सऊदी अरब और UAE टकराव के बीच अमेरिका सक्रिय, रूबियो ने लगाया फोन
सऊदी अरब ने यमन के मुकाला बंदरगाह शहर पर बमबारी की, जिसमें अलगाववादी ताकतों के लिए संयुक्त अरब अमीरात से हथियारों की खेप को निशाना बनाया गया। यह हमला एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्ग पर स्थित देश में एक बड़ा कदम है, जो फारस की खाड़ी क्षेत्र के लिए नए खतरे पैदा कर सकता है। बाद में संयुक्त अरब अमीरात ने यमन से अपनी सेना वापस बुलाने की घोषणा की। संयुक्त अरब अमीरात द्वारा समर्थित अलगाववादी दक्षिणी संक्रमणकालीन परिषद (एसटीसी) ने इस महीने तेल सुविधाओं सहित हद्रामौत और महरा प्रांतों के अधिकांश हिस्से पर कब्जा कर लिया।
मार्को रूबियो ने सऊदी-यूएई से की बात
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने यमन में बिगड़ती स्थिति और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और सऊदी अरब के शीर्ष नेताओं से फोन पर बातचीत की है। अमेरिकी सरकार की ओर से जारी बयान में इसकी जानकारी दी गई। सबसे पहले रुबियो ने यूएई के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन जायद से बात की। दोनों ने यमन की मौजूदा हालात के साथ-साथ पूरे ममिडल ईस्ट की सुरक्षा, स्थिरता के मुद्दों पर चर्चा की। यह बातचीत ऐसे समय हुई है जब यमन की कमजोर सुरक्षा स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बनी हुई है। इसके बाद रुबियो ने सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद से भी फोन पर बातचीत की। यमन में एक दशक से चल रहे संघर्ष के कारण वहां गंभीर मानवीय संकट पैदा हो गया है, जिसे संयुक्त राष्ट्र दुनिया के सबसे खराब संकटों में गिनता है। अमेरिका का कहना है कि क्षेत्रीय देशों के साथ मिलकर काम करना जरूरी है ताकि मिडल ईस्ट में स्थिरता लाई जा सके।
यमन से सैनिक वापस बुलाएगा यूएई
एपी, यमनः संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने यमन से अपनी सेना वापस बुलाने और अपना आतंकवाद विरोधी अभियान समाप्त करने का फैसला किया है। यह कदम सऊदी अरब के उन आरोपों के बाद आया है, जिसमें कहा गया था कि यूएई यमन के अलगाववादी गुट 'सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल' (एसटीसी) को हथियार सप्लाई कर रहा है। सऊदी ने यमन के मुकल्ला पोर्ट पर हमला किया था। दावा था कि पोर्ट पर यूएई से आए जहाज में एसटी के लिए हथियार थे, जबकि यूएई ने इसे गलत बताते हुए कहा कि उसमें केवल सैन्य गाड़िया थी।
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29 सितंबर 2025, अमेरिका का व्हाइट हाउस संयुक्त राष्ट्र की बैठक के बाद इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू हाथों में फोन का रिसीवर लिए बैठे होते हैं। उनसे यही कोई 2 फुट की दूरी पर पीस मेकर डोनाल्ड ट्रंप विराजमान होते हैं। इजरायली पीएम नेतन्याहू सॉरी बोलते नजर आते हैं। दरअसल, नेतन्याहू ने 9 सितंबर को दोहा पर हुए हमले के लिए कतर के प्रधानमंत्री से फोन पर सॉरी बोल रहे थे। इजरायल पिछले दो साल से लगातार गाजा को टारगेट कर रहा है। इस चक्कर में ईरान के ऊपर भी हमला कर दिया गया और इसमें सुपरपावर मुल्क अमेरिका का भी बखूबी साथ मिला। लेकिन कहानी इससे आगे बढ़ी और इजरायल की तरफ से कतर के ऊपर भी हमला किया गया। कतर पर 9 सितंबर को अति आत्मविश्वास में आकर इजरायल ने बम बरसा दिए। नतीजन व्हाइट हाउस में नेतन्याहू को तलब किया गया। यहां ट्रंप ने कतर के प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान जशीन अल थानी को कॉल किया और फिर फोन सीधा नेतन्याहू को पकड़ा दिया। नेतन्याहू ने दोहा में हमास के पॉलिटिकल लीडरशिप पर टारगेटेड अटैक को लेकर कतर पीएम से माफी मांगी। इसके साथ ही भविष्य में ऐसी कोई घटना न दोहराने का वादा भी किया।
