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Changing Face of Terror | लोन वुल्फ से साइबर वुल्फ तक: आतंक की डिजिटल शक्ल |Teh Tak Chapter 6

बदलते दौर के साथ आतंकवाद की परिभाषा भी बदल रही है। आधुनिक आतंकवादी को अब विस्फोटकों से लदे जैकेट या असॉल्ट राइफल की आवश्यकता नहीं है। एक लैपटॉप, एक एन्क्रिप्टेड ऐप और डिजिटल फाइनेंस तक पहुंच भी उतनी ही घातक हो सकती है। जैसे-जैसे भौतिक सीमाएं मजबूत हो रही हैं और पारंपरिक आतंकी नेटवर्क दबाव में आ रहे हैं, चरमपंथी समूह तेजी से साइबरस्पेस में प्रवेश कर रहे हैं। एक अदृश्य, सीमाहीन खतरा पैदा कर रहे हैं जिसे पहचानना और रोकना कहीं अधिक कठिन है।

इसे भी पढ़ें: Changing Face of Terror | 26/11 ने कैसे गढ़ी वैश्विक ‘फिदायीन’ आतंक की पटकथा |Teh Tak Chapter 4

हवाला से क्रिप्टोकरेंसी तक

दशकों से, आतंकी टेरर फंडिंग हवाला, नकद और फर्जी चैरिटी जैसी अनौपचारिक मनी ट्रांसफर ट्रेल पर निर्भर थी। हालांकि ये नेटवर्क अभी भी मौजूद हैं, लेकिन क्रिप्टोकरेंसी और डार्क वेब मार्केटप्लेस इन्हें तेजी से रिप्लेस करने में लगे हैं। डिजिटल करेंसी पहचान गुप्त रखने और ग्लोबल रेंज की वजह से अधिक चलन में हैं। जिससे पारंपरिक बैंकिंग निगरानी के बिना सीमाओं के पार मनी ट्रांसफर संभव हो जाता है। डार्क वेब पर, चरमपंथी समूह अवैध व्यापार, मानवीय कार्यों के नाम पर दान और यहां तक ​​कि साइबर अपराध के माध्यम से धन जुटाते हैं। पारंपरिक वित्तपोषण के विपरीत, इन लेन-देनों से बहुत कम सबूत मिलते हैं, जिससे खुफिया और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए काम करना मुश्किल हो जाता है।

कट्टरपंथ 2.0

भर्ती के तरीके भी बदल गए हैं। पहले, कट्टरपंथ भौतिक स्थानों पर निर्भर करता थाधार्मिक संस्थान, प्रशिक्षण शिविर या आमने-सामने के नेटवर्क। आज, टेलीग्राम और सिग्नल जैसे एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म, गेमिंग चैट रूम और सोशल मीडिया फोरम, नए विचारधारा-प्रचार केंद्र बन गए हैं। चरमपंथी प्रचारक गुमनामी का फायदा उठाकर युवा उपयोगकर्ताओं को निशाना बनाते हैं, और मीम्स, वीडियो और चुनिंदा कहानियों के माध्यम से धीरे-धीरे हिंसा को सामान्य बना देते हैं। गेमिंग प्लेटफॉर्म, विशेष रूप से, एक अप्रत्याशित रास्ता प्रदान करते हैंजहां सामान्य बातचीत बिना तुरंत संदेह पैदा किए वैचारिक प्रशिक्षण में बदल सकती है। कट्टरपंथ अब मुखर या स्पष्ट नहीं रहा; यह सूक्ष्म, व्यक्तिगत और निरंतर है।

भारत में हालात

जनवरी 2024 से सितंबर 2025 के बीच, यानी सिर्फ़ 21 महीनों में, गृह मंत्रालय के भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) ने कम से कम 27 क्रिप्टो एक्सचेंज चिन्हित किए, जिन्हें साइबर अपराधी कथित तौर पर मनी लॉन्ड्रिंग चैनल के तौर पर इस्तेमाल कर रहे थे। इन प्लेटफॉर्म्स के जरिए लगभग 2,872 पीड़ितों से करीब 623.63 करोड़ किसी एक एक्सचेंज से 360.16 करोड़ तक और किसी अन्य से 6.01 करोड़ तक निकाले गए ।पिछले तीन वर्षों में I4C ने कम से कम 144 मामलों का विश्लेषण किया और पाया कि क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल साइबर अपराधों से चुराए गए धन को अंतरराष्ट्रीय अपराधिक नेटवर्क तक पहुँचाने के लिए किया जा रहा है।

