बुक रिव्यू- भारतीय राजनीति में लोहिया का योगदान:आजादी की लड़ाई से लेकर समाजवादी आंदोलन तक, लोहिया को समझने के लिए पढ़ें ये किताब
किताब: लोहिया (एक प्रामाणिक जीवनी) लेखक: ओंकार शरद प्रकाशक: लोकभारती मूल्य: 175 रुपए भारत की राजनीति में कुछ नेता ऐसे रहे हैं, जिन्हें उनके समय से कहीं ज्यादा बाद की पीढ़ियों ने समझने की कोशिश की। डॉ. राममनोहर लोहिया उन्हीं में से एक हैं। वे भारतीय राजनीति, समाज और लोकतंत्र को अपने अलग नजरिए से देखने वाले विचारक थे। लेखक ओंकार शरद की किताब ‘लोहिया एक प्रामाणिक जीवनी’ उनके व्यक्तित्व और विचारधारा को समझाने की कोशिश करती है। ओंकार शरद की किताब लोहिया के बचपन से शुरू होकर उनकी शिक्षा, गांधी से संबंध, स्वतंत्रता आंदोलन, जेल-यात्रा, समाजवादी राजनीति, जाति-विरोधी विचार, गैर-कांग्रेसवाद और उनके अंतिम दौर तक जाती है। किताब की खासियत किताब की खासियत यह है कि इसमें लोहिया के बड़े राजनीतिक विचारों के साथ उनके निजी स्वभाव और जीवन के छोटे-छोटे प्रसंग भी हैं। जैसेकि- बचपन में उनका स्वभाव, पढ़ाई के प्रति उनका दृष्टिकोण, विदेश में बने अंग्रेज मित्रों से संबंध, जेल में यातना और अंतिम दिनों की बेचैनी। ओंकार ने डॉ. लोहिया के जीवन को करीब से देखा है। वे उनके सहयोगी भी रहे हैं। उन्होंने किताब में लोहिया के जीवन के अलग-अलग दौर को अलग अध्यायों में क्रमबद्ध किया है- ग्राफिक में लोहिया के जीवन के प्रमुख पड़ाव देखिए- अन्याय के खिलाफ खड़े होने वाला स्वभाव लोहिया सामान्य परिवार से थे। लेकिन बचपन से ही उनके व्यक्तित्व में असाधारण जिद और संवेदनशीलता दिखाई देने लगी थी। किताब में उनके बचपन के कई प्रसंग आते हैं, जिनसे पता चलता है कि वे अन्याय को चुपचाप स्वीकार करने वालों में नहीं थे। बचपन में ही वे कमजोर पर होने वाले अत्याचार को लेकर बेचैन हो जाते थे। स्कूल के दिनों में भी उनका व्यवहार दूसरे बच्चों से अलग था। खेल, शरारत और पढ़ाई के बीच उनका व्यक्तित्व धीरे-धीरे तर्क, सवाल और विरोध की तरफ बढ़ रहा था। मां के निधन के बाद दादी और परिवार की दूसरी महिलाओं ने उनका पालन-पोषण किया। पिता हीरालाल का भी उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। आगे चलकर यही पारिवारिक संस्कार उनके भीतर निर्भीकता और सामाजिक बराबरी की भावना को मजबूत करते हैं। शिक्षा के साथ राजनीति की समझ लोहिया उच्च शिक्षा के लिए विदेश गए। किताब का ‘लंदन नहीं, बर्लिन’ अध्याय इस दौर को खास तरीके से सामने रखता है। आर्थिक परिस्थितियां आसान नहीं थीं, फिर भी वे विदेश जाकर पढ़ाई पूरी करने के लिए निकले। बर्लिन में रहते हुए लोहिया ने केवल पढ़ाई नहीं की, बल्कि यूरोप में चल रहे राजनीतिक बदलावों को भी करीब से देखा। जर्मनी में हिटलर के उभार का दौर था। इसी समय उनके सामने यह सवाल भी था कि जिस देश में वे पढ़ रहे हैं, वहां बढ़ती तानाशाही आगे क्या रूप लेगी। किताब के अनुसार लोहिया ने ‘नमक सत्याग्रह’ पर अपना शोध-प्रबंध पूरा किया और डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की। लेकिन जर्मनी में बदलते राजनीतिक माहौल ने उन्हें वहां रुकने नहीं दिया। यह प्रसंग बताता है कि उनके लिए शिक्षा केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं थी। इसके साथ ही देश और समाज के सवाल भी लगातार उनके