संयुक्त राष्ट्र महासभा में विश्व मानचित्र को अधिक सटीक बनाने संबंधी प्रस्ताव पारित होने के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर जोरदार कूटनीतिक भिड़ंत छिड़ गई है। भारत ने साफ कर दिया है कि उसके संप्रभु क्षेत्र, जिनमें केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख शामिल हैं, को भारत के आधिकारिक मानचित्र के अनुरूप ही दिखाया जाना चाहिए और किसी भी प्रकार का ‘‘गलत’’ या ‘‘भ्रामक’’ चित्रण स्वीकार्य नहीं होगा। वहीं पाकिस्तान ने इस स्पष्ट भारतीय रुख पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए उसे ‘‘निराधार’’ बताया है।
हम आपको बता दें कि ताजा विवाद की पृष्ठभूमि संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा चार सितंबर को पारित उस प्रस्ताव से जुड़ी है, जिसका शीर्षक है— ‘करेक्ट द मैप: वैश्विक मानचित्रण प्रतिनिधित्व में संतुलन और विश्व के क्षेत्रों, विशेषकर अफ्रीका का समान प्रतिनिधित्व।’ टोगो द्वारा प्रायोजित इस प्रस्ताव को 164 देशों का समर्थन मिला। अमेरिका ने इसके खिलाफ अकेले मतदान किया, जबकि एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा, सर्बिया और यूक्रेन मतदान से दूर रहे।
इस प्रस्ताव का मूल उद्देश्य राजनीतिक सीमाओं को बदलना या किसी देश के क्षेत्रीय दावों को मान्यता देना नहीं, बल्कि ऐसी ‘इक्वल एरिया’ मैप प्रोजेक्शन प्रणाली को प्रोत्साहित करना है, जिसमें महाद्वीपों और भूभागों का वास्तविक क्षेत्रफल अपेक्षाकृत सही अनुपात में दिखाई दे। दरअसल, अफ्रीकी देशों की लंबे समय से यह शिकायत रही है कि प्रचलित मानचित्र प्रक्षेपणों में अफ्रीका का आकार वास्तविकता से छोटा दिखाई देता है। संयुक्त राष्ट्र की पहल सरकारों, स्कूलों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और तकनीकी कंपनियों को अधिक संतुलित मानचित्रण पद्धतियों, विशेषकर ‘इक्वल अर्थ’ जैसी प्रोजेक्शन प्रणालियों के उपयोग के लिए प्रोत्साहित करती है।
लेकिन भारत ने प्रस्ताव के समर्थन के साथ ही एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सुरक्षा-कवच भी खड़ा कर दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया है कि भारत का समर्थन केवल भूभागों के वास्तविक आकार के अनुपात को बनाए रखने वाली मानचित्रण पद्धति के सिद्धांत के लिए है। भारत ने किसी विशेष नक्शे, प्रक्षेपण या राष्ट्रीय सीमाओं के किसी खास चित्रण का समर्थन नहीं किया है।
जायसवाल का संदेश बेहद स्पष्ट था कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख सहित भारत के संप्रभु क्षेत्र भारत के आधिकारिक मानचित्र के अनुरूप ही प्रदर्शित किए जाने चाहिए। उन्होंने दो टूक कहा कि भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर उसका रुख ‘‘स्पष्ट, सुसंगत और गैर-परक्राम्य’’ है। दूसरे शब्दों में, नई वैश्विक मानचित्रण बहस को भारत अपनी सीमाओं या क्षेत्रीय स्थिति पर किसी नए विवाद का मंच नहीं बनने देगा।
यहीं से पाकिस्तान बौखला उठा। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने भारतीय दावे को ‘‘निराधार’’ बताते हुए जम्मू-कश्मीर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एजेंडे पर मौजूद एक अंतरराष्ट्रीय विवाद बताया। पाकिस्तान ने दावा किया कि भारत के ‘‘एकतरफा कदम’’ और ‘‘आधिकारिक नक्शे’’ विवादित क्षेत्र की स्थिति नहीं बदल सकते तथा अंतिम निर्णय संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों और कश्मीरी जनता की इच्छा के अनुरूप होना चाहिए।
देखा जाये तो भारत के लिए पाकिस्तान की यह प्रतिक्रिया कोई नई बात नहीं है, लेकिन इसका समय बेहद महत्वपूर्ण है। संयुक्त राष्ट्र का नया प्रस्ताव स्पष्ट रूप से राजनीतिक मानचित्रण, अंतरराष्ट्रीय सीमाओं, विवादित क्षेत्रों और स्थानों के नामों से संबंधित नहीं है। इसलिए पाकिस्तान द्वारा इस प्रस्ताव के बाद कश्मीर का मुद्दा उठाना दरअसल इस्लामाबाद के पुराने राग को दोबारा अलापने जैसा है। लेकिन पाकिस्तान के अलाप का कोई असर नहीं हुआ और भारत ने उसे बहस की दिशा बदलने का मौका ही नहीं दिया। नई दिल्ली ने पहले ही स्पष्ट कर दिया कि संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव राजनीतिक सीमाओं पर फैसला नहीं करता।
बहरहाल, पाकिस्तान चाहे कितना भी शोर मचाता रहे, सच्चाई नहीं बदल सकती। कश्मीर भारत का था, भारत का है और भारत का ही रहेगा। साथ ही पाकिस्तान जिस कश्मीर के नाम पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शोर मचाता फिरता है, उसी के अवैध कब्जे वाले पीओजेके से अब भारत के साथ जुड़ने की आवाजें उठ रही हैं। स्थानीय जनता के असंतोष, राजनीतिक दमन और पाकिस्तान की नीतियों के खिलाफ बढ़ते प्रतिरोध ने इस्लामाबाद के दावों की पोल पूरी दुनिया के सामने खोल दी है। पीओजेके की जनता को दुश्मन तक करार देने वाले पाकिस्तानी रक्षा मंत्री की टिप्पणी और स्थानीय लोगों पर हाल के जुल्मो-सितम के बाद 'कश्मीर' शब्द के उच्चारण का हक भी पाकिस्तान खो चुका है। सवाल उठता है कि जो देश अपने कब्जे वाले क्षेत्रों की जनता को अधिकार, सम्मान और आवाज तक नहीं दे सकता, वह कश्मीर के नाम पर दुनिया को उपदेश देने की नैतिक हैसियत कैसे रख सकता है? भारत का संदेश स्पष्ट है कि नक्शों पर भ्रम फैलाने या बयानबाजी से इतिहास और भूगोल नहीं बदलते। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और पाकिस्तान की खोखली बयानबाजी इस सच्चाई को बदलने में कभी सफल नहीं होगी।
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