इसे भी पढ़ें: Changing Face of Terror | ग्लोबल जिहाद का उभार, लेकिन भारत क्यों बना अपवाद |Teh Tak Chapter 5

सीमाओं से परे वाला सिक्योरिटी थ्रेट

साइबर और क्रिप्टो-आधारित आतंकवाद एक अभूतपूर्व चुनौती पेश करता है। इसमें कोई स्पष्ट युद्धक्षेत्र नहीं है, कोई प्रत्यक्ष हमलावर नहीं है, और न ही प्रभाव का कोई एक क्षण है। यह खतरा धीरे-धीरे, अदृश्य रूप से - स्क्रीन, सर्वर और सूचनाओं के माध्यम से - फैलता है। जैसे-जैसे सरकारें भौतिक सुरक्षा को मजबूत कर रही हैं, वास्तविक युद्धक्षेत्र ऑनलाइन स्थानांतरित हो रहा है। इस अदृश्य शत्रु का मुकाबला करने के लिए न केवल मजबूत साइबर कानूनों और वित्तीय निगरानी की आवश्यकता होगी, बल्कि डिजिटल साक्षरता, प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की भी आवश्यकता होगी। साइबर आतंकवाद के युग में, युद्ध अब केवल हमलों को रोकने तक सीमित नहीं है - यह लोगों के दिमाग, सूचना और स्वयं के विश्वास की रक्षा करने के बारे में है।

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Changing Face of Terror | ग्लोबल जिहाद का उभार, लेकिन भारत क्यों बना अपवाद |Teh Tak Chapter 5

पिछले तीन दशकों में वैश्विक आतंकवाद ने जिस तरह अपना स्वरूप बदला है, उसकी जड़ें ‘ख़िलाफ़त’ की अवधारणा और ग्लोबल जिहाद के फैलते नेटवर्क में छिपी हैं। अल-कायदा के बिखरे हुए फ्रैंचाइज़ मॉडल से लेकर आईएसआईएस के ज़मीन पर अपना राज्य खड़ा करने के प्रयास तक, जिहादी आंदोलन ने रणनीति, संगठन और महत्वाकांक्षातीनों स्तरों पर बड़े बदलाव देखे। 9/11 के बाद अमेरिका के नेतृत्व में शुरू हुए ‘वॉर अगेंस्ट टेरर’ ने अनजाने में ऐसे सत्ता-शून्य पैदा किए, जिनका फायदा कट्टरपंथी संगठनों ने उठाया और मध्य पूर्व को हिंसा के नए दौर में झोंक दिया। लेकिन इसी वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत एक अपवाद बनकर सामने आया। दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादियों में से एक होने के बावजूद, भारत अल-कायदा और आईएसआईएस जैसे संगठनों का मज़बूत गढ़ नहीं बन सका। यह लेख इसी विरोधाभास को समझने की कोशिश करता है।

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खिलाफत का उदय और ग्लोबल जिहाद

पिछले तीन दशकों में वैश्विक जिहाद दो अलग-अलग लेकिन आपस में जुड़ी रणनीतियों से होकर गुज़रा हैअल-कायदा का बिखरा हुआ “फ्रैंचाइज़ मॉडल” और आईएसआईएस का ज़मीन पर अपना ‘राज्य’ बनाने का प्रयास। दोनों की वैचारिक जड़ें भले ही एक जैसी थीं, लेकिन उनकी सोच, रणनीति और नतीजे बिल्कुल अलग रहे। 9/11 के बाद अमेरिका के नेतृत्व में अफगानिस्तान और इराक में हुए युद्धों ने इन बदलावों में बड़ी भूमिका निभाई। इन युद्धों ने अनजाने में ऐसे सत्ता-शून्य पैदा किए, जिनका फायदा आतंकी संगठनों ने तेजी से उठाया। इसके बावजूद, भारत जैसे देशजहाँ दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादियों में से एक रहती हैअल-कायदा और आईएसआईएस जैसे संगठनों की बड़े पैमाने पर भर्ती का केंद्र नहीं बन सके। यह सवाल खड़ा करता है कि वैश्विक जिहाद की पहुँच और असर की भी अपनी सीमाएँ हैं।

