डॉक्टर को मारने वाले शिवसेना पार्षद की जमानत पर सुनवाई:सुप्रीम कोर्ट बोला- हालात बद्तर हुए, ऐसे लोग सड़कों पर नहीं घूमना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महाराष्ट्र में डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों से मारपीट के एक केस में सुनवाई की। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा- ऐसे हमले कानून-व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर मुद्दा बन रहे हैं। इन लोगों को सड़कों पर घूमने का हक नहीं है। मामला डोंबिवली के नगर निगम अस्पताल में डॉक्टरों और कर्मचारियों से शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे की मारपीट से जुड़ा है। अस्पताल में कोई बेड खाली नहीं था। इसलिए डॉक्टरों ने मरीज को दूसरे अस्पताल जाने का। नाराज लोगों ने शिवसेना पार्षद रमेश को अस्पताल बुला लिया, जहां उन्होंने मारपीट की। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की उस याचिका पर सुनवाई की, जिसमें म्हात्रे और अन्य आरोपियों को जमानत देने के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई है। बेंच ने म्हात्रे और अन्य आरोपियों को नोटिस जारी किया है। उन्हें जवाब देने के लिए तीन हफ्ते का समय दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई बाद में होगी। पहले देखें जुलाई में हुई घटना की 4 तस्वीरें… कोर्ट ने पार्षद के वकील से पूछा- इसे सही कैसे ठहरा सकते हैं सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पालघर में डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों पर हुए एक नए हमले का भी जिक्र लिया। बेंच ने कहा, “कल एक और घटना हुई। वही लोग फिर डॉक्टरों पर हमला कर रहे हैं।” म्हात्रे के वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि उन्होंने मामले की जांच की है और पालघर की घटना में शामिल लोग वही नहीं थे। इस पर बेंच ने साफ किया कि वह “विचारधारा” की बात कर रही थी। बेंच ने सवाल किया कि ऐसे हमलों को सही कैसे ठहराया जा सकता है। कोर्ट ने कहा, “आप अस्पताल के अंदर जाकर डॉक्टरों और कर्मचारियों पर हमला कैसे कर सकते हैं? उन्हें बेरहमी से कैसे पीट सकते हैं?” बॉम्बे हाईकोर्ट की शर्तों को चुनौती सुप्रीम कोर्ट डोंबिवली हमले के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की ओर से म्हात्रे को राहत देते समय लगाई गई कड़ी शर्तों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था। मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि जांच और ट्रायल जल्दी पूरा करने के हाईकोर्ट के निर्देशों से ऐसा लगता है कि मामले में पहले ही फैसला मान लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि जल्दी ट्रायल पर आपत्ति को लेकर सवाल किया और कहा, “एक संदेश जाना जरूरी है।” बेंच ने इससे पहले संकेत दिया था कि वह डोंबिवली में 6 जुलाई को हुए हमले के मामले में म्हात्रे की जमानत रद्द करने पर विचार कर रही है। इसके बाद म्हात्रे ने कड़ी जमानत शर्तों को चुनौती देने वाली अपनी अपील वापस ले ली। डॉक्टर बोले- गुंडे नजर रख रहे हैं, अब कभी नहीं लौटूंगा पीड़ित डॉक्टर ने मीडिया से कहा, ‘ मैं घटना के बाद खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा हूं। इसलिए मैंने इस्तीफा दे दिया है और ठाणे छोड़ दिया है।’ डॉक्टर ने कहा, ‘यहां बहुत डर का माहौल है। गुंडे नजर रख रहे हैं। दूसरे डॉक्टर काम करना चाहें तो करें, लेकिन मैं अब कभी ठाणे वापस नहीं लौटूंगा।’
क्या राहुल गांधी ने छोटी लड़ाई को बड़ा बनाया:निशु और स्वतंत्र भारद्वाज में 3 समानताएं, फिर दोनों की लड़ाई में क्यों कूदे राहुल
