Supreme Court ने न्यायिक अधिकारी की अनुशासनहीनता पर जताई नाराजगी, अवमानना कार्यवाही पर रोक से इनकार
उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि कोई न्यायिक अधिकारी अदालत में न्यायाधीशों पर चीख नहीं सकता। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए मुंबई उच्च न्यायालय द्वारा एक न्यायिक अधिकारी के खिलाफ ‘‘अनुचित आक्रोशपूर्ण व्यवहार’’ को लेकर शुरू की गई अवमानना की कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय अवमानना की कार्यवाही आगे बढ़ा सकता है, लेकिन 28 सितंबर तक इसपर अंतिम फैसला नहीं करेगा।
शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के एक सितंबर के उस आदेश को चुनौती देने वाली न्यायिक अधिकारी की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई, जिसमें उनके खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू की गई थी। जब पीठ ने याचिका पर नोटिस जारी करने की बात कही, तो याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने उच्च न्यायालय में चल रही अवमानना कार्यवाही पर रोक लगाने का अनुरोध किया। पीठ ने कहा, ‘‘एक न्यायिक अधिकारी अदालत में न्यायाधीशों पर चीख नहीं सकता।’’ सिंह ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अदालत में चीखा नहीं था और अदालत के समक्ष बिना शर्त माफी भी मांगी थी।
पीठ ने कहा, ‘‘एक न्यायिक अधिकारी को उच्च न्यायालय से यह कहने का कोई अधिकार नहीं है कि पदों को नहीं भरने के लिए अदालत जिम्मेदार है। उसे अपने शब्दों पर पछतावा होना चाहिए। यह गंभीर अनुशासनहीनता है।’’ शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वह उच्च न्यायालय में वापस जाए और वहां बिना शर्त माफी मांगे।
सिंह ने कहा कि याचिकाकर्ता पहले ही उच्च न्यायालय के समक्ष माफी मांग चुका है और उसका तबादला नक्सल प्रभावित क्षेत्र में कर दिया गया है, जो करीब 1,000 किलोमीटर दूर है। इसके बाद उच्चतम न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख 28 सितंबर तय की। उच्च न्यायालय में यह विवाद त्वरित अदालतों के लिए 179 पदों के सृजन का निर्देश देने का अनुरोध करने वाली अंतरिम याचिका की सुनवाई के दौरान उठा।
उच्च न्यायालय ने पाया था कि राज्य के विधि एवं न्याय विभाग में सचिव और वरिष्ठ कानूनी सलाहकार रहे अधिकारी द्वारा पहले दाखिल किया गया हलफनामा संतोषजनक नहीं था। उच्च न्यायालय ने अपने एक सितंबर के आदेश में कहा था कि उसने अतिरिक्त सरकारी वकील से पूछा था कि अतिरिक्त हलफनामे में कौन-से कथन यह बताते हैं कि त्वरित अदालतों के लिए 179 नए पद सृजित किए गए हैं। उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘हमारे सवाल का जवाब देने के बजाय, हलफनामा देने वाले अधिकारी ने आक्रामक और ऊंची आवाज में बोलना शुरू कर दिया (जो लगभग चीखने जैसा था)।
उन्होंने अन्य बातों के अलावा उच्च न्यायालय प्रशासन को दोषी ठहराया और भरी अदालत में कहा कि ‘179 पदों को नहीं भरने के लिए उच्च न्यायालय प्रशासन जिम्मेदार है’।’’ उच्च न्यायालय ने अधिकारी को नोटिस जारी करके पूछा था कि उनके खिलाफ क्यों नहीं अवमानना की कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए। उच्च न्यायालय ने मामले को 11 सितंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया था।
Tarun Chugh का आरोप, Punjab Police ने जबरन कराया दलित व्यक्ति का अंतिम संस्कार
भाजपा के राज्यसभा सदस्य तरुण चुग ने बृहस्पतिवार को दावा किया कि पंजाब पुलिस ने संगरूर के एक दलित व्यक्ति का अंतिम संस्कार उसके परिवार की इच्छा के विरूद्ध कराया। संगरूर निवासी गुलजार सिंह (47) ने आत्महत्या कर ली थी। चुग ने पंजाब की आम आदमी पार्टी (आप) सरकार पर इस समुदाय के प्रति ‘‘अन्याय की सारी हदें’’ पार करने का आरोप भी लगाया।
संगरूर जिले के दिरबा निवासी सिंह की सोमवार रात कथित तौर पर जहर खाने से मौत हो गई। उनके परिवार का कहना है कि छह सितंबर को दिरबा में हुए एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने (सिंह ने) वित्त मंत्री हरपाल चीमा से इलाके में मादक पदार्थ की आपूर्ति के बारे में सवाल पूछा था। चुग ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में आरोप लगाया कि पुलिस ने जबरदस्ती सिंह का अंतिम संस्कार कराया।
उन्होंने कहा, ‘‘आम आदमी पार्टी का शर्मनाक, धोखेबाज और घिनौना चेहरा एक बार फिर उजागर हो गया है।’’ सांसद ने सिंह के परिवार का एक वीडियो साझा करते हुए कहा, ‘‘भगवंत मान के अयोग्य अधिकारियों ने दावा किया कि दलित मजदूर गुलजार सिंह का अंतिम संस्कार परिवार की सहमति से किया गया था, लेकिन पीड़ित परिवार का आरोप है कि पुलिस ने उनकी मर्जी के खिलाफ जबरदस्ती अंतिम संस्कार कराया।’’ उन्होंने यह भी दावा किया कि सिंह के परिवार को सरकार से उचित मदद या मुआवजा नहीं मिला है। चुग ने कहा कि पंजाब के लोग पूछ रहे हैं कि चीमा को अभी तक बर्खास्त क्यों नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि अरविंद केजरीवाल और गुरु द्रोही भगवंत मान सरकार ने पंजाब में दलितों के साथ अन्याय की सारी हदें पार कर दी हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘पूरा पंजाब पूछ रहा है कि मंत्री हरपाल चीमा को अब तक बर्खास्त क्यों नहीं किया गया है और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में चीमा के खिलाफ कोई मामला क्यों दर्ज नहीं किया गया है।’’ सिंह के आखिरी पलों का एक कथित वीडियो सामने आया है, जिसमें वह चीमा से अपने इलाके में मादक पदार्थ की उपलब्धता के बारे में सवाल पूछते दिख रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनकी मौत के लिए सरपंच जिम्मेदार होगा और यह भी स्वीकार किया कि उनका बेटा भी मादक पदार्थ का सेवन करता था। सिंह का वीडियो वायरल होते ही विपक्षी दलों ने भगवंत मान सरकार से मामले की जांच तथा चीमा के इस्तीफे की मांग की।
सिंह के परिवार की शिकायत के आधार पर, पांच लोगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 108 (आत्महत्या के लिए उकसाने) और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।
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