Janmashtami 2026: जन्माष्टमी पर घर में क्यों बनाते हैं कान्हा के पैरों के निशान? जानें क्या है पौराणिक मान्यता
Janmashtami 2026: जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व है। इस दिन भक्त कान्हा के बाल स्वरूप की पूजा करते हैं, घर को सजाते हैं और आधी रात को जन्मोत्सव मनाते हैं। इस पर्व से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं हैं, जिनका अपना धार्मिक महत्व माना जाता है। इन्हीं में एक है घर के मुख्य द्वार से पूजा स्थल तक भगवान कृष्ण के नन्हे पैरों के निशान बनाना। मान्यता है कि ये चरण चिह्न बाल गोपाल के घर में आगमन का प्रतीक होते हैं। आखिर जन्माष्टमी पर कान्हा के पैरों के निशान क्यों बनाए जाते हैं और इसका क्या महत्व है? आइए जानते हैं।
जन्माष्टमी के दिन घरों में भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप यानी लड्डू गोपाल की विशेष पूजा की जाती है। भक्त कान्हा को झूला झुलाते हैं, उनका श्रृंगार करते हैं और आधी रात को जन्मोत्सव मनाते हैं। इसी दौरान घर में एक खास परंपरा भी निभाई जाती है। कई घरों में मुख्य दरवाजे से पूजा स्थल तक भगवान कृष्ण के छोटे-छोटे पैरों के निशान बनाए जाते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन चरण चिह्नों को बाल गोपाल के घर में प्रवेश का प्रतीक माना जाता है। भक्तों की भावना होती है कि जन्माष्टमी की रात स्वयं कान्हा उनके घर पधार रहे हैं। इसी भाव के साथ उनके नन्हे कदमों के निशान मुख्य द्वार से पूजा घर या उस स्थान तक बनाए जाते हैं, जहां लड्डू गोपाल को विराजमान किया जाता है।
घर में प्रवेश करते हुए बनाए जाते हैं चरण चिह्न
जन्माष्टमी पर कान्हा के पैरों के निशान बनाते समय आमतौर पर उन्हें घर के बाहर से अंदर की ओर आते हुए बनाया जाता है। इसके पीछे मान्यता यह है कि भगवान कृष्ण भक्त के घर में प्रवेश कर रहे हैं। कई लोग इन चरण चिह्नों को पूजा स्थल तक बनाते हैं, ताकि ऐसा प्रतीत हो कि बाल गोपाल स्वयं चलकर वहां विराजमान होने आए हैं।
इन निशानों को बनाने के लिए आटे, चावल के घोल, रोली या रंगोली जैसी पारंपरिक सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि इसे लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग स्थानीय परंपराएं भी देखने को मिलती हैं।
सुख-शांति और सकारात्मकता का प्रतीक
कान्हा के नन्हे पैरों के निशान केवल सजावट का हिस्सा नहीं माने जाते, बल्कि इनके पीछे भक्तिभाव भी जुड़ा है। मान्यता है कि भगवान कृष्ण के घर आगमन से सुख, शांति और आनंद का वातावरण बनता है। इसलिए भक्त श्रद्धा के साथ उनके चरण चिह्न बनाकर अपने घर में भगवान का स्वागत करते हैं।
भगवान कृष्ण का बाल स्वरूप भक्तों को विशेष रूप से प्रिय है। जन्माष्टमी पर उन्हें बच्चे की तरह सजाना, पालने में झुलाना, माखन-मिश्री और अन्य भोग लगाना इसी वात्सल्य भाव का हिस्सा है। ऐसे में घर में बनाए जाने वाले छोटे-छोटे पैरों के निशान इस भावना को और खास बना देते हैं।
जन्माष्टमी 2026 पर कब मनाया जाएगा जन्मोत्सव?
