शेयर बाजार में इस हफ्ते हलचल की उम्मीद:US-ईरान तनाव, कच्चे तेल की कीमत और महंगाई-आंकड़ों जैसे 8 फैक्टर तय करेंगे बाजार की चाल
पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका-ईरान तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और अमेरिका के महंगाई आंकड़े इस हफ्ते शेयर बाजार की दिशा तय करेंगे। इसके अलावा विदेशी निवेशकों का रुख, डॉलर के मुकाबले रुपए की चाल और नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को होने वाला 18वां ब्रिक्स सम्मेलन भी घरेलू बाजार पर असर डालेंगे। इस हफ्ते 8 फैक्टर्स बाजार की दिशा तय कर सकते हैं… 1. US-ईरान के बीच बढ़ा तनाव इरान ने स्ट्रैट ऑफ होर्मुज में एंट्री करने की कोशिश कर रहे एक अमेरिकी जहाज पर हमला करने का दावा किया है। इसके एक दिन पहले अमेरिकी सेना ने नौसैनिक जहाजों पर मिसाइल हमले के जवाब में तीन ईरानी तेल टैंकरों पर हमला किया था। इस घटनाक्रम से भू-राजनीतिक संकट गहरा गया है। 2. कच्चे तेल की कीमतों में उछाल स्ट्रैट ऑफ होर्मुज में सप्लाई में रुकावट आने की आशंका से ब्रेंट क्रूड पिछले हफ्ते 8% और WTI क्रूड 9% से ज्यादा बढ़ गया। मार्केट एक्सपर्ट्स के मुताबिक, एनर्जी मार्केट में भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ने से ग्लोबल बॉन्ड यील्ड बढ़ी है, जिससे जोखिम वाले एसेट्स पर दबाव बना है। 3. अमेरिकी महंगाई के आंकड़े मजबूत अमेरिकी रोजगार आंकड़ों के बाद अब सबकी नजरें US इन्फ्लेशन डेटा पर हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि यूएस फेडरल रिजर्व की नीतियों और ग्लोबल मार्केट सेंटिमेंट को आकार देने में यह आंकड़े बेहद अहम साबित होंगे। 4. प्राइमरी मार्केट में 11 नए IPO इस हफ्ते प्राइमरी मार्केट में काफी हलचल रहेगी। रेंटोमोजो, करमतारा इंजीनियरिंग और मनोहर इलेक्ट्रिकल्स जैसी 11 मेन-बोर्ड कंपनियां आईपीओ के जरिए टोटल ₹7,055 करोड़ जुटाने की तैयारी में हैं। 5. रुपए की रिकवरी और मजबूती अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए ने पिछले पांच हफ्तों का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन किया है। केंद्रीय बैंक की विशेष योजनाओं में मजबूत डॉलर इनफ्लो से रुपए को समर्थन मिला है, जिसकी चाल पर निवेशकों की नजर रहेगी। 6. FII की लगातार बिकवाली विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने सितंबर के पहले हफ्ते में भारतीय शेयर बाजार से ₹7,443 करोड़ निकाले हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, भारत की GDP ग्रोथ 7.8% रहने और रुपया मजबूत होने के बावजूद अमेरिका में 10-वर्षीय बॉन्ड की यील्ड 4.78% होने के कारण FIIs बिकवाली कर रहे हैं। 7. ग्लोबल इकोनॉमिक इवेंट्स ग्लोबल लेवल पर अमेरिकी इन्फ्लेशन डेटा के साथ-साथ यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ECB) की बैठक, जापान का GDP ग्रोथ डेटा और चीन के महंगाई आंकड़े बाजार की चाल तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे। 8. ब्रिक्स सम्मेलन नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को 18वां ब्रिक्स सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है। इस सम्मेलन में ग्लोबल ट्रेड और आर्थिक नीतियों पर होने वाली चर्चाएं भारतीय बाजारों के सेंटिमेंट को प्रभावित कर सकती हैं। पिछले हफ्ते सेंसेक्स 1.2% गिरा था पिछले हफ्ते सेंसेक्स और निफ्टी में 1.2% तक की गिरावट दर्ज की गई। लगातार चौथे हफ्ते बाजार में गिरावट दर्ज की गई है। वहीं बीते हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन यानी शुक्रवार, 4 सितंबर को बाजार में तेजी रही। सेंसेक्स 362 अंक चढ़कर 