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कतर का इतिहास
आज से करीब 8000 साल पहले की बात है। मिडिल ईस्ट के कुछ हिस्सों में अच्छी खासी बारिश हुई। बारिश हुई तो जीवन बढ़ा। एक ऐसी जगह भी लोगों को रहने का ठिकाना मिला जहां इससे पहले रिहाइश नहीं थी। क़तर में लोग बसे और मिट्टी के बर्तन बनाने शुरू किए। इराक की एक पुरानी सभ्यता है अल उबैद। इसी सभ्यता से मिलते जुलते कुछ बर्तन कतर में भी दिखते हैं और इसे ही पोट्री कल्चर की शुरुआत भी माना जाता है। 224 ईसवी की बात है। ससानी साम्राज्य ने खाड़ी पर कंट्रोल काबिज किया था। क़तर इस दौर में पर्पल डाई के अलावा मोतियों के व्यापार में भी लग चुका था। ईसाइयत के बढ़ते प्रभाव से कतर में भी मिशन इंडिया आई और इसे बेथ कतराय कहा गया।
मक्का और मदीना जैसे इस्लामी केंद्रों के साथ संपर्क बढ़ा
बहरीन और आसपास के कुछ इलाके इसका बड़ा हिस्सा भी रहे। सातवीं सदी में यहां इस्लाम का आगमन हुआ। क़तर के इतिहास में ये एक महत्वपूर्ण मोड़ था। 628 ईसवी में पैगंबर मोहम्मद ने पूर्वी अरब के शासक मुंजिर बिन सा अल तमीमी को एक दूत भेजकर इस्लाम को अपनाने की उनसे गुहार भेजी। मुंजिर मान गए और उनके प्रभाव के चलते कतर की अधिकांश अरब जनजातियां इस्लाम में ढलने लगी। इस्लाम के आने से ना केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और आर्थिक संरचनाओं में भी यहां बड़े बदलाव देखे गए। स्लाम के आने से क़तर का मक्का और मदीना जैसे इस्लामी केंद्रों के साथ संपर्क बढ़ा, व्यापार बढ़ा, रिवाज बदले, मस्जिदें बनी, क़तर की बस्तियां जो पहले मछली पकड़ने और मोतियों के व्यापार पर निर्भर थी।
क़तर को घोड़ों और ऊंट के प्रजनन केंद्र के रूप में मिली प्रसिद्धि
आठवीं सदी में क़तर की एक नई पहचान भी उभरी। उमयद डायनेस्टी के दौरान क़तर को घोड़ों और ऊंट के प्रजनन केंद्र के रूप में बड़ी प्रसिद्धि मिली। क़तर की कहानी में थोड़ा और आगे बढ़ते हैं। 19वीं सदी में आते हैं। यहां पर अल थानी परिवार ने सत्ता संभाली। 1868 में शेख मोहम्मद बिन थानी ने ब्रिटिश सरकार के साथ एक संधि की। इसके तहत क़तर ब्रिटिश प्रोटेक्टोरेट बना। प्रोटेक्ट रेट मतलब जिस देश को किसी दूसरे देश का संरक्षण प्राप्त हो।
मिडिल ईस्ट में तेल की खोज
20वीं सदी की शुरुआत तक क़तर की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से मोती व्यापार पर निर्भर थी। खाड़ी के गर्म और उथले पानी में पाए जाने वाले मोती बड़ी हाई क्वालिटी के होते थे और इसके चलते बाजार में इनकी मांग भी बहुत ज्यादा होती थी। फिर यह गोताखोरी भी अपने आप में बड़ा जोखिम भरा काम था। इसलिए भी डिमांड हाई थी। 1930 के दशक में जापान में कृत्रिम मोती के उत्पादन ने क़तर के मोती व्यापार को गहरा झटका दिया। इस आर्थिक संकट ने क़तर के लोगों को उस समय सकते में डाल दिया। 20वीं सदी के मध्य में क़तर के इतिहास में एक बड़ा बदलाव आया। जब 1939 में दुखान तेल क्षेत्र में तेल की खोज हुई। 1930 के दशक में मिडिल ईस्ट में तेल की खोज ट्रेंड कर रही थी।
कतर की आर्थिक स्थिति को बदल कर रख दिया
