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मुंबई में 20 बिल्लियों की मौत से सनसनी, काला जादू का शक; FIR दर्ज

मुंबई के चेंबूर इलाके में करीब 20 बिल्लियों की मौत और उनके क्षत-विक्षत शव मिलने से सनसनी फैल गई है. पांजरापोल इलाके में अगस्त से अब तक कई बिल्लियों के गायब होने और मारे जाने की बात सामने आई है. स्थानीय कैट केयरटेकर और सोशल वर्कर रुबीना पठान ने कई बिल्लियों के शव बरामद किए. 4 सितंबर को छह बिल्लियों के क्षत-विक्षत शव मिलने के बाद मामला और गंभीर हो गया. शवों की हालत इतनी भयावह थी कि उनके अंदरूनी अंग तक दिखाई दे रहे थे. अब RCF पुलिस ने अज्ञात आरोपियों के खिलाफ FIR दर्ज कर जांच शुरू कर दी है.

छह बिल्लियों के शव मिलने के बाद बढ़ा शक

4 सितंबर को रुबीना पठान ने पांजरापोल इलाके में छह बिल्लियों के क्षत-विक्षत शव देखे. इसके अगले दिन 5 सितंबर को एक और मरी हुई बिल्ली मिली, जबकि एक बिल्ली का बच्चा गंभीर हालत में मिला. लगातार बिल्लियों के गायब होने और फिर उनके शव मिलने से इलाके में रहने वाले लोगों के बीच डर का माहौल है. स्थानीय लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर बिल्लियों को कौन निशाना बना रहा है और उन्हें इतनी बेरहमी से क्यों मारा जा रहा है.

बिल्लियों की हत्या के पीछे काला जादू का एंगल?

इस पूरे मामले में अब काले जादू का एंगल भी चर्चा में है. स्थानीय लोगों को शक है कि कहीं बिल्लियों की हत्या किसी तांत्रिक गतिविधि या अंधविश्वास से जुड़ी तो नहीं है. कुछ लोगों की आशंका है कि किसी अघोरी या तांत्रिक गतिविधि के लिए बिल्लियों को निशाना बनाया जा रहा हो सकता है. हालांकि अभी तक पुलिस जांच में ऐसा कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है, जिससे बिल्लियों की हत्या और काले जादू के बीच सीधा संबंध साबित हो सके. ऐसे में यह फिलहाल जांच का एक संभावित एंगल ही है.

काले जादू में बिल्लियों को लेकर क्या मान्यताएं हैं?

कुछ तांत्रिक मान्यताओं और अंधविश्वासों में बिल्लियों को रहस्यमयी शक्तियों से जोड़कर देखा जाता है. खासकर काली बिल्ली को लेकर अलग-अलग इलाकों में कई तरह की मान्यताएं मौजूद हैं. इसी अंधविश्वास के चलते कुछ लोग बिल्ली के शरीर के अंगों को कथित तांत्रिक क्रियाओं में इस्तेमाल किए जाने की बात मानते हैं. कथित तौर पर वशीकरण, शत्रु बाधा, बदला लेने या किसी व्यक्ति को डराने के लिए भी जानवरों का इस्तेमाल किए जाने की     बातें सामने आती रही हैं. हालांकि इन मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है.

पुलिस ने दर्ज की FIR, CCTV से आरोपी की तलाश

9 सितंबर को शिकायत मिलने के बाद RCF पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज की गई. फिलहाल इस मामले में आरोपी   की पहचान नहीं हो पाई है. पुलिस आसपास लगे CCTV कैमरों की फुटेज खंगाल रही है और दूसरे सुरागों के जरिए आरोपी तक पहुंचने की कोशिश कर रही है. पुलिस के सामने चुनौती यह पता लगाने की भी है कि बिल्लियों को किस तरीके से निशाना बनाया गया और इन घटनाओं के पीछे असली मकसद क्या था.

पशु क्रूरता कानून के तहत मामला दर्ज

मामले में भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 325 और Prevention of Cruelty to Animals Act की धारा 11(1)(a) और 11(1)(l) के तहत FIR दर्ज की गई है. BNS की धारा 325 किसी जानवर को मारने, जहर देने, घायल करने या उसे बेकार कर देने से जुड़े अपराध को कवर करती है. इस धारा में पांच साल तक की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है.

50 हजार के इनाम का ऐलान किया

मामले की गंभीरता को देखते हुए पशु अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था PETA India भी जांच में मदद कर रही है. PETA India ने उस व्यक्ति या व्यक्तियों की जानकारी देने वाले को 50 हजार रुपये तक का इनाम देने का ऐलान किया है, जिसकी जानकारी से आरोपी की गिरफ्तारी और दोषसिद्धि हो सके. संस्था ने लोगों से अपील की है कि अगर किसी के पास इस घटना से जुड़ी जानकारी है तो वह सामने आए. जानकारी देने वाले की पहचान गोपनीय रखने की बात कही गई है.

