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Uttarakhand Election 2027: देहरादून जिले में भाजपा ने लगाया था क्लीन स्वीप

Uttarakhand Election 2027: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून सिर्फ प्रशासनिक केंद्र नहीं बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करने वाला सबसे बड़ा जिला भी है. दरअसल, यहां पहाड़ी जिलों से अलग सियासी मिजाज शहरी और आधुनिक है. यहां ट्रैफिक, स्मार्ट सिटी, भू-कानून और रोजगार जैसे मुद्दे हर बार चुनावी बहस का केंद्र बनते हैं. 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले आइए जानते हैं जिले की सभी सीटों का पूरा सियासी समी​करण.

देहरादून में मुस्लिम आबादी करीब 12 प्रतिशत

जनगणना 2011 के मुताबिक देहरादून जिले की कुल आबादी करीब 16 लाख 97 हजार है, जिसमें पुरुषों की हिस्सेदारी करीब 52.6 प्रतिशत (8 लाख 92 हजार) और महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 47.4 प्रतिशत (8 लाख 4 हजार) है. साक्षरता की बात करें तो यहां 84 प्रतिशत साक्षरता दर दर्ज की गई थी, जिसमें पुरुष साक्षरता लगभग 89 प्रतिशत और महिला साक्षरता करीब 79 प्रतिशत थी. वहीं, धार्मिक आबादी की बात करें तो जिले में हिंदू आबादी करीब 84 प्रतिशत, मुस्लिम आबादी करीब 12 प्रतिशत और सिख समुदाय करीब 2 प्रतिशत है. इसके अलावा ईसाई, बौद्ध और जैन समुदाय की भी सक्रिय मौजूदगी है. 

देहरादून जिले में 10 विधानसभा सीटें, जिसमें से 2 आरक्षित

देहरादून जिले में कुल 10 विधानसभा सीटें आती हैं, जिनके नाम हैं चकराता, विकासनगर, सहसपुर, धर्मपुर, रायपुर, राजपुर रोड, देहरादून कैंट, मसूरी, डोईवाला और ऋषिकेश. बता दें इनमें से चकराता सीट अनुसूचित जनजाति (जौनसारी समुदाय) के लिए और राजपुर रोड सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. बाकी आठों सीटें सामान्य श्रेणी में आती हैं.

देहरादून जिले में भाजपा ने लगाया था क्लीन स्वीप

चुनाव आयोग के डेटा पर नजर डालें तो यहां 2022 के विधानसभा चुनाव में देहरादून जिले की दसों सीटों में से नौ पर भाजपा ने कब्जा जमाया था.वहीं, एक सीट कांग्रेस का उम्मीदवार विजयी रहा था. आइए आपको हर सीट के बारे में बताते हैं.

देहरादून कैंट सीट पर बीजेपी ने सविता कपूर को उतारा था. बता दें वे दिवंगत विधायक हरबंस कपूर की पत्नी हैं. बीजेपी की परंपरागत सीट और लोगों की सहानुभूति के चलते सविता ने वि​जय दर्ज की. बता दें उन्होंने कांग्रेस के सूर्यकांत धस्माना को करीब 21 हजार वोटों से हराया था.

धर्मपुर विधानसभा सीट की बात करें तो यहां भाजपा के विनोद चमोली ने कांग्रेस के दिनेश अग्रवाल को करीब 10 हजार वोटों से मात दी थी.

रायपुर सीट पर भाजपा के उमेश शर्मा 'काऊ' ने कांग्रेस के हीरा सिंह बिष्ट को करीब 30 हजार वोटों के भारी अंतर से हराया था.

राजपुर रोड (सुरक्षित) सीट पर भाजपा के खजान दास ने कांग्रेस के राजकुमार को करीब 11 हजार वोटों से पराजित किया था.

मसूरी सीट से कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी कांग्रेस की गोदावरी थपलियाल को हराकर विधानसभा पहुंचे. 

डोईवाला सीट पर भाजपा के बृजभूषण गैरोला ने कांग्रेस के गौरव चौधरी को करीब 29 हजार वोटों से हराकर जीत दर्ज की थी.

ऋषिकेश सीट पर भाजपा के प्रेमचंद अग्रवाल ने कांग्रेस के जयेंद्र चंद रमोला को करीब 19 हजार वोटों से हराया था. बता दें वह पिछले चुनाव में यहां से तीसरी बार जीते थे. 

सहसपुर सीट पर भाजपा के सहदेव सिंह पुंडीर ने कांग्रेस के आर्येंद्र शर्मा को करीब साढ़े आठ हजार वोटों से हराया था.