साथ चलते रहे। गांधी से प्रभावित, लेकिन अंध-समर्थक नहीं लोहिया के राजनीतिक जीवन को गांधी से अलग करके समझना मुश्किल है। किताब में गांधी और लोहिया के संबंधों को कई प्रसंगों के जरिए सामने लाया गया है। लोहिया गांधी के सत्याग्रह, अहिंसा और जन-आधारित राजनीति से प्रभावित थे। लेकिन वे गांधी के हर राजनीतिक फैसले से सहमत हों, ऐसा नहीं था। यही उनकी खासियत भी थी। वे सम्मान करते हुए असहमति जताने का साहस रखते थे। किताब में गांधी के साथ उनके संवाद और स्वतंत्रता आंदोलन को लेकर उनके विचारों से यह स्पष्ट होता है कि लोहिया गांधी को केवल नेता नहीं, बल्कि नैतिक शक्ति के रूप में देखते थे। वहीं कांग्रेस नेतृत्व की नीतियों को लेकर वे लगातार सवाल उठाते रहे। ग्राफिक में किताब की 10 खास बातें देखिए- जेल, यातना और संघर्ष लोहिया की राजनीतिक यात्रा का सबसे कठिन दौर 1942 का ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ था। अंग्रेजी सरकार के खिलाफ आंदोलन में उनकी भूमिका सक्रिय थी। वे अंडरग्राउंड रहे, गिरफ्तार हुए और जेल में उन्हें कठोर यातनाएं दी गईं। किताब में लाहौर किले की जेल का वर्णन बेहद प्रभावशाली है। वहां पूछताछ और यातनाओं के बीच लोहिया को मानसिक और शारीरिक दबाव से तोड़ने की कोशिश की गई। लेकिन उन्होंने अपने विचारों से समझौता नहीं किया। जेल में यातना के बीच वे योग और आत्म-अनुशासन का सहारा लेते थे। वे दर्द को केवल सहते नहीं थे, बल्कि उसे समझने और उसके ऊपर मानसिक नियंत्रण पाने की कोशिश करते थे। लोहिया के लिए जेल स्वतंत्रता आंदोलन का केवल एक अध्याय नहीं थी। जेल उनके राजनीतिक चरित्र की परीक्षा थी। आजादी के बाद भी संघर्ष खत्म नहीं हुआ 1947 में देश आजाद हुआ, लेकिन लोहिया के लिए संघर्ष खत्म नहीं हुआ। किताब का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह आजादी के बाद के लोहिया को भी उतनी ही गंभीरता से देखती है। वे कांग्रेस के भीतर की राजनीति और सत्ता के केंद्रीकरण से संतुष्ट नहीं थे। उनका मानना था कि आजादी का मतलब केवल अंग्रेजों का जाना नहीं, बल्कि समाज में बराबरी और आम आदमी की वास्तविक आजादी भी है। कांग्रेस से अलग होकर समाजवादी राजनीति को मजबूत करना इसी सोच का हिस्सा था। वे ‘सत्ता के विकल्प की जरूरत’ पर जोर देते रहे। समाजवादी सोच के प्रवर्तक लोहिया की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा जाति-विरोध और सामाजिक बराबरी से जुड़ा था। वे मानते थे कि भारत में आर्थिक असमानता के साथ जातिगत असमानता भी सत्ता और समाज को प्रभावित करती है। उनका जोर पिछड़े वर्गों को राजनीतिक हिस्सेदारी देने पर था। वे केवल यह नहीं चाहते थे कि पिछड़ों की स्थिति पर चर्चा हो। वे चाहते थे कि सत्ता और प्रशासन में उनकी वास्तविक भागीदारी बढ़े। सत्ता को चुनौती देने की रणनीति किताब का एक महत्वपूर्ण अध्याय है- ‘लोकसभा में, कांग्रेस हटाओ-देश बचाओ’। लोहिया का मानना था कि लंबे समय तक एक ही पार्टी के सत्ता में रहने से लोकतंत्र कमजोर हो सकता है। इसलिए विपक्ष को मजबूत होना चाहिए। उनकी रणनीति का मकसद व्यक्तिगत सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाना था। अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों को कांग्रेस के खिलाफ एक मंच पर लाने की कोशिश इसी रणनीति का