पश्चिम बंगाल का जादवपुर विश्वविद्यालय एक बार फिर राज्य की तेज होती राजनीतिक और वैचारिक लड़ाई का अखाड़ा बन गया है। बुधवार को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी ने गोलपार्क से जादवपुर विश्वविद्यालय के गेट तक करीब तीन किलोमीटर लंबी ‘गेरुआ सम्मान यात्रा’ निकालकर राष्ट्रविरोधी नारों और ताकतों के खिलाफ बेहद कड़ा रुख अपनाया। साधु-संतों, संन्यासियों और बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ निकली इस यात्रा में ‘जय श्रीराम’ के नारे गूंजते रहे और अधिकारी स्वयं भगवा वस्त्र तथा गेरुआ ध्वज लेकर आगे चलते दिखाई दिए।
विश्वविद्यालय के बाहर सभा को संबोधित करते हुए शुभेन्दु अधिकारी ने कहा कि जादवपुर जैसी प्रतिष्ठित संस्था में ‘कश्मीर मांगे आजादी’ और माओवादी नेता किशनजी के समर्थन में लगाए जाने वाले नारों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि उन्होंने ऐसे तत्वों को “उखाड़ फेंकने” का संकल्प लिया है। शुभेन्दु अधिकारी ने कहा कि जादवपुर विश्वविद्यालय श्री अरविंद की भूमि और उत्कृष्टता का केंद्र है। उनका कहना था कि पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री अच्छी तरह जानता है कि विश्वविद्यालय परिसर से ‘कश्मीर मांगे आजादी’ और ‘लाल सलाम टू किशनजी’ जैसे नारों को कैसे खत्म किया जाए। हम आपको बता दें कि किशनजी शीर्ष माओवादी नेताओं में शामिल था और 2011 में पश्चिम मेदिनीपुर में पुलिस मुठभेड़ में मारा गया था।
मुख्यमंत्री ने गेरुआ रंग के अपमान को भी मुद्दा बनाया। उन्होंने कहा कि अब भगवा रंग के प्रति किसी भी कथित अपमान को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। शुभेन्दु अधिकारी ने घोषणा की कि वह जादवपुर दोबारा आएंगे, एक बार गीता पाठ करने और दूसरी बार हनुमान चालीसा का पाठ करने के लिए। उन्होंने लोगों से जादवपुर विश्वविद्यालय में तीन दिवसीय वैदिक पाठ कार्यक्रम में शामिल होने की अपील भी की। सभा में शुभेन्दु अधिकारी ने कहा कि यह स्वामी विवेकानंद की धरती है और यहां गेरुआ बना रहेगा। उन्होंने मौजूद लोगों से पूछा कि क्या वे ऐसी ताकतों के खिलाफ खड़े होने के लिए तैयार हैं।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को केवल नारों के विवाद तक सीमित करके देखना मुश्किल है। जादवपुर विश्वविद्यालय लंबे समय से बंगाल की वामपंथी छात्र राजनीति का मजबूत गढ़ रहा है। हाल के दिनों में वामपंथी छात्र संगठनों और आरएसएस से जुड़े अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के बीच टकराव और नारेबाजी ने परिसर का माहौल और अधिक तनावपूर्ण कर दिया है। विवाद की शुरुआत आधी रात परिसर में हुए हंगामे और झड़प से हुई, जिसमें वामपंथी छात्रों तथा कथित ABVP समर्थकों के बीच टकराव की बात सामने आई। हम आपको यह भी बता दें कि शुभेन्दु अधिकारी ने सामान्य राजनीतिक नारों और सरकार की नीतियों की आलोचना को लोकतांत्रिक अधिकार के दायरे में रखने की बात भी कही है। उनका निशाना विशेष रूप से उन नारों पर है जो देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय एकता के खिलाफ मानते हैं।
इसी विवाद के बीच राज्य सरकार द्वारा उच्च शिक्षा से संबंधित एक नए विधेयक की तैयारी की खबर ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया है। सूत्रों के अनुसार प्रस्तावित विधेयक में कॉलेज और विश्वविद्यालय के शिक्षकों के स्थानांतरण से संबंधित प्रावधान हो सकते हैं। वामपंथी विपक्ष ने इसे सरकार की दबाव की राजनीति बताते हुए सवाल उठाया है। स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) के राष्ट्रीय अध्यक्ष सृजन भट्टाचार्य ने आरोप लगाया कि सरकार विश्वविद्यालय के शिक्षकों को उनकी वैचारिक स्थिति के कारण निशाना बनाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि जादवपुर विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रहा है और उसकी बजाय सरकार “गेरुआ राजनीति” को बढ़ावा दे रही है। उन्होंने इस रणनीति के सफल नहीं होने का दावा किया।