विकासनगर में भाजपा के मुन्ना सिंह चौहान ने कांग्रेस के नवप्रभात को महज पांच हजार वोटों के अंतर से शिकस्त दी थी.

चकराता (सुरक्षित) सीट पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रीतम सिंह ने भाजपा के रामशरण नौटियाल को करीब साढ़े नौ हजार वोटों से हराया था. 

देहरादून के शहरी इलाकों में भाजपा का दबदबा, चकराता में कांग्रेस मजबूत 

उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से ही देहरादून जिले की शहरी सीटों पर भाजपा की पकड़ मजबूत मानी जाती रही है. एक रिपोर्ट के मुताबिक  देहरादून कैंट सीट तो लंबे समय तक हरबंस कपूर का पर्याय बन चुकी थी, जो यहां से कई बार लगातार जीतते रहे हैं. उधर, मसूरी और ऋषिकेश जैसी सीटों पर भी भाजपा का प्रभाव लगातार बना रहा है.

ये सीट रही है कांग्रेस का गढ़ जाति और स्थानीय मुद्दे तय करते हैं नतीजे  

एक रिपोर्ट के मुताबिक चकराता सीट जहां जौनसार जाति के लोग अधिक रहते हैं दशकों से कांग्रेस का गढ़ मानी जाती है. बता दें यहां आदिवासी जौनसारी समुदाय का प्रभुत्व है और प्रीतम सिंह सरीखे नेता यहां से बार-बार जीतते आए हैं. राजनीतिक जानकारों की मानें तो राज्य में किसी भी दल की लहर रही हो विकासनगर और सहसपुर जैसी पछवादून की सीटों पर मुकाबला अक्सर कड़ा रहा है. यहां जाति और स्थानीय मुद्दे नतीजे तय करते हैं. 

देहरादून जिले की विधानसभा में अब क्या हैं मौजूदा हालात?

2027 के चुनाव से पहले देहरादून में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का काम तेजी से चल रहा है. हाल की रिपोर्टों के मुताबिक जिले में करीब साढ़े 15 लाख से ज्यादा मतदाता दर्ज हैं और मतदाता सूची में बड़े बदलाव देखे जा रहे हैं. दिलचस्प यह है कि मतदाता संख्या के लिहाज से रायपुर सीट अब जिले की सबसे बड़ी विधानसभा सीट बन गई है जबकि राजपुर रोड और देहरादून कैंट अपेक्षाकृत छोटी सीटें रह गई हैं. वहीं, राजनीतिक तौर पर भाजपा शहरी विकास कार्यों और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं को आधार बनाकर मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है, जबकि कांग्रेस बेरोजगारी, बढ़ते जमीन के दामों और भू-कानून जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की रणनीति बना रही है. चकराता में कांग्रेस की पकड़ बरकरार रहने की उम्मीद जताई जा रही है जबकि बाकी सीटों पर पार्टी अपनी खोई जमीन वापस पाने के लिए संगठन को मजबूत करने में जुटी है.

किस सीट पर क्या जातीय समीकरण, जानें डिटेल

- चकराता (सुरक्षित) सीट पर जौनसारी जनजाति समुदाय का दबदबा, यही समुदाय यहां हार-जीत तय करता है.

- विकासनगर व सहसपुर सीट पर गढ़वाली राजपूत-ब्राह्मण समाज के साथ पंजाबी और गुर्जर समुदाय भी असरदार हैं.

- राजपुर रोड (सुरक्षित) सीट पर दलित मतदाता निर्णायक हैं, साथ ही यहां पंजाबी-सिख और ब्राह्मण समाज की भी बड़ी मौजूदगी है.

- देहरादून कैंट सीट पर पंजाबी, सिंधी और कायस्थ समेत शहरी मध्यवर्गीय मतदाता निर्णायक हैं.

- धर्मपुर व रायपुर  सीट पर सरकारी कर्मचारी, सेवानिवृत्त अधिकारी और प्रवासी आबादी हार-जीत का अंतर तय करती है. 

- मसूरी सीट पर मुस्लिम, ईसाई और गढ़वाली राजपूत समुदाय का मिलाजुला प्रभाव रहता है.

- डोईवाला सीट पर सिख-पंजाबी किसान वर्ग और गुर्जर समुदाय के साथ पहाड़ों से आए प्रवासी मतदाता अहम हार जीत पर अहम रोल निभाते हैं.

- ऋषिकेश सीट पर ब्राह्मण, पंजाबी और तीर्थाटन से जुड़े व्यापारी वर्ग के साथ बाहरी राज्यों से आई आबादी वोट पर असरदार है.

