Explainer: एक्टर्स को फिल्म की पूरी कहानी बताई जाती है या सिर्फ अपने सीन्स? जानिए बॉलीवुड में स्क्रिप्ट रीडिंग का क्या है तरीका
Bollywood Script Reading Process: जब किसी फिल्म की अनाउंस होती है तो अक्सर लोगों के मन में सवाल आता है कि उसमें काम कर रहे एक्टर्स को फिल्म की पूरी स्क्रिप्ट दी जाती है या नहीं. आपको बता दें कि आमतौर पर ऐसा जरूरी नहीं है. किसी एक्टर को पूरी स्क्रिप्ट दी जाए, सिर्फ उसके हिस्से के सीन्स दिए जाएंगे या कहानी को अलग तरीके से समझाया जाएगा, यह फिल्म के प्रोजेक्ट, डायरेक्टर, प्रोडक्शन टीम और रोल पर डिपेंड करता है. कई फिल्मों के मेकर्स एक्टर को पूरी स्क्रिप्ट पढ़ने के लिए देते हैं. इससे एक्टर को अपनी कैरेक्टर जर्नी, स्टोरी में अपने रोल की जगह, दूसरे कैरेक्टर्स के साथ उसका रिलेशन और स्टोरी के अलग-अलग टर्न्स समझने में मदद मिलती है. खासकर जब कोई कैरेक्टर फिल्म की पूरी स्टोरी में लीड में होता है तो तब पूरी स्क्रिप्ट पढ़ना एक्टर के लिए काफी यूजफुल हो सकता है.
स्टोरी को सीक्रेट रखना जरूरी होता है
लेकिन आपको यहां पर एक बात भी समझनी पड़ेगी क्योंकि ऐसा नहीं है कि हर प्रोजेक्ट में यह प्रोसेस एक जैसा होता है. कुछ फिल्मों और खासकर उन प्रोजेक्ट्स में जहां स्टोरी को सीक्रेट रखना जरूरी होता है, वहां पूरी स्क्रिप्ट हर किसी को शेयर नहीं की जाती. एक्टर को अपने सीन्स, जरूरी कॉन्टेक्स्ट और कैरेक्टर की जानकारी दी जाती है.यहां एक और जरूरी बात है. स्क्रिप्ट मिलना और स्क्रिप्ट पढ़ना दो अलग चीजें हैं. अगर किसी एक्टर को पूरी स्क्रिप्ट मिल भी गई है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह सिर्फ अपने डायलॉग्स देखकर शूटिंग करने पहुंच जाता है. प्रोफेशनल एक्टिंग प्रोसेस में कैरेक्टर को समझने के लिए सीन से आगे की जानकारी भी काफी इंपॉर्टेंट हो सकती है.
पूरी स्क्रिप्ट का फायदा क्या होता है?
एक्टर को जब किसी फिल्म की पूरी स्क्रिप्ट दी जाती है तो इसका यह फायदा होता है कि वह अपने कैरेक्टर को सिर्फ एक सीन के हिसाब से नहीं, बल्कि पूरी कहानी के हिसाब से समझ सकता है. मान लीजिए किसी कैरेक्टर की शुरुआत बहुत सिंपल तरीके से होती है, लेकिन जब कहानी आगे बढ़ती है तो उसके बिहेवियर में बड़ा बदलाव आता है. अगर एक्टर को पूरी स्क्रिप्ट पता है तो वह शुरुआत से ही उसी को ध्यान में रखकर अपने कैरेक्टर की तैयारी कर सकता है.
कैरेक्टर के बिहेवियर को समझने में मदद मिलती है
उदाहरण के लिए किसी कैरेक्टर का शुरुआत रोल शांत दिखाई देने वाला शख्स को हो सकता है और बाद में उसे अपना एग्रेसिव बिहेवियर दिखना है. अगर एक्टर को पूरी जर्नी पता है तो वह शुरुआती सीन्स में भी छोटे-छोटे बिहेवियर डिटेल्स डाल सकता है. इससे कैरेक्टर का ट्रांसफॉर्मेशन ज्यादा अच्छा दिखाई दे सकता है. पूरी स्क्रिप्ट मिलने का एक फायदा यह भी है कि एक्टर को दूसरे कैरेक्टर्स के साथ अपने रिलेशंस समझने में मदद मिलती है. उसे पता होता है कि सामने वाला कैरेक्टर उसके लिए कौन है, उनके बीच पहले क्या हुआ है और आगे उनके बीच क्या बदलाव आएगा.
सिर्फ अपने सीन्स दिए जाएं तो एक्टर कैसे तैयारी करता है?