ईरान पहले ही तेल खोज चुका था। 1932 में क़तर के पड़ोसी बहरीन में तेल की खोज हो गई। ब्रिटिश कंपनी एंग्लो पर्शियन ऑयल कंपनी ने क़तर में भी तेल तलाशना शुरू किया। 1935 में क़तर के शासक शेख अब्दुल्ला बिन जासिम अलथानी ने पेट्रोलियम कॉनसेशन लिमिटेड के साथ एक डील की समझौता किया। 1949 में तेल का निर्यात शुरू हुआ जिसने कतर की आर्थिक स्थिति को बदल कर रख दिया। 1970 के दशक में नॉर्थ फील्ड में प्राकृतिक गैस के विशाल भंडारों की खोज हुई। तेल और गैस ने मिलकर क़तर को दुनिया के सबसे संपन्न देशों में से एक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
तकनीक ने बदली तकदीर
गैस को लिक्विड फॉर्म में बदलने से इसे बड़ी-बड़ी जहाजों में तेल की तरह भरकर समुद्र के रास्ते जहां चाहे पहुंचाया जा सकता था। इसके लिए गैस पाइपलाइन की भी झंझट नहीं होती। लेकिन इसके लिए जरूरी था कि गैस को माइनस 161 सेल्सियस तापमान पर ठंडा किया जाए। कतर ने इस तकनीक में निवेश किया और प्राकृतिक गैस से बड़ी रकम कमाने की दिशा में बड़ा रास्ता खोजा। इसके बाद वह तरल प्राकृतिक गैस का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया। तेल और गैस की कमाई से अमीर बनने के पीछे कतर की एक खास रणनीति भी है। यह रणनीति है, खर्च से ज्यादा बचाओ। कतर को पता था कि तेल से होने वाली कमाई बहुत स्थिर नहीं है। इसलिए उसने तेल से मिले पैसों का दुनिया के अन्य हिस्सों में निवेश करना शुरू किया। कतर पूरी योजना के साथ इस पर काम करता है ताकि आर्थिक भविष्य मजबूत किया जा सके और तेल पर निर्भरता कम की जा सके।
अल जजीरा से अरब मीडिया में क्रांति
कतर एयरवेज दुनिया के टॉप एयरलाइंस में से एक बन गया। लेकिन कतर ने सबसे बड़ा कदम साल 1996 में उठाया। इस साल कतर ने अल जजीरा की शुरुआत की। 137 मिलियन डॉलर के अनुदान के साथ अल जजीरा ने अरबी मीडिया में क्रांति ला दी। अल जजीरा आज दुनिया के प्रतिष्ठित मीडिया ग्रुप में से एक है। इसने कतर को मिडल ईस्ट में सॉफ्ट पावर बना दिया।
क़तर और भारत के बीच रिश्ते
क़तर और भारत के बीच कूटनीतिक रिश्ते 70 के दशक में शुरू हुए थे। जनवरी 1973 में क़तर ने भारत में अपने दूतावास के लिए पहले चार्ज द अफ़ेयर्स की नियुक्ति की, मई 1974 में क़तर ने अपना पहला राजदूत भारत में नियुक्त किया। लेकिन भारत के साथ क़तर के रिश्ते बनने उससे पहले शुरू हो गए थे। 1940 में क़तर ने दुखन तेल भंडार की खोज की। इसके दो दशक के बाद क़तर को एक और तेल भंडार का पता चला। उसकी अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ने लगी, जिसमें विदेश से आए कामगारों की अहम भूमिका रही। 1990 तक क़तर में काम करने वाले विदेश से आए लोगों में भारतीय कामगारों की संख्या 50 लाख तक हो गई थी। ये उसकी आबादी का लगभग एक तिहाई थी। इधर क़तर और भारत के बीच व्यापार भी बढ़ रहा था। जहां क़तर भारत से अनाज, मशीनरी और इलेक्ट्रिक सामान ख़रीद रहा था, भारत उससे तेल, लिक्विफ़ाइड नैचुरल गैस (एलएनजी) ख़रीद रहा था। मोदी के सत्ता में आने के बाद 2015 और 2016 में उन्होंने मुलाक़ात क़तर के अमीर तमीम बिन हमद अल थानी से मुलाक़ात की। इसके अलावा सितंबर 2019 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा और दिसंबर 2023 में दुबई में हुए जलवायु सम्मेलन में दोनों नेताओं की मुलाक़ात हुई थी। इन बैठकों
भारत का क़तर से द्विपक्षीय व्यापार
2022-23 में भारत और क़तर के बीच 18.77 अरब डॉलर का व्यापार हुआ। इस दौरान भारत ने 1.96 अरब डॉलर मूल्य का सामान क़तर को निर्यात किया. वहीं भारत का इस दौरान 16.8 अरब डॉलर मूल्य का आयात रहा। 2018-19 में दोनों का व्यापार 12.33 अरब डॉलर का रहा, जो 2019-20 में 10.96 अरब डॉलर, 2020-21 में 9.21 अरब डॉलर, 2021-22 में 15.20 अरब डॉलर रहा और 2022-23 में 18.78 अरब डॉलर तक पहुंच गया। क़तर भारत को एलएनजी, एलपीजी, केमिकल्स, प्लासिटिक, अलूमिनियम का सामान बेचता है। वहीं भारत से वो अनाज, तांबा, लोहा, स्टील, फल, सब्ज़ियां, मसाले, प्रोसेस्ड फूड, इलेक्ट्रिक मशीनरी, कपड़े, बहूमूल्य रस्त और रबर खरीदता है। एनएलजी और एलपीजी के मामले में क़तर भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है। भारत अपनी एलएनजी की ज़रूरत का कुल 48 फ़ीसदी हिस्सा भारत क़तर से ख़रीदता है।
