ISRO की भूमिका नहीं होगी कम, IN-SPACe प्रमुख Pawan Goenka ने दिया स्पष्टीकरण
नयी दिल्ली, छह सितंबर भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (इन-स्पेस) के अध्यक्ष पवन गोयनका ने रविवार को कहा कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की भूमिका किसी भी तरह कम नहीं हो रही है और वह भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र की आधारशिला बना रहेगा। अंतरिक्ष विभाग के तहत एक स्वायत्त एजेंसी इन-स्पेस गैर-सरकारी संस्थाओं की विभिन्न अंतरिक्ष गतिविधियों को बढ़ावा देने, सक्षम बनाने, अधिकृत करने और उनकी निगरानी का काम करता है। गोयनका ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘2020 से किए गए सुधार भारत के समग्र अंतरिक्ष परिवेशी तंत्र का विस्तार करने से जुड़े हैं।
इसका उद्देश्य उद्योग को परिपक्व प्रक्षेपण यानों, उपग्रहों और अन्य प्रणालियों के निर्माण तथा बड़े पैमाने पर उत्पादन में तेजी से आगे बढ़ने का अवसर देना है।’’ उन्होंने कहा कि वहीं, इसरो का ध्यान उन्नत अनुसंधान एवं विकास, वैज्ञानिक मिशन, रणनीतिक अभियानों, नई प्रौद्योगिकियों और ऐसे बुनियादी ढांचे पर रहेगा, जिसे निजी क्षेत्र अपने दम पर विकसित करने में सक्षम नहीं है। गोयनका की यह टिप्पणी इसरो के नौ कर्मचारी संगठनों द्वारा अंतरिक्ष एजेंसी के अध्यक्ष वी नारायणन को पत्र लिखकर इसरो के विनिर्माण और परिचालन कार्यों को निजी संस्थाओं को हस्तांतरित करने के प्रस्ताव पर आधिकारिक स्पष्टीकरण मांगे जाने के बाद आई है। चार सितंबर को लिखे पत्र में कर्मचारी संगठनों ने गोयनका की 21 अगस्त की टिप्पणियों का उल्लेख किया।
गोयनका ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कथित तौर पर कहा था, ‘‘अंतत: इसरो कोई भी प्रक्षेपण यान नहीं बनाएगा और न ही किसी प्रक्षेपण यान का निर्माण करेगा। यह सब निजी क्षेत्र या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (पीएसयू) द्वारा किया जाएगा।’’ कर्मचारी संगठनों ने दावा किया कि इन टिप्पणियों के बाद अंतरिक्ष विभाग की ओर से कोई ऐसी आधिकारिक सूचना जारी नहीं की गई जिसमें स्वीकृत नीति, उसके कानूनी और प्रशासनिक आधार, उसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने की प्रक्रिया तथा मौजूदा कर्मचारियों और भविष्य की सरकारी भर्तियों पर पड़ने वाले असर को स्पष्ट किया गया हो। पत्र में कहा गया है, ‘‘इसरो द्वारा विकसित प्रौद्योगिकी राष्ट्रीय संपत्ति है।
इसका हस्तांतरण पारदर्शी एवं जवाबदेह होना चाहिए तथा यह रणनीतिक, सुरक्षा और रोजगार संबंधी पहलुओं के अनुरूप होना चाहिए तथा कर्मचारियों को इसकी जानकारी समाचार पत्रों की खबरों के जरिये नहीं मिलनी चाहिए।’’ गोयनका ने रविवार को इससे पहले सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि भारत को 2030 तक हर साल 50 प्रक्षेपण के लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए इसरो और निजी कंपनियों को मिलकर काम करना होगा। उन्होंने कहा, ‘‘इतने बड़े लक्ष्य को कोई एक संगठन अकेले हासिल नहीं कर सकता।’’ इन-स्पेस के अध्यक्ष ने यह भी रेखांकित किया कि इसरो का अनुसंधान क्या संभव है, इसकी सीमाओं को लगातार आगे बढ़ाता रहेगा। उन्होंने कहा, ‘‘निजी उद्योग को इस गति को बड़े पैमाने पर विनिर्माण में बदलना होगा—अधिक रॉकेट, अधिक उपग्रह, अधिक प्रक्षेपण क्षमता और नई प्रौद्योगिकियां।
Tier-2 और Tier-3 शहरों के Startup में भारी नवाचार क्षमता, बोले Jitendra Singh
कोलकाता, छह सितंबर केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने रविवार को ‘‘तेजी से विस्तार कर रहे’’ भारत के स्टार्टअप परिवेशी तंत्र को महानगरों से आगे ले जाने की जरूरत पर जोर दिया और कहा कि द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों की नवाचार क्षमता को पहचानने की आवश्यकता बढ़ रही है। सिंह ने यहां ‘आरआईएसई (रिसर्च, इनोवेशन, स्टार्ट-अप एंड एंटरप्रेन्योरशिप) कॉन्क्लेव 2026’ के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि देश में स्वदेशी प्रौद्योगिकियों को प्रयोगशालाओं से बाजार तक तेजी से पहुंचाने के लिए विज्ञान, स्टार्टअप और उद्योग के बीच मजबूत संबंध स्थापित किए जाने चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘टीयर-2 और टीयर-3 शहरों की नवाचार क्षमता को पहचानने की जरूरत बढ़ रही है।
