Explainer: चीन ने बंद किया कैलाश का रास्ता, 1981 में ऐसे दोबारा शुरू हुई कैलाश मानसरोवर यात्रा, जानें पूरी कहानी
नेपाल में आई फ्लैश फ्लड ने एक बार फिर कैलाश मानसरोवर यात्रा की कठिनाइयों और इससे जुड़े जोखिमों को सामने ला दिया है. प्राकृतिक आपदा के कारण यात्रा पर निकले कई श्रद्धालुओं के प्रभावित होने की खबरों ने इस पवित्र तीर्थ तक पहुंचने वाले रास्तों को लेकर चिंता बढ़ा दी है. हालांकि, कैलाश मानसरोवर की यात्रा सिर्फ कठिन भौगोलिक परिस्थितियों की वजह से चुनौतीपूर्ण नहीं रही है, बल्कि इसके पीछे लंबा राजनीतिक और ऐतिहासिक दौर भी रहा है.
हिमालय की ऊंचाइयों में स्थित कैलाश पर्वत हिंदू धर्म के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है. हिंदू मान्यता में इसे भगवान शिव का निवास माना जाता है। बौद्ध और जैन परंपराओं में भी कैलाश का विशेष धार्मिक महत्व है. यही वजह है कि सदियों से श्रद्धालु तमाम मुश्किलों के बावजूद इस क्षेत्र तक पहुंचने की कोशिश करते रहे हैं.
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बेहद खास है कैलाश और मानसरोवर
कैलाश पर्वत तिब्बत में स्थित है और इसकी ऊंचाई करीब 22 हजार फीट बताई जाती है. ऊंचाई के लिहाज से यह माउंट एवरेस्ट से छोटा है, लेकिन धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व के कारण इसकी अलग पहचान है. इसका अनोखा आकार और चारों दिशाओं से बदलता स्वरूप इसे हिमालय के सबसे रहस्यमयी पर्वतों में शामिल करता है।कैलाश के पास ही मानसरोवर और राक्षस ताल स्थित हैं. मानसरोवर को हिंदू धर्म में बेहद पवित्र माना जाता है, जबकि राक्षस ताल से कई धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं. दोनों झीलें एक-दूसरे के काफी करीब होने के बावजूद अपने अलग स्वरूप के लिए जानी जाती हैं. आमतौर पर तीर्थयात्री पहले मानसरोवर पहुंचते हैं और इसके बाद दारचेन से कैलाश पर्वत की परिक्रमा शुरू करते हैं. ऊंचाई, मौसम और दुर्गम रास्तों की वजह से यह यात्रा शारीरिक रूप से काफी चुनौतीपूर्ण मानी जाती है.
चीन के नियंत्रण के बाद बंद हुआ रास्ता
कैलाश मानसरोवर यात्रा के इतिहास में 1950 के दशक का दौर बेहद महत्वपूर्ण रहा. तिब्बत पर चीन के नियंत्रण के बाद भारत और चीन के संबंधों में तनाव बढ़ा और कैलाश तक भारतीय तीर्थयात्रियों की पहुंच भी प्रभावित हुई. 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद सीमा पर तनाव और बढ़ गया, जिसके कारण यात्रा का पारंपरिक मार्ग लंबे समय तक बंद रहा. कैलाश भारत की धार्मिक चेतना में लगातार मौजूद रहा, लेकिन वहां पहुंचना राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर हो गया.
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कैलाश यात्रा दोबारा शुरू कराने में स्वामी की भूमिका
बाद के वर्षों में भारत और चीन के रिश्तों में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा. इसी दौर में बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रह्मण्यम स्वामी की भूमिका का भी जिक्र मिलता है. स्वामी के मुताबिक, 1978 में चीन की यात्रा के दौरान उन्होंने तत्कालीन चीनी नेता देंग शियाओ पिंग के सामने कैलाश मानसरोवर यात्रा दोबारा शुरू करने का मुद्दा उठाया था. उन्होंने कई मौकों पर दावा किया कि इस बातचीत के बाद चीनी पक्ष ने यात्रा शुरू करने की संभावनाओं पर विचार किया. स्वामी के अनुसार, उन्होंने बाद की यात्राओं में भी इस मुद्दे को उठाया और चीन की ओर से रास्ते तथा अन्य व्यवस्थाओं को लेकर तैयारियां की गईं. उनके दावों के मुताबिक, 1981 में भारतीय श्रद्धालुओं का एक दल कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर गया था और वे भी इस दल का हिस्सा थे.
आज इन रास्तों से होती है यात्रा
समय के साथ कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए भारत से रास्ते उपलब्ध हुए. भारत सरकार की ओर से यात्रा के लिए लिपुलेख दर्रे और नाथू ला मार्ग का इस्तेमाल किया जाता है. दोनों रास्ते अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों से होकर गुजरते हैं और मौसम की स्थिति यात्रा को काफी प्रभावित कर सकती है. हाल की प्राकृतिक आपदाओं ने यह भी दिखाया है कि हिमालयी क्षेत्र में यात्रा के दौरान मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. फ्लैश फ्लड, भूस्खलन और अचानक मौसम बदलने जैसी घटनाएं तीर्थयात्रियों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं. कैलाश मानसरोवर की यात्रा इसलिए सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं है. यह आस्था, इतिहास, कूटनीति और हिमालय की कठिन परिस्थितियों से जुड़ी एक ऐसी यात्रा है, जिसका रास्ता कई दशकों तक राजनीति और सीमा तनाव से प्रभावित रहा. आज भी हजारों श्रद्धालुओं के लिए कैलाश के दर्शन जीवन की सबसे बड़ी आध्यात्मिक यात्राओं में से एक माने जाते हैं.
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