हिस्सा थी। आगे चलकर भारतीय राजनीति में गठबंधन और गैर-कांग्रेस राजनीति के जिस दौर की शुरुआत हुई, उसकी वैचारिक जमीन तैयार करने वालों में लोहिया का नाम प्रमुखता से आता है। लोकसभा में लोहिया किताब का अंतिम राजनीतिक दौर बेहद महत्वपूर्ण है। लोहिया ने संसद में पहुंचकर सत्ता से सवाल पूछने को अपनी राजनीति का माध्यम बनाया। वे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बड़े आलोचक थे और संसद में सरकार की नीतियों पर तीखे सवाल उठाते थे। उनकी भाषा सीधी थी और शैली आक्रामक, लेकिन उसका उद्देश्य केवल विरोध करना नहीं था। वे गरीबी, महंगाई, असमानता और आम आदमी की समस्याओं को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लाना चाहते थे। लोहिया के लिए संसद सत्ता के साथ समझौते की जगह नहीं, सत्ता से सवाल पूछने की जगह थी। लोहिया की भाषा-शैली लोहिया की सबसे बड़ी ताकत उनकी राजनीतिक भाषा भी थी। वे जटिल विचारों को ऐसे वाक्यों में रखते थे, जो आम आदमी तक पहुंच सकें। उनके भाषणों में नारे थे, लेकिन उनके पीछे वैचारिक आधार भी था। यही वजह है कि दशकों बाद भी उनके कई राजनीतिक सूत्र भारतीय राजनीति में सुनाई देते हैं। किताब की खूबियां और सीमाएं इस जीवनी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह लोहिया को केवल ‘महान नेता’ बनाकर पेश नहीं करती। उनके संघर्ष, असहमति, राजनीतिक उतार-चढ़ाव और निजी जीवन के प्रसंग साथ-साथ चलते हैं। यह किताब मुख्य रूप से जीवन और राजनीतिक यात्रा को समझने वाली जीवनी है। यह किताब किन्हें पढ़नी चाहिए, ग्राफिक में देखिए- किताब के बारे में मेरी राय किताब से पता चलता है कि लोहिया ने आजीवन संघर्ष किया। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई हो या आजाद भारत की सरकार से असहमति- उनके लिए सत्ता बदलना पर्याप्त नहीं था। वे समाज और राजनीति, दोनों में बदलाव चाहते थे। किताब की खासियत यह भी है कि लोहिया के विचार उनके जीवन की घटनाओं से निकलते हुए दिखाई देते हैं। बचपन के विद्रोही स्वभाव से लेकर जेल की यातना सहने तक और संसद में सरकार को घेरने तक एक निरंतरता नजर आती है। लोहिया को समझने के लिए यह किताब हर किसी को पढ़नी चाहिए। ****************** ग्राफिक- विपुल शर्मा …………… ये बुक रिव्यू भी पढ़ें बुक रिव्यू- पीपल की छांव में:एक आदमी, एक पेड़ और एक ऐसी मुहिम की कहानी, जो धीरे-धीरे आंदोलन बन गई हम अक्सर पर्यावरण की बात तब करते हैं, जब गर्मी बढ़ जाती है, बारिश का मौसम बदल जाता है या किसी शहर की हवा जहरीली हो जाती है। लेकिन पेड़, मिट्टी, पक्षी और प्रकृति हमारे जीवन को हर दिन कैसे प्रभावित करते हैं, इस पर कम ही सोचते हैं। पूरी खबर पढ़ें…
पेरेंटिंग- मैं ‘ना’ बोलूं तो पति ‘हां’ बोलते हैं:बच्चा इस बात का फायदा उठाता है, क्या पेरेंटिंग में मतभेद बच्चे के लिए बुरा है
