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जितने वोटों के अंतर से 70 में 68 पर हुई हार-जीत, दिल्ली में उससे ज्यादा मतदाता SIR में हो गए बाहर!

रिपोर्ट में कहा गया कि सूची से बाहर किए गए मतदाताओं में 31,59,223 को स्थायी रूप से स्थानांतरित, 11,73,552 को पता नहीं चलने , 2,82,412 को मृत और 1,41,535 को पंजीकृत/दोहरे मतदाता के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

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उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों का खतरा होगा बेअसर, सरस्वती ताल और केदारताल की गहराई नापने उतरा विशेषज्ञ दल

Uttarakhand News: उत्तराखंड के ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में कुदरत का मिजाज कब बदल जाए, इसका अंदाजा लगाना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है. पहाड़ों पर बनी हिमनद यानी ग्लेशियर झीलें कई बार भारी तबाही की वजह बन जाती हैं. इसी डर और खतरे को पहले ही भांपते हुए उत्तराखंड सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है. राज्य के दो बेहद अहम और संवेदनशील तालों, चमोली जिले के सरस्वती ताल और उत्तरकाशी जिले के केदार ताल, की पड़ताल के लिए वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की एक खास टीम को मंगलवार को रवाना कर दिया गया है.

उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण यानी यूएसडीएमए के दफ्तर से सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने इस टीम को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया. यह अभियान सिर्फ एक सामान्य दौरा नहीं है, बल्कि आधुनिक विज्ञान की मदद से उन खतरों को वक्त रहते पहचानने की कोशिश है जो आने वाले समय में निचले इलाकों के लिए आफत बन सकते हैं. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और आपदा प्रबंधन मंत्री मदन कौशिक ने इस कठिन और जरूरी सफर पर निकल रहे वैज्ञानिकों को अपनी शुभकामनाएं दी हैं.

ऊंचाई पर छिपा कुदरत का बड़ा गणित

यह पूरा मिशन उन कठिन रास्तों और बर्फीली वादियों में पूरा होना है जहां आम इंसान का सांस लेना भी भारी पड़ जाता है. चमोली जिले में स्थित सरस्वती ताल करीब 5700 मीटर की ऊंचाई पर है, जबकि उत्तरकाशी का केदारताल लगभग 4750 मीटर की ऊंचाई पर बसा है. इतनी ज्यादा ऊंचाई पर स्थित झीलों में पानी की मात्रा कितनी है, उनकी तलहटी कैसी है और क्या उनके किनारे कमजोर पड़ रहे हैं, यह जानना बेहद जरूरी हो चुका है.

वैज्ञानिकों का यह दल वहां जाकर बैथीमेट्री सर्वेक्षण करेगा. आसान शब्दों में कहें तो टीम इन झीलों की गहराई, पानी के फैलाव और तलहटी की बनावट का नक्शा तैयार करेगी. इससे यह साफ हो सकेगा कि अगर कभी बादल फटने या ग्लेशियर टूटने से पानी अचानक बढ़ता है, तो झील का बांध जैसा किनारा कितना दबाव झेल सकता है.

समय पर चेतावनी ही सबसे बड़ा बचाव

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस अभियान को लेकर साफ किया है कि सरकार का मुख्य मकसद किसी भी हादसे से पहले लोगों की सुरक्षा तय करना है. पहाड़ों में जब ग्लेशियर झीलें टूटती हैं तो निचले गांवों तक संभलने का वक्त नहीं मिलता. इसी वजह से मुख्यमंत्री ने जोर दिया है कि झीलों में सेंसर, जलस्तर मापने वाली मशीनें और बेहतर संचार उपकरण लगाए जाएंगे.

अगर झील का पानी अचानक असामान्य रूप से बढ़ता है, तो निचले इलाकों में तुरंत सायरन या संदेश पहुंच सके, ऐसी व्यवस्था तैयार की जा रही है. आपदा प्रबंधन मंत्री मदन कौशिक ने भी बताया कि संवेदनशील इलाकों की पहचान करके वहां से लोगों को सुरक्षित निकालने के रास्ते पहले से तय किए जा रहे हैं. स्थानीय स्तर पर राहत और बचाव का ढांचा इतना मजबूत बनाया जा रहा है कि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत मदद पहुंचाई जा सके.

13 संवेदनशील झीलों पर सरकार की नजर

उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन विभाग ने पूरे राज्य में तेरह ऐसी ग्लेशियर झीलों की पहचान की है जो भविष्य में खतरनाक साबित हो सकती हैं. राहत की बात यह है कि इनमें से चार झीलों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण पहले ही पूरा किया जा चुका है. अब बाकी बची झीलों का अध्ययन भी चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा है. इसी कड़ी में सरस्वती ताल और केदारताल का नंबर आया है.

सचिव विनोद कुमार सुमन के अनुसार, यह अध्ययन सिर्फ झीलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि इन झीलों से निकलने वाली नदियों और नालों के किनारे बसे गांवों और ढांचों पर क्या असर पड़ सकता है. इस वैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर ही आने वाले दिनों में सुरक्षा की नई दीवारें और जल निकासी के रास्ते तय किए जाएंगे.

दिग्गज संस्थानों के महारथी मैदान में

इस मुश्किल अभियान को कामयाब बनाने के लिए देश के कई बड़े वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थानों को एक मंच पर लाया गया है. इस संयुक्त दल में यूएसडीएमए, यूएलएमएमसी, लखनऊ का बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, रुड़की का राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के साथ-साथ एनडीआरएफ और एसडीआरएफ के जांबाज जवान शामिल हैं.

दल में रोहित कुमार, निखिल पुनिया, डॉ. विशाल, दीपक भट्ट, डॉ. शेख नवाज अली, शुभजीत घोष, प्रकाश रंजन जेना, डॉ. पिंकी बिष्ट, स्वप्निल बिष्ट, शिव्यांक सिंह नेगी, शिव शंकर यादव, डॉ. शिवानंद मंडराहा, नितेश खेतवाल, संदीप सिंह, सचिन कुमार, मनीष कुमार, महेंद्र, मनोज सिंह, शार्दुल गुसाईं और नरेंद्र सिंह रावत जैसे विशेषज्ञ शामिल हैं. यह पूरी टीम मिलकर भूविज्ञान, पानी के बहाव और पर्वतारोहण के अपने तजुर्बे से हिमालय के इन तालों की सटीक जानकारी जुटाएगी. दल की विदाई के मौके पर विभाग के सलाहकार विनय रुहेला, ले. कर्नल रघुवीर सिंह भंडारी, डीआईजी राजकुमार नेगी और दिनेश कुमार पुनेठा भी मौजूद रहे.

यह भी पढ़ें: CM धामी की पहल रंग लाई, उत्तरकाशी-तिलवाड़ा मार्ग को NH बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी

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