पंचांग के अनुसार, 2026 में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 4 सितंबर की रात 2:25 बजे से शुरू होकर 5 सितंबर की रात 12:13 बजे तक रहेगी। भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव निशिता काल में मनाया जाता है। इसलिए इस गणना के अनुसार 4 सितंबर को जन्माष्टमी का व्रत और रात में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाएगा।
नोट: धार्मिक तिथियों और मुहूर्त में स्थानीय पंचांग के अनुसार थोड़ा अंतर हो सकता है। इसलिए पूजा का सटीक समय अपने क्षेत्र के पंचांग से जरूर जांच लें।
Har Chhath Vrat Katha 2026: हर छठ आज, संतान सुख के लिए जरूर पढ़ें हल षष्ठी की ये पौराणिक कथा
Har Chhath Vrat Katha 2026: हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हर छठ या हल षष्ठी का व्रत रखा जाता है। इस साल यह पर्व 2 सितंबर, बुधवार को मनाया जा रहा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी के जन्मोत्सव से जुड़ा है। बलराम जी का प्रमुख शस्त्र हल माना जाता है, इसलिए इस पर्व को हल षष्ठी या हल छठ भी कहा जाता है।
यह व्रत विशेष रूप से संतान की सुख-समृद्धि से जुड़ा माना जाता है। माताएं संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ व्रत रखती हैं। इस दिन पूजा-पाठ के साथ हर छठ की कथा पढ़ने और सुनने की भी परंपरा है।
हर छठ की लोकप्रिय पौराणिक कथा
लोकप्रिय पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में एक ग्वालिन रहती थी। वह दूध, दही और मक्खन बेचकर अपने परिवार का पालन-पोषण करती थी। एक बार वह गर्भवती हुई और प्रसव का समय नजदीक आ गया, लेकिन उसने रोजी-रोटी के लिए अपना काम जारी रखा।
एक दिन अचानक उसे रास्ते में प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। पास में झरबेरी की झाड़ियां देखकर वह उनकी ओट में बैठ गई। कुछ समय बाद उसने एक पुत्र को जन्म दिया।
कथा के अनुसार, ग्वालिन को उस दिन भी अपना दूध-दही और मक्खन बेचने की चिंता थी। उसने नवजात बच्चे को कपड़े में लपेटकर झाड़ियों के पास छोड़ दिया और सामान बेचने के लिए गांव की ओर चली गई।
व्रत रखने वाली महिलाओं से बोला झूठ
उस दिन गांव की कई महिलाओं ने हर छठ का व्रत रखा था। धार्मिक परंपरा के अनुसार, इस व्रत में गाय के दूध से बनी चीजों का सेवन नहीं किया जाता और भैंस के दूध से बनी सामग्री का उपयोग किया जाता है।
ग्वालिन के पास मौजूद दूध, दही और मक्खन में गाय और भैंस दोनों का दूध मिला हुआ था। लेकिन उसने महिलाओं से कहा कि उसके पास मौजूद सारी सामग्री भैंस के दूध से बनी है। महिलाओं ने उसकी बात पर भरोसा कर लिया और उससे दूध, दही और मक्खन खरीद लिया। सामान बिक जाने के बाद ग्वालिन वापस लौट गई।
हल की चपेट में आया नवजात
कथा के अनुसार, जिस जगह ग्वालिन ने अपने बच्चे को छोड़ा था, उसके पास एक किसान खेत में हल चला रहा था। अचानक उसके बैल इधर-उधर भागने लगे। इसी दौरान हल उस स्थान की ओर पहुंच गया, जहां नवजात बच्चा रखा था।
हल की चोट से बच्चा घायल हो गया। कुछ देर बाद किसान को बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। वह झाड़ियों के पास पहुंचा तो वहां घायल अवस्था में एक नवजात को देखा। घबराहट में उसने बच्चे के घाव को जोड़ने का प्रयास किया और वहां से चला गया।
बच्चे की हालत देखकर टूट गई ग्वालिन
जब ग्वालिन अपना सामान बेचकर वापस लौटी तो उसने अपने बच्चे को घायल अवस्था में देखा। यह देखकर वह बेहद दुखी हो गई और रोने लगी। उसे अपनी कही हुई बात याद आई। उसे एहसास हुआ कि उसने हर छठ का व्रत रखने वाली महिलाओं से झूठ बोलकर उन्हें गाय के दूध से बनी सामग्री भी बेच दी थी। कथा के अनुसार, उसने अपने बच्चे के साथ हुई घटना को अपने झूठ और छल का परिणाम माना। इसके बाद उसने अपनी गलती स्वीकार करने और महिलाओं से माफी मांगने का फैसला किया।
महिलाओं के सामने स्वीकार की अपनी गलती
ग्वालिन उसी गांव में पहुंची और महिलाओं को पूरी बात बता दी। उसने स्वीकार किया कि उसने जो दूध, दही और मक्खन बेचा था, उसमें गाय का दूध भी मिला हुआ था।
उसने महिलाओं से अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी और अपने बच्चे के साथ हुई घटना भी बताई। उसका पश्चाताप देखकर व्रत रखने वाली महिलाओं ने उसे माफ कर दिया और आशीर्वाद दिया।
आशीर्वाद के बाद बच्चे को जीवित पाया
मान्यता के अनुसार, महिलाओं से माफी मांगने के बाद ग्वालिन जब वापस झरबेरी की झाड़ियों के पास पहुंची तो उसने अपने बच्चे को जीवित पाया। अपने पुत्र को सुरक्षित देखकर उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने इसे हर छठ की महिमा और भगवान की कृपा माना।
कथा के अनुसार, इस घटना के बाद ग्वालिन ने जीवन में कभी झूठ नहीं बोलने का संकल्प लिया और श्रद्धा के साथ हर छठ या हल षष्ठी का व्रत रखने लगी।
हर छठ की कथा से क्या संदेश मिलता है?
इस लोकप्रिय कथा को धार्मिक परंपरा में सत्य, नियमों के पालन और अपनी गलती स्वीकार करने के संदेश से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि हर छठ का व्रत संतान के कल्याण और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है।
इसी वजह से हर छठ के दिन महिलाएं विधि-विधान से पूजा करने के साथ व्रत कथा पढ़ती और सुनती हैं। कथा के बाद भगवान बलराम और संबंधित देवी-देवताओं का स्मरण कर संतान की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
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