Bihar Flood: 11 जिलों में गंगा का जलस्तर बढ़ा, 19.57 लाख लोग प्रभावित
पटना, छह सितंबर बिहार के 11 जिलों में 19 लाख से ज़्यादा लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। पटना के गांधी घाट पर गंगा का जलस्तर बाढ़ के महत्वपूर्ण निशान से ऊपर जाने के बाद अधिकारियों ने निचले इलाकों के लिए चेतावनी जारी की है। अधिकारियों ने रविवार को यह जानकारी दी।
अधिकारियों ने बताया कि भारी बारिश के बाद पटना के गांधी घाट पर गंगा का जलस्तर ‘बाढ़ के उच्चतम स्तर’ (एचएफएल) से ऊपर चला गया है, इसलिए अगले एक से तीन दिनों में पटना जिले के अंतर्गत हाथीदह और उसके बाद के रेलवे स्टेशन के प्रभावित होने की आशंका है। उन्होंने बताया कि राज्य में कई नदियों का जलस्तर बढ़ने से पटना, भोजपुर, सारण, वैशाली, भागलपुर, बेगूसराय, बक्सर, समस्तीपुर, मुंगेर, कटिहार और अररिया सहित 11 जिलों के 330 ग्राम पंचायतों में लगभग 19.57 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। जल संसाधन विभाग (डब्ल्यूआरडी) की ओर से जारी नवीनतम परामर्श के मुताबिक, हाथीदह में गंगा का जलस्तर अपने पिछले एचएफएल को पार कर सकता है।
इसके मद्देनजर बेगूसराय, लखीसराय, मुंगेर, भागलपुर और कटिहार जिलों में सतर्कता बढ़ा दी गई है। परामर्श में कहा गया, ‘‘अधिकारियों और ज़मीनी स्तर के कर्मचारियों को निर्देश दिया गया है कि वे सतर्क रहें और जरूरत के हिसाब से सावधानी बरतते हुए जल-स्तर, तटबंधों, संवेदनशील जगहों और निचले इलाकों पर नियमित नजर रखें।’’ इसमें कहा गया, ‘‘अभियंताओं से बाढ़ से निपटने से संबंधित संसाधन और मशीनरी तैयार रखने को कहा गया है। प्रभावित इलाकों के लोगों को सलाह दी गई है कि वे नदी के पास न जाएं और सतर्क रहें।’’ स्थानीय प्रशासन से कहा गया है कि वे नावों के संचालन पर नजर रखें, क्षमता से अधिक लोगों को नावों पर सवार नहीं होने दें और लोगों को हालात के बारे में जानकारी देते रहें।
डब्ल्यूआरडी के मुताबिक, पटना के गांधी घाट पर रविवार सुबह छह बजे गंगा का जलस्तर 50.57 मीटर था, जो 21 अगस्त 2016 को दर्ज किए गए पिछले उच्चतम जलस्तर 50.52 मीटर से 0.05 मीटर अधिक है। बयान के मुताबिक, ‘‘पटना जिले के पंडारक में सुबह छह बजे गंगा नदी का जलस्तर 43.92 मीटर था, जो 16 अगस्त 2021 को दर्ज किए गए पिछले उच्चतम जलस्तर 43.73 मीटर से 0.19 मीटर अधिक है।’’ अधिकारियों ने बताया कि राज्य में गंडक नदी डुमरियाघाट और हाजीपुर में, कोसी नदी बलतारा और कुरसेला में , बूढ़ी गंडक नदी खगड़िया में , गंगा नदी हाथीदह, भागलपुर, कहलगांव, बक्सर व मुंगेर में, पुनपुन नदी श्रीपालपुर में, घाघरा नदी दरौली में और बागमती नदी बेनीबाद में खतरे के निशान के ऊपर बह रही है। उन्होंने बताया कि बाढ़ से प्रभावित लोगों के लिए अभी अलग-अलग जिलों में कुल 110 सामुदायिक रसोई संचालित की जा रही है और प्रभावित इलाकों से लोगों को निकालने और आवाजाही में मदद के लिए 1,345 नावों की सेवा ली जा रही है।
अधिकारियों ने बताया कि इसके अलावा, अलग-अलग जिलों में राज्य आपदा मोचन बल (एसडीआरएफ) की 27 और राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) की 10 टीम तैनात की गई हैं। इस बीच, मध्य पूर्व रेलवे ने रविवार को कहा कि पटना-गया खंड पर पुनपुन और परसा बाजार स्टेशनों को जोड़ने वाली पुल संख्या 21 पर जलस्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाने के कारण कुछ रेलगाड़ियों को र₨द्द कर दिया गया है या फिर उनका मार्ग बदला गया है।
ISRO के निजीकरण प्रस्ताव पर कर्मचारी संगठनों ने V Narayanan से मांगा स्पष्टीकरण