अब सवाल आता है कि अगर किसी एक्टर को पूरी स्क्रिप्ट की जगह सिर्फ उसके सीन्स दिए गए तो वह अपने कैरेक्टर को कैसे समझेगा? ऐसी सिचुएशन में डायरेक्टर और राइटर का रोल काफी इंपॉर्टेंट हो जाता है. एक्टर को उसके कैरेक्टर के बेसिक बैकग्राउंड, सीन का कॉन्टेक्स्ट, सामने वाले कैरेक्टर के साथ रिलेशन और उस मोमेंट में उसकी मेंटल स्टेट समझाई जा सकती है. कई बार एक्टर को सीन से पहले ही बता दिया जाता है कि इस सिचुएशन तक कैरेक्टर कैसे पहुंचा है. इससे एक्टर को वह सीन परफॉर्म करने के लिए जरूरी जानकारी मिल जाती है. भले ही उसे पूरी कहानी न पता हो.
प्रोजेक्ट के बड़े ट्विस्ट्स सीक्रेट रहें
कुछ प्रोजेक्ट्स में एक्टर को सिर्फ जरूरी हिस्से की जानकारी देने का फैसला इसलिए भी लिया जा सकता है, उस प्रोजेक्ट के बड़े ट्विस्ट्स सीक्रेट रहें. खासकर मिस्ट्री, थ्रिलर और ऐसे प्रोजेक्ट्स जिनमें क्लाइमैक्स या कैरेक्टर आइडेंटिटी उस प्रोजेक्ट का बड़ा हिस्सा होती है, वहां इंफॉर्मेशन को लिमिटेड रखना एक क्रिएटिव डिसीजन हो सकता है. हालांकि इसका यह मतलब नहीं कि एक्टर को बिल्कुल भी स्क्रिप्ट के बारे में नहीं बताया जाता है. अच्छे परफॉर्मेंस के लिए एक्टर को उतनी इंफॉर्मेशन देना जरूरी होता है जिससे वह सीन को सही इमोशन और इंटेंशन के साथ परफॉर्म कर सके. यानी किसी एक्टर को पूरी फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं पता हो सकती, उसे उसके सीन्स लिए जरूरी बैकग्राउंड दिया जाता है.
स्क्रिप्ट रीडिंग कौन-कौन करता है?
बॉलीवुड में स्क्रिप्ट रीडिंग का प्रोसेस सिर्फ एक्टर को पीडीएफ भेज देने तक लिमिटेड नहीं होता. एक फिल्म में राइटर, डायरेक्टर, कास्टिंग टीम, प्रोडक्शन टीम और एक्टर्स अलग-अलग लेवल पर स्क्रिप्ट को पढ़ते और समझते हैं. कई प्रोजेक्ट्स में एक्टर और डायरेक्टर के बीच स्क्रिप्ट डिस्कशन भी होता है. इस दौरान कैरेक्टर को लेकर सवाल-जवाब किए जाते हैं. एक्टर अपने कैरेक्टर को समझता है और डायरेक्टर बताता है कि सीन को किस टोन में परफॉर्म करना है.
राइटर और डायरेक्टर उस पर डिस्कश करते
कई बार टेबल रीड भी किया जाता है. इसमें फिल्म या सीरीज के लीड कैरेक्टर्स एक साथ बैठकर अपने डायलॉग्स पढ़ते हैं. इसका फायदा यह होता है कि एक्टर्स को एक-दूसरे की डिलीवरी, टाइमिंग और कैरेक्टर केमिस्ट्री समझने का मौका मिलता है. टेबल रीड के दौरान कई बार डायलॉग्स के फ्लो और सीन की अंडरस्टैंडिंग को लेकर भी चर्चा होती है. अगर कोई लाइन बोलने में नैचुरल नहीं लग रही है या किसी सीन की इंटेंशन क्लियर नहीं है तो राइटर और डायरेक्टर उस पर डिस्कश करते हैं.
हर फिल्म में टेबल रीड होना जरूरी नहीं है
हालांकि, हर फिल्म में टेबल रीड होना जरूरी नहीं है. यह प्रोजेक्ट की वर्किंग स्टाइल और प्रोडक्शन प्रोसेस के मुताबिक होता है. स्क्रिप्ट रीडिंग का एक और इंपॉर्टेंट हिस्सा कैरेक्टर डिस्कशन होता है. एक्टर सिर्फ यह नहीं देखता कि उसे क्या डायलॉग बोलना है. वह यह भी समझतने की कोशिश करता है कि कैरेक्टर ऐसा क्यों बोल रहा है, उसकी सिचुएशन क्या है और सीन में उसका ऑब्जेक्टिव क्या है.
