दुनिया का नक्शा अब बदलने जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र (UN) ने एक ऐतिहासिक फैसले में नए विश्व मानचित्र को अपनी औपचारिक मंजूरी दे दी है। इस नए मैप में अब अफ्रीका महाद्वीप को उसके असली और सटीक भौगोलिक आकार में दिखाया जाएगा। यूएन में पेश किए गए 'क्रैक द मैप' प्रस्ताव पर हुई वोटिंग के दौरान 164 देशों ने इसके पक्ष में मतदान किया। वहीं, अमेरिका ने इस बदलाव का विरोध किया, जबकि छह अन्य सदस्य देशों ने भी इस प्रस्ताव पर अपनी अलग राय दर्ज कराई। गौरतलब है कि सदियों से इस्तेमाल हो रहे पारंपरिक नक्शों में अफ्रीका का आकार वास्तविक क्षेत्रफल से काफी छोटा दिखाया जाता रहा है। अफ्रीका द्वारा रखे गए इस संशोधन प्रस्ताव को भारी बहुमत मिलने के बाद अब वैश्विक पटल पर दुनिया का सही भौगोलिक अनुपात आधिकारिक रूप से स्थापित होगा। रिज़ॉल्यूशन के अनुसार, इक्वल अर्थ कार्टोग्राफिक प्रोजेक्शन के नाम से जाना जाने वाला यह मैप, दुनिया के कार्टोग्राफिक चित्रण की सटीकता को बेहतर बनाने के लिए बनाया गया है।
टोगो अधिक सटीक विश्व मानचित्र का समर्थन करता है
टोगो ने इस प्रस्ताव को प्रायोजित किया, ने कहा कि मानचित्र लोगों के विश्व को समझने के तरीके को आकार दे सकते हैं। विदेश मंत्री रॉबर्ट डसी ने कहा कि मानचित्र शिक्षा का मार्गदर्शन करते हैं, कल्पना को पोषित करते हैं और सामूहिक धारणाओं को प्रभावित करते हैं। इसलिए वे कभी तटस्थ नहीं होते, जब वे हमारे ग्रह की विकृत छवि प्रस्तुत करते हैं, तो वे गलत प्रतिनिधित्व को बनाए रखने का जोखिम उठाते हैं जो पीढ़ियों तक चला जाता है।
अमेरिका ने UN के प्रस्ताव की आलोचना की
अमेरिका ने इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि जनरल असेंबली को ज़्यादा ज़रूरी मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। अमेरिकी प्रतिनिधि यारयना फेरेंसेविच ने कहा कि ऐसी ही पहलों की वजह से इस संस्था की विश्वसनीयता कम हो रही है। वोटिंग से पहले फेरेंसेविच ने कहा असली समस्याओं पर ध्यान देने के बजाय... यह संस्था 16वीं सदी के मैप प्रोजेक्ट्स और मुआवज़े व कॉग्निटिव जस्टिस को बढ़ावा देने में उनकी भूमिका पर बहस कर रही है।
मर्केटर प्रोजेक्शन आकार को कैसे विकृत करता है
मर्केटर प्रोजेक्शन को भूभागों के आकार और कोणों को सही ढंग से बनाए रखने के लिए डिज़ाइन किया गया था, लेकिन यह उनके वास्तविक क्षेत्रफल को सटीक रूप से नहीं दर्शाता है। यह अंतर त्रि-आयामी (3D) पृथ्वी को द्वि-आयामी (2D) समतल सतह पर दर्शाने की चुनौती के कारण पैदा होता है। इसमें उत्तरी क्षेत्र वास्तविक से काफी बड़े दिखाई देते हैं, जबकि भूमध्य रेखा (इक्वेटर) के करीब के क्षेत्र अपेक्षाकृत छोटे नज़र आते हैं। नतीजतन, यूरोप और उत्तरी अमेरिका अपने वास्तविक आकार की तुलना में बहुत बड़े दिखाई देते हैं, जबकि अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका अपने वास्तविक अनुपात से काफी छोटे नजर आते हैं।
Continue reading on the app
