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Bihar का पानी 30 साल से चोरी! Sanjay Jha ने Bangladesh संधि पर रोक की मांग की

जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने गुरुवार को केंद्र सरकार से अपील की कि वह दिसंबर में खत्म होने वाली बांग्लादेश के साथ गंगा जल-बंटवारे की संधि को रिन्यू न करे। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले तीन दशकों से बिहार के हिस्से का पानी चुराया जा रहा है। 'नीतीश संवाद यात्रा' के पहले चरण के पूरा होने के बाद पार्टी मुख्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए झा ने कहा कि यह मुद्दा बिहार के लिए अहम है और आरोप लगाया कि राज्य को उसके पानी का बड़ा हिस्सा नहीं दिया गया है।
 

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झा ने कहा कि यह मुद्दा राज्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। जहां भारत के राज्य पानी के बंटवारे के मुद्दों पर आपस में कड़ा संघर्ष करते हैं, वहीं बिहार का पानी 30 वर्षों से चुराकर बांग्लादेश भेजा जा रहा है। यात्रा के पहले चरण में बक्सर, भोजपुर, बेगूसराय और खगड़िया जिले शामिल थे। यह यात्रा कटिहार में खत्म होने से पहले गंगा के किनारे बसे 12 ज़िलों से होकर गुज़रेगी। झा, JD(U) के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा और पार्टी के दूसरे नेताओं के साथ, यात्रा के अगले चरण में सारण, पटना, वैशाली, समस्तीपुर, लखीसराय, मुंगेर, भागलपुर और कटिहार का दौरा करेंगे।

राज्यसभा सांसद झा ने कहा कि यात्रा के पहले चरण में पार्टी को "लोगों का ज़बरदस्त समर्थन और भागीदारी" मिली, जिससे पता चलता है कि यह मुद्दा लोगों के बीच ज़ोर पकड़ रहा है। 12 दिसंबर, 1996 को भारत और बांग्लादेश के बीच हुई गंगा जल-बंटवारा संधि, 30 साल का एक समझौता है जो फरक्का बैराज पर सूखे के मौसम में पानी के बहाव के बंटवारे को तय करता है।
 

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झा ने दावा किया कि इस समझौते के तहत, बांग्लादेश को 1 जनवरी से 31 मई के बीच 1,500 क्यूमेक पानी पक्का मिलता है, जबकि इसी मौसम में बिहार के बक्सर में सिर्फ़ 400 क्यूमेक पानी ही पहुँचता है। एक क्यूमेक का मतलब है प्रति सेकंड 1,000 लीटर पानी। उन्होंने आरोप लगाया कि इसका मतलब है कि बिहार का अपना 1,100 क्यूमेक पानी बांग्लादेश चला जाता है। झा ने केंद्र से अपील की कि इस संधि को आगे न बढ़ाया जाए और कहा कि अगर इसे बढ़ाया जाता है, तो 2050 तक राज्य की पानी की अनुमानित जरूरतों को ज़रूर ध्यान में रखा जाना चाहिए।
 
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Supreme Court ने न्यायिक अधिकारी की अनुशासनहीनता पर जताई नाराजगी, अवमानना कार्यवाही पर रोक से इनकार

उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि कोई न्यायिक अधिकारी अदालत में न्यायाधीशों पर चीख नहीं सकता। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए मुंबई उच्च न्यायालय द्वारा एक न्यायिक अधिकारी के खिलाफ ‘‘अनुचित आक्रोशपूर्ण व्यवहार’’ को लेकर शुरू की गई अवमानना की कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय अवमानना की कार्यवाही आगे बढ़ा सकता है, लेकिन 28 सितंबर तक इसपर अंतिम फैसला नहीं करेगा।

शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के एक सितंबर के उस आदेश को चुनौती देने वाली न्यायिक अधिकारी की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई, जिसमें उनके खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू की गई थी। जब पीठ ने याचिका पर नोटिस जारी करने की बात कही, तो याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने उच्च न्यायालय में चल रही अवमानना कार्यवाही पर रोक लगाने का अनुरोध किया। पीठ ने कहा, ‘‘एक न्यायिक अधिकारी अदालत में न्यायाधीशों पर चीख नहीं सकता।’’ सिंह ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अदालत में चीखा नहीं था और अदालत के समक्ष बिना शर्त माफी भी मांगी थी।

पीठ ने कहा, ‘‘एक न्यायिक अधिकारी को उच्च न्यायालय से यह कहने का कोई अधिकार नहीं है कि पदों को नहीं भरने के लिए अदालत जिम्मेदार है। उसे अपने शब्दों पर पछतावा होना चाहिए। यह गंभीर अनुशासनहीनता है।’’ शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वह उच्च न्यायालय में वापस जाए और वहां बिना शर्त माफी मांगे।

सिंह ने कहा कि याचिकाकर्ता पहले ही उच्च न्यायालय के समक्ष माफी मांग चुका है और उसका तबादला नक्सल प्रभावित क्षेत्र में कर दिया गया है, जो करीब 1,000 किलोमीटर दूर है। इसके बाद उच्चतम न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख 28 सितंबर तय की। उच्च न्यायालय में यह विवाद त्वरित अदालतों के लिए 179 पदों के सृजन का निर्देश देने का अनुरोध करने वाली अंतरिम याचिका की सुनवाई के दौरान उठा।

उच्च न्यायालय ने पाया था कि राज्य के विधि एवं न्याय विभाग में सचिव और वरिष्ठ कानूनी सलाहकार रहे अधिकारी द्वारा पहले दाखिल किया गया हलफनामा संतोषजनक नहीं था। उच्च न्यायालय ने अपने एक सितंबर के आदेश में कहा था कि उसने अतिरिक्त सरकारी वकील से पूछा था कि अतिरिक्त हलफनामे में कौन-से कथन यह बताते हैं कि त्वरित अदालतों के लिए 179 नए पद सृजित किए गए हैं। उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘हमारे सवाल का जवाब देने के बजाय, हलफनामा देने वाले अधिकारी ने आक्रामक और ऊंची आवाज में बोलना शुरू कर दिया (जो लगभग चीखने जैसा था)।

उन्होंने अन्य बातों के अलावा उच्च न्यायालय प्रशासन को दोषी ठहराया और भरी अदालत में कहा कि ‘179 पदों को नहीं भरने के लिए उच्च न्यायालय प्रशासन जिम्मेदार है’।’’ उच्च न्यायालय ने अधिकारी को नोटिस जारी करके पूछा था कि उनके खिलाफ क्यों नहीं अवमानना की कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए। उच्च न्यायालय ने मामले को 11 सितंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया था।

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