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Explainer: ईरान की ‘कैसल ब्रेकर’ मिसाइल क्या है? अमेरिकी सैन्य ठिकानों के लिए क्यों बढ़ा खतरा

Kheibar Shekan Missile: अमेरिका और ईरान के बीच पिछले कुछ महीनों से जारी संघर्ष ने पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा दिया है. दोनों देशों के बीच जंग रोकने के लिए बातचीत की कोशिश भी हुई, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका. इसके बाद दोनों तरफ से सैन्य कार्रवाई का दौर जारी रहा. अमेरिका की ओर से ईरान पर हमले के बाद ईरान ने भी खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया.

इस संघर्ष में ईरान की कई मिसाइलों का इस्तेमाल चर्चा में है, लेकिन इनमें खैबर शिकन मिसाइल को खास तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है. फारसी भाषा में ‘खैबर शिकन’ का अर्थ ‘किला तोड़ने वाला’ या ‘कैसल ब्रेकर’ होता है. इसका नाम ही इसकी मारक क्षमता और रणनीतिक महत्व को दर्शाता है.

खैबर शिकन मिसाइल क्या है?

खैबर शिकन ईरान की मीडियम रेंज बैलिस्टिक मिसाइल है. इसे ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC की एयरोस्पेस फोर्स ने विकसित किया है.

यह मिसाइल करीब 1,500 किलोमीटर तक लक्ष्य को निशाना बनाने में सक्षम बताई जाती है. इसकी एक खासियत यह है कि यह अपने साथ करीब 500 किलोग्राम का वॉरहेड ले जा सकती है.

इसकी रेंज को देखते हुए यह मिसाइल ईरान के लिए रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है. लगभग 1,500 किलोमीटर की दूरी तक हमला करने की क्षमता का मतलब है कि ईरान इससे पश्चिम एशिया के कई महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों और रणनीतिक लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता रखता है.

इसकी सबसे बड़ी ताकत क्या है?

खैबर शिकन की सबसे बड़ी खूबियों में इसका सॉलिड-फ्यूल इंजन शामिल है. मिसाइलों में आम तौर पर सॉलिड और लिक्विड फ्यूल तकनीक का इस्तेमाल होता है. लिक्विड फ्यूल वाली मिसाइलों में लॉन्च से पहले ईंधन भरने और दूसरी तैयारियां करने में ज्यादा समय लग सकता है. इसके मुकाबले सॉलिड फ्यूल मिसाइलों में ईंधन पहले से भरा रहता है. इससे उन्हें अपेक्षाकृत कम समय में लॉन्च के लिए तैयार किया जा सकता है.

यही वजह है कि सॉलिड-फ्यूल तकनीक किसी मिसाइल को ऑपरेशनल तौर पर ज्यादा तेजी से इस्तेमाल करने में मदद कर सकती है. खैबर शिकन का डिजाइन भी इसे अपेक्षाकृत हल्का और तेज बनाने पर केंद्रित है. यही वजह है कि ईरान इसे अपनी मिसाइल क्षमता की महत्वपूर्ण कड़ी के तौर पर पेश करता है.

क्या इसे आसानी से ट्रैक करना मुश्किल है?

सॉलिड-फ्यूल मिसाइलों का एक बड़ा फायदा यह है कि इन्हें लंबे समय तक तैयार स्थिति में रखा जा सकता है. इसके कारण लॉन्च से पहले की गतिविधियां कम हो सकती हैं.

लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि ऐसी मिसाइल को उपग्रह या आधुनिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम बिल्कुल भी नहीं पहचान सकते. आज के समय में मिसाइलों को ट्रैक करने के लिए रडार, उपग्रह, इन्फ्रारेड सेंसर और अन्य निगरानी प्रणालियों का इस्तेमाल किया जाता है.

इसलिए खैबर शिकन को ‘पकड़ना असंभव’ मिसाइल कहना सही नहीं होगा. इसकी चुनौती मुख्य रूप से इसकी तैयारी और लॉन्च प्रक्रिया की गति तथा उड़ान के दौरान किए जाने वाले मैन्युवर से जुड़ी हो सकती है.

कैसे पड़ा इसका नाम ‘खैबर शिकन’?

इस मिसाइल का नाम भी इतिहास से जुड़ा हुआ है. ईरान ने खैबर शिकन को पहली बार सार्वजनिक रूप से 2022 में प्रदर्शित किया था.

‘खैबर’ नाम इस्लामी इतिहास में मौजूद खैबर क्षेत्र से जुड़ा है. यह क्षेत्र अपने किलों के लिए जाना जाता था. वहीं फारसी शब्द ‘शिकन’ का अर्थ किसी चीज को तोड़ने या ध्वस्त करने वाला होता है.