FAQ

Q. देहरादून जिले में कुल कितनी विधानसभा सीटें हैं?
A. देहरादून जिले में कुल दस विधानसभा सीटें हैं, जिनके नाम हैं चकराता, विकासनगर, सहसपुर, धर्मपुर, रायपुर, राजपुर रोड, देहरादून कैंट, मसूरी, डोईवाला और ऋषिकेश.

Q. इनमें से कौन-सी सीटें आरक्षित हैं?
A. चकराता सीट अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए और राजपुर रोड सीट अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित है. बाकी आठ सीटें सामान्य श्रेणी की हैं.

Q. 2022 चुनाव में देहरादून जिले में किस पार्टी को कितनी सीटें मिलीं?
A. भाजपा को नौ सीटें मिलीं जबकि सिर्फ चकराता सीट कांग्रेस के खाते में गई थीं.

Q. देहरादून जिले की आबादी में हिंदू और मुस्लिम समुदाय का हिस्सा कितना है?
A. जनगणना 2011 के अनुसार जिले में हिंदू आबादी करीब 84 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी करीब 12 प्रतिशत है. इसके अलावा सिख समुदाय की आबादी भी करीब 2 प्रतिशत है.

Q. जिले में किस पार्टी का ऐतिहासिक तौर पर दबदबा रहा है?
A. शहरी सीटों पर भाजपा का दबदबा लगातार बना रहा है, खासकर देहरादून कैंट, मसूरी और ऋषिकेश जैसी सीटों पर इसका प्रभाव है. वहीं चकराता सीट दशकों से कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता है.

Q. 2027 के चुनाव से पहले फिलहाल राजनीतिक माहौल कैसा है?
A. मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण का काम तेजी से चल रहा है और रायपुर सीट अब जिले की सबसे बड़ी सीट बन गई है.

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Explainer: कैसे चुने जाते हैं 'National Awards' विनर्स? जानिए पूरा प्रोसेस

National Film Awards: भारत में फिल्मों के लिए मिलने वाला सबसे बड़ा सम्मान नेशनल फिल्म अवॉर्ड माना जाता है. हर साल जब इन अवॉर्ड्स के विनर्स  के नाम सामने आते हैं, तो लोगों के मन में एक सवाल उठता है कि आखिर विनर्स का चयन कैसे किया जाता है. लोग जानना चाहते हैं कि बेस्ट फिल्म, बेस्ट एक्टर और बेस्ट एक्ट्रेसेस जैसे अवॉर्ड क्या सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर हिट की वजह से मिलते हैं, या इसके पीछे कोई और वजह है. तो आइए जानते हैं नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स के विनर्स चुनने का पूरा प्रोसेस.

क्या होता है नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स? 

नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स भारत में फिल्मों के लिए दिया जाने वाला सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित सम्मान माना जाता है. इसकी शुरुआत साल 1954 में हुई थी और ये पुरस्कार भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से दिए जाते हैं. हर साल हिंदी समेत देश की अलग-अलग भाषाओं में बनी बेहतरीन फिल्मों और उनसे जुड़े कलाकारों, निर्देशकों, लेखकों, संगीतकारों और तकनीकी विशेषज्ञों को इस सम्मान से सम्मानित किया जाता है. 

बता दें कि,  नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीतना किसी भी कलाकार और फिल्ममेकर के लिए गर्व की बात मानी जाती है. दरअसल, ये अवॉर्ड किसी भी कलाकार को इस वजह से नहीं दिया जाता की उसकी फिल्म ब्लॉकबस्टर साबित हो.  बल्कि इन अवॉर्ड को देने से पहले उसकी फिल्म की कहानी, स्टार्स की एक्टिंग, निर्देशन, संगीत और तकनीकी क्वालिटी को देखा जाता है. 

कौन भेजता है फिल्मों की एंट्री?

नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में किसी फिल्म को अपने आप शामिल नहीं किया जाता. इसके लिए फिल्म के निर्माता या प्रोडक्शन हाउस को अपनी फिल्म की एंट्री भेजनी होती है. एंट्री भेजने के लिए कुछ नियम भी होते हैं, जिनका पालन करना जरूरी होता है. सबसे पहले फिल्म का भारत में बनना जरूरी है और उसे सेंसर बोर्ड (CBFC) से सर्टिफिकेट मिला होना चाहिए. इसके अलावा फिल्म तय समय सीमा के भीतर रिलीज हुई होनी चाहिए. आज के समय में सिर्फ थिएटर में रिलीज होने वाली फिल्में ही नहीं, बल्कि OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई फिल्में भी नियमों को पूरा करने पर नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स के लिए आवेदन कर सकती हैं.