सवाल- मैं 36 साल की एक वर्किंग महिला हूं। हमारा 9 साल का बेटा है। समस्या यह है कि मैं और मेरे पति उसकी परवरिश को लेकर बिल्कुल अलग सोच रखते हैं। मैं चाहती हूं कि वह अपनी गलतियों से सीखे, इसलिए उसे समझाकर बात करती हूं। वहीं मेरे पति मानते हैं कि बच्चों को टफ बनाना चाहिए, अनुशासन सिखाना चाहिए। कई बार मैं किसी बात के लिए उसे ‘हां’ बोल देती हूं, लेकिन पति उसी बात के लिए मना कर देते हैं। बेटा अब समझ गया है कि किस चीज के लिए किसके पास जाना है। अगर मैं मना करती हूं तो वह पापा से पूछ लेता है। मुझे लगता है कि वह इस स्थिति का फायदा उठाने लगा है। क्या माता-पिता की अलग-अलग पेरेंटिंग स्टाइल बच्चे के व्यवहार और व्यक्तित्व पर असर डाल सकती है? हमें क्या करना चाहिए? एक्सपर्ट- डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- हर माता-पिता अपने बच्चे के लिए अच्छा ही चाहते हैं, लेकिन ‘अच्छा’ क्या है, इसकी परिभाषा हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकती है। कोई अनुशासन को प्राथमिकता देता है, तो कोई कम्युनिकेशन और आजादी को। इसलिए पेरेंटिंग को लेकर पति-पत्नी के बीच मतभेद होना कोई नई अजूबा बात नहीं है। लेकिन जब ये मतभेद रोजमर्रा के फैसलों में दिखाई देने लगे और बच्चा यह समझ जाए कि "मम्मी से नहीं तो पापा से ‘हां’ मिल जाएगी," तब यह बच्चे के लिए नुकसानदायक हो सकता है। पेरेंटिंग में मतभेद का बच्चे पर असर 9 साल की उम्र तक बच्चे में यह समझ विकसित हो जाती है कि किस व्यक्ति से क्या रिस्पॉन्स मिलेगा। वह यह भी सीख जाता है कि किससे कौन-सी बात मनवाई जा सकती है। इसे कई बार लोग ‘चालाकी’ समझते हैं, जबकि चाइल्ड साइकोलॉजी के अनुसार यह अक्सर बच्चे का सीखा हुआ व्यवहार (लर्न्ड बिहेवियर) होता है। बच्चा वही तरीका अपनाता है, जिससे उसकी बात बनने की संभावना सबसे ज्यादा हो। ऐसे में अगर पेरेंटिंग को लेकर माता–पिता के विचार एक न हों और ये बात बच्चे को समझ में आ जाए तो इसके ये मनोवैज्ञानिक प्रभाव हो सकते हैं- क्या अलग सोच होना गलत है? बिल्कुल नहीं। हर बात पर माता-पिता की राय एक होना जरूरी नहीं है। समस्या तब होती है, जब बच्चे के सामने एक ही स्थिति पर अलग-अलग नियम या प्रतिक्रियाएं दी जाती हैं। इसे इन दो उदाहरणों से समझिए– 1. बच्चा मोबाइल चलाना चाहता है। आपसे परमिशन मांग रहा है। 2. बच्चा पॉकेट मनी मांग रहा है। ऐसी स्थिति में बच्चा यह नहीं सीख पाता कि घर का नियम क्या है। चाइल्ड साइकोलॉजी के अनुसार, बच्चे नियमों की सख्ती से ज्यादा उनकी कंसिस्टेंसी यानी एकरूपता को समझते हैं। जब हर बार एक जैसे नियम लागू होते हैं, तो बच्चों में सही-गलत की साफ समझ विकसित होती है। बच्चा 'पेरेंट शॉपिंग' क्यों करता है? कई बार बच्चा सिर्फ यह सीख रहा होता है कि उसकी जरूरत या मांग किस रास्ते से पूरी हो सकती है। इसलिए अगर एक व्यक्ति उसे मना करता है, तो वह स्वाभाविक रूप से दूसरे से पूछ सकता है। चाइल्ड साइकोलॉजी में इसे 'पेरेंट शॉपिंग' कहते हैं। यह व्यवहार तब ज्यादा देखने को मिलता है, जब- यह जरूरी नहीं कि बच्चा गलत इरादे से ऐसा कर रहा हो। अक्सर यह इस बात का संकेत होता है कि उसे नियमों और सीमाओं को लेकर एक जैसा मैसेज नहीं मिल रहा है। बच्चे के व्यक्तित्व पर क्या असर अगर परिवार में लंबे समय तक यही स्थिति बनी रहे तो बच्चे पर ये प्रभाव पड़ सकते हैं। उसे लगता है कि हर नियम पर बातचीत करके उसे बदला जा सकता है। गलती होने पर वह यह देखने लगता है कि कौन उसका पक्ष लेगा। उसे समझ नहीं आता कि सही क्या है, क्योंकि दोनों सबसे महत्वपूर्ण लोग अलग बातें कह रहे हैं। जब बच्चा दोनों के बीच संदेश पहुंचाने लगता है या एक की बात दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल करता है, तो परिवार का भावनात्मक माहौल प्रभावित होने लगता है। इस समस्या का समाधान क्या है? सबसे पहले यह समझें कि यह ‘मां बनाम पिता’ की लड़ाई नहीं है। असल सवाल ये है कि- ‘’क्या बच्चा एक सुरक्षित, स्पष्ट और भरोसेमंद माहौल में बड़ा हो रहा है?'' अगर इसका जवाब 'नहीं' है तो बदलाव की जरूरत है। इसके लिए नीचे दिए गए 6 कदम उठाएं। 