76,515 पर बंद हुआ। निफ्टी में 24 अंक की तेजी रही, ये 23897 के स्तर पर बंद हुआ था। नॉलेज बॉक्स: क्या होता है FII और FPI आउटफ्लो? जब फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FII) या फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPI) किसी देश के शेयर बाजार से अपने शेयर बेचकर पैसा निकालते हैं, तो उसे आउटफ्लो कहा जाता है। ऐसा आमतौर पर तब होता है जब वैश्विक स्तर पर ब्याज दरें या बॉन्ड यील्ड बढ़ती हैं, जिससे निवेशक सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख करते हैं।
Explainer: एक्टर्स को फिल्म की पूरी कहानी बताई जाती है या सिर्फ अपने सीन्स? जानिए बॉलीवुड में स्क्रिप्ट रीडिंग का क्या है तरीका
Bollywood Script Reading Process: जब किसी फिल्म की अनाउंस होती है तो अक्सर लोगों के मन में सवाल आता है कि उसमें काम कर रहे एक्टर्स को फिल्म की पूरी स्क्रिप्ट दी जाती है या नहीं. आपको बता दें कि आमतौर पर ऐसा जरूरी नहीं है. किसी एक्टर को पूरी स्क्रिप्ट दी जाए, सिर्फ उसके हिस्से के सीन्स दिए जाएंगे या कहानी को अलग तरीके से समझाया जाएगा, यह फिल्म के प्रोजेक्ट, डायरेक्टर, प्रोडक्शन टीम और रोल पर डिपेंड करता है. कई फिल्मों के मेकर्स एक्टर को पूरी स्क्रिप्ट पढ़ने के लिए देते हैं. इससे एक्टर को अपनी कैरेक्टर जर्नी, स्टोरी में अपने रोल की जगह, दूसरे कैरेक्टर्स के साथ उसका रिलेशन और स्टोरी के अलग-अलग टर्न्स समझने में मदद मिलती है. खासकर जब कोई कैरेक्टर फिल्म की पूरी स्टोरी में लीड में होता है तो तब पूरी स्क्रिप्ट पढ़ना एक्टर के लिए काफी यूजफुल हो सकता है.
स्टोरी को सीक्रेट रखना जरूरी होता है
लेकिन आपको यहां पर एक बात भी समझनी पड़ेगी क्योंकि ऐसा नहीं है कि हर प्रोजेक्ट में यह प्रोसेस एक जैसा होता है. कुछ फिल्मों और खासकर उन प्रोजेक्ट्स में जहां स्टोरी को सीक्रेट रखना जरूरी होता है, वहां पूरी स्क्रिप्ट हर किसी को शेयर नहीं की जाती. एक्टर को अपने सीन्स, जरूरी कॉन्टेक्स्ट और कैरेक्टर की जानकारी दी जाती है.यहां एक और जरूरी बात है. स्क्रिप्ट मिलना और स्क्रिप्ट पढ़ना दो अलग चीजें हैं. अगर किसी एक्टर को पूरी स्क्रिप्ट मिल भी गई है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह सिर्फ अपने डायलॉग्स देखकर शूटिंग करने पहुंच जाता है. प्रोफेशनल एक्टिंग प्रोसेस में कैरेक्टर को समझने के लिए सीन से आगे की जानकारी भी काफी इंपॉर्टेंट हो सकती है.
पूरी स्क्रिप्ट का फायदा क्या होता है?
एक्टर को जब किसी फिल्म की पूरी स्क्रिप्ट दी जाती है तो इसका यह फायदा होता है कि वह अपने कैरेक्टर को सिर्फ एक सीन के हिसाब से नहीं, बल्कि पूरी कहानी के हिसाब से समझ सकता है. मान लीजिए किसी कैरेक्टर की शुरुआत बहुत सिंपल तरीके से होती है, लेकिन जब कहानी आगे बढ़ती है तो उसके बिहेवियर में बड़ा बदलाव आता है. अगर एक्टर को पूरी स्क्रिप्ट पता है तो वह शुरुआत से ही उसी को ध्यान में रखकर अपने कैरेक्टर की तैयारी कर सकता है.
कैरेक्टर के बिहेवियर को समझने में मदद मिलती है
उदाहरण के लिए किसी कैरेक्टर का शुरुआत रोल शांत दिखाई देने वाला शख्स को हो सकता है और बाद में उसे अपना एग्रेसिव बिहेवियर दिखना है. अगर एक्टर को पूरी जर्नी पता है तो वह शुरुआती सीन्स में भी छोटे-छोटे बिहेवियर डिटेल्स डाल सकता है. इससे कैरेक्टर का ट्रांसफॉर्मेशन ज्यादा अच्छा दिखाई दे सकता है. पूरी स्क्रिप्ट मिलने का एक फायदा यह भी है कि एक्टर को दूसरे कैरेक्टर्स के साथ अपने रिलेशंस समझने में मदद मिलती है. उसे पता होता है कि सामने वाला कैरेक्टर उसके लिए कौन है, उनके बीच पहले क्या हुआ है और आगे उनके बीच क्या बदलाव आएगा.