नयी दिल्ली, छह सितंबर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के नौ कर्मचारी संगठनों ने अंतरिक्ष एजेंसी के अध्यक्ष वी. नारायणन को पत्र लिखकर विनिर्माण और परिचालन कार्यों को निजी कंपनियों को हस्तांतरित करने के प्रस्ताव पर आधिकारिक स्पष्टीकरण मांगा है। कर्मचारी संगठनों ने चार सितंबर को लिखे गए इस पत्र में इसरो की भविष्य की भूमिका के साथ-साथ मौजूदा कर्मचारियों और भविष्य में होने वाली भर्तियों पर इसके संभावित प्रभावों को लेकर भी सवाल उठाए हैं। पत्र में कहा गया, ‘‘निर्धारित वाणिज्यिक गतिविधियों में निजी क्षेत्र की भागीदारी एक मजबूत और सार्वजनिक स्वामित्व वाले इसरो के साथ-साथ जारी रह सकती है लेकिन ऐसी नीति बिना व्यापक चर्चा के स्वीकार नहीं की जा सकती, जो इसरो की भूमिका को केवल सीमित अनुसंधान एवं विकास तक समेट दे और देश के प्रक्षेपण यानों के निर्माण एवं प्रक्षेपण संबंधी बुनियादी ढांचे का संचालन सार्वजनिक क्षेत्र के हाथों से बाहर चला जाए।’’ पत्र में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (इन-स्पेस) के अध्यक्ष पवन गोयनका द्वारा 21 अगस्त को की गई टिप्पणियों का भी जिक्र किया गया।
‘इन-स्पेस’ गैर-सरकारी संस्थाओं की विभिन्न अंतरिक्ष गतिविधियों को बढ़ावा देने, उन्हें सक्षम बनाने, अधिकृत करने और उनकी निगरानी करने वाली संस्था है। गोयनका ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कथित तौर पर कहा था, ‘‘अंतत: इसरो कोई भी प्रक्षेपण यान नहीं बनाएगा और न ही किसी प्रक्षेपण यान का निर्माण करेगा। यह सब निजी क्षेत्र या पीएसयू द्वारा किया जाएगा।’’ कर्मचारी संगठनों ने दावा किया कि इन टिप्पणियों के बाद अंतरिक्ष विभाग की ओर से कोई ऐसी आधिकारिक सूचना जारी नहीं की गई जिसमें स्वीकृत नीति, उसके कानूनी और प्रशासनिक आधार, उसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने की प्रक्रिया तथा मौजूदा कर्मचारियों और भविष्य की सरकारी भर्तियों पर पड़ने वाले असर को स्पष्ट किया गया हो।
पत्र में कहा गया है, ‘‘इसरो द्वारा विकसित प्रौद्योगिकी राष्ट्रीय संपत्ति है। इसका हस्तांतरण पारदर्शी एवं जवाबदेह होना चाहिए तथा यह रणनीतिक, सुरक्षा और रोजगार संबंधी पहलुओं के अनुरूप होना चाहिए तथा कर्मचारियों को इसकी जानकारी समाचार पत्रों की खबरों के जरिये नहीं मिलनी चाहिए।’’ इसमें कई अन्य चिंताएं को भी रेखांकित किया गया है तथा यह सवाल भी शामिल है कि पीएसएलवी, एलवीएम3, एसएसएलवी और भविष्य में विकसित किए जाने वाले प्रक्षेपण यानों का डिजाइन, विकास, निर्माण, एकीकरण, परीक्षण और प्रक्षेपण आगे भी इसरो के कार्यों के रूप में जारी रहेगा या इसे बंद कर दिया जाएगा। कर्मचारी संगठनों ने यह भी पूछा है कि प्रस्तावित बदलाव का स्वीकृत पदों की संख्या, मौजूदा रिक्तियों, भर्ती कैलेंडर तथा इसरो के सभी केंद्रों में वैज्ञानिक, तकनीकी, प्रशासनिक एवं औद्योगिक कर्मचारियों की भर्ती पर क्या असर पड़ेगा।
गोयनका ने रविवार को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि भारत को 2030 तक हर साल 50 प्रक्षेपण के लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए इसरो और निजी कंपनियों को मिलकर काम करना होगा। उन्होंने कहा, ‘‘इतने बड़े लक्ष्य को कोई एक संगठन अकेले हासिल नहीं कर सकता।’’ ‘इन-स्पेस’ के अध्यक्ष ने यह भी कहा कि इसरो का अनुसंधान नयी संभावनाओं की सीमाओं का विस्तार करता रहेगा। उन्होंने कहा, ‘‘निजी उद्योग को इस गति को बड़े पैमाने पर विनिर्माण में बदलना होगा-अधिक रॉकेट, अधिक उपग्रह, अधिक प्रक्षेपण क्षमता और नयी प्रौद्योगिकियां विकसित करनी होंगी।
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