Delhi Building Collapse: धूल का गुबार और चीख-पुकार...चश्मदीद बोला-बम धमाके जैसा था मंजर
Delhi Satya Niketan Building Collapses : नई दिल्ली के साउथ इलाके में स्थित सत्य निकेतन के पास रविवार को एक बहुमंजिला बिल्डिंग गिरने से भयानक हादसा हो गया। बताया जाता है कि इमारत के मलबे में 25 से 30 छात्रों के दबे होने की आशंका है। आइए चश्मदीद से जानते हैं कैसा था ये मंजर…
23 हजार फीट ऊंचे माउंट त्रिशूल को फतह करने निकले भारतीय सेना के जांबाज, रुड़की से मिली हरी झंडी
Uttarakhand News: उत्तराखंड के रुड़की स्थित ऐतिहासिक बंगाल इंजीनियर ग्रुप एंड सेंटर से भारतीय सेना ने एक नए रोमांचक और बेहद चुनौतीपूर्ण सफर की शुरुआत की है. भारतीय सेना के कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर्स की एक विशेष पर्वतारोहण टीम को 7,120 मीटर यानी लगभग 23,360 फीट ऊंचे माउंट त्रिशूल को फतह करने के लिए पूरी तैयारी के साथ रवाना किया गया है. यह अभियान केवल एक पर्वत की चोटी तक पहुंचने की कोशिश भर नहीं है, बल्कि यह सेना के जांबाजों के फौलादी इरादों, अनुशासन और कभी न हार मानने वाले जज्बे की एक नई मिसाल बनने जा रहा है.
गढ़वाल हिमालय की गोद में फैली चोटियों में माउंट त्रिशूल को हमेशा से पर्वतारोहियों के लिए सबसे बड़ी परीक्षाओं में से एक माना गया है. यह चोटी अपनी अत्यधिक ऊंचाई, खड़ी ढलानों, जानलेवा बर्फीले रास्तों और पलक झपकते ही बदल जाने वाले खतरनाक मौसम के लिए जानी जाती है. ऐसे हालात में सेना का यह दल न केवल शारीरिक सहनशक्ति का प्रदर्शन करेगा, बल्कि मानसिक मजबूती और तकनीकी कुशलता का ऐसा तालमेल दिखाएगा जो सामान्य परिस्थितियों में देखना असंभव होता है.
शीर्ष सैन्य अधिकारियों की मौजूदगी में हुआ भव्य आयोजन
इस महत्वपूर्ण अभियान की रवानगी के अवसर पर सेना के कई बड़े और अनुभवी अधिकारी मौजूद रहे. सेंट्रल कमांड के जीओसी इन सी लेफ्टिनेंट जनरल अनिंद्य सेनगुप्ता, इंजीनियर इन चीफ लेफ्टिनेंट जनरल विकास रोहेला और बंगाल सैपर्स एंड मिलिट्री सर्वे के कर्नल कमांडेंट लेफ्टिनेंट जनरल एसएस दहिया ने विशेष रूप से उपस्थित होकर दल का उत्साह बढ़ाया. इनके साथ ही कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर्स के वे वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हुए जिन्होंने अपने समय में पर्वतारोहण के क्षेत्र में बड़े कीर्तिमान बनाए हैं. पुराने दिग्गजों की मौजूदगी ने युवा पर्वतारोहियों के भीतर नए जोश और आत्मविश्वास का संचार किया.
कार्यक्रम के औपचारिक हिस्से की शुरुआत टीम लीडर की ओर से दी गई एक विस्तृत और बेहद अहम ब्रीफिंग से हुई. इस प्रस्तुति में बताया गया कि दल किस रास्ते से आगे बढ़ेगा, बेस कैंप कब और कहां स्थापित किए जाएंगे, और अंतिम चढ़ाई की रणनीति क्या होगी. इसके अलावा पहाड़ों में अचानक आने वाले बर्फीले तूफानों और तापमान के शून्य से कई डिग्री नीचे चले जाने पर बचाव के क्या उपाय किए जाएंगे, इसकी रूपरेखा भी सभी के सामने रखी गई.
कठिन प्रशिक्षण और तैयारी का दौर
इस मिशन पर निकलने से पहले अभियान दल ने कई महीनों तक कड़ा और पसीना बहा देने वाला अभ्यास किया है. इस दल में हर स्तर के जांबाज शामिल हैं, जिनमें अनुभवी सैन्य अधिकारी, जूनियर कमीशंड अधिकारी और अन्य जवान कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं. पहाड़ों में कम ऑक्सीजन और अत्यधिक ठंड के माहौल में ढलने के लिए टीम ने विशेष अनुकूलन प्रशिक्षण पूरा किया है. इसके तहत जवानों को यह सिखाया गया है कि बर्फीली दीवारों पर चढ़ते समय कैसे अपनी ऊर्जा बचानी है और आधुनिक उपकरणों का सटीक इस्तेमाल किस तरह करना है.
रसद और प्रशासनिक व्यवस्था को भी बेहद बारीकी से तैयार किया गया है. इतनी अधिक ऊंचाई पर सांस लेना भी एक बड़ा काम बन जाता है, ऐसे में जवानों को स्वस्थ और सक्रिय बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है. टीम के पास आधुनिक संचार साधन, आपातकालीन मेडिकल किट और तकनीकी औजार मौजूद हैं ताकि किसी भी अप्रत्याशित संकट के समय खुद को संभाला जा सके.
सैनिकों के साहस और परंपरा की नई मिसाल
समारोह को संबोधित करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल अनिंद्य सेनगुप्ता ने दल के सभी सदस्यों की शारीरिक चुस्ती, मानसिक दृढ़ता और अटूट टीम भावना की जमकर सराहना की. उन्होंने कहा कि बंगाल सैपर्स का इतिहास हमेशा से जोखिम भरे अभियानों और साहसिक कारनामों से भरा रहा है. ऐसे कठिन अभियान केवल रिकॉर्ड बनाने के लिए नहीं होते, बल्कि यह सेना के भीतर नेतृत्व क्षमता, विषम परिस्थितियों में त्वरित निर्णय लेने की कला और आपसी भरोसे को मजबूत करते हैं. ऊंचाई वाले इलाकों में देश की सीमाओं की रक्षा करने के लिए यह अनुभव बेहद काम आते हैं.
संबोधन के बाद समारोह का सबसे गौरवपूर्ण क्षण वह था जब टीम लीडर को आधिकारिक अभियान ध्वज सौंपा गया. यह ध्वज इस बात का प्रतीक है कि पूरा देश और सेना इस दल के साथ खड़ी है. ध्वज हाथ में आते ही पूरे परिसर में भारत माता की जय और रेजिमेंट के जयकारों की गूंज सुनाई दी. इसके बाद सभी अधिकारियों ने हाथ हिलाकर दल को बेस कैंप की ओर बढ़ने के लिए विदा किया.
माउंट त्रिशूल की यह चढ़ाई आने वाले दिनों में हर कदम पर इस दल की परीक्षा लेगी. बर्फीली हवाएं, दरकते ग्लेशियर और लगातार गिरता तापमान इस रास्ते का हिस्सा होंगे. इसके बावजूद दल का हर सदस्य पूरे संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है. यह अभियान सेना के इंजीनियर्स की उस गौरवशाली परंपरा को और आगे ले जाएगा, जिसमें मुश्किल से मुश्किल बाधा को पार करना ही उनका सबसे बड़ा धर्म रहा है.
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