इसी वजह से दोनों शब्दों को मिलाकर इसका नाम ‘खैबर शिकन’ रखा गया, जिसका अर्थ लगभग ‘खैबर को तोड़ने वाला’ या ‘किला ध्वस्त करने वाला’ समझा जाता है.

ईरान ने इसका इस्तेमाल कहां किया?

ईरान और इजरायल तथा अमेरिका से जुड़े मौजूदा सैन्य तनाव के दौरान खैबर शिकन के इस्तेमाल को लेकर कई दावे सामने आए हैं. ईरान की IRGC ने दावा किया है कि इस मिसाइल का इस्तेमाल जॉर्डन के अजरक इलाके में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने और कमांड-एंड-कंट्रोल सेंटर को निशाना बनाने के लिए किया गया.

इसके अलावा खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाए जाने के दावे किए गए हैं. हालांकि, युद्ध के दौरान सामने आने वाले ऐसे दावों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग मामलों में जरूरी होती है.

ईरान के पास कितना बड़ा मिसाइल जखीरा है?

ईरान लंबे समय से अपनी मिसाइल क्षमता को अपनी सैन्य ताकत का अहम हिस्सा मानता रहा है. रिपोर्टों के मुताबिक, उसके पास अलग-अलग दूरी तक हमला करने वाली बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का बड़ा जखीरा है. यहां के मिसाइल बेड़े को मोटे तौर पर कम दूरी, मध्यम दूरी और लंबी दूरी वाली मिसाइलों में समझा जा सकता है.

इनमें फतेह सीरीज, जोल्फगार, कियाम-1 और शहाब जैसी मिसाइलें कम दूरी के लक्ष्यों के लिए इस्तेमाल की जा सकती हैं. वहीं शहाब-3, इमाद, कद्र-1, खोर्रमशहर, सेज्जिल और हाज कासिम जैसी मिसाइलें ज्यादा दूरी तक हमला करने की क्षमता रखती हैं. इसके अलावा ईरान के पास क्रूज मिसाइलों का भी बड़ा नेटवर्क है. इनमें सोमर, होवेइजेह, पावेह और राद जैसी मिसाइलों का नाम लिया जाता है.

ईरान की मिसाइलें कितनी दूर तक मार कर सकती हैं?

ईरान की मिसाइल क्षमता को समझने के लिए उनकी रेंज को देखना जरूरी है. अलग-अलग मिसाइलों की क्षमता अलग है और सभी का इस्तेमाल एक जैसे लक्ष्यों के खिलाफ नहीं किया जाता.

कम दूरी वाली मिसाइलें लगभग 150 से 800 किलोमीटर तक के लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल की जा सकती हैं. मध्यम दूरी वाली मिसाइलों की रेंज लगभग 1,500 से 2,000 किलोमीटर तक बताई जाती है. वहीं कुछ क्रूज मिसाइलों की रेंज इससे ज्यादा बताई जाती है.

इसका मतलब है कि ईरान की मिसाइलों की पहुंच उसके आसपास के कई देशों और पश्चिम एशिया के महत्वपूर्ण सैन्य क्षेत्रों तक हो सकती है.

खैबर शिकन से अमेरिका और इजरायल को कितना खतरा?

खैबर शिकन की करीब 1,500 किलोमीटर की बताई गई रेंज इसे ईरान के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है. पश्चिम एशिया में अमेरिका के कई सैन्य ठिकाने अलग-अलग देशों में मौजूद हैं. वहीं इजरायल भी ईरान की मिसाइल क्षमता को लेकर लगातार चिंतित रहा है.

ईरान के पास मौजूद अलग-अलग मिसाइलों का संयोजन उसकी रणनीतिक क्षमता को बढ़ाता है. कम दूरी वाली मिसाइलें क्षेत्रीय लक्ष्यों के खिलाफ इस्तेमाल की जा सकती हैं, जबकि लंबी दूरी वाली मिसाइलें दूर स्थित महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाने की क्षमता देती हैं.

हालांकि, किसी मिसाइल की केवल रेंज से उसकी पूरी सैन्य क्षमता का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. उसकी सटीकता, वॉरहेड, लॉन्च सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता और सामने वाले देश की एयर डिफेंस व्यवस्था भी बहुत महत्वपूर्ण होती है.

क्या खैबर शिकन दुनिया की सबसे खतरनाक मिसाइल है?