सिर्फ अपने सीन्स दिए जाएं तो एक्टर कैसे तैयारी करता है?
अब सवाल आता है कि अगर किसी एक्टर को पूरी स्क्रिप्ट की जगह सिर्फ उसके सीन्स दिए गए तो वह अपने कैरेक्टर को कैसे समझेगा? ऐसी सिचुएशन में डायरेक्टर और राइटर का रोल काफी इंपॉर्टेंट हो जाता है. एक्टर को उसके कैरेक्टर के बेसिक बैकग्राउंड, सीन का कॉन्टेक्स्ट, सामने वाले कैरेक्टर के साथ रिलेशन और उस मोमेंट में उसकी मेंटल स्टेट समझाई जा सकती है. कई बार एक्टर को सीन से पहले ही बता दिया जाता है कि इस सिचुएशन तक कैरेक्टर कैसे पहुंचा है. इससे एक्टर को वह सीन परफॉर्म करने के लिए जरूरी जानकारी मिल जाती है. भले ही उसे पूरी कहानी न पता हो.
प्रोजेक्ट के बड़े ट्विस्ट्स सीक्रेट रहें
कुछ प्रोजेक्ट्स में एक्टर को सिर्फ जरूरी हिस्से की जानकारी देने का फैसला इसलिए भी लिया जा सकता है, उस प्रोजेक्ट के बड़े ट्विस्ट्स सीक्रेट रहें. खासकर मिस्ट्री, थ्रिलर और ऐसे प्रोजेक्ट्स जिनमें क्लाइमैक्स या कैरेक्टर आइडेंटिटी उस प्रोजेक्ट का बड़ा हिस्सा होती है, वहां इंफॉर्मेशन को लिमिटेड रखना एक क्रिएटिव डिसीजन हो सकता है. हालांकि इसका यह मतलब नहीं कि एक्टर को बिल्कुल भी स्क्रिप्ट के बारे में नहीं बताया जाता है. अच्छे परफॉर्मेंस के लिए एक्टर को उतनी इंफॉर्मेशन देना जरूरी होता है जिससे वह सीन को सही इमोशन और इंटेंशन के साथ परफॉर्म कर सके. यानी किसी एक्टर को पूरी फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं पता हो सकती, उसे उसके सीन्स लिए जरूरी बैकग्राउंड दिया जाता है.
स्क्रिप्ट रीडिंग कौन-कौन करता है?
बॉलीवुड में स्क्रिप्ट रीडिंग का प्रोसेस सिर्फ एक्टर को पीडीएफ भेज देने तक लिमिटेड नहीं होता. एक फिल्म में राइटर, डायरेक्टर, कास्टिंग टीम, प्रोडक्शन टीम और एक्टर्स अलग-अलग लेवल पर स्क्रिप्ट को पढ़ते और समझते हैं. कई प्रोजेक्ट्स में एक्टर और डायरेक्टर के बीच स्क्रिप्ट डिस्कशन भी होता है. इस दौरान कैरेक्टर को लेकर सवाल-जवाब किए जाते हैं. एक्टर अपने कैरेक्टर को समझता है और डायरेक्टर बताता है कि सीन को किस टोन में परफॉर्म करना है.
राइटर और डायरेक्टर उस पर डिस्कश करते
कई बार टेबल रीड भी किया जाता है. इसमें फिल्म या सीरीज के लीड कैरेक्टर्स एक साथ बैठकर अपने डायलॉग्स पढ़ते हैं. इसका फायदा यह होता है कि एक्टर्स को एक-दूसरे की डिलीवरी, टाइमिंग और कैरेक्टर केमिस्ट्री समझने का मौका मिलता है. टेबल रीड के दौरान कई बार डायलॉग्स के फ्लो और सीन की अंडरस्टैंडिंग को लेकर भी चर्चा होती है. अगर कोई लाइन बोलने में नैचुरल नहीं लग रही है या किसी सीन की इंटेंशन क्लियर नहीं है तो राइटर और डायरेक्टर उस पर डिस्कश करते हैं.
हर फिल्म में टेबल रीड होना जरूरी नहीं है
हालांकि, हर फिल्म में टेबल रीड होना जरूरी नहीं है. यह प्रोजेक्ट की वर्किंग स्टाइल और प्रोडक्शन प्रोसेस के मुताबिक होता है. स्क्रिप्ट रीडिंग का एक और इंपॉर्टेंट हिस्सा कैरेक्टर डिस्कशन होता है. एक्टर सिर्फ यह नहीं देखता कि उसे क्या डायलॉग बोलना है. वह यह भी समझतने की कोशिश करता है कि कैरेक्टर ऐसा क्यों बोल रहा है, उसकी सिचुएशन क्या है और सीन में उसका ऑब्जेक्टिव क्या है.
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