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जूरी और विनर्स का सलेक्शन 

नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स के विनर्स चुनने के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय एक जूरी बनाता है. इस जूरी में फिल्म, कला, साहित्य और दूसरे क्षेत्रों के अनुभवी लोगों को शामिल किया जाता है. सरकार जूरी बनाती है, लेकिन किसे अवॉर्ड देना है, इसका फैसला जूरी ही करती है.  विनर्स चुनने का काम दो चरणों में होता है. इसे टू-टियर सिस्टम कहा जाता है. पहले चरण में देश के अलग-अलग हिस्सों के लिए उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम की अलग-अलग जूरी बनाई जाती है. ये जूरी अपने-अपने क्षेत्र की फिल्मों को देखकर अच्छी फिल्मों को आगे भेजती हैं.

जूरी को फॉलो करने होते हैं नियम

इसके बाद सेंट्रल जूरी इन फिल्मों को देखती है. इसमें चेयरपर्सन समेत 11 सदस्य होते हैं. जूरी फिल्मों और कलाकारों के काम को देखकर आपस में चर्चा करती है और फिर अलग-अलग कैटेगरी में अंतिम विनर्स का फैसला करती है. वहीं, जूरी सदस्यों के लिए कई नियम बनाए गए हैं.  उन्हें हर फिल्म पूरी देखनी होती है, अगर किसी सदस्य ने कोई फिल्म पूरी नहीं देखी है, तो वो उस फिल्म पर वोट नहीं कर सकता है. इसके अलावा जूरी की चर्चा और फैसलों को पूरी तरह सीक्रेट रखा जाता है.  वहीं, नियमों का उल्लंघन करने पर सदस्य को भविष्य में जूरी का हिस्सा बनने से रोका भी जा सकता है.

फिल्म की कमाई से नहीं मिलता अवॉर्ड

नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में किसी फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर कितनी कमाई की है, ये सबसे जरूरी बात नहीं होती. जूरी फिल्म को कई चीजों के आधार पर देखती है. इसमें फिल्म की कहानी, एक्टिंग, डायरेक्शन, संगीत और फिल्म बनाने का तरीका शामिल होता है. फिल्म का दर्शकों और समाज पर क्या असर पड़ा, इसे भी ध्यान में रखा जाता है. यही वजह है कि कई बार ऐसी फिल्में भी नेशनल अवॉर्ड जीत जाती हैं, जिन्होंने बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा कमाई नहीं की होती.

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कभी-कभी नहीं दिया जाता अवॉर्ड

नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स की एक खास बात ये भी है कि अगर जूरी को किसी कैटेगरी में कोई एंट्री तय स्तर की नहीं लगती, तो उस साल उस कैटेगरी में अवॉर्ड नहीं दिया जाता है. बता दें, वैसे तो फिल्म इंडस्ट्री में कई अवॉर्ड शो होते हैं, लेकिन नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स को सबसे ज्यादा सम्मान मिलता है क्योंकि ये पॉपुलैकिटी से ज्यादा टैलेंट को महत्व देता है. इसी वजह से किसी भी कलाकार के लिए नेशनल अवॉर्ड जीतना गर्व की बात होती है.

कब और कहां होगा नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स? 

इस साल 72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स की बात करे तो ये गुजरात के एकता नगर (केवड़िया) में 22 सितंबर 2026 को आयोजित किया जाएगा. वहीं, हर साल की तरह इस बार भी देशभर के टेलेंटड कलाकारों, निर्देशकों, लेखकों और तकनीशियनों को इस दौरान सम्मानित किया जाएगा. वहीं, समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू विजेताओं को अवॉर्ड देंगी. बता दें, इससे पहले नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स समारोह नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित किए जाते थे.

किन सेलेब्स को मिलेगा सम्मान?

बता दें, इस बार के नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स की घोषणा 18 जुलाई 2026 को हो गई थी. फिल्म 'आर्टिकल 370' को बेस्ट फीचर फिल्म का अवॉर्ड मिला है. इसके अलावा यामी गौतम (Yami Gautam) को बेस्ट एक्ट्रेस चुना गया है और कार्तिक आर्यन (Kartik Aryan) और मलयालम सुपरस्टार ममूटी ममूटी (Mammootty) को संयुक्त रूप से बेस्ट एक्टर का सम्मान मिलेगा.  इसके अलावा एक्टर और फिल्म निर्माता रणदीप हुड्डा को उनकी फिल्म 'स्वातंत्र्य वीर सावरकर' के लिए बेस्ट डेब्यू निर्देशक का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलेगा.

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