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DJB STP Scam Case में पूर्व CEO Udit Prakash Rai सहित 5 को Bail, कोर्ट ने दी बड़ी राहत

राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने दिल्ली जल बोर्ड (DJB) STP टेंडर घोटाले के मामले में गिरफ्तार पांच आरोपियों को ज़मानत दे दी। इनमें DJB के पूर्व CEO उदित प्रकाश राय भी शामिल हैं। कोर्ट इस मामले में दिल्ली के पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन को पहले ही ज़मानत दे चुका है। स्पेशल जज ने उदित प्रकाश राय, नागेंद्र यादव, अंकित श्रीवास्तव, पंकज वर्मा और राजा कुमार कुर्रा को ज़मानत दी। इसके लिए उन्हें 2 लाख रुपये का ज़मानत बॉन्ड और उतनी ही राशि की दो ज़मानतें देनी होंगी। एक और आरोपी, DJB के पूर्व चीफ इंजीनियर सतीश चंद्र वशिष्ठ को भी गिरफ्तार किया गया है और वे अभी दो दिन की पुलिस कस्टडी में हैं। 

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आरोप है कि जांच में पता चला है कि रोहिणी STP की क्षमता को 15 MGD से बढ़ाकर 25 MGD करने के टेक्निकल प्रपोज़ल में तत्कालीन मंत्री ने बदलाव किया था। उन्होंने बिना किसी टेक्निकल सिफारिश या फिजिबिलिटी स्टडी के इसे 30 MGD तक बढ़ाने की मंज़ूरी दे दी। इसी तरह, प्रोजेक्ट में रोहिणी और नरेला STP को तो शामिल किया गया, लेकिन ओखला फेज़-V STP को बाहर रखा गया, जिससे लागत में लगभग 123 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई। आरोप है कि ये मनमाने फैसले बिना किसी ठोस टेक्निकल आधार के लिए गए थे। एंटी-करप्शन ब्रांच (ACB) ने GNCTD के पूर्व जल मंत्री सत्येंद्र कुमार जैन, दिल्ली जल बोर्ड के पूर्व CEO उदित प्रकाश राय (IAS), M/s AN एंटरप्राइजेज़ के मालिक नागेंद्र यादव, M/s यूरोटेक एनवायरनमेंट प्राइवेट लिमिटेड के मालिक राजा कुमार कुर्रा, M/s सृजनहार के मालिक पंकज वर्मा और अंकित श्रीवास्तव को गिरफ्तार किया था।

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डोगरा ने ANI को बताया, "हमारे मंत्रालय का मकसद सभी युवाओं को 'MY Bharat' से जोड़ना है। युवाओं के लिए भारत सरकार की सभी योजनाएं 'MY Bharat' पोर्टल पर उपलब्ध हैं। युवा अपनी पसंद के क्षेत्रों में हिस्सा ले सकते हैं और 'विकसित भारत' के लिए अपने विचार और योगदान दे सकते हैं।" डोगरा ने कहा कि हिमाचल प्रदेश जलवायु परिवर्तन और सस्टेनेबल डेवलपमेंट (सतत विकास) पर खास ज़ोर देगा, क्योंकि राज्य पहाड़ी इलाका है और पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों के प्रति संवेदनशील है। उन्होंने कहा, "हमारा मुख्य विषय 'विकसित भारत' है। हमारी सभी प्रतियोगिताएं 'विकसित भारत' पर आधारित हैं और चूंकि हिमाचल एक पहाड़ी इलाका है, इसलिए हमारा ध्यान जलवायु परिवर्तन और सस्टेनेबल डेवलपमेंट पर होगा।

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Kashmir में Normalcy से परेशान हैं Terrorists? Kashmiri Pandits को धमकियां देकर 1990 वाला डर लौटाने के चल रहे प्रयास

आतंकवादी कितनी भी धमकियां देते रहें, कश्मीर में अब उनकी दाल गलने वाली नहीं है। जिस डर के सहारे 1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने पर मजबूर किया गया था, उस दौर और आज के कश्मीर में जमीन-आसमान का फर्क है। मोदी सरकार के सुरक्षा तंत्र ने आतंकियों के लिए हालात कठिन किए हैं और अब जब बंदूक के दम पर दहशत फैलाना आसान नहीं रहा तो पाकिस्तान में बैठे उनके आकाओं और घाटी में सक्रिय आतंकी संगठनों की ओर से धमकी भरे पत्रों और निजी जानकारियां लीक करने जैसे हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।

ताजा मामला करीब 7,000 कश्मीरी पंडित पीएम पैकेज कर्मचारियों को लेकर है। लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े बताए जा रहे यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल (ULC/ULF) की ओर से कथित तौर पर जारी धमकियों में कर्मचारियों से नौकरी छोड़ने को कहा गया है और ऐसा नहीं करने पर जान से मारने की धमकी दी गई है। दावा है कि कुछ कर्मचारियों के निजी फोन नंबर, घर के पते और वाहन पंजीकरण संबंधी जानकारियां ऑनलाइन लीक की गई हैं। पिछले एक महीने से अधिक समय में ऐसी कम से कम पांच धमकियां सामने आने की बात कही गई है।