एक तरफ रूस यूक्रेन की जंग चल रही है और दूसरी तरफ यूक्रेन को रूस के खिलाफ मदद पहुंचाने यानी कि गोला बारूद पहुंचाने के चक्कर में यूरोप के एक छोटे से देश के रक्षा मंत्री को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ गई। दरअसल यह पूरा मामला करीब 70 मिलियन यूरो यानी 768 करोड़ से ज्यादा की एक एमिनेशन डील का है और इस पूरे विवाद के बीच नाम आया है भारत की स्वामित्व वाली एक डिफेंस कंपनी का और आरोप यह नहीं है कि भारतीय कंपनी ने कोई घोटाला किया बल्कि विवाद इस बात को लेकर है कि यूरोप के इस छोटे से देश एस्टोनिया ने आखिर ऐसी कंपनी से इतनी बड़ी डिफेंस डील क्यों की जिसका आर्टिलरी शेल बेचने का पहले कोई स्थापित रिकॉर्ड नहीं था। करोड़ों रुपए एडवांस में दिए गए गोला बारूद समय पर नहीं पहुंचा। जो सामान पहुंचा उसकी क्वालिटी पर सवाल उठे। कॉन्ट्रैक्ट खत्म हुआ और अब पैसा वापस लेने के लिए कानूनी लड़ाई चल रही है। इसके बाद हुआ यह कि एस्टोनिया के डिफेंस मिनिस्टर हेनो बेवकको ने पॉलिटिकल रिस्पांसिबिलिटी लेते हुए इस्तीफा दे दिया।
आखिर इस डील में हुआ क्या था?
कहानी शुरू होती है साल 2024 से। उस समय यूक्रेन को आर्टिलरी एमिनेशन की भारी जरूरत थी। रूस के साथ युद्ध लंबा खींच चुका था और यूक्रेन लगातार पश्चिमी देशों से गोला बारूद की मांग कर रहा था। एस्टोनिया भी यूक्रेन का खुलकर समर्थन कर रहा था और उसकी कोशिश थी कि ज्यादा से ज्यादा एमिनेशन यूक्रेन तक पहुंचाया जाए। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए एस्टोनिया के सेंटर फॉर डिफेंस इन्वेस्टमेंट यानी आरकेआईके ने एक कंपनी के साथ आर्टिलरी शेल की सप्लाई के लिए कॉन्ट्रैक्ट किए। यह कंपनी डाटा सेल एसआरएल जो इटली में रजिस्टर्ड थी। लेकिन इस कहानी में भारत की एंट्री यहीं से हुई। डाटा सेल को मार्च 2024 में भारत की नेको डिफेंस मिनिशन ने एक्वायर कर लिया था। यानी कंपनी इटली में रजिस्टर्ड थी लेकिन उसका मालिकाना हक अब भारतीय कंपनी के पास आ गया था। और सबसे बड़ा सवाल यहीं से पैदा हुआ। रिपोर्ट्स के मुताबिक डाटा सेल के पास आर्टिलरी शेल बेचने का कोई स्थापित पिछला रिकॉर्ड नहीं था। यानी एस्टोनिया ने जिस कंपनी को इतने बड़े एमिनेशन कॉन्ट्रैक्ट के लिए चुना वो इस क्षेत्र में पहले से कोई बड़ा जाना पहचाना सप्लायर नहीं थी। अब एस्टोनिया ने इस डील में करीब 70 मिलियन यूरो यानी 768 करोड़ से ज्यादा की रकम एडवांस में दे दी। पहले डील अगस्त 2024 में हुई और करीब 15 मिलियन यूरो का एडवांस दिया गया। अक्टूबर में एक कॉन्ट्रैक्ट और हुआ और 10 मिलियन यूरो से ज्यादा की रकम आगे दी गई। इसके बाद भी कॉन्ट्रैक्ट हुए और कुल एडवांस पेमेंट करीब 70 मिलियन यूरो तक पहुंच गई। यह पैसा यूरोपीय संघ की यूरोपियन पीस फैसिलिटी से जुड़े फंडिंग मैकेनिज्म के जरिए आया था जिसका इस्तेमाल यूक्रेन की सैन्य मदद के लिए किया जा रहा था। यानी पूरा मामला सिर्फ एस्टोनिया की अपनी डिफेंस से प्रोक्योरमेंट का नहीं था। इसमें यूरोपीय फंडिंग भी जुड़ी थी और मकसद था यूक्रेन को आर्टिलरी एमिनेशन उपलब्ध कराना। लेकिन इसके बाद जो हुआ उसने इस पूरी डील की तस्वीर बदल दी।
भारत की कंपनी इस डील में कैसे आई?
