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Supreme Court ने अभिषेक बनर्जी के PA सुमित रॉय की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज की

नयी दिल्ली, नौ सितंबर उच्चतम न्यायालय ने तृणमूल कांग्रेस नेता अभिषेक बनर्जी के निजी सहायक सुमित रॉय की सालबोनी जमीन घोटाला मामले में अग्रिम जमानत याचिका बृहस्पतिवार को खारिज कर दी। आरोप हैं कि पश्चिम बंगाल की सरकारी जमीन को कथित तौर पर बेच दिया गया और बिक्री से मिली रकम पार्टी के खाते में जमा कराई गई। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने छह अगस्त के अपने उस पुराने आदेश को भी वापस ले लिया, जिसमें रॉय की गिरफ्तारी पर रोक लगाई गई थी।

न्यायालय के इस आदेश के बाद अब सुमित रॉय को हिरासत में लेकर पूछताछ के लिए गिरफ्तार किया जा सकता है। पीठ ने रॉय की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन और राज्य सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलें सुनने के बाद रॉय को राहत देने से इनकार कर दिया। इससे पहले तीन अगस्त को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कथित सरकारी जमीन घोटाला मामले में रॉय की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी।

इस मामले की जांच सालबोनी पुलिस कर रही है। मामला धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी, जाली दस्तावेजों के इस्तेमाल और आपराधिक साजिश से संबंधित धाराओं के तहत दर्ज किया गया है। सॉलिसिटर जनरल ने अंतरिम राहत का कड़ा विरोध करते हुए कहा था कि मामले की जांच के लिए रॉय को हिरासत में लेकर पूछताछ करना जरूरी है।

न्यायमूर्ति तीर्थंकर घोष की अध्यक्षता वाली उच्च न्यायालय की पीठ ने रॉय को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया था। राज्य सरकार के वकील ने उच्च न्यायालय को बताया था कि जांच के दौरान सरकारी जमीन से संबंधित फर्जी स्वामित्व दस्तावेज (टाइटल डीड) सामने आए हैं। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि स्थानीय नेताओं और प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत से सरकारी जमीन का हस्तांतरण किया गया था।

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भारत और भगवा का अपमान बर्दाश्त नहीं, Gerua Samman Yatra के दौरान राष्ट्रविरोधी तत्वों पर जमकर बरसे Suvendu Adhikari

पश्चिम बंगाल का जादवपुर विश्वविद्यालय एक बार फिर राज्य की तेज होती राजनीतिक और वैचारिक लड़ाई का अखाड़ा बन गया है। बुधवार को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी ने गोलपार्क से जादवपुर विश्वविद्यालय के गेट तक करीब तीन किलोमीटर लंबी ‘गेरुआ सम्मान यात्रा’ निकालकर राष्ट्रविरोधी नारों और ताकतों के खिलाफ बेहद कड़ा रुख अपनाया। साधु-संतों, संन्यासियों और बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ निकली इस यात्रा में ‘जय श्रीराम’ के नारे गूंजते रहे और अधिकारी स्वयं भगवा वस्त्र तथा गेरुआ ध्वज लेकर आगे चलते दिखाई दिए।

विश्वविद्यालय के बाहर सभा को संबोधित करते हुए शुभेन्दु अधिकारी ने कहा कि जादवपुर जैसी प्रतिष्ठित संस्था में ‘कश्मीर मांगे आजादी’ और माओवादी नेता किशनजी के समर्थन में लगाए जाने वाले नारों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि उन्होंने ऐसे तत्वों को “उखाड़ फेंकने” का संकल्प लिया है। शुभेन्दु अधिकारी ने कहा कि जादवपुर विश्वविद्यालय श्री अरविंद की भूमि और उत्कृष्टता का केंद्र है। उनका कहना था कि पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री अच्छी तरह जानता है कि विश्वविद्यालय परिसर से ‘कश्मीर मांगे आजादी’ और ‘लाल सलाम टू किशनजी’ जैसे नारों को कैसे खत्म किया जाए। हम आपको बता दें कि किशनजी शीर्ष माओवादी नेताओं में शामिल था और 2011 में पश्चिम मेदिनीपुर में पुलिस मुठभेड़ में मारा गया था।