खैबर शिकन को ईरान की आधुनिक और महत्वपूर्ण बैलिस्टिक मिसाइलों में गिना जाता है, लेकिन इसे दुनिया की सबसे खतरनाक मिसाइल कहना सही नहीं होगा.

दुनिया में कई देशों के पास अलग-अलग तरह की अत्याधुनिक बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें मौजूद हैं. कुछ मिसाइलों की रेंज खैबर शिकन से कई गुना ज्यादा है, जबकि कुछ में ज्यादा आधुनिक गाइडेंस और मैन्युवरेबल तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है. इसलिए खैबर शिकन की असली अहमियत ईरान की पूरी मिसाइल रणनीति के संदर्भ में समझना ज्यादा सही होगा.

एक नजर में समझिए

  • नाम: खैबर शिकन, जिसका अर्थ ‘कैसल ब्रेकर’ या किला ध्वस्त करने वाला है.
  • प्रकार: मीडियम रेंज बैलिस्टिक मिसाइल.
  • विकास: ईरान की IRGC की एयरोस्पेस फोर्स से जुड़ी.
  • रेंज: करीब 1,500 किलोमीटर तक बताई जाती है.
  • वॉरहेड: करीब 500 किलोग्राम तक ले जाने की क्षमता बताई जाती है.
  • खास तकनीक: सॉलिड-फ्यूल इंजन.
  • पहली सार्वजनिक प्रस्तुति: 2022.
  • रणनीतिक महत्व: पश्चिम एशिया में दूर स्थित सैन्य और रणनीतिक लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता.

आखिर खैबर शिकन ईरान के लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

ईरान के लिए मिसाइलें सिर्फ हमला करने का हथियार नहीं हैं, बल्कि उसकी सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा हैं. ईरान के पास आधुनिक लड़ाकू विमानों और कुछ दूसरी सैन्य क्षमताओं की तुलना में मिसाइलों पर ज्यादा निर्भरता रही है.

इसी वजह से उसने पिछले कई दशकों में अपने मिसाइल कार्यक्रम को लगातार विकसित किया है. सॉलिड-फ्यूल तकनीक, अलग-अलग रेंज की मिसाइलें और बड़ी संख्या में मिसाइलों का भंडार ईरान को क्षेत्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण मिसाइल शक्ति बनाता है.

खैबर शिकन इसी रणनीति का एक हिस्सा है. इसकी खासियत सिर्फ इसकी 1,500 किलोमीटर की रेंज नहीं, बल्कि इसका सॉलिड-फ्यूल डिजाइन और अपेक्षाकृत तेजी से लॉन्च किए जाने की क्षमता भी है.

ईरान की असली ताकत सिर्फ एक मिसाइल नहीं

खैबर शिकन की चर्चा इसलिए ज्यादा हो रही है क्योंकि यह ईरान की आधुनिक मिसाइल तकनीक और उसकी सैन्य रणनीति दोनों को दिखाती है. करीब 1,500 किलोमीटर की रेंज, सॉलिड-फ्यूल इंजन और भारी वॉरहेड ले जाने की क्षमता इसे एक महत्वपूर्ण हथियार बनाती है.

लेकिन ईरान की असली मिसाइल ताकत किसी एक मिसाइल पर निर्भर नहीं है. उसके पास अलग-अलग रेंज और तकनीक वाली बैलिस्टिक तथा क्रूज मिसाइलों का बड़ा नेटवर्क है.

यही मिसाइल क्षमता ईरान को पश्चिम एशिया में अपने विरोधियों और क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों के खिलाफ रणनीतिक विकल्प देती है. आने वाले समय में अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष किस दिशा में जाता है, यह तय करेगा कि खैबर शिकन जैसी मिसाइलों की भूमिका सिर्फ सैन्य शक्ति के प्रदर्शन तक सीमित रहती है या युद्ध के मैदान में इनका इस्तेमाल और बढ़ता है.

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बीएमआई से नहीं, पेट की चर्बी से तय होता है खतरा : एम्स के प्रोफेसर डॉ. नवल विक्रम

नई दिल्ली, 5 सितंबर (आईएएनएस)। मोटापे से संबंधित शिखर सम्मेलन में एम्स नई दिल्ली के प्रोफेसर डॉ. नवल विक्रम ने कहा कि सिर्फ बीएमआई से मोटापे का सही अंदाजा नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि यह फैट और मसल में फर्क नहीं करता। असली खतरा पेट और कमर पर जमा मेटाबॉलिकली एक्टिव फैट से है, जो कई बीमारियों का कारण बनता है। उन्होंने बच्चों के लिए नई इंजेक्टेबल दवाओं के इस्तेमाल, सरकारी गाइडलाइन और खान-पान में सुधार को लेकर भी जरूरी सलाह दी।