‘निशु के बाप का सिर फोड़ा और कुछ नहीं हुआ...’ इस एक बयान ने स्वतंत्र भारद्वाज को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। सोशल मीडिया पर दो खेमे आमने-सामने हैं। कोई स्वतंत्र को सही बता रहा है, तो कोई निशु आजाद के बयानों और देवी-देवताओं पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी पर सवाल उठा रहा है। अब स्वतंत्र का परिवार सीधे राहुल गांधी पर सवाल उठा रहा है। आरोप है कि बच्चों की छोटी-सी लड़ाई को जातीय रंग देकर बड़ा बना दिया गया। क्या वाकई ऐसा है, निशु और स्वतंत्र एक जैसे कैसे हैं, स्वतंत्र का आगे क्या होगा, समझेंगे; बूझे की नाहीं में...। निशु आजादः अंबेडकरवादी सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर गाजियाबाद की रहने वाली 15 साल की निशु आजाद सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर है। उसके X के बायो के मुताबिक, वह एक अंबेडकरवादी/बहुजन एक्टिविस्ट हैं, जो सामाजिक न्याय और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी राय रखती हैं। हालांकि, समय-समय पर वह विवादित वीडियो भी पोस्ट करती है। वह जून-जुलाई 2026 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन के दौरान सुर्खियों में आईं। स्वतंत्र भारद्वाजः भाजपा समर्थक कंटेंट क्रिएटर बिहार के दरभंगा जिले के मूल निवासी स्वतंत्र भारद्वाज के माता-पिता पटना के कंकड़बाग में रहते हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट स्वतंत्र UPSC की तैयारी के लिए दिल्ली में रहता था। बाद में सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों से जुड़े प्रदर्शनों में शामिल होने लगा। स्वतंत्र सोशल मीडिया पर अक्सर विवादित और राजनीतिक मुद्दों से जुड़े वीडियो डालता है। आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की बात भी करता है। उसके इंस्टाग्राम अकाउंट पर 1.8 लाख और फेसबुक पर 3.41 लाख फॉलोअर्स हैं। फिलहाल उसका इंस्टाग्राम अकाउंट बंद है। खुद को वह BJP का समर्थक बताता है। बायो में लिखा है- ‘स्वतंत्र सनातनी योद्धा।’ निशु और स्वतंत्र दोनों के हिन्दू धर्म को लेकर नफरती विचार हैं। निशु खुद को नास्तिक और हिन्दू देवी-देवताओं को काल्पनिक बताती है। वहीं, स्वतंत्र खुद को कथित सनातनी योद्धा बताता है। हिन्दू देवी-देवताओं को अनाप-शनाप बोलती है निशु 5 सितंबर को निशु आजाद और उनके पिता संजय आजाद के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट अमिता सचदेवा ने दिल्ली के साइबर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई है। अमिता सचदेवा का कहना है कि निशु नाबालिग हैं, इसलिए उनके पिता को अभिभावक के तौर पर जिम्मेदार मानते हुए दोनों पर कार्रवाई की मांग की गई है। इसके अलावा निशु का सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल है, जिसमें वह कथित तौर पर कहती है- ‘जब मनुस्मृति के समय नारी को शिक्षा का अधिकार था ही नहीं, तो सरस्वती ने पीएचडी की डिग्री कहां से ली।’ हालांकि, भास्कर इस वीडियो की पुष्टि नहीं करता। खुद को सनातनी योद्धा बताता है स्वतंत्र स्वतंत्र भारद्वाज खुद को सनातनी योद्धा बताता है। वह अखंड हिन्दू राष्ट्र की मांग करता है। उसके सोशल मीडिया अकाउंट में मुसलमानों, विपक्षी नेताओं और आरक्षण को निशाना बनाने वाली कई पोस्ट भी हैं। उसके सोशल मीडिया अकाउंट्स पर कथित तौर पर कई भड़काऊ पोस्ट हैं। अपने हालिया पोस्ट में उसने अभिनेत्री स्वरा भास्कर को जौहर प्रथा पर उनकी टिप्पणियों के जवाब में निशाना बनाया है। एक अन्य पोस्ट में उसने राम मंदिर चंदा चोरी विवाद को लेकर अखिलेश यादव के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल किया है। दोनों के सोशल मीडिया अकाउंट को खंगालने पर पता चला कि दोनों गाली-गलौज और जातीय नफरत फैलाने के मुहिम में जुटे हैं। इसे सिलसिलेवार तरीके से जानिए… निशुः मोदी की कथित तेरवहीं की, ब्राह्मणों को अपशब्द कहे जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए प्रोटेस्ट के दौरान निशु ने PM मोदी की कथित तेरहवीं का भोज कर दिया। वह एक वीडियो में कथित तौर पर समोसा देते हुए लोगों को कह रही है मोदी की तेरहवीं का खाना है। इंजॉय कीजिए। 9 नवंबर 2024 को निशु ने अपने X पर लिखा- ब्राह्मणों ने हिंदू वैदिक धर्म के नाम पर स्त्री जाति का अपमान किया। दलित की बहू शादी के बाद पहली रात सवर्ण के घर भेजी जाती थी, उसका चीर हरण करने के लिए। स्वतंत्रः जातीय श्रेष्ठता का प्रदर्शन और डींगें हांकना शौक …तो क्या वाकई राहुल गांधी ने मामले को जातीय रंग दिया? दरअसल, 2 सितंबर को यूट्यूब चैनल पर आए स्वतंत्र के इंटरव्यू के बाद निशु ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को टैग करते हुए मदद मांगी। 3 सितंबर को राहुल गांधी ने X पर लिखा, ‘निशु हम तुम्हारे साथ हैं। अमित शाह की दिल्ली पुलिस एक तरफ छात्रों के साथ अमानवीय बर्बरता करती है। दूसरी तरफ दलित लड़की के पिता का सिर फोड़ने वाला अपराधी खुलेआम घूम रहा है।’ राहुल गांधी के इस पोस्ट के बाद राजनीति गरमा गई। स्वतंत्र भारद्वाज के चाचा अजीत झा ने भास्कर से कहा, दो लोगों की लड़ाई थी। राहुल गांधी ने इसे जातीय रंग दे दिया। स्वतंत्र को राजनीति करके फंसाया जा रहा है। इस मुद्दे पर हर पार्टी राजनीति कर रही है। दो बच्चों के बीच का मामला था, उसे राष्ट्रीय स्तर का बना दिया गया।' सीनियर जर्नलिस्ट अरविंद मोहन कहते हैं, 'राहुल गांधी इस मुद्दे को दो कारणों से मजबूती से उठा रहे हैं। अरविंद मोहन कहते हैं, 'सामने UP में चुनाव है। चंदा चोरी इससे बड़ा इश्यू है, लेकिन टैक्टिकली वो चंदा चोरी से ज्यादा इन सब मुद्दों को उठा रही है। वो जानती है कि जितनी मजबूती से वो सरकार को इस इश्यू पर घेर रही है, चंदा चोरी पर नहीं घेर सकती है। यही कारण है कि राहुल टेक्टिकली इश्यू को उठा रहे हैं।' निशु क्या विक्टिम कार्ड खेल रही है? सीधे तौर पर नहीं कह सकते, लेकिन उसके दावे पुलिस की जांच में अलग कहानी कह रहे। निशु आजाद के 2 दावों की हकीकत… 1. CJP का दावा- संजय की खोपड़ी फटी, पुलिस बोली दावा गलत निशु ने आरोप लगाया, ‘पिता संजय आजाद के साथ मारपीट की घटना के तुरंत बाद FIR दर्ज करवाई, लेकिन डेढ़ महीने से पुलिस कुछ नहीं कर रही। हमें मेडिकल के नाम पर घुमा रही है।’ 3 सितंबर को CJP के प्रवक्ता सौरभ दास ने दिल्ली पुलिस पर आरोप लगाया, ‘संजय की खोपड़ी बुरी तरह फटी थी। हत्या की कोशिश का मामला बनता, लेकिन दिल्ली के DCP सचिन शर्मा और ACP अजय शर्मा ने FIR में इसकी धारा जोड़ने से इनकार कर दिया, क्योंकि इससे स्वतंत्र भारद्वाज को गिरफ्तार करना पड़ता। हमसे कहा गया- जाओ कोर्ट से ऑर्डर लेकर आओ।' चोट सामान्य थी, कोई फैक्चर नहींः दिल्ली पुलिस 2. निशु बोली-घर पर हमला हुआ, पुलिस ने किया खारिज निशु आजाद ने एक वीडियो और फोटो शेयर कर आरोप लगाया कि 5 सितंबर की रात कुछ लोगों ने घर पर दो बार पथराव किया। हम डर के साये में हैं। हमें सुरक्षा चाहिए। वहीं, गाजियाबाद जिले के शालीमार गार्डन ACP अतुल कुमार सिंह ने बताया, जांच में मामला फर्जी पाया गया है। हमने घटनास्थल का निरीक्षण किया था। दीवार, ग्रिल, शीशे पर पत्थर लगने के निशान नहीं मिले हैं। पड़ोसियों ने भी पथराव की घटना से इनकार किया है। CCTV फुटेज से भी घटना की पुष्टि नहीं हुई है। स्वतंत्र भारद्वाज का आगे क्या होगा? दिल्ली पुलिस ने ताजा विवाद से पहले इस मामले में BNS की 3 धाराओं में FIR दर्ज की थी- 115 (2), यानी सामान्य मारपीट; 126(2), यानी जबरन रोकना और 3(5), यानी एक से ज्यादा लोगों का एक साथ किसी अपराध के लिए एकजुट होना। बाद में उसने इंटरव्यू में दावा किया कि उसने निशु के पिता का सिर फोड़ दिया था। उसके बाद उस पर SC/ST एक्ट और पॉस्को एक्ट की धारा के साथ नई FIR की गई और उसे 5 सितंबर को गिरफ्तार कर लिया गया। कोर्ट ने उसे 21 सितंबर तक जेल भेज दिया।
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