काला जादू या कोई और वजह, जांच के बाद खुलेगा राज

करीब 20 बिल्लियों की मौत के बाद अब पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इन बेजुबान जानवरों को कौन और क्यों निशाना बना रहा है. क्या इसके पीछे काला जादू या कोई तांत्रिक गतिविधि है, किसी व्यक्ति की रंजिश है या फिर कोई सनकी आरोपी लगातार बिल्लियों को निशाना बना रहा है? फिलहाल इसका जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा. पुलिस CCTV और दूसरे सुरागों के जरिए आरोपी तक पहुंचने में जुटी है. एक बात साफ है कि किसी भी अंधविश्वास या मकसद के नाम पर बेजुबान जानवरों के साथ इस तरह की क्रूरता को सही नहीं ठहराया जा सकता.ग लापता हैं.

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Explainer: न सुपर ओवर, न बाउंड्री काउंट..., जानें दलीप ट्रॉफी का वो 'अनोखा नियम' जिससे बिना मैच जीते चैंपियन बनी ईशान किशन की टीम!

टेस्ट क्रिकेट फॉर्मेट में कोई मैच पूरे 5 दिन तक खेला जाए और अंत में बिना किसी ठोस नतीजे के ड्रॉ पर छूटे, लेकिन चैंपियन का फैसला सिर्फ इस बात से हो कि किसने पहली पारी में ज्यादा रन बनाए थे, यह सुनने में थोड़ा अजीब और दूसरी टीम के साथ नाइंसाफी लग सकता है. लेकिन भारतीय घरेलू क्रिकेट के सबसे प्रतिष्ठित टूर्नामेंट्स में से एक, 'दलीप ट्रॉफी' का नियम यही है. दलीप ट्रॉफी के पांच दिवसीय नॉकआउट और फाइनल मुकाबलों के लिए बीसीसीआई का एक ऐतिहासिक नियम है. इसके तहत, अगर मैच ड्रॉ पर समाप्त होता है, तो विजेता का फैसला 'पहली पारी की बढ़त' के आधार पर किया जाता है. यानी जो भी टीम अपनी पहली पारी में विपक्षी टीम से एक भी रन ज्यादा बना लेती है, मैच ड्रॉ होने के बावजूद उसे ही आधिकारिक तौर पर चैंपियन घोषित कर दिया जाता है. अब साउथ जोन के खिलाफ खेला गया फाइनल मुकाबला ड्रॉ रहने के बावजूद ईस्ट जोन की टीम चैंपियन बन गई है और उसने अपने 13 साल के खिताबी सूखे को खत्म किया है. तो आइए, इस आर्टिकल में जानते हैं कि दलीप ट्रॉफी का यह अनोखा नियम आखिर क्या है, इतिहास में कब-कब इसके फाइनल मैच ड्रॉ हुए और किस तरह टीमों ने पहली पारी की बढ़त लेकर चमचमाती ट्रॉफी पर कब्जा जमाया. 

क्या है दलीप ट्रॉफी का यह 'अनोखा नियम'?

क्रिकेट प्रेमी अक्सर सीमित ओवरों के फॉर्मेट (वनडे या T20) में सुपर ओवर या बाउंड्री काउंट जैसे रोमांचक नियम देखने के आदी होते हैं. लेकिन जब बात फर्स्ट-क्लास क्रिकेट यानी रेड बॉल से खेले जाने वाले 5-दिवसीय फाइनल मुकाबलों की आती है, तो यहां की कहानी और नियम बिल्कुल अलग हो जाते हैं.

बीसीसीआई के घरेलू क्रिकेट नियमों के मुताबिक, अगर दलीप ट्रॉफी का फाइनल मैच पूरे 5 दिन खेलने के बाद भी किसी सीधे नतीजे तक नहीं पहुंच पाता और ड्रॉ पर समाप्त होता है, तो दोनों टीमों की पहली पारी के स्कोर्स की तुलना की जाती है. इस स्थिति में, जिस टीम ने भी पहली पारी में बढ़त हासिल की होती है, वह मैच को बिना जीते भी आधिकारिक तौर पर विजेता बन जाती है.

यही वजह है कि इस फॉर्मेट में टीमें टॉस जीतते ही बिना किसी हिचकिचाहट के पहले बल्लेबाजी चुनती हैं. उनकी रणनीति बोर्ड पर रनों का एक ऐसा 'एवरेस्ट' खड़ा करने की होती है, जिसके दबाव में आकर विरोधी टीम अपनी पहली पारी में ही बिखर जाए और मैच ड्रॉ होने की स्थिति में भी बढ़त का यह जादुई फायदा विरोधी के हाथ न लग सके. 

दलीप ट्रॉफी के इतिहास में कब-कब फाइनल हुआ ड्रॉ और कौन बना चैंपियन?

ईस्ट जोन बनाम साउथ जोन 2026–27: चेन्नई के चेपॉक मैदान पर खेले गए इस फाइनल में ईस्ट जोन ने रनों का ऐसा एवरेस्ट खड़ा किया कि साउथ जोन उसके नीचे दब गई. ईशान किशन के 270 रनों के दम पर ईस्ट जोन ने पहली पारी में 708 रन बनाए और मैच ड्रॉ होने पर 372 रनों की भारी-भरकम बढ़त के आधार पर खिताब अपने नाम कर ली.