भारत के 50-60 प्रतिशत से अधिक स्टार्टअप महानगरों से नहीं हैं। उन्होंने कहा, ‘‘छोटे शहरों के युवा नवोन्मेषक तेजी से बड़े शहरों के अपने समकक्षों की बराबरी कर रहे हैं और कई मामलों में उनसे बेहतर प्रदर्शन भी कर रहे हैं। ऐसे में वैज्ञानिक संस्थानों और नवाचार परिवेशी तंत्र के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे इन युवाओं तक पहुंचें, न कि उनसे स्थापित प्रौद्योगिकी केंद्रों तक आने की उम्मीद करें।’’ उन्होंने यह भी कहा कि भारत करीब 2,40,000 ‘स्टार्ट-अप’ के साथ दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ‘स्टार्ट-अप’ परिवेशी तंत्र बनकर उभरा है।
सिंह ने कहा कि आरआईएसई कॉन्क्लेव के आयोजन स्थल के रूप में कोलकाता का चयन विशेष महत्व रखता है, क्योंकि भारत की वैज्ञानिक और शैक्षणिक यात्रा में इस शहर का ऐतिहासिक योगदान रहा है। बंगाल की वैज्ञानिक उत्कृष्टता और संस्थान निर्माण की लंबी परंपरा को याद करते हुए उन्होंने कहा कि कोलकाता ने कई प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों और संस्थानों को जन्म दिया तथा उनका पोषण किया है, जिन्होंने भारत की बौद्धिक और वैज्ञानिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। सिंह ने पश्चिम बंगाल की वैज्ञानिक और बौद्धिक विरासत को पुनर्स्थापित करने का आह्वान करते हुए कहा कि कोलकाता ऐतिहासिक रूप से ‘‘नए चलन की शुरुआत करने वाला’’ रहा है और देश के भविष्य को आकार देने में अब भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
केंद्रीय मंत्री सिंह ने कहा कि भारत के वैश्विक प्रौद्योगिकी और स्टार्ट-अप के प्रमुख शक्ति केंद्र बनने की यात्रा में उसके ऐतिहासिक उत्कृष्टता केंद्रों की विरासत को फिर से हासिल करना भी शामिल होना चाहिए। डॉ. बिधान चंद्र रॉय और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी समेत अन्य प्रमुख हस्तियों का उल्लेख करते हुए सिंह ने कहा कि मौजूदा पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि वह इस असाधारण विरासत को आगे बढ़ाए और कोलकाता को वैज्ञानिक एवं तकनीकी उत्कृष्टता के प्रमुख केंद्र के रूप में फिर से स्थापित करने में मदद करे। सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार का ‘समग्र सरकारी’ दृष्टिकोण अब तेजी से ‘समग्र विज्ञान’ दृष्टिकोण में बदल रहा है, जिसके तहत विभिन्न मंत्रालयों, विभागों, अनुसंधान संस्थानों, शिक्षण जगत और उद्योग को एक साथ लाया जा रहा है।
एक आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, उन्होंने कहा, ‘‘भारत ने हाल के वर्षों में निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए उन क्षेत्रों में नए अवसर पैदा किए हैं, जो पहले बड़े पैमाने पर उद्योग के लिए बंद थे। इनमें अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और जैव प्रौद्योगिकी शामिल हैं। इन क्षेत्रों को खोलने से स्टार्टअप और कारोबारी इकाइयों के लिए राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी विकास में भाग लेने का नया माहौल बना है।’’ मंत्री ने उद्योग जगत से आगे आने और भारतीय प्रयोगशालाओं से विकसित हो रही स्वदेशी प्रौद्योगिकियों को अपनाने, समर्थन देने, वित्त पोषित करने तथा उनका व्यावसायीकरण करने का आग्रह किया।
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक परियोजनाओं और स्टार्टअप को अलग-थलग रहकर कायम नहीं रखा जा सकता तथा उनके लिए कारोबार और उद्योग के साथ पारस्परिक रूप से लाभकारी संबंध जरूरी हैं। सिंह ने कहा कि पूर्वी भारत की वैज्ञानिक एवं तकनीकी ताकत, उसके मजबूत शैक्षणिक और औद्योगिक आधार के साथ मिलकर देश की प्रौद्योगिकी आधारित वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उन्होंने कहा कि स्टार्टअप प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के प्रमुख माध्यम बन सकते हैं, जबकि इस्पात, एल्युमिनियम, खनन, जूट, सूचना प्रौद्योगिकी और सॉफ्टवेयर जैसे क्षेत्रों में स्थापित उद्योग स्वदेशी प्रौद्योगिकियों को बड़े पैमाने पर अपनाने में महत्वपूर्ण भागीदार बन सकते हैं।
विज्ञप्ति के अनुसार, सम्मेलन में आठ समझौता ज्ञापन (एमओयू) और चार प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पहल प्रमुख आकर्षण रहीं।
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