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मुख्यमंत्री ने गेरुआ रंग के अपमान को भी मुद्दा बनाया। उन्होंने कहा कि अब भगवा रंग के प्रति किसी भी कथित अपमान को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। शुभेन्दु अधिकारी ने घोषणा की कि वह जादवपुर दोबारा आएंगे, एक बार गीता पाठ करने और दूसरी बार हनुमान चालीसा का पाठ करने के लिए। उन्होंने लोगों से जादवपुर विश्वविद्यालय में तीन दिवसीय वैदिक पाठ कार्यक्रम में शामिल होने की अपील भी की। सभा में शुभेन्दु अधिकारी ने कहा कि यह स्वामी विवेकानंद की धरती है और यहां गेरुआ बना रहेगा। उन्होंने मौजूद लोगों से पूछा कि क्या वे ऐसी ताकतों के खिलाफ खड़े होने के लिए तैयार हैं।

हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को केवल नारों के विवाद तक सीमित करके देखना मुश्किल है। जादवपुर विश्वविद्यालय लंबे समय से बंगाल की वामपंथी छात्र राजनीति का मजबूत गढ़ रहा है। हाल के दिनों में वामपंथी छात्र संगठनों और आरएसएस से जुड़े अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के बीच टकराव और नारेबाजी ने परिसर का माहौल और अधिक तनावपूर्ण कर दिया है। विवाद की शुरुआत आधी रात परिसर में हुए हंगामे और झड़प से हुई, जिसमें वामपंथी छात्रों तथा कथित ABVP समर्थकों के बीच टकराव की बात सामने आई। हम आपको यह भी बता दें कि शुभेन्दु अधिकारी ने सामान्य राजनीतिक नारों और सरकार की नीतियों की आलोचना को लोकतांत्रिक अधिकार के दायरे में रखने की बात भी कही है। उनका निशाना विशेष रूप से उन नारों पर है जो देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय एकता के खिलाफ मानते हैं।

इसी विवाद के बीच राज्य सरकार द्वारा उच्च शिक्षा से संबंधित एक नए विधेयक की तैयारी की खबर ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया है। सूत्रों के अनुसार प्रस्तावित विधेयक में कॉलेज और विश्वविद्यालय के शिक्षकों के स्थानांतरण से संबंधित प्रावधान हो सकते हैं। वामपंथी विपक्ष ने इसे सरकार की दबाव की राजनीति बताते हुए सवाल उठाया है। स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) के राष्ट्रीय अध्यक्ष सृजन भट्टाचार्य ने आरोप लगाया कि सरकार विश्वविद्यालय के शिक्षकों को उनकी वैचारिक स्थिति के कारण निशाना बनाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि जादवपुर विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रहा है और उसकी बजाय सरकार “गेरुआ राजनीति” को बढ़ावा दे रही है। उन्होंने इस रणनीति के सफल नहीं होने का दावा किया।

देखा जाये तो शुभेन्दु अधिकारी का यह शक्ति प्रदर्शन ऐसे समय हुआ है जब करीब दो सप्ताह पहले वह जादवपुर विश्वविद्यालय के बाहर हुए एक बड़े कार्यक्रम में शामिल हुए थे, जिसमें लगभग 10,000 लोगों ने राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ का पूर्ण संस्करण गाया था। उस कार्यक्रम में शुभेन्दु अधिकारी ने CPI(M) नेतृत्व वाले वाम मोर्चे और तृणमूल कांग्रेस, दोनों पर सार्वजनिक जीवन से राष्ट्रवाद की भावना कमजोर करने का आरोप लगाया था।

इस यात्रा ने साफ कर दिया कि जादवपुर विश्वविद्यालय अब बंगाल की व्यापक राजनीतिक लड़ाई का एक प्रमुख प्रतीक बन चुका है। एक तरफ वामपंथी छात्र राजनीति अपने वैचारिक प्रभाव को बनाए रखने की कोशिश में है, तो दूसरी तरफ भाजपा और उससे जुड़े संगठन परिसर में राष्ट्रवाद, भगवा प्रतीक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर खुलकर मैदान में उतर चुके हैं।

बहरहाल, ‘कश्मीर मांगे आजादी’, ‘फ्री फिलिस्तीन’ और किशनजी के समर्थन जैसे नारों पर मुख्यमंत्री का कड़ा रुख आने वाले दिनों में इस बहस को और तीखा कर सकता है। जादवपुर की दीवारों पर लिखे नारों से शुरू हुआ विवाद अब विश्वविद्यालय की राजनीति से निकलकर राष्ट्रवाद बनाम वैचारिक स्वतंत्रता, परिसर की स्वायत्तता बनाम राजनीतिक हस्तक्षेप और बंगाल की बदलती राजनीतिक संस्कृति की बड़ी बहस में बदलता दिखाई दे रहा है।

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