1. नियम पहले आपस में तय करें रोजमर्रा की महत्वपूर्ण बातों पर माता-पिता पहले से चर्चा कर लें और एक साझा नियम तय करें। हर मुद्दे पर पूरी तरह सहमत होना जरूरी नहीं है, लेकिन बच्चे के सामने तय नियमों पर एक जैसी प्रतिक्रिया होनी चाहिए। इससे बच्चे को पता रहता है कि किस व्यवहार पर क्या अपेक्षा और क्या परिणाम होगा। 2. नियम बदलना हो तो मिलकर बदलें अगर किसी नियम में बदलाव जरूरी लगे तो बाद में आपस में चर्चा करें। फिर दोनों मिलकर बच्चे को नया नियम बताएं। इससे बच्चे को स्पष्ट संदेश मिलेगा। 3. बच्चे के सामने एक-दूसरे का फैसला न काटें अगर पति ने किसी बात के लिए मना किया है और लगता है कि फैसला सही नहीं है, तो बच्चे के सामने उसे तुरंत न बदलें। बच्चे से कहें- "हम दोनों इस पर बात करेंगे और फिर तुम्हें बताएंगे।" इससे बच्चे को संदेश मिलता है कि माता-पिता एक टीम की तरह फैसले लेते हैं। 4. सख्ती और प्यार में संतुलन रखें कई माता-पिता मानते हैं कि सख्ती से ही बच्चा जिम्मेदार बनता है, जबकि कुछ का मानना है कि सिर्फ प्यार और समझाइश ही काफी है। लेकिन चाइल्ड साइकोलॉजी के अनुसार सबसे प्रभावी तरीका अथॉरिटेटिव पेरेंटिंग है, जिसमें स्नेह और अनुशासन दोनों का संतुलन होता है। इसमें- 5. 'एक सख्त, एक नरम' वाला पैटर्न न बनाएं कई परिवारों में माता-पिता में से एक हमेशा डांटता है और दूसरा हमेशा बचाता है। इससे बच्चा दोनों की भूमिकाएं तय कर लेता है। ये तरीका सही नहीं है। इसकी बजाय– 6. बच्चे को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करें 9 साल का बच्चा कुछ नियम समझ सकता है और उस पर अपनी राय दे सकता है। इसलिए उससे पूछें कि- जब बच्चा नियम बनाने में शामिल होता है, तो उनके पालन की संभावना भी बढ़ जाती है। एक्सपर्ट हेल्प कब जरूरी? इन स्थितियों में माता–पिता के लिए फैमिली काउंसलर या चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट से सलाह लेना मददगार हो सकता है। याद रखें बच्चे को ऐसे माता-पिता चाहिए, जो एक टीम की तरह काम करें। दोनों के व्यक्तित्व और सोच अलग हो सकते हैं, लेकिन बच्चे की परवरिश से जुड़े फैसलों में तालमेल जरूरी है। जब घर के नियम स्पष्ट, स्थिर और सम्मानजनक होते हैं, तो बच्चा भी धीरे-धीरे जिम्मेदार बनता है। यही स्वस्थ पेरेंटिंग की सबसे मजबूत नींव है। ************************ ग्राफिक्स- अजीत सिंह …………………. पेरेंटिंग से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- बेटा किताबें नहीं छूता: हर वक्त मोबाइल, लैपटॉप या टीवी, उसे सिर्फ स्क्रीन चाहिए, उसमें रीडिंग हैबिट कैसे डेवलप करें आज के समय में बच्चों की पढ़ाई के लिए डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल होता है। इस वजह से कई बच्चों का अटेंशन स्पैन (एकाग्रता) प्रभावित होता है। दरअसल, लगातार बदलने वाला कंटेंट उनके ब्रेन को तुरंत स्टिमुलेट करता है। पूरी खबर पढ़ें…
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