ईस्ट जोन बनाम सेंट्रल जोन 2012-13: चेन्नई में खेला गया यह फाइनल मुकाबला भी ड्रॉ रहा था, जहां ईस्ट जोन ने पहली पारी में बढ़त (232 बनाम 189 रन) बनाकर लगातार दूसरी बार दलीप ट्रॉफी का खिताब अपने नाम कर लिया था. 

नॉर्थ जोन और वेस्ट जोन 1999-2000: कोलकाता के ऐतिहासिक ईडन गार्डन्स में नॉर्थ जोन और वेस्ट जोन के बीच खेला गया यह खिताबी मुकाबला जब ड्रॉ हुआ, तो फैसला पहली पारी के आधार पर हुआ. नॉर्थ जोन ने अपनी पहली पारी में 101 रनों की महत्वपूर्ण लीड लेकर ट्रॉफी अपने नाम कर ली थी. 

1981-82, 1983-84, 1986-87 और 1987-88: दलीप ट्रॉफी के इतिहास में यह नियम दशकों पुराना है। इन सभी सीजनों में खिताबी जंग ड्रॉ पर खत्म हुई थी, जहां वेस्ट जोन, नॉर्थ जोन और साउथ जोन ने पहली पारी की बढ़त के आधार पर चैंपियनशिप अपने नाम की थी.

दलीप ट्रॉफी इतिहास में सिर्फ एक बार दोनों टीमें बनीं 'संयुक्त विजेता'

दलीप ट्रॉफी के 60 से अधिक सालों के इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं, जब दिग्गज खिलाड़ियों से सजी टीमों के बीच खिताबी जंग ड्रॉ पर समाप्त हुए. ऐसे में क्रिकेट फैंस के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि अगर खराब मौसम या किसी और कारणों से फाइनल मैच में दोनों टीमों की पहली पारी भी पूरी न हो पाए, तब विजेता का फैसला कैसे होता है? इस अनोखे और पेचीदा सवाल का जवाब हमें इतिहास के पन्नों में मिलता है. ऐसा ही एक बेहद दिलचस्प और हैरान कर देने वाला वाकया साल 2013-14 के दलीप ट्रॉफी फाइनल में देखने को मिला था, जब कोच्चि के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में नॉर्थ जोन और साउथ जोन की टीमें खिताबी भिड़ंत के लिए आमने-सामने थीं. 

उस मुकाबले में लगातार खराब मौसम और भारी बारिश के कारण खेल में इतनी रुकावट आई कि दोनों ही टीमें अपनी-अपनी पहली पारी का खेल भी पूरा नहीं कर सकीं. जब पहली पारी की बढ़त का गणित लगाने का भी मौका नहीं बचा, तब बीसीसीआई को एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लेना पड़ा. क्रिकेट के स्थापित नियमों के तहत, जब पहली पारी के आधार पर भी विजेता तय करना नामुमकिन हो गया, तब उस साल नॉर्थ जोन और साउथ जोन दोनों को 'संयुक्त विजेता' घोषित किया गया. आखिरकार चमचमाती ट्रॉफी दोनों टीमों के बीच आपस में बांटी गई, जो दलीप ट्रॉफी के इतिहास के सबसे अनोखे पन्नों में दर्ज हो गई. 

क्या खेल के भावना के खिलाफ है यह नियम? 

घरेलू क्रिकेट सीजन के दौरान कई बार क्रिकेट फैंस और खेल विशेषज्ञ इस नियम की तीखी आलोचना भी करते हैं. उनका मानना है कि इस नियम की वजह से फाइनल जैसे बड़े और खिताबी मैचों का रोमांच कम हो जाता है, क्योंकि टीमें बेहद धीमी और रक्षात्मक बल्लेबाजी करने लगती हैं. इतना ही नहीं, कई बार मेजबान टीमें पिच को पूरी तरह से सपाट तैयार करवा देती हैं, ताकि विकेट ही न गिरें और मैच ड्रॉ की तरफ बढ़ जाए.

हालांकि, खेल के जानकारों का एक दूसरा तर्क यह भी है कि 5 दिनों के खेल में दोनों टीमों की चारों पारियां पूरी होना और एक सीधा नतीजा निकालना हमेशा मुमकिन नहीं होता. ऐसे में, जो टीम मैच के शुरुआती तीन दिनों में शानदार खेल दिखाकर पहली पारी में हावी रहती है, उसे उसकी कड़ी मेहनत और निरंतरता का इनाम मिलना ही चाहिए. यही वजह है कि रणजी ट्रॉफी और दलीप ट्रॉफी जैसे बड़े और प्रतिष्ठित रेड-बॉल टूर्नामेंट्स में 'पहली पारी की बढ़त' के इस नियम को सबसे निष्पक्ष और व्यावहारिक विकल्प माना जाता है.

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