अल-कायदा के फ्रैंचाइज़ मॉडल से लेकर आईएसआईएस के ऑन ग्राउंड ऑपरेशन

ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में अल-कायदा ने जिहाद का एक ‘फ्रैंचाइज़ मॉडल’ खड़ा किया। इसका मतलब यह था कि संगठन खुद किसी ज़मीन या देश पर कब्ज़ा नहीं करता था, बल्कि एक ढीले-ढाले वैचारिक नेटवर्क की तरह काम करता था। यमन से लेकर उत्तरी अफ्रीका और दक्षिण एशिया तक कई स्थानीय आतंकी गुट अल-कायदा के नाम पर काम करते थे, लेकिन अपने-अपने इलाकों में स्वतंत्र रूप से ऑपरेट करते थे। अल-कायदा का उद्देश्य शासन चलाना नहीं, बल्कि बड़े और प्रतीकात्मक हमलों के ज़रिये पश्चिमी प्रभाव को कमजोर करना और व्यापक विद्रोह को भड़काना था। आईएसआईएस ने इस सोच से बिल्कुल अलग रास्ता अपनाया। इराक पर अमेरिकी हमले के बाद पैदा हुई अराजकता से उभरे आईएसआईएस ने जिहाद को सिर्फ वैश्विक हिंसा तक सीमित मानने से इनकार किया। उसने ज़मीन पर कब्ज़ा करने और शासन चलाने की कोशिश की और 2014 में ‘ख़िलाफ़त’ की घोषणा कर दी। उसका लक्ष्य केवल पश्चिम से लड़ना नहीं था, बल्कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था को हटाकर अपना तथाकथित इस्लामी राज्य बनाना था। टैक्स वसूली, अदालतें, प्रचार तंत्र और क्षेत्रीय प्रशासन जैसे ढाँचों के साथ यह राज्य-निर्माण मॉडल आधुनिक जिहादी आंदोलन में पहले कभी

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9/11 और वॉर अगेस्ट टेरर

11 सितंबर 2001 के हमलों ने वैश्विक सुरक्षा नीतियों को पूरी तरह बदल दिया। इसके बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर अल-कायदा के मुख्य ठिकानों को तोड़ दिया, लेकिन उसकी विचारधारा को खत्म नहीं कर सका। इससे भी ज़्यादा असर 2003 में इराक पर हुए अमेरिकी हमले का पड़ा, जहाँ मौजूदा सरकारी ढाँचे को गिरा दिया गया, लेकिन उनकी जगह कोई मज़बूत और स्थिर व्यवस्था खड़ी नहीं की गई। नतीजतन इराक में सत्ता का खालीपन पैदा हो गया, जिसे सांप्रदायिक तनाव ने और गहरा कर दिया। यही हालात कट्टरपंथी संगठनों के लिए सबसे अनुकूल साबित हुए। इसी अराजकता का सबसे बड़ा फायदा आईएसआईएस को मिला। इराक की पुरानी बाथ पार्टी से जुड़े अधिकारी, खुद को हाशिए पर महसूस करने वाले सुन्नी समुदाय और विदेशी जिहादीसब मिलकर एक ऐसे संगठन में जुट गए जो सैन्य रूप से भी मजबूत था और वैचारिक रूप से भी आक्रामक। जहाँ अल-कायदा लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष की कल्पना करता था, वहीं आईएसआईएस ने उसी संघर्ष को तुरंत एक ‘राज्य’ में बदलने की कोशिश की।

मुस्लिम बहुलता के बावजूद भारत में अल-कायदा/आईएसआईएस पैर जमाने में क्यों हुए नाकाम

भारत अल-कायदा या आईएसआईएस जैसे संगठनों के लिए वैसा मुफीद ठिकाना नहीं बन पाया, जैसा मध्य पूर्व, अफ्रीका या यूरोप के कुछ हिस्से बने। इसके पीछे कई अहम कारण हैं। सबसे पहला कारण यह है कि भारतीय मुसलमान एक बहुलतावादी और लोकतांत्रिक समाज में गहराई से जुड़े हुए हैं। यहाँ की स्थानीय, सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराएँ ऐसी कट्टर वैश्विक जिहादी विचारधाराओं को स्वीकार नहीं करतीं। दूसरा, भारत में उस तरह का राज्य-ध्वंस या लंबा गृहयुद्ध नहीं हुआ, जिसका फायदा आमतौर पर जिहादी संगठन उठाते हैं। तीसरा, भारतीय इस्लाम की परंपरा ऐतिहासिक रूप से स्थानीय पहचान और आपसी मेल-जोल पर ज़ोर देती रही है। इतना ही नहीं, भारत के मुस्लिम-बहुल इलाकों में किसी बड़े विदेशी सैन्य कब्ज़े का अभाव भी एक अहम वजह है। दुनिया के अन्य हिस्सों में विदेशी सेनाओं की मौजूदगी को जिहादी संगठन कट्टरपंथ फैलाने के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं, लेकिन भारत में ऐसा माहौल न होने के कारण उनकी यह रणनीति कारगर साबित नहीं हो सकी।

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