गोला बारूद कुछ महीनों के भीतर पहुंचना था लेकिन डिलीवरी लगातार टलती रही। प्रोडक्शन से जुड़ी समस्याओं का हवाला दिया गया। एस्टोनिया इंतजार करता रहा और जब 2025 में एमिनेशन की शिपमेंट पहुंची तो उसके सामान की क्वालिटी को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए। एस्टोनियाई पक्ष का कहना था कि सामान निर्धारित रिक्वायरमेंट के मुताबिक पूरा नहीं था और क्वालिटी स्टैंडर्ड पर भी खरा नहीं उतरा। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक शिपमेंट में जरूरी कॉमोनेंट्स तक पूरे नहीं थे। इसके बाद एस्टोनिया ने कॉन्ट्रैक्ट टर्मिनेट कर दिए और एडवांस में दी गई रकम वापस मांगनी शुरू कर दी और यहीं से यह मामला प्रोक्योरमेंट डिस्प्यूट से निकलकर राजनीतिक संकट बन गया। मतलब जो डील हुई थी जो गोला बारूद की डील थी वो अपने तय मानक पूरे नहीं कर पाई और यहां से पूरा विवाद शुरू हुआ। एस्टोनिया के डिफेंस इन्वेस्टमेंट सेंटर के मौजूदा प्रमुख एलमार वाहेर ने तो यहां तक कह दिया कि उनकी राय में यह कॉन्ट्रैक्ट किया ही नहीं जाना चाहिए था। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई घर बनवाने के लिए ऐसी कंपनी को चुन ले जिसने पहले कभी घर बनाया ही नहीं तो पहले से ही सवाल खड़ा हो जाता है कि वो घर पूरा कर पाएगी या नहीं और इस कंपनी के साथ भी यही हुआ क्योंकि इस कंपनी के पास एमिनेशन बनाने का कोई पुराना रिकॉर्ड नहीं था और उसके साथ इतने बड़े स्तर पर एक डील हो गई। लेकिन कहानी का एक दूसरा पक्ष भी है। डाटा सेल ने एस्टोनिया के आरोपों को स्वीकार नहीं किया। कंपनी का कहना है कि उसने बड़ी मात्रा में सामान सप्लाई किया और करीब 58 मिलियन यूरो के इनवॉइसेस जमा किए।
डिफेंस मिनिस्टर की कुर्सी क्यों गई?
यही एस्टोनिया की पॉलिटिक्स इस कहानी को बाकी डिफेंस प्रोक्योरमेंट मामले से अलग बनाती है। एस्टोनिया के डिफेंस मिनिस्टर हेनो पेपकोर जो 2022 से इस पद पर थे। उन्होंने 2 सितंबर 2026 को इस्तीफा देने का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि डिफेंस मिनिस्टर हर एमिनेशन कॉन्ट्रैक्ट खुद नेगोशिएट नहीं करता और वह व्यक्तिगत तौर पर इस कॉन्ट्रैक्ट की बातचीत में शामिल नहीं थे। लेकिन उनके मंत्रालय के अधीन डिफेंस सेक्टर की ओवरऑल पॉलिटिकल रिस्पांसिबिलिटी उनकी थी। इसीलिए उन्होंने इसकी जिम्मेदारी स्वीकार की।
Continue reading on the app