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केंद्र ने जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा को चीफ जस्टिस नियुक्त करने में पंजाब सरकार के विचारों को नजरअंदाज किया: हरपाल सिंह चीमा
आम आदमी पार्टी (आप) के सीनियर नेता और पंजाब के कैबिनेट मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने रविवार को जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा को पंजाब सरकार से बिना किसी सलाह के पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने पर कड़ी आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि जिस तरह से यह नियुक्ति किया गया है, उससे पंजाब के संवैधानिक अधिकारों और देश के फेडरल स्ट्रक्चर के प्रति केंद्र के सम्मान पर गंभीर सवाल उठे हैं. इस दौरान उनके साथ आप नेता तरनप्रीत सिंह सन्नी भी मौजूद थे.
विचार पेश करने का अवसर नहीं दिया
जालंधर में प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कैबिनेट मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि नियुक्ति को अंतिम रूप देने से पहले पंजाब सरकार को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया. उन्होंने आगे कहा, "जिस तरह से यह नियुक्ति की गई है, उससे पंजाब के संवैधानिक अधिकारों और देश के फेडरल स्ट्रक्चर के प्रति केंद्र के सम्मान पर बड़े सवाल उठते हैं. नियुक्ति को तय करने से पहले पंजाब सरकार को अपने विचार पेश करने का अवसर नहीं दिया गया.
विचारों को ध्यान में रखने का साफ प्रोविजन
मंत्री ने कहा कि यह मामला इसलिए भी बहुत गंभीर है क्योंकि ऐसे नियुक्ति को कंट्रोल करने वाले मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर में संबंधित राज्य सरकार के विचारों को ध्यान में रखने का साफ प्रोविजन है. उन्होंने कहा, “पंजाब के गवर्नर का 12 अगस्त, 2026 को मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान को भेजा गया लेटर और केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल का लेटर, दोनों में इस संबंधित प्रक्रिया का ज़िक्र था.”
मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा, “नियमों के मुताबिक राज्य सरकार की राय ज़रूरी होने के बावजूद, चीफ जस्टिस की नियुक्ति से पहले पंजाब सरकार से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया गया. यह सिर्फ़ नियुक्ति का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह पंजाब के अधिकारों और संवैधानिक फेडरल स्ट्रक्चर का मुद्दा है.”
पिछले रवैये पर भी सवाल उठाए
उन्होंने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के उस समय के सबसे सीनियर जज, जस्टिस जी.एस.संधावालिया के प्रति केंद्र सरकार के पिछले रवैये पर भी सवाल उठाए. उन्होंने याद दिलाया, “सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जुलाई 2024 में जस्टिस संधावालिया को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस नियुक्त करने की सिफारिश की थी, लेकिन हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस नियुक्त होने से पहले नियुक्ति को दो महीने से ज्यादा समय तक रोक कर रखा गया.”
चीफ जस्टिस बनाने में देरी क्यों
मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा, “मैं पूछना चाहता हूं कि कॉलेजियम की सिफारिश के बावजूद जस्टिस जीएस संधावालिया को मध्य प्रदेश का चीफ जस्टिस बनाने में देरी क्यों की गई, जबकि जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा को पंजाब सरकार से सलाह लिए बिना पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस क्यों नियुक्त किया गया?”
सरकार से सलाह क्यों नहीं ली गई?
उन्होंने कहा, “इससे एक बुनियादी सवाल उठता है: अगर राज्य सरकार की सलाह तय प्रोसेस का हिस्सा है, तो पंजाब की चुनी हुई सरकार से सलाह क्यों नहीं ली गई? मुख्यमंत्री तीन करोड़ पंजाबियों के जनादेश को रिप्रेजेंट करते हैं. चुनी हुई राज्य सरकार को नजरअंदाज करना न केवल मुख्यमंत्री बल्कि पंजाब के लोगों का भी अपमान है.”
मंत्री ने आगे कहा, “इस मुद्दे पर पंजाब कैबिनेट में तुरंत चर्चा की ज़रूरत थी. इसलिए, मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने इस मामले पर चर्चा करने के लिए रविवार शाम 4 बजे एक इमरजेंसी कैबिनेट मीटिंग बुलाई है.”
अधिकारों से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा
इस नियुक्ति को राज्य के अधिकारों से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा बताते हुए, मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा, “संविधान एक फेडरल ढांचा बनाता है जिसमें केंद्र और राज्य दोनों के अधिकार साफ तौर पर तय हैं. केंद्र बार-बार राज्यों के अधिकारों में दखल नहीं दे सकता. पंजाब सरकार अपने संवैधानिक अधिकारों और फेडरल ढांचे को कमजोर करने की किसी भी कोशिश के खिलाफ मजबूती से आवाज उठाएगी.”
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