देखा जाये तो कश्मीरी पंडित समुदाय के लोगों के लिए यह महज एक नया खतरा नहीं है। 1990 के दशक में आतंकियों ने नामों की सूचियां दीवारों पर चिपकाकर और धमकियों के जरिए भय का माहौल बनाया था। फर्क सिर्फ इतना है कि तब इंटरनेट नहीं था, आज वही रणनीति डिजिटल माध्यमों के जरिए अपनाई जा रही है। कश्मीरी पंडित समुदाय की आवाज के रूप में सक्रिय सबा कौल ने इसे ‘‘बड़ा और चिंताजनक सुरक्षा संकट’’ बताते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय और जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल कार्यालय से कथित डेटा लीक की जांच की मांग की है। इससे पहले पीएम पैकेज कर्मचारी और एक्टिविस्ट राकेश हांडू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और जम्मू-कश्मीर पुलिस की साइबर क्राइम विंग को शिकायत देकर एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी। उनके मुताबिक 5 सितंबर के पत्र में गैर-स्थानीय कर्मचारियों को लिंग या पद की परवाह किए बिना निशाना बनाने की धमकी दी गई और ‘‘बॉडी बैग उनके मूल स्थानों पर भेजे जाएंगे’’ जैसी भयावह चेतावनी दी गई।

इसके अलावा, पीएम पैकेज की पृष्ठभूमि भी महत्वपूर्ण है। 2008 में केंद्र ने कश्मीरी प्रवासियों की वापसी और पुनर्वास के लिए 3,000 सरकारी नौकरियों वाला पैकेज घोषित किया था। 2015 में 3,000 और पद मंजूर किए गए, जिससे केंद्रीय वित्तपोषित पदों की संख्या 6,000 हुई। बावजूद इसके, आतंकी धमकियों में करीब 7,000 पंडित कर्मचारियों को निशाना बनाए जाने का दावा सामने आया है।

साथ ही सुरक्षा के साथ आवास का सवाल भी जुड़ा है। राकेश हांडू के मुताबिक करीब 6,000 पीएम पैकेज कर्मचारी वर्षों से घाटी में काम कर रहे हैं और कई किराये के मकानों में रहते हैं। जम्मू-कश्मीर में 6,042 ट्रांजिट क्वार्टर बनाए जाने के बावजूद कथित तौर पर करीब 800 ही आवंटित हुए हैं। कुछ आवासीय परिसरों की सुरक्षा, सड़क, जल निकासी, बाउंड्री और निर्माण पूरा होने को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। यानी ‘‘सामान्य स्थिति’’ का असली पैमाना केवल यह नहीं हो सकता कि बाजार खुले हैं या पर्यटक आ रहे हैं; असली कसौटी यह है कि जिस कश्मीरी पंडित को घाटी लौटाया गया है, क्या वह वहां सुरक्षित घर और सुरक्षित कार्यस्थल के भरोसे के साथ रह सकता है?

हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही अहम है। कश्मीर में हाल के दिनों में पर्यटन, सार्वजनिक गतिविधियों और अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में बढ़ोतरी हुई है। श्रीनगर में इस समय अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का आयोजन चल रहा है और हाल ही में अमेरिकी राजदूत के कश्मीर दौरे ने भी सामान्य होते माहौल की तस्वीर पेश की थी। यही बदलता कश्मीर आतंकियों और पाकिस्तान में बैठे उनके आकाओं को सबसे ज्यादा खटकता है। जब बंदूकें वह भय पैदा नहीं कर पा रहीं जिसकी उन्हें तलाश है, तब धमकी पत्रों और साइबर माध्यमों से दहशत पैदा करने की कोशिश की जा रही है।

उधर, राजनीतिक मोर्चे पर भी विवाद तेज है। नेशनल कांफ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने इन धमकियों पर सवाल उठाते हुए इसे उपराज्यपाल प्रशासन की कथित साजिश तक बताया, जिस पर बीजेपी ने उन्हें आतंकवाद के प्रति नरम रुख रखने का आरोप लगाकर पलटवार किया। वहीं मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अपने पिता से अलग रुख अपनाते हुए धमकियों को गंभीरता से लेने और सुरक्षा एजेंसियों से स्रोत का पता लगाने की मांग की है।

बहरहाल, कश्मीरी पंडितों की सुरक्षित वापसी केवल नौकरी देने या मकान बनाने का प्रशासनिक लक्ष्य नहीं है। 2022 में राहुल भट की चाडूरा तहसील कार्यालय के भीतर हुई हत्या इस चुनौती की भयावह याद है। इसलिए आज की सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि आतंकियों की धमकियों के बावजूद कश्मीरी पंडित घाटी में न केवल लौटें, बल्कि बिना डर के रह और काम भी कर सकें। आतंक का युग खत्म करने का दावा तभी पूरी तरह सार्थक होगा, जब धमकी देने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई के साथ हर लौटते परिवार को यह भरोसा भी मिले कि कश्मीर में उसका भविष्य सुरक्षित है।

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  Sports

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