देखा जाये तो शुभेन्दु अधिकारी का यह शक्ति प्रदर्शन ऐसे समय हुआ है जब करीब दो सप्ताह पहले वह जादवपुर विश्वविद्यालय के बाहर हुए एक बड़े कार्यक्रम में शामिल हुए थे, जिसमें लगभग 10,000 लोगों ने राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ का पूर्ण संस्करण गाया था। उस कार्यक्रम में शुभेन्दु अधिकारी ने CPI(M) नेतृत्व वाले वाम मोर्चे और तृणमूल कांग्रेस, दोनों पर सार्वजनिक जीवन से राष्ट्रवाद की भावना कमजोर करने का आरोप लगाया था।
इस यात्रा ने साफ कर दिया कि जादवपुर विश्वविद्यालय अब बंगाल की व्यापक राजनीतिक लड़ाई का एक प्रमुख प्रतीक बन चुका है। एक तरफ वामपंथी छात्र राजनीति अपने वैचारिक प्रभाव को बनाए रखने की कोशिश में है, तो दूसरी तरफ भाजपा और उससे जुड़े संगठन परिसर में राष्ट्रवाद, भगवा प्रतीक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर खुलकर मैदान में उतर चुके हैं।
बहरहाल, ‘कश्मीर मांगे आजादी’, ‘फ्री फिलिस्तीन’ और किशनजी के समर्थन जैसे नारों पर मुख्यमंत्री का कड़ा रुख आने वाले दिनों में इस बहस को और तीखा कर सकता है। जादवपुर की दीवारों पर लिखे नारों से शुरू हुआ विवाद अब विश्वविद्यालय की राजनीति से निकलकर राष्ट्रवाद बनाम वैचारिक स्वतंत्रता, परिसर की स्वायत्तता बनाम राजनीतिक हस्तक्षेप और बंगाल की बदलती राजनीतिक संस्कृति की बड़ी बहस में बदलता दिखाई दे रहा है।
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महाराष्ट्र में भाजपा के एक स्थानीय विधायक और अन्य राजनेताओं ने कम बारिश होने के साथ पेयजल और मवेशियों के चारे को लेकर बढ़ती चिंताओं का हवाला देते हुए राज्य सरकार से लातूर जिले और मराठवाड़ा के अन्य क्षेत्रों में सूखा घोषित करने की अपील की है। लातूर ग्रामीण के विधायक रमेश कराड ने बुधवार को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को ज्ञापन सौंपकर तत्काल सूखा घोषित करने और लंबे समय से बारिश न होने से प्रभावित किसानों के लिए राहत संबंधी कदम उठाने की मांग की। उन्होंने बताया कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाली सोयाबीन और गन्ने की फसलें बारिश की कमी के कारण गंभीर संकट का सामना कर रही हैं।
कराड ने दावा किया, ‘‘किसान पहले ही बीज, उर्वरक, कीटनाशक, कृषि कार्यों और मजदूरी पर भारी रकम खर्च कर चुके हैं। अब वे अपनी पूरी पूंजी डूबने की आशंका का सामना कर रहे हैं।’’
इस स्थिति ने पानी और चारे की उपलब्धता को लेकर भी चिंताएं बढ़ा दी हैं। नदियां, झीलें और कुएं धीरे-धीरे सूख रहे हैं।
साथ ही भूजल का गिरता स्तर आने वाले हफ्तों में लोगों और मवेशियों के लिए पेयजल को लेकर समस्या खड़ी कर सकता है। उन्होंने सरकार से तुरंत फसल नुकसान का आकलन करने, मौजूदा पानी और चारे की स्थिति की समीक्षा करने तथा लातूर ग्रामीण और सूखे से प्रभावित मराठवाड़ा के अन्य क्षेत्रों के लिए सूखा राहत की घोषणा करने का आग्रह किया। लातूर के पूर्व विधायक और भाजपा नेता शिवाजीराव पाटिल कवेकर ने भी मुख्यमंत्री से जिले और मराठवाड़ा में सूखा घोषित करने तथा किसानों को ठोस वित्तीय सहायता प्रदान करने का आग्रह किया।
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