कतर में हर चौथा शख्स है हिंदुस्तानी
ऐतिहासिक रूप से भारत और कतर के लोगों से लोगों के बीच मजबूत सम्बंध है। 8 लाख 30 हजार से अधिक मजबूत और जोशपूर्ण भारतीय समुदाय; कतर में सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय माना जाता है। बड़ी संख्या में ब्लू-कॉलर श्रमिकों के अलावा चिकित्सा, इंजीनियरिंग, शिक्षा, वित्त, बैंकिंग, व्यवसाय और मीडिया सहित व्यवसायों में लगे हुए हैं। 2019 में भारत-कतर संस्कृति वर्ष के रूप में मनाया गया। फीफा 2022 और एशियाई फुटबॉल चैम्पियनशिप 2023 में भारतीय प्रवासियों द्वारा उत्साहपूर्वक भागीदारी ने कार्यक्रमों की सफलता को और अधिक रंगीन और जीवंत बना दिया। कतर में 19 भारतीय स्कूल और एक भारतीय विश्वविद्यालय शैक्षणिक सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। प्रत्येक साल अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2024 के कार्यक्रम में 3000 से अधिक लोगों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
अमेरिका को गिफ्ट किया 3400 करोड़ का फ्लाइंग महल
12 मई की तारीख को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप रोजाना की तरह व्हाइट हाउस में मीडिया को एड्रेस करने पहुंचे। उन्होंने कहा कि कतर हमें एक गिफ्ट दे रहा है। अगर हम इसे स्वीकार नहीं करेंगे तो हम मूर्ख इंसान होंगे। फिर आता है 14 मई का दिन अपने मिडिल ईस्ट दौरे पर निकले ट्रंप कतर पहुंचते हैं। यहां उन्होंने कतर सरकार के साथ करीब 100 लाख करोड़ रुपए (1.2 ट्रिलियन डॉलर) की डील की थी। कतर सरकार ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के लिए एक बोइंग 747-8 जंबो जेट गिफ्ट में दिया है। 3400 करोड़ रुपए की कीमत वाले इस लग्जरी प्लेन को 'फ्लाइंग पैलेस' या उड़ता महल कहा जाता है। यह किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति को मिलने वाला अब तक का सबसे महंगा गिफ्ट है। जब इसको लेकर अमेरिका में बयानबाजी शुरू हो गई तो ट्रंप ने ट्वीट करते हुए इस गिफ्ट को स्वीकार करने की वजह भी बता दी। ट्रंप ने अपने पोस्ट में लिखा कि बोइंग 747 को संयुक्त राज्य वायु सेना यानी की एयरफोर्स रक्षा विभाग को दिया जा रहा है ना की मुझे। ये कतर की ओर से गिफ्ट है, जिसकी हमने कई सालों तक रक्षा की है।
दुनिया को बैलेंस कर रहा कतर
कतर की फॉरेन पॉलिसी भी अलग तरह की है। एक तरफ उनकी ईरान से अच्छी दोस्ती है तो दूसरी तरफ ईरान के दुश्मन अमेरिका का मिडिल ईस्ट के सबसे बड़ा सैन्य अड्डा भी कतर में है। साल 2017 में सऊदी अरब ने आतंकवाद का समर्थन करने का आरोप लगाया और 3.5 साल तक कतर की नाकेबंदी की। लेकिन कतर ने सप्लाई चेन को बदलकर इससे बच निकला। इसकी सबसे बड़ी वजन प्राकृतिक गैस है। जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तो यूरोप गैस के लिए कतर की तरफ देखने लगा। कतर ने भी इसका खूब फायदा उठाया। कतर ने साल 2019 में साल 2026 तक एलएनजी निर्यात को 64 फीसदी बढ़ाने के लिए नॉर्थ फील्ड के विस्तार शुरू किया। आज 3.2 लाख नागरिकों वाला देश कतर खुद से 100 गुना बड़े देशों के बराबर शक्ति रखता है।
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