डॉ. नवल विक्रम ने कहा, बीएमआई एक मापदंड है, जो बहुत लंबे समय से मोटापे को डिफाइन करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। आज भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। बीएमआई यह नहीं पता करता है कि हमारे शरीर में फैट कितना है, मांस कितना है। अगर कोई एथलीट होगा, जिसका बीएमआई 30 है, उसमें मसल बहुत ज्यादा होगा, फैट 15 फीसदी होगा। दूसरी तरफ 30 बीएमआई का कोई और व्यक्ति है, जिसमें फैट होगा 40 फीसदी और मसल होगा 15 फीसदी। इन दोनों में, दोनों का बीएमआई बराबर है, लेकिन अगर सिर्फ बीएमआई देखें तो दोनों ही मोटापे की कैटेगरी में माने जाएंगे।

उन्होंने बताया कि अगर हम देखें कि तकलीफ किसे ज्यादा होगी, किसके अंदर डायबिटीज की शिकायत हो सकती है, और किसको हार्ट से संबंधित बीमारी होगी, तो ये उसे ज्यादा होगा, जिसके शरीर में फैट ज्यादा होगा। बीएमआई, फैट और नॉन-फैट में अंतर नहीं कर पाता है। इसलिए बेहतर है कि अगर बीएमआई के साथ कोई और फैट माप सकते हैं, तो वह इस्तेमाल करें। जो मोटापा पेट पर और कमर पर होती है, वह एक अच्छा मापदंड होता है कि आपके पेट के अंदर कितना फैट इकट्ठा है। अगर आपकी जांघों पर फैट है, तो वह परेशान नहीं करता है। अगर पेट के अंदर फैट इकट्ठा है, तो वह सबसे खतरनाक होता है। वह हार्मोन, साइटोकाइन, बड़ी सारी चीजें बनाता है, जिनका असर शरीर के ऑर्गन्स पर खराब पड़ता है।

उन्होंने बताया कि एक और मापदंड ये हो सकता है, कमर देखिए और अपनी लंबाई देखिए। आपकी लंबाई 160 सेंटीमीटर है, तो आपकी कमर 80 सेंटीमीटर से ऊपर नहीं होनी चाहिए, चाहे पुरुष हों या महिला। एक सामान्य बात है कि अपनी कमर को लंबाई का आधा रखिए, तो आप स्वस्थ रहेंगे। इसका मतलब आपमें एब्डॉमिनल ओबेसिटी नहीं रहेगी। यह बहुत जरूरी है। बच्चों में मोटापे के इलाज के लिए जो नई इंजेक्टेबल दवाएं आई हैं, वे बेहद स्पेशलाइज्ड हैं। इन्हें कोई भी डॉक्टर प्रिस्क्राइब नहीं कर सकता। सरकारी गाइडलाइन के मुताबिक, सिर्फ एमडी मेडिसिन या एंडोक्राइनोलॉजिस्ट ही इन्हें लिखने के लिए अधिकृत हैं।

उन्होंने बताया कि डेटा के मुताबिक ये दवाइयां काफी कारगर हैं और इनसे वजन कम करने में काफी मदद मिलती है, लेकिन इन्हें लंबे समय तक लगातार लेना पड़ता है। अगर 2, 3 या 6 महीने लेकर छोड़ दिया जाए तो कोई फायदा नहीं होता और वजन फिर से बढ़ जाता है। जितने लंबे समय तक इन्हें लिया जाता है, वजन उतने ही लंबे समय तक कंट्रोल में रह सकता है। ये दवाइयां अब तक सिर्फ वयस्कों के लिए थीं, लेकिन अब एक दवाई को 12 साल से ऊपर के बच्चों के लिए भी जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल की अनुमति मिल गई है।

उन्होंने कहा कि खान-पान सबसे अहम है। सबसे पहले उसी पर ध्यान देना चाहिए। जितनी भूख हो, उसका 70-80 फीसदी ही खाएं, पूरा पेट भरकर खाने से बचें। खाने का एक फिक्स्ड पैटर्न बनाएं और हमेशा ताजा पका हुआ भोजन करें। घर का बना हो या पैकेट वाला, हाई साल्ट, हाई शुगर और हाई फैट वाली चीजों को कम करना जरूरी है। प्रधानमंत्री ने भी खाने में 10 फीसदी तेल कम करने की बात कही है, इससे सबसे ज्यादा कैलोरी घटती है।

--आईएएनएस

केके/एबीएम

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