसपास की दीवार और गुंबद हटाए गए। इसके बाद जांच में सामने आया कि प्रतिमा लॉकिंग पद्धति पर टिकी हुई है और इसे सीधे उठाने पर नुकसान होने का खतरा हो सकता है। इसके बाद विशेषज्ञों और पुरातत्व विभाग की टीम ने 5 से 6 फीट गहरे गड्ढे खोदकर जांच की। उन्होंने बताया कि बाद में SGSITS और IIT की टीम ने भी मंदिर का दौरा किया और आधुनिक स्कैनिंग उपकरणों से आगे की जांच की बात कही। फिलहाल प्रतिमा को लेकर आगे की प्रक्रिया प्रशासन के स्तर पर तय होनी है।
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