मिडिल ईस्ट जल रहा है। रूस यूक्रेन युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा है और इन सबके बीच भारत की धड़कनें तेज हैं। क्योंकि हम अपनी जरूरत का 89% तेल विदेशों से मंगाते हैं। अगर कल सप्लाई रुक गई तो भारत थम जाएगा। आपने अक्सर सुना होगा कि राजस्थान की रेतीली जमीन पर जीवन जीना कितना कठिन है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यही तपता हुआ थार रेगिस्तान आने वाले समय में भारत की एनर्जी सिक्योरिटी यानी ऊर्जा सुरक्षा का सबसे बड़ा किला बनने जा रहा है। एक ऐसी जगह जहां पानी मिलना मुश्किल था। वहां अब काला सोना यानी क्रूड ऑयल उबल रहा है। भारत को अपनी रफ्तार बनाए रखने के लिए हर दिन लगभग 50 लाख यानी 5 मिलियन बैरल कच्चे तेल की जरूरत होती है। लेकिन कड़वा सच यह है कि हम अभी अपनी जरूरत का 85% हिस्सा विदेशों से आयात करते हैं। चाहे वह मिडिल ईस्ट के देश हो या रूस के। हाल ही में हमने देखा कि स्टेट ऑफ हॉर्मोज में तनाव की वजह से वैश्विक तेल सप्लाई कितनी बुरी तरह प्रभावित हुई है। दुनिया का 1/5 हिस्सा तेल और गैस इसी रास्ते से आता है। जब भी वहां कोई संकट आता है भारत की इकॉनमी पर दबाव बढ़ जाता है। रूस पर लगे प्रतिबंधों ने सप्लाई चेन को अनिश्चित बना दिया।
दुनिया का 1/5 हिस्सा तेल और गैस इसी रास्ते से आता है। जब भी वहां कोई संकट आता है भारत की इकॉनमी पर दबाव बढ़ जाता है। रूस पर लगे प्रतिबंधों ने सप्लाई चेन को अनिश्चित बना दिया। ऐसे में सवाल यह उठा कि क्या भारत हमेशा दूसरों के भरोसे रहेगा? और इसी सवाल का जवाब छिपा है राजस्थान के रेतीली धोरों में। दरअसल राजस्थान के बाड़मेर बेसिन में साल 2004 में तेल के बड़े भंडार मिले थे। इन्हें नाम दिया गया मंगला भाग्यम और ऐश्वर्या यानी कि एमबीए। यह सिर्फ नाम नहीं है। यह भारत की उम्मीदें हैं। यहां करीब 1 बिलियन बैरल तेल का भंडार है। आपको जानकर हैरानी होगी कि अकेले मंगला फील्ड से अब तक 500 मिलियन बैरल तेल निकाला जा चुका है। आज भारत के कुल घरेलू तेल उत्पादन का लगभग 20% हिस्सा अकेला इसी क्षेत्र से आता है। लेकिन अब यहां एक चुनौती खड़ी हो गई थी। पुराने कुओं से तेल निकलना मुश्किल होता जा रहा था और उत्पादन 51,000 बैरल प्रतिदिन पर सिमट गया था। लेकिन अब लक्ष्य है इसे 80,000 बैरल प्रतिदिन तक ले जाना। चुनौतियां यह थी कि जो तेल बचा है वह बहुत गाढ़ा और चिपचिपा है। वह आसानी से बाहर नहीं आता है। इसे निकालने के लिए भारत अब दो वर्ल्ड क्लास टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहा है। पहली टेक्नोलॉजी है एएसपी। इसमें जमीन के अंदर खास तरह के केमिकल्स डाले जाते हैं जो तेल की चिपचिपाहट को कम कर देते हैं और तेल आसानी से पाइप के जरिए ऊपर आ जाता है।
इसमें जमीन की गहराई में बेहद गर्म भाप भेजी जाती है। इसमें जमा हुआ तेल पिघल जाता है और उसे पंप करना आसान हो जाता है। जैसलमेर में इस तकनीक का ट्रायल इतना सफल रहा कि वहां उत्पादन में 70% की बढ़ोतरी देखी गई। अब यही फार्मूला पूरे राजस्थान के तेल क्षेत्रों में लागू किया जा रहा है। सिर्फ तेल निकालना काफी नहीं होता है दोस्तों। उसे साफ करना यानी रिफाइन करना बहुत जरूरी है और अभी तक यह तेल टैंकरों के जरिए गुजरात की कोयाली रिफाइनी भेजा जाता था। लेकिन अब खेल बदलने वाला है। राजस्थान के बाड़मेर में एचपीसीएल द्वारा एक विशाल रिफाइनरी बनाई जा रही है।
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भारतीय सेना की मारक क्षमता को लेकर अब एक ऐसा फैसला लिया गया है जो कि आने वाले दशकों तक देश की सरहद की सुरक्षा को नई दिशा देगा। AK203 एक ऐसी राइफल जिसने अपनी मजबूती और अचूक निशाने से दुनिया को अपना मुरीद बनाया। अब उसे अपनी शक्ति भी भारत से ही मिलेगी। अडानी डिफेंस एंड एयररोस्पेस ने इंडो रशियन राइफल प्राइवेट लिमिटेड आईआरआरपीएल के साथ 5 साल का मेगा एग्रीमेंट साइन कर लिया है। अब भारत की मिट्टी में ही बनी हुई गोलियां रूस की तकनीक से बनी हुई राइफलों से निकलेंगी। यह केवल एक कमर्शियल डील नहीं है बल्कि मेड इन इंडिया के सीने पर गर्व का नया तामगा भी है। अब सबसे पहले समझौते की गहराई को समझते हैं। अडानी डिफेंस ने अगले 5 सालों के लिए आईआरआरपीएल के साथ हाथ मिलाया। इस डील का मुख्य केंद्र है 7.62 * 39 एमm का स्मॉल कैलिबर एमुनेशन। यह वही गोलियां हैं जो कि AK 203 राइफल की जान मानी जाती हैं। इस समझौते का सबसे बड़ा जो रणनीतिक लाभ है वो यह है कि यह एक इंटीग्रेटेड डोमेस्टिक सप्लाई चेन का निर्माण करेगा।
आज के दौर में जब दुनिया में युद्धों की वजह से सप्लाई चेन टूट रही है तब भारत ने यह सुनिश्चित किया है कि हमारी राइफल्स के लिए गोला बारूद की कमी नहीं होनी चाहिए। यह आत्मनिर्भरता का वो मॉडल है जहां हथियार बनाने वाली संस्था और गोला बारूद बनाने वाली संस्था एक साथ भारत को बाहरी दबाव से मुक्त कर रहे हैं। अब भारत को रूस या किसी देश से बाहर से बार-बार गोलियां मंगवाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आईआरआरपीएल यानी कि इंडो रशियन राइफल प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना साल 2019 में हुई थी। यह भारत और रूस के बीच अटूट रक्षा संबंधों का जीता जागता उदाहरण है। उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले के कोरवा में स्थित इसकी फैक्ट्री आधुनिक हथियारों का नया मंदिर बन चुकी है। इस जॉइंट वेंचर में भारत की ओर से एडवांस वेपन एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड और म्यूशन इंडिया लिमिटेड शामिल है। और वहीं रूस की तरफ से विश्व प्रसिद्ध श्वता क्रशिकोफ और रोसोबनोट एक्सपर्ट इसकी रीड है। दिसंबर 2021 में सरकार ने 61400 27 AK203 राइफल्स के उत्पादन का जो कॉन्ट्रैक्ट दिया था वह अब पूरी रफ्तार पकड़ चुका है। इस फैक्ट्री से निकलने वाली हर राइफल के लिए स्वदेशी चारा यानी कि गोला बारूद भी तैयार हो रहा है।
इस पूरी कहानी में अडानी डिफेंस का रोल बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। उत्तर प्रदेश के कानपुर में अडानी डिफेंस ने दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा एमुनेशन और मिसाइल कॉम्प्लेक्स विकसित किया है। यह जो फैसिलिटी है, यह केवल ईंट पत्थरों से नहीं बनी है बल्कि यह भारत की निजी क्षेत्र की रक्षा क्षमताओं का प्रतीक बन रही है। इस समझौते के तहत अडानी डिफेंस ना केवल गोलियों की सप्लाई करेगी बल्कि वह भारतीय सेना की कंटिन्यूटी ऑफ एमुनेशन यानी कि गोला बारूद की निरंतर उपलब्धता की गारंटी देगी। यह डिफेंस सेक्टर में प्राइवेट प्लेयर के बढ़ते हुए दबदबे को भी दिखाता है। कानपुर के प्लांट की क्षमता इतनी है कि वह ना केवल भारतीय सेना बल्कि आने वाले समय में मित्र देशों की जरूरतों को भी पूरा कर सकते हैं। यह आत्मनिर्भर भारत की उस सोच को साकार करता है जहां हम ना सिर्फ हथियार खरीदेंगे बल्कि उसके बड़